Sunday, May 31, 2009

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -114

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -114

- पंकज अवधिया

(हनुमान लंगूर और नि:संतान दम्पत्ति)

एक छोटी सी झोपडी के सामने महिलाओ की लम्बी कतार लगी देख मैने गाडी रुकवाई और लोगो ने इस बारे मे पूछा। लोगो ने बताया कि नि:संतान महिलाए यहाँ बाबा के दर्शन करने के लिये कतार मे खडी है। मैने गाडी किनारे करवायी और वही खडा हो गया। इतने मे बाबा का एक एजेंट आया और गाडी के अन्दर झाँकते हुये बोला कि अकेले आये हो? आपका इलाज नही होगा। अपनी घरवाली को लेकर आओ। ड्रायवर ने इस धृष्टता पर कुछ कहना चाहा तो मैने उसे चुप करा दिया। मैने एजेंट को जवाब दिया कि मुझे सारी प्रक्रिया देख लेने दो फिर मै अपनी पत्नी को लेकर आ जाऊँगा। इस पर वह बोला कि पैसा जमा करा दो ताकि अगली बार कतार मे न लगना पडे। कतार मे न लगने के लिये 1000 रुपये और वैसे 100 रुपये। मैने कहा कि मै पैसे बाबा ही को दूंगा। पहले मुझे इलाज देखने तो दो।


कुछ देर बाद हलचल बढी। बताया गया कि बाबा आ गये है। पास ही तुलसी चौरा था। वहाँ बैठकर एक अधेस मंत्र पढ रहा था। मंत्र स्पष्ट नही थे पर जै काली कलकत्ते वाली बार-बार सुनायी देता था। महिलाओ को एक पौधे पर नारियल चढाना होता था और फिर बाबा के पैर पडकर वापस लौट जाना पडता था। कोई जाँच नही होती थी और न ही किसी किस्म की जडी-बूटी दी जाती थी। थोडी देर तक बाबा को ध्यान से देखने पर याद आया कि इनसे कही मुलाकात हुयी है।अरे, ये तो दुकालू है। वही दुकालू जो मुझे राजिम के मेले मे साँप भगाने की जडी-बूटी बेचते अक्सर मिलता था। मैने उसपर एक फिल्म भी बनायी थी जिसमे उसने कहा था कि आजकल धन्धा नही चल रहा है। हो सकता है कि उसने इसी के चलते यह शार्टकट चुना हो। मै उधेडबुन मे लगा ही था कि उसने मुझे पहचान लिया। कुछ सकपकाते हुये पास आ गया। उसके सामने नोटो का ढेर लगा था। चारो ओर भक्तो की भीड थी। मैने कोने मे ले जाकर उससे उस नये रुप के बारे मे पूछा तो उसने कहा कि उसके पास एक विशेष वनस्पति है जिसे नारियल अर्पित करने से बच्चे हो जाते है। वह इसे हिमालय से लाया है। लो जी कर लो बात। अब दुकालू भला कब हिमालय चला गया? फिर नारियल चढाने से तो बच्चे नही हो जाते। मैने वनस्पति पास से देखनी चाही। वनस्पति के पास जाते ही मेरे मुँह से बरबस निकल पडा हनुमान लंगूर


मै अकसर देहाती बाजारो और ग्रामीण मेलो की खाक छानते रहता हूँ। मुझे सिरपुर मे लगने वाला मेला याद आ गया। वहाँ मैने हनुमान लंगूर को देखा था। देखा क्या था इसे खरीदने के लिये मुँहमाँगे दाम दिये थे। हनुमान लंगूर नाम सुनकर मै उस समय भी चौका था। आमतौर पर हनुमान लंगूर काले मुँह वाले बन्दर को कहा जाता है। किसी को वनस्पति विशेष को हनुमान लंगूर कहते मैने पहली बार सुना था। यह स्थानीय बोली का नाम भी नही था। छत्तीसगढ मे बन्दर के लिये बेन्दरा शब्द है। लंगूर तो स्थानीय भाषा का शब्द नही है।

सिरपुर के मेले मे जडी-बूटी बेचने वाला दावे कर रहा था कि पशु-चिकित्सा के लिये उसके पास एक दिव्य वनसप्ति है। दावे जोरदार थे पर वनस्पति कही नही दिखायी दे रही थी। उसका कहना था कि एडवांस देने पर ही वनस्पति दिखायी जायेगी। उसकी माँग पूरी की गयी तो मुझे हनुमान लंगूर दिखायी गयी। बताया गया कि इसकी आकृति बन्दर की पूँछ की तरह है इसलिये इसे यह नाम मिला। इसके गुणो का बखान करते-करते जडी-बूटी वाला इतना ऊपर चढ गया कि उसने इसे संजीवनी बूटी भी कह डाला। मुझे यह वनस्पति स्थानीय नही लगी। यह कैक्टस का एक प्रकार है। सिरपुर के मेले के बाद मैने यह वनस्पति बहुत से तांत्रिको के पास देखी। दवा के रुप मे इसके प्रयोग के दावे सुने पर कोई इसके तथाकथित प्रभावो को प्रमाणित नही कर सका। मैने भूत-प्रेत उतारने के नाम पर इसी काँटेदार कैक्टस से बेकसूर महिलाओ को पिटते भी देखा।

मैने दुकालू से ही इस गोरखधन्धे के स्त्रोत के बारे मे जानना चाहा। उसने कुछ भी बताने से इंकार कर दिया। भीड उसके साथ थी। जब पुलिस मे शिकायत की धमकी दी गयी तो उसने अलग से बात करने की इच्छा जतायी। आखिर उसने राज खोला। देखिये साहब, आस-पास की वनस्पति को उठाकर उससे झाड-फूँक करो तो लोगो मे प्रभाव नही पड्ता। इसलिये राजधानी के नर्सरी वालो से सम्पर्क किया है। ये नर्सरी वाले कलकत्ता से जुडे है। ये अजीबोगरीब पौधे लाकर देते है, जिन्हे हिमालय से साधना के बाद प्राप्त की गयी जडी-बूटी कहकर हम इलाज का ढोंग करते है। हमे इन नर्सरी वालो को लगातार हिस्सा देना होता है। छत्तीसगढ और उडीसा मे ऐसे सैकडो तांत्रिक है जो इस तरह के गोरखधन्धे मे लगे है।

नर्सरी वालो का नाम सुनते ही मुझे दिल्ली के एक नर्सरी वाले की याद आ गयी। आफ्रीका से लाये एक पौधे को दिल्ली का यह नर्सरी वाला एक एनजीओ की मदद से कल्पवृक्ष बताकर बेचने की तैयारी मे है। एक निजी टीवी चैनल ने तो बकायदा इसे देश भर को दिखाना शुरु कर दिया है। उसका दावा है कि इसके नीचे बैठने से समस्त मनोकामनाए पूर्ण हो जाती है। जल्दी ही इसे बाजार मे लाने की तैयारी है। इस गोरख धन्धे से असंख्य भारतीयो को उनकी धार्मिक आस्था का लाभ उठाकर ठगा जायेगा। नर्सरी वालो की इन करतूतो को सामने लाने मैने यह लेख लिखा है। आम लोगो के जागने की देर है। एक बार वे जाग गये तो पाखंडियो के पैर उखडते समय नही लगेगा। (क्रमश:)


(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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मुम्बई हमले ने की विदेशी पर्यटको की संख्या मे कमी

मुम्बई हमले ने की विदेशी पर्यटको की संख्या मे कमी

(मेरी कान्हा यात्रा-11)

- पंकज अवधिया

इस बार कान्हा मे पर्यटको का जबरदस्त टोटा है। क्या यह मन्दी का असर है? विदेशी पर्यटक तो जैसे पैसे खर्च करना ही नही चाहते। कान्हा मे सभी के चेहरे पर चिंता की लकीरे साफ दिखती है। रात को चर्चा के दौरान स्थानीय लोगो ने बताया कि मन्दी से ज्यादा मुम्बई हमलो ने हमारी कमर तोड दी है। उसके बाद से पर्यटको का आना एकदम से कम हो गया है। पहले भारत को सुरक्षित देश माना जाता था पर अब जब जान पर ही बन आये तो भला कोई क्यो आना चाहेगा?


देशी पर्यटक बजट देखकर चलते है। उनसे मोटी कमायी की ज्यादा उम्मीद नही की जा सकती-ऐसा लोगो ने बताया। उनका व्यवसाय विदेशी पर्यटको से चलता है। मुझे अपनी यात्रा के दौरान बहुत कम विदेशी सैलानी दिखे। उनसे चर्चा हुयी तो वे अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित दिखे। वे भारत की मेहमाननवाजी से खुश दिखे पर येन-केन-प्रकारेण ऐसे या वैसे, किसी भी रुप मे अतिरिक्त पैसे झटक लेने के रिवाज से कुछ क्षुब्ध दिखे। अक्सर विदेशी पर्यटक इंटरनेट के इस युग मे अपनी भारत यात्रा के हर पहलू पर लेख लिखते है। इससे नये पर्यटको को बहुत सहायता मिलती है। वे और सोच-समझ कर पैसे खर्च करते है। आखिर पैसे की कीमत सभी के लिये है। एक पुराने होटल मालिक ने कहा कि पहले गोरे साहब खुश होकर हजारो लुटा जाते थे पर अब यह धीरे-धीरे कम हो रहा है।

हाल के कुछ वर्षो मे रिसोर्ट और होटलो की संख्या मे अप्रत्याशित वृद्धि हुयी है। इससे गला काट स्पर्धा आरम्भ हो गयी है। इससे कुछ हद तक पर्यटको को फायदा है पर कान्हा मे ज्यादातर पर्यटक सालाना छुट्टियो मे आते है। इतनी बडी संख्या मे कि व्यवस्था ही चरमरा जाती है। कमरे भर जाते है तो पर्य़टक भरी ठंड मे बरामदो मे सोने को तैयार हो जाते है। जिप्सी रात को 1000 रुपयो मे बुक की जाती है तो सुबह ज्यादा पैसे मिलने पर वे दूसरी सवारी लेकर निकल जाते है। उनका तर्क होता है कि ये कुछ दिन ही होते है कमायी के। कान्हा जाने वाले पर्यटको को यही सलाह देनी चाहिये कि वे छुट्टियो के पीक समय मे न जाये। साल भर जाये ताकि पार्क और उसके वन्य जीव भी इस अनावश्यक दबाव से बचे रह सके।

साहब, आज खाली है पर कल से सारे कमरे बुक है, सीजन के आखिर तक।बस ऐसा ही कहकर रिसोर्ट और होटल मालिक सब्जबाग सजाये होते है। दूसरे दिन पहुँच जाओ तो फिर सब खाली मिलता है। इस कठिन समय मे उन्हे भी समय के साथ बदलने और नये उपायो को अपनाने की जरुरत है ताकि पर्यटको के आने का क्रम बना रहे। (क्रमश:)


सोन कुत्ते के घेरे से बचते हिरण

इंडियन घोस्ट ट्री


रिसोर्ट के बागीचे मे गाजर घास


गाजर घास गर्मियो मे भी रौनक बिगाड रही है


इतने छोटे हाथी पर बाघ देखने की तैयारी?


लिसोडा का पेड



(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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Saturday, May 30, 2009

आप कान्हा आये और खातिरदारी का मौका ही नही दिया

आप कान्हा आये और खातिरदारी का मौका ही नही दिया

(मेरी कान्हा यात्रा-10)
- पंकज अवधिया


“आपके लेखो ने तो हमारे विभाग मे हडकम्प मचा रखा है। अब और कितना लिखेंगे? आप कब आये और इतने दिन बिता कर चले गये हमे कानो कान खबर तक नही हुयी। आपने हमे खातिरदारी का मौका ही नही दिया। सूखे-सूखे चले गये। आपके लिखे को पढकर लगता है कि आप कान्हा मे पन्द्रह दिन तो अवश्य रुके होंगे। आपने न जाने कितनी सफारी की होगी पर रजिस्टर मे आप दिखे नही। क्या सब गोपनीय तरीके से किया? अगली बार आइयेगा तो सूचना देकर आइयेगा-----“ कान्हा यात्रा पर लिखी जा रही इस लेखमाला को पढकर जंगल विभाग के एक मित्र ने यह सन्देश भेजा। ब्लाग पर लिखे जा रहे इस हिन्दी लेखमाला को इस तरह से पढा जायेगा इसकी उम्मीद कम थी।

13 मई, 2009 को दोपहर तीन बजे पहुँचने के बाद मै दूसरे दिन अर्थात 14 मई को दो बजे वापस लौट पडा यानि मै चौबीस घंटो से भी कम समय तक कान्हा मे रुका। इस छोटी यात्रा मे मैने दो सफारी की। हजारो चित्र लिये। दो बार उसे भी देख लिया न चाहते हुये भी, जिसे देखने लोग मजमा लगाये रहते है यानि कि टाइगर। रात की नीन्द भी ली। दसो स्वास्थ्य समस्याओ से जूझ रहे लोगो को परामर्श दे दिया। सारे रिसोर्ट घूम आया और साथ ही किसानो से भी बात कर ली। इस लेखमाला मे अभी बहुत कुछ लिखना बाकी है। यदि उपयोगिता के नजरिये से देखा जाये तो एक दिन बहुत बडा होता है और अमूमन एक दिन की यात्रा से इतनी सारी जानकारियाँ एकत्र हो जाती है कि बहुत कुछ लिखा जा सकता है।

कान्हा का जो चित्र मैने अपने मन मे सजाया था यथार्थ मे मैने उसे उल्टा पाया। मैने कान्हा के बारे मे सूट-बूट लगाये शोधकर्ताओ और जंगल प्रबन्धन के लोगो को बडी-बडी बाते करते अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनो मे बहुत बार सुना था। कान्हा को बहुत से इनाम भी मिले है पर जिस स्थिति मे मैने पार्क को देखा वैसी स्थिति दिल को दुखा देने वाली थी। एक बात तो एकदम स्पष्ट हो गयी कि सूट-बूट वाले लोगो ने बन्द कमरो मे बैठकर भ्रमित करने वाली रपट बनायी होगी जैसा कि अक्सर वे करते है। कान्हा मुझे पर्यटको के दबाव मे ऐसा बीमार लगा कि कम से कम तीन साल तक इसे अपने हाल मे छोड देने का अनुमोदन करने का मन हुआ। पर मुझे मालूम है कि पर्यटको का जबरदस्त दबाव झेल रहे वन्य प्राणियो की किसी को चिंता नही है। वे तो जब तक बचे रहेंगे तब तक जिप्सियो मे सवार आँखे उन्हे घूरती रहेंगी। वे इस धरती से विदा भी कैमरे की क्लिक के साथ लेंगे पर कान्हा जैसे नेशनल पार्को की जमीनी हकीकत के बारे मे लिखकर मै योजनाकारो को झकझोरना चाहता हूँ। यह लेखमाला इसी दिशा मे एक छोटा सा प्रयास है।

कान्हा की यह यात्रा मैने अपने खर्च पर की थी। मुझे मालूम है कि सरकारी खातिरदारी की कितनी बडी कीमत चुकानी पडती है? पेंच टाइगर रिजर्व का मेरा अनुभव ऐसा ही रहा है। वहाँ से लौटकर भी कई सालो पहले मैने पार्क के अन्दर से बहने वाली पेंच नदी के तट पर गाजर घास के निर्बाध फैलाव के बारे मे दुनिया को बताया था। पता नही आज यह घास कितने बडे क्षेत्र को अपने आगोश मे ले चुकी होगी?

कान्हा मे ढेरो शोध कार्य हो रहे है। देशी-विदेशी शोधकर्ताओ का जमावडा लगा हुआ है। न जाने कितने पैसे पानी की तरह बहाये जा रहे है? इनमे से एक भी शोध-कार्य जमीनी हकीकत को बयान करे और उसकी सलाह पर पार्क प्रबन्धन त्वरित कार्यवाही करे तो इस नेशनल पार्क का कायापलट हो सकता है। (क्रमश:)
(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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छत्तीसगढ मे तथाकथित विकास की बलिवेदी पर चढाये गये जीवनदाता वृक्ष : भाग-1

छत्तीसगढ मे तथाकथित विकास की बलिवेदी पर चढाये गये जीवनदाता वृक्ष : भाग-1

- पंकज अवधिया


सिरसा-गस्ती सन्युक्त पेड


तेज बरसात के बीच हम पाँच लोग जैसे-तैसे उस पेड तक पहुँचे। हमारे पास विदारीकन्द, तेलिया कन्द जैसे कई प्रकार के कन्दो का सूखा मिश्रण था। हमे जल्दी थी कि कब हम पेड तक पहुँचे और इन मिश्रणो को जड खोदकर दबा आये। हमे जंगल मे नही जाना था। यह पेड था हाइवे के किनारे। तूफानी रात मे जाना मजबूरी थी क्योकि वही शुभ दिन बताया गया था कन्दो को गाडने के लिये। दिन भर तो हम जंगलो की खाक छानते रहे कंदो की तलाश मे। वापस लौटते रात हो गयी। पेड के पास पहुँचकर हमारे साथ आये पारम्परिक चिकित्सको ने कुछ मंत्र पढे फिर कन्दो को दबाने का काम शुरु हो गया। एक घंटे बाद हा पूरी तरह से काम निपटा चुके थे। रात को आते-जाते लोग पता नही हमे क्या समझ रहे थे।


रायपुर से आरंग जाते वक्त यह पेड बायी ओर पर था। यह सिरसा (शिरीष) का पुराना पेड था और इसमे गस्ती नामक दूसरी वनस्पति ने जगह बना ली थी। गस्ती पीपल और बरगद के परिवार का है। इसके फल चिडियो द्वारा पसन्द किये जाते है। बीज चिडियो के मलद्वार से बिना पचे बीट के साथ निकल जाते है। ये बीज उचित परिस्थिति पाते ही फिर से उग जाते है। छत्तीसगढ मे आप गस्ती को बहुत से पेडो पर उगता पायेंगे। यह परजीवी नही होता है। आधुनिक विज्ञान भले ही इसे साधारण घटना के रुप मे देखे पर पारम्परिक चिकित्सक इस तरह सन्युक्त पेडो को माँ प्रकृति का वरदान मानते है। वे ऐसे दो पेडो का अध्य्यन कर आसानी से बता देते है कि एक ने दूसरे के औषधीय गुणो को प्रभावित किया है या नही। इस बात को और आसानी से समझने के लिये हम सिरसा और गस्ती का उदाहरण ले।


सिरसा और गस्ती दोनो ही के पौध भागो का प्रयोग बतौर औषधी होता रहा है। बहुत से मामलो मे सिरसा रोगी को उतना आराम नही पहुँचा पाता जितनी कि उससे उम्मीद होती है। ऐसे समय मे पारम्परिक चिकित्सक ऐसे सन्युक्त पेडो की तलाश करते है। वे बताते है कि जो काम सिरसा नही कर पा रहा है वही काम सिरसा के ऊपर आश्रित रहने वाला गस्ती कर सकता है। यह गहन ज्ञान है जो पारम्परिक चिकित्सको के पास पीढीयो के अनुभव से आया है।


पारम्परिक चिकित्सको के बीच आपसी संवाद कम ही होता है। वे अपने साथियो से या तो जंगलो मे मिल लेते है या हाट बाजार के दौरान। कुछ अपने ज्ञान के बारे मे कुछ नही बोलते है तो कुछ खुशी-खुशी ज्ञान बाँटते है इस उम्मीद मे कि इससे उन्हे दूसरो से नया ज्ञान मिलेगा। इसी आपसी चर्चा से सिरसा-गस्ती के सन्युक्त पेड की महिमा दूर-दूर तक फैल गयी थी। जिन्होने यह महिमा फैलायी थी उनका ही जिम्मा था कि वे इसे औषधीय गुणो से सम्पन्न करते रहे। मै अक्सर औषधीय वनस्पतियो को औषधीय गुणो से सम्पन्न करने के पारम्परिक ज्ञान के बारे मे लिखता रहता हूँ। यह अद्भुत ज्ञान है जिसकी मिसाल दुनिया मे नही मिलती है। इसे अंग्रेजी मे ट्रेडीशनल एलिलोपैथिक नालेज का वैज्ञानिक नाम मिला है। यदि आप इसे गूगल मे सर्च करेंगे तो आपको केवल छत्तीसगढ के परिणाम मिलेंगे हजारो शोध लेखो के हवाले से।


सिरसा-गस्ती सन्युक्त पेड को साल मे बारह से अधिक बार औषधीय गुणो से परिपूर्ण किया जाता रहा। यह मेरा सौभाग्य है कि मै हर बार इस अनुष्ठान मे शामिल रहा। ऊपर आपने कन्दो के मिश्रण के बारे मे पढा। यह मिश्रण सिरसा-गस्ती सन्युक्त पेड को औषधीय गुणो से परिपूर्ण बनाने के लिये गाडा गया था। दो महिने बाद रक्त सम्बन्धी रोगो की चिकित्सा के लिये पारम्परिक चिकित्सक इस सिरसा-गस्ती सन्युक्त पेड के पौध भाग एकत्रित करने वाले थे। उसी की तैयारी थी यह सब। उनका कहना था कि दो महिने मे ये कन्द सडकर अपने रसायनो से सिरसा-गस्ती सन्युक्त पेड को औषधीय गुणो से समृद्ध कर देंगे।


पारम्परिक चिकित्सक गुपचुप तरीके से यह काम करते रहे। उन्हे डर था कि इसका प्रचार होते ही धार्मिक माफियाओ का यहाँ कब्जा हो सकता है। धार्मिक माफियाओ का कब्जा तो नही हुआ पर जब यहाँ फोरलेन सडक का निर्माण हुआ तो एक झटके मे ही इसे काट दिया गया। दूसरे दिन इस दुखद खबर को पाकर जब हम लाश की तलाश मे निकले तो पता चला कि वह टुकडो मे बँटकर चूल्हो और आस-पास के ढाबो की भट्टियो मे जलकर खाक हो चुकी थी। साथ चल रहे पारम्परिक चिकित्सको ने बिना देरी राख एकत्र कर ली और किसी कीमती निशानी के रुप मे सहेज लिया। उनकी आँखो मे आँसू थे।

मैने इस पेड से जुडी सैकडो तस्वीरे खीची है। इसकी महिमा का बखान करते सैकडो पन्ने मेरे डेटाबेस मे है। पर अब सिरसा-गस्ती सन्युक्त पेड इतिहास बन चुका है। पारम्परिक चिकित्सक पीढीयो से सम्भाल कर रखे इस पेड के खो जाने से इतने दुखी है कि अब उन्होने रोगियो को लौटना शुरु कर दिया है। इस तरह के हजारो पेड छत्तीसगढ मे होंगे पर आरंग मार्ग पर स्थित इस पेड को विशेष दर्जा प्राप्त था। इसे खोने का गम अपनो के खोने के कम से अधिक ही रहा हम सब को। (क्रमश:)


(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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Friday, May 29, 2009

प्राकृतिक जंगल मे कांक्रीट जंगल का बढता साम्राज्य

प्राकृतिक जंगल मे कांक्रीट जंगल का बढता साम्राज्य

(मेरी कान्हा यात्रा-9)
- पंकज अवधिया



कान्हा नेशनल पार्क के लिये मैने रायपुर से चिल्फी घाटी होते हुये बिछिया का रास्ता चुना था। कान्हा के खटिया गेट तक पहुँचते-पहुँचते यह लगने लगा था कि हम गलत जगह आ गये है क्योकि यहाँ जंगल का नामोनिशान नही था। जिधर देखो उधर खेत नजर आते थे। जंगली पौधो के नाम पर पलाश ही बिखरे दिखायी देते थे। जैसे ही हम मोचा गाँव पहुँचे हमे जंगल नजर आने लगे। पर अफसोस ये असली जंगल न होकर कांक्रीट जंगल थे। कुकुरमुत्तो की तरह भाँति-भाँति के होटल और रिसोर्ट नजर आ रहे थे। पर्यटक कम थे पर उनके स्वागत के लिये लोगो मे होड लगी थी। मै लगभग सभी रिसोर्ट मे गया पर वे मुझे कांक्रीट जंगल के हिस्से नजर आये। रिसोर्ट के हट्स हो या कमरे, अन्दर जाने पर लगता है जैसे आप किसी आधुनिक शहर मे हो। जंगल का कोई अहसास ही नही होता है। एसी, फ्रिज, टब बाथ से लेकर तमामा शहरी सुविधाए है। टेबल टेनिस और स्वीमिंग पूल है। पर इन सब बेवजह की सुख-सुविधाओ को परोसने वाले रिसोर्ट मालिक यह नही समझ पाते है कि पर्यटक इन सब से बचने के लिये दूर जंगल मे सुकून के लिये आते है। अब उसे कमरे मे बन्द होकर आई.पी.एल. का मैच ही देखना है तो वो भला क्यो हजारो रुपये खर्च करके कान्हा आयेगा?

कान्हा मे रिसोर्ट मालिको ने बहुत सी जमीने खरीदी है। उसमे शायद पेड लगाने की योजना हो पर अभी तो वे खाली ही है। कुछ हिस्सो मे सजावटी पौधे लगाये गये है पर ये वही पौधे है जिन्हे आप-हम शहरो मे देखते है। इनके लिये बहुत पैसे खर्चे गये होंगे पर पर्यटको के लिहाज से ये ठीक नही है। यदि स्थानीय वनस्पतियो को लगाया जाता तो पर्यटक ज्यादा आकर्षित होते।

“तो आपके कहने का मतलब है कि कान्हा मे पर्यटक पार्क के लिये आये पर उनके आगमन का एक बडा उद्देश्य रिसोर्ट मे ठहरना भी हो। क्या ये सम्भव है?” एक रिसोर्ट मालिक ने मुझसे चर्चा के दौरान यह प्रश्न किया। मैने कहा कि हाँ, यह सम्भव है। आज इतना अधिक खर्चने के बाद भी रिसोर्ट मे पर्यटको का टोटा है। इसके दसवे हिस्से के खर्च से ही रिसोर्ट को प्रकृति के करीब लाया जा सकता है। इस कांक्रीट जंगल को प्राकृतिक जंगल मे समाहित किया जा सकता है। उन्होने मुझे कार्य योजना बनाने को कहा है।

कान्हा नेशनल पार्क के आस-पास के कुछ गाँवो मे ही सारे के सारे होटलो और रिसोर्ट को स्थापित कर देना समझ से परे है। यदि ऐसी योजना हो कि एक गाँव मे दो से तीन रिसोर्ट ही हो और गाँव के विकास की जिम्मेदारी इन रिसोर्ट की हो तो सभी का विकास हो सकता है। जैसा कि मैने पहले कहा, कान्हा से कुछ दूर जाने पर ही जंगलो का नामो-निशान मिट जाता है। खाली जमीने है पर उनमे वनस्पतियाँ नही है। एक बडे हिस्से मे स्थानीय वनस्पतियो के पुनरोपण की मुहिम चलायी जाये और इसमे रिसोर्ट व गाँवो दोनो को जोडा जाये तो न केवल जंगल का विस्तार हो सकेगा बल्कि बडी संख्या मे पर्यटक भी आ सकेंगे।

कान्हा के आस-पास के किसान पारम्परिक फसलो की खेती करते है। पार्क मे कोई बाड न होने के कारण वन्यजीव खेतो की फसल को नुकसान पहुँचाते है। इससे किसानो और वन्य जीवो दोनो ही को नुकसान होता है। किसान अपनी फसल खोते है और वन्य जीव कीटनाशक युक्त फसलो का प्रयोग करके वापस जंगलो मे जहर लेकर चले जाते है। हिरन जैसे शाकाहारी जीव जब मरते है तो उन पर आश्रित रहने वाले टाइगर जैसे जीवो तक कीटनाशको के अंश चले जाते है। गिद्ध भी इनसे नही बच पाते है। इन क्षेत्रो मे ऐसी फसलो को बढावा दिया जा सकता है जिन्हे वन्य जीव पसन्द नही करते है। इनमे औषधीय और सगन्ध फसले हो सकती है। इन्हे जैविक विधि से उगाया जाता है इसलिये न तो पार्क को कोई नुकसान होगा और न ही वन्य जीवो को। जंगल के करीब होने के कारण यहाँ उगायी गयी फसले औषधीय गुणो से परिपूर्ण होंगी। इन फसलो से अंतिम उत्पाद ग्रामीण कुटिर उद्योग के माध्यम से बने और रिसोर्ट के माध्यम से इनकी बिक्री की व्यवस्था सुनिश्चित हो। आप ही बताइये यदि आप ऐसे स्थान पर जाये जहाँ सुबह के दंत मंजन से लेकर रात को नीन्द लाने वाले औषधीय तेल वही उगायी जा रही फसलो से तैयार किये गये हो तो निश्चित ही आप बारम्बार वहाँ जाना पसन्द करेंगे कि नही?

हमारे बुजुर्गो ने जंगलो को नयी पीढी के लिये सहेज कर रखा। उन्होने जंगलो का विस्तार भी किया। पर हमारी पीढी न केवल जंगलो को कांक्रीट जंगलो मे बदलने आमदा है बल्कि नये जंगल की तैयारी भी नही कर रही है। क्यो न कान्हा से ही जंगलो के विस्तार की पहल हमारी पीढी करे? (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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जैव-विविधता को धता बताते हुये यूकिलिप्टस को बढावा

जैव-विविधता को धता बताते हुये यूकिलिप्टस को बढावा

(मेरी कान्हा यात्रा-8)
- पंकज अवधिया



“कान्हा और आस-पास के गाँव मे बडी मात्रा मे यूकिलिप्टस का रोपण किया जाना है। इसके लिये लगातार बैठके लेकर किसानो को प्रेरित किया जा रहा है कि वे इस विदेशी प्रजाति को बडे पैमाने पर लगाये।“ कान्हा पहुँचते ही मेरी मुलाकात श्री अमित से हुयी जो बफर जोन समिति के अध्यक्ष है। वे अपना एक मोटल चलाते है। उन्होने ने ही इस बैठक के बारे मे बताया। जैव-विविधता से पूर्ण कान्हा नेशनल पार्क के इतने करीब आस्ट्रेलियाई मूल के यूकिलिप्टस का रोपण समझ से परे है। आम जनता यूकिलिप्टस के बारे मे सब जानती है। देश जल संकट से गुजर रहा है और हमारे योजनाकार भूमिगत जल के शत्रु को बढावा दे रहे है। कान्हा की चिडियो को देखने दूर-दूर से लोग आते है। यूकिलिप्टस चिडियो के लिये अभिशाप है। इसकी पत्तियाँ जब जमीन मे गिरती है तो देर से सडती है। जमीन को सदा के लिये अम्लीय कर देती है। फिर यूकिलिप्टस से निकले एलिलोरसायन अपने आस-पास गिनी-चुनी वनस्पतियो को ही उगने देते है। यह जाने बगैर कि यूकिलिप्टस कान्हा की किन प्रजातियो को सीधे नुकसान पहुँचायेगा, इसे लगाने के लिये बकायदा बैठके ली जा रही है।

पार्क मे सफारी के दौरान मुझे बताया गया कि पलाश के पौधे बहुत तेजी से जंगल मे फैलते है। इससे कान्हा नेशनल पार्क के घास के मैदान खतरे मे पड रहे थे। इस कारण पार्क से बडे पैमाने पर पलाश को छाँटा गया। पलाश तो भारतीय मूल का पौधा है। इसके बहुत से प्राकृतिक शत्रु भी है। इसके बाद भी वह निर्बाध गति से फैल रहा है। यूकिलिप्टस के प्राकृतिक शत्रु नही है। यह आस्ट्रेलिया से अकेले आया। भारतीय वन्य जीव इसकी पत्तियाँ नही खाते। एक बार इसने कान्हा जैसे क्षेत्र मे कदम रखा नही कि इसे फैलने मे जरा भी समय नही लगेगा। पलाश को साफ करने वाले योजनाकार आखिर क्यो यूकिलिप्टस से होने वाले खतरे को नजरान्दाज कर रहे है, यह समझ से परे है।

श्री अमित ने कहा कि कागज उद्योग की बढती माँग के लिये यूकिलिप्टस की खेती को प्रोत्साहित किया जा रहा है। एक बडी कम्पनी ने इसकी खेती के लिये अभियान चलाया है। मैने पूछा कि क्या वे पौध सामग्री ही बेच रहे है या निश्चित खरीद के लिये किसानो से लिखित समझौता भी कर रहे है। उनका कहना था कि अभी तो केवल लगाने की बात है। खरीदने पर वे चुप है। इसका मतलब यही है कि किसानो को छला जा रहा है। पर कान्हा और आस-पास के गाँवो मे किसान पर्यटन उद्योग से जुडे हुये है। साल के तीन महिनो यानि बरसात मे जब पार्क बन्द रहता है तो ही वे खेती करते है। बाकी समय तो पर्यटको से फुरसत नही मिलती है। इसलिये इस बात की सम्भावना कम है कि किसान इस नयी योजना को अपनाये। उन्हे खाने के लिये अन्न चाहिये। वे यूकिलिप्टस पर शायद ही अपनी हामी भरे। श्री अमित ने कहा कि किसानो का इंकार यानि और अधिक बैठके और प्रलोभन।

“क्या कान्हा और उसके आस-पास हो रही इन गतिविधियो की खबर स्थानीय मीडिया को है?” मैने जब यह प्रश्न आम लोगो के सामने रखा तो अलग-अलग जवाब मिले। ज्यादातर ने कहा कि मीडिया की नजर टाइगर पर ही होती है क्योकि टाइगर की खबरे चाव से पढी जाती है। स्थानीय स्तर पर बहुत सी खबरे छपती है पर वे राष्ट्रीय स्तर पर नही पहुँच पाती है। कान्हा मे अपनी मनमानी करने वाले यह अच्छी तरह से जानते है। यही कारण है कि ऐसी गतिविधियाँ निरंतर जारी है। (क्रमश:)
(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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Thursday, May 28, 2009

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -113

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -113 - पंकज अवधिया
(नुकसानरहित बीडी और सिगरेट पर चर्चा)


“दिन भर सोने से अच्छा है कि तेन्दू पत्ते की तुडाई के लिये चले जाओ। इस बार तो पैसे भी अच्छे मिल रहे है।“मैने जंगली क्षेत्र के एक ग्रामीण मित्र से कहा। वह पारम्परिक चिकित्सक है। ज्यादा जमीन नही है और न ही साधन इसलिये दूसरे किसानो की तरह गर्मी की फसल नही ले पाता है। अब गर्मियो मे ज्यादा जडी-बूटियाँ भी नही मिलती। इसलिये सारा दिन घर मे पडे-पडे बीतता है। “तेन्दू पत्ता तोडने चला तो जाऊँ पर घुनघुट्टी से कौन बचायेगा? और फिर बिच्छी से?” मेरे ज्यादा पीछे पडने पर उसने खीझ कर कहा। आप यदि ग्रामीण जीवन से जुडे है तो आप घुनघुट्टी को अवश्य जानते होंगे। खाली बैठने पर यह आँखो के कीचड के लिये आस-पास मंडराती रहती है। इतनी देर तक कि आप तंग आ जाये। ये छोटी मक्खीनुमा जीव शहरो मे नही मिलता पर गाँवो मे अभी भी सताता है। हम क्या जंगल के राजा भी इससे त्रस्त रहते है। इसलिये दिन के समय वे अन्धेरी जगह मे चले जाते है। रात को जब घुनघुट्टी का राज खत्म हो जाता है तब ही राजा माँद से बाहर आते है। तेन्दु पत्ता तोडने वालो को इनसे बचना पडता है। बिच्छी बिच्छू नही है। यह एक तरह की इल्ली है जिसके शरीर के काँटे होते है। यह इल्ली तेन्दु की पत्तियो को खाती है। यह पत्ती की निचली सतह पर होती है। जब अचानक ही पत्तियो को तोडते समय इन पर हाथ पडता है तो बिच्छू के डंक की तरह अहसास होता है। मित्र को इन दोनो की चिंता थी। काफी बहस के बाद मैने उसे सुझाव दिया कि चलो एक पहर मै साथ चलता हूँ। इससे उसका हौसला बढेगा। मेरी कमाई भी उसके ही खाते मे जायेगी। वह तैयार हो गया।

शायद हम पहले तेन्दु पत्ता एकत्र करने वाले होंगे जो जंगल तक कार से पहुँचे। हमे कुछ और लोग मिल गये। तय हुआ कि गाना गाते हुये आगे बढेंगे। इससे समय भी कटेगा और भालू जैसे उलझने वाले जीव भी दूर रहेंगे। जिस बात की आशंका मित्र को थी वह सामने आने लगी। घुनघुट्टी से हम परेशान होने लगे और बिच्छी के दंश ने हमारे हौसले पस्त कर दिये। दूसरे लोग मजे से गा रहे थे और आगे बढ रहे थे। उन्हे अपनी समस्या बतायी तो कुछ ने हमसे गांजे का सहारा लेने को कहा। पर हम इसके लिये तैयार नही थे। वे कहने लगे कि गाँजे से काटने पर उल्टे झटका कीडे को लगता है। एक बुजुर्ग ने बढिया उपाय सुझाया।

उन्होने तेन्दु की जड हमे दी और फिर उसके रस को हाथ मे लगाने को कहा। रस के सूखने पर हमे फिर से पत्तियाँ तोडने को कहा। हमने ऐसा ही किया। हमे इल्ली के काँटे लगने बन्द हो गये। वे त्वचा मे घुस रहे थे पर दर्द का अहसास नही हो रहा था। वाकई यह तो कमाल हो गया। उन्होने हमे पलाश सहित बहुत सी ऐसी वनस्पतियाँ दिखायी जिनका उपयोग दंश से रक्षा कर सकता है। मैने इस लेखमाला मे पहले लिखा है कि भारतीय सेना की सहायता के उद्देश्य से मै एक शोध दस्तावेज तैयार कर रहा हूँ। इसमे छत्तीसगढ के जंगलो मे मौजूद तमाम तरह के खतरे यानि बिच्छी से लेकर जंगली भैसे और जहरीले साँपो तक की पहचान और उनसे निपटने के जमीनी उपाय का विस्तार से वर्णन है। मैने बुजुर्ग से मिली इस जानकारी को उनके हवाले से इस दस्तावेज मे शामिल कर लिया है।

बुजुर्ग से विस्तार से चर्चा होने लगी। तेन्दु पत्ता तोडाई का काम जैसे हम भूल से गये। बुजुर्ग ने बताया कि मुझे यह काम पसन्द नही है। तेन्दु पत्ता से बीडी का निर्माण होता है। बीडी का प्रयोग मेहनत-मजदूरी करने वाले लोग अक्सर करते है। बुजुर्ग ने कहा कि बीडी से हमे सुकून मिलता है और तेन्दु पत्ता तोडाई से पैसे पर जब हमारे परिवार का कोई बीडी के जहर के कारण कैंसर की जकड मे आता है तो पीढीयो की कमायी उसमे लग जाती है और फिर भी हम जान नही बचा पाते है। यदि हम इस बात को समझ जाये और तेन्दु पत्ता की तोडाई बन्द कर दे तो न बीडी बनेगी और न ही लोग अकाल मौत मरेंगे। मुझे उन बुजुर्ग की बात सही लगी पर इतने बडे व्यापार को रोक पाना सम्भव नही जान पडा। तेन्दु की पत्तियो के धुँए के जानलेवा प्रभाव के बारे मे तो प्राचीन भारतीय ग्रंथ चेताते आ रहे है। आम लोग आँखो के सामने अपने घर को बरबाद होते देख रहे है पर इसका मोह नही छूट रहा है। ऐसा नही है कि तेन्दु पत्ता के व्यापार पर विराम लगाने की ये क्रांतिकारी बात मै पहली बार सुन रहा था। मुझे याद है कि एक कैसर के मरीज के साथ मध्य भारत के एक बीडी निर्माता कुछ वर्षो पहले मेरे पास आये थे।

“हमारी माताजी कैंसर की अंतिम अवस्था मे है। सारे देशी-विदेशी चिकित्सक जवाब दे चुके है। आप ही कुछ सुझाये।“ उन्होने मुझसे अनुरोध किया। मैने कुछ पारम्परिक चिकित्सको के पते दिये। चर्चा के दौरान उन्होने बताया कि सालो तक हम बीडी के धन्धे से हजारो घर बर्बाद कर अपने घर मे रोशनी बढाते रहे। पर वो कहते है न कि ऊपर वाले की लाठी मे आवाज नही होती। वैसे ही हमारे घर मे कब कैंसर ने दस्तक दे दी, हमे पता ही नही चला। इसके बाद हमने फैसला कर लिया कि अब हम यह धन्धा नही करेंगे पर “इजी मनी” के दीवाने हमारे बेटे इस धन्धे को बन्द करने तैयार नही है। अब हमे लगता है कि हमारा जीवन इसी अभिशाप के साये मे चलेगा।

यूँ तो “बाय डिफाल्ट” सिगरेट और बीडी हर्बल ही है पर ये जानलेवा उत्पाद है। इसमे कोई दो राय नही है। देश के पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान के दस्तावेजीकरण के दौरान मैने बहुत सी ऐसी हर्बल सिगरेट के बारे मे पारम्परिक ज्ञान का दस्तावेजीकरण किया जिसकी बानगी पूरी दुनिया मे नही मिलती। मिर्गी के रोगियो के लिये दसो किस्म की उपयोगी हर्बल सिगरेट है जो आज भी ग्रामीण अंचलो मे लोकप्रिय है। साँस की बीमारी से लेकर बवासिर और यहाँ तक कि साधारण सर्दी-जुकाम के लिये भी ऐसे देशी उत्पाद है। यह विडम्बना ही है कि इनमे से एक भी उत्पाद बाजार मे नही है। ग्रामीण कुटिर उद्योग की अपार सम्भावना लिये इस परियोजना के बारे मे किसी के पास सोचने तक का समय नही है।

कुछ वर्षो पहले हर्बल सिगरेट को व्यवसायिक तौर पर आम जनता के सामने लाने के लिये कुछ स्थापित निर्माताओ ने मुझसे सम्पर्क किया था। मैने अपनी कल्पनाशक्ति और अनुभव के हिसाब से ढेरो उत्पाद बनाये पर इस जद्दोजहद मे एक बात सामने आयी जिसने प्रयोग की दिशा ही बदल दी। जिसे बीडी या सिगरेट का नशा लग गया था वह बिना तम्बाकू वाली हर्बल सिगरेट मे मन नही रमा पाता था। और जो इन्हे नही पीता था उसे हर्बल सिगरेट मे भी मजा नही आता था। यह कडवी पर सीधी बात थी। हमे ऐसी हर्बल सिगरेट बनानी थी जिसे पीते वक्त लोगो को लगे कि वे मूल सिगरेट पी रहे है पर इससे उन्हे नुकसान न हो बल्कि हो सके तो लाभ हो।

तेन्दु या तम्बाकू से नुकसान होता है ऐसा प्राचीन ग्रंथो मे लिखा है पर इसकी “काट” के बारे मे कुछ नही लिखा गया है। जंगल मे हर अच्छी-बुरी चीज की “काट” मौजूद है। मैने इस “काट” पर हजारो पन्ने रंगे है। एक वनस्पति दूसरी वनस्पति की “काट” का काम करती है पर बहुत बार एक ही वनस्पति मे ही “काट” रहती है। जैसे जड की “काट” पत्तियो मे होती है। तो क्या ऐसी सिगरेट बनायी जा सकती है जो हमारी कल्पना मे है। सौभाग्य से इसका जवाब हाँ मे है। पर अभी ये प्रयोग दिशा पाने के बाद आरम्भिक चरणो मे है।

चलिये अब उन बुजुर्ग के पास वापस लौटे जिन्होने बिच्छी का तोड बताया था। हम जंगल मे बैठकर बतिया रहे थे। मैने आदर्श सिगरेट की कल्पना उनके सामने रखी तो वे हैरत मे पड गये कि क्या सचमुच ऐसा हो सकता है? यदि ऐसा हो सकता है तो न तेन्दु पत्ता की तोडाई रोकनी होगी और न ही लोगो का बीडी पीना छुडाना होगा। बीडी का कारोबार भी फैलेगा और घर भी बरबाद नही होंगे। मैने अपने कुछ नुस्खे उन्हे देने का मन बना लिया। आखिर उन्होने मुझ अजनबी पर विश्वास करके ज्ञान बाँटा था। मैने एक बीडी ली और उसे खोला। पास से पाँच प्रकार की छालो को एकत्र किया और फिर उन्हे बीडी के अन्दर रख दिया। “छाल अभी कच्ची है इसलिये हो सकता है कि जलने मे कुछ दिक्कत हो।“ मैने कहा। उन्होने बीडी पी और कह पडे कि यह तो वैसी ही बीडी है जैसी हम रोज पीते है। इसका मतलब छालो की उपस्थिति से मूल रुप नही बिगडा था। पर ये छाले अंजाने रुप से तेन्दु की विषाक्तता को कम कर रही थी। उन्होने मुझे धन्यवाद दिया और हम लौट पडे।

मेरे ड्रायवर को जब यह सब पता चला तो वह बिफर पडा और बोला कि अनपढ गँवारो को तो आप झट से सब बता देते हो पर मुझ जैसे पढे-लिखो को कुछ भी नही बताते। मै मन ही मन उस पर हँसा। वह जिन्हे अनपढ-गँवार कह रहा था उनके पास ज्ञान का जो खजाना है वो जन्मो के किताबी अध्ययन के बाद भी हम नही पा सकते। (क्रमश:)
(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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Monday, May 25, 2009

पहली जरुरत: “जल धरोहरो” को बचाने और बढाने की

पहली जरुरत: “जल धरोहरो” को बचाने और बढाने की - पंकज अवधिया

छत्तीसगढ अपने तालाबो के लिये पूरी दुनिया मे जाना जाता है। मुझे याद आता है कि कुछ वर्ष पहले राजधानी रायपुर के समीप स्थित आरंग नगर के पास रसनी के दो तालाबो से मैने बडी मात्रा मे जल एकत्र किया था और वहाँ से सैकडो किलोमीटर दूर पारम्परिक चिकित्सको के पास बतौर उपहार पहुँचाया था। रसनी के तालाब सडक के बायी और दायी ओर है। इन तालाबो के विषय मे बताया जाता है कि ये कभी नही सूखते। मैने हमेशा इनमे पानी देखा है। यहाँ के लोग भले ही इसे साधारण तालाब माने पर दूर-दूर के पारम्परिक चिकित्सक इसके जल को रोग विशेष मे उपयोगी मानते रहे है। वे रोगियो को न केवल इसमे स्नान करने को कहते है बल्कि जल के प्रयोग से दवाए भी बनाते है। और तो और, इस जल से नाना प्रकार की वनस्पतियो को सीचा जाता है ताकि वे औषधीय गुणो से परिपूर्ण हो जाये। पारम्परिक चिकित्सको के लिये ये गंगा जल से कम नही है। इन तालाबो के आस-पास उग रही वनस्पतियाँ विशेष औषधीय गुणो से परिपूर्ण मानी जाती है। मैने यहाँ मन्दिर के पास स्थित बेल और पुराने पीपल के बारे मे बहुत लिखा है। उडीसा के पारम्परिक चिकित्सक जब इस मार्ग से गुजरते है तो इन तालाबो का जल पीने और पीपल की छाँव मे सुस्ताने का मौका नही छोडते। इन तालाबो की इतनी अधिक महिमा होने के बावजूद कभी प्रशासन की ओर से इनके लिये कुछ नही किया गया। कुछ समय पहले इन तालाबो के पास से एक बार फिर गुजरा तो मै रो पडा।

फोर लेन सडक का निर्माण होने के कारण तालाबो को पाटा जा रहा है। तालाब अब अपनी अंतिम साँसे गिन रहे है। मै यह सब देखकर हतप्रभ रह गया। पास ही पीपल के पेड की लाश पडी हुयी थी। किसी शक्तिशाली आधुनिक मशीन ने उसे बेरहमी और बेशरमी से उखाड दिया गया था। मै गिरे हुये पेड तक पहुँचा तो उसमे जान नही थी। यह वही पीपल था जिसने असंख्य मनुष्यो की जान बचायी थी। आज जब मनुष्य़ की बारी आयी तो उसने इसे नेस्तनाबूत करने मे जरा भी देर नही लगायी। मै अनगिनत बार इस पीपल के साये मे बैठा चुका हूँ। इस बार मेरी हिम्मत उससे नजरे मिलाने की नही हुयी। सडक बनाने वालो ने तो ग्राम देवता को नही बख्शा था तो भला इन पेडो की क्या बिसात? बेल का महान पेड भी मुझे नही दिखा। पल भर मे ही माँ प्रकृति की इस अनुपम भेट को बरबाद कर दिया गया। मै तस्वीरे लेने लगा तो कुछ गाँव वाले एकत्र हो गये। उन्होने मुझे पत्रकार समझा और शिकायत भरे लहजे मे कहा कि हमे मुआवजा नही मिला है। यह केन्द्र सरकार की सडक है। मैने रुन्धे गले से पूछा कि इस पीपल को बचाने कोई सामने नही आया? तो वे बोले, हमारी एक भी नही सुनी गयी।

रसनी के तालाब की तरह छत्तीसगढ मे हजारो ऐसे तालाब है जो अपने औषधीय जल के लिये पीढीयो से जनमानस मे लोकप्रिय रहे है। यह मेरा सौभाग्य है कि मै इनमे से बहुत से तालाबो तक पहुँचा हूँ। पारम्परिक चिकित्सक कहते है कि तालाबो के आस-पास प्राकृतिक रुप से उग रही वनस्पतियाँ जल को औषधीय गुणो से परिपूर्ण करती है। विकास के साथ-साथ इन वनस्पतियो का नाश होता रहा और अब तालाब अपने औषधीय गुणो को खोते जा रहे है। गरियाबन्द के पास एक ऐसा तालाब दिखा जहाँ पानी मोखला नाम वनस्पति की सघन आबादी से होकर आता था। ह्र्दय रोगो के लिये इस तालाब के जल को अमृत का दर्जा प्राप्त है। रायपुर के कंकाली तालाब की महत्ता तो हम सब जानते ही है। त्वचा रोगो के लिये इसका पानी वरदान माना जाता है। पर आज साफ-सफाई न होने के कारण यह तालाब अपना यह गुण खोता जा रहा है। इतिहासकार प्रो.गुप्ता अपने शोध दस्तावेजो मे दुर्ग जिले के ऐसे तालाब का जिक्र करते है जिसमे नहाने से आदमी पागल हो जाता है। इसे “बहया तालाब” के रुप मे जाना जाता है। जब मै खोजते-खोजते उस तालाब तक पहुँचा तो पता चला कि वह पट चुका है। बडी मुश्किल से गाँव के एक बुजुर्ग ने बताया कि उस तालाब के आस-पास धतूरे के असंख्य पौधे उगे हुये थे। सम्भवत: इस वनस्पति के सम्पर्क से आता हुआ वर्षा का जल जब तालाब तक पहुँचता रहा होगा तो इसे विषाक्त बना देता रहा होगा।

आज छत्तीसगढ के महानगरो मे भले ही “पहली वर्षा” होते ही हम प्रदूषित पानी के डर से उसमे नहाने से बचते हो पर “पहली वर्षा” के बारे जो पारम्परिक ज्ञान हमारे प्रदेश मे आम लोगो के पास है उसकी बानगी पूरी दुनिया मे नही मिलती। गर्मियो मे होने वाली घमौरियो से मुक्ति के लिये “पहली वर्षा” मे नहाया जाता है। आश्चर्यजनक रुप से इससे घमौरियाँ मिट जाती है। “पहली वर्षा” के विषय मे असली ज्ञान का खजाना प्रदेश के पारम्परिक चिकित्सको के पास है। वे इस जल को साल भर सहेज के रखते है। अलग-अलग वनस्पतियो से एकत्र किया गया “पहली वर्षा” का जल पारम्परिक चिकित्सा का अहम भाग है। चार (चिरौंजी) के पौध भागो से एकत्र किया गया “पहली वर्षा” का जल बाल के रोगो के लिये वरदान माना जाता है। जामुन से एकत्र किया गया जल माइग्रेन, महुआ से एकत्र किया गया जल रक्त सम्बन्धी जटिल रोगो, कुसुम से पेट सम्बन्धी रोगो, कुम्ही और निर्मली से कैंसर, सोनपाठा से श्वाँस सम्बन्धी रोग, कोलियार से स्त्री रोग और नीम से एकत्र किया गया “पहली वर्षा” का जल सिकल सेल एनीमिया मे प्रयोग किया जाता है। शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढाने के लिये आँवला, बरगद, पीपल और सागौन से एकत्र किया गया जल प्रयोग किया जाता है। अभी तक 400 प्रकार की वनस्पतियो से एकत्र किये गये जल के बारे मे पारम्परिक ज्ञान का दस्तावेजीकरण हो चुका है।

कुछ वर्षो पहले मै रायगढ के एक बुजुर्ग पारम्परिक चिकित्सक से मिला। वे दुखी लग रहे थे। कारण पूछने पर उन्होने बताया, ”इस बार “पहली वर्षा” के तुरंत बाद मै वरुण की कटोरी मे जल एकत्र करने निकला तो साफ जल मिला ही नही। सभी पेड काली धूल से ढके हुये थे जिससे माँ प्रकृति प्रदत्त यह अमृत विष हो चुका था।“ उन्हे इस बात की चिंता खाये जा रही थी कि अब साल भर वे कैसे आम लोगो को रोगो से राहत पहुँचा पायेंगे?

काली धूल के अभिशाप से अब तो राजधानी भी अछूती नही है। वैज्ञानिक साहित्य बताते है कि काली धूल मे ऐसे रसायन है जो किसी भी रुप मे शरीर मे पहुँचकर कैंसर की उत्पत्ति कर सकते है। राजधानी तो आज काली धूल से पटी है। मानसूनी वर्षा से यह धूल भूजल तक पहुँच रही है। भूगर्भ वैज्ञानिक बताते है कि छत्तीसगढ मे क्रेस्ट संरचना है जिसके कारण भूमिगत जल आसानी से प्रदूषित हो रहा है। किसी को इसकी परवाह नही है। भूमिगत जल प्रदूषित होने का मतलब है आगामी पीढीयो को जहर का उपहार देना। हमारे बुजुर्गो ने हमे साफ पानी दिया और हम उसे बचाना तो दूर उसमे काली धूल जैसे जहर घोल रहे है।

छत्तीसगढ के जंगलो मे ऐसी वनस्पतियो की कमी नही है जिसमे जल को शुद्ध करने की क्षमता है। दुनिया भर मे “वाटर क्लीयरिंग नट” प्रदूषित जल को साफ करने मे अपनी अहम भूमिका निभा रहा है। दुनिया को यह ज्ञान सबसे पहले छत्तीसगढ से ही मिला। एक समय पैरी और इन्द्रावती के किनारे इसके पेड बहुतायत से थे। बुजुर्ग कहते थे कि इसके फल इन नदियो के पानी मे गिरकर इन केवल इन्हे साफ रखते थे बल्कि औषधीय गुणो से भी परिपूर्ण करते थे। दिया तले अन्धेरा की तर्ज पर हमारे प्रदेश मे इसके महत्व को नही समझा गया। जलाने की लकडी के लिये पेडो को एक-एक करके नष्ट कर दिया गया। गूलर जिसे हम डूमर के नाम से भी जानते है, की जल को निर्मल बनाये रखने की अदभुत क्षमता के बारे हमारे योजनाकर कम ही जानते है। पुराने तालाबो मे पीपल और बरगद और इसके भाई-बन्द पाकर और गस्ती को आज भी देखा जा सकता है। ये पेड तालाबो के आस-पास बेमतलब नही थे। तालाबो के पानी को साल दर साल पीढीयो तक साफ रखने का उपाय भी हमारे बुजुर्ग जानते है। बेल, महुआ जैसे पेडो को निश्चित क्रम मे लगाकर यह किया जा सकता है। छत्तीसगढ के तालाबो की पुरानी रौनक लौटाने के लिये इन पेडो को फिर से स्थापित करना जरुरी है। आज ज्यादातर तालाब पेड विहीन है। कुछ मे पेड है तो विदेशी सजावटी पेड जिन्हे सुन्दरता के नाम पर लगाया गया है। इन पेडो के रसायनो से मछलियो या तालाब के जल पर पड रहे अच्छे-बुरे प्रभावो की चिंता नही की गयी है।

छत्तीसगढ के विकास के लिये व्यग्र योजनाकारो से मै यही कहना चाहता हूँ कि वे नयी योजनाए भले बनाये पर छत्तीसगढ के मूल स्वरुप को न बिगाडे। माँ प्रकृति ने दोनो हाथो से हमे दिल खोलकर दिया है और हमारे बुजुर्गो ने इसका महत्व समझकर इसे संजोया है। इसके महत्व को समझने की जरुरत है। विकास धरोहरो की छेडछाड के बिना सम्भव नही है- ऐसा सोचना गलत है। धरोहरो का मूल स्वरुप मे संरक्षण भी विकास है।


शोध-सन्दर्भ

Oudhia, P. (2007). First Rains in Chhattisgarh: A vital source of Nature’s remedy. www.Ecoport.org.

Oudhia, P. (2007). Lightening in beneficial too. www.Ecoport.org.

Oudhia, P. (2007). Traditional medicinal knowledge about first rain water in Chhattisgarh, India : New comments. www.Ecoport.org.

Oudhia, P. (2007). Detailed information on Ponds of Indian state Chhattisgarh famous for treatment of specific diseases. www.Ecoport.org.



(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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[यह लेख रायपुर से प्रकाशित होने वाले दैनिक छत्तीसगढ मे 23 मई, 2009 को प्रकाशित हो चुका है।]

Thursday, May 21, 2009

शराब पीये चाहे जितनी पर शरीर को कुछ भी नुकसान न हो

शराब पीये चाहे जितनी पर शरीर को कुछ भी नुकसान न हो

(मेरी कान्हा यात्रा-7)
- पंकज अवधिया



“ हाथो मे यदि अपरस हो जाये तो इस पेड के पास जाये और सात बार इससे लिपटकर समधी भेंट करे। फिर हाथो को इसकी चिकनी छाल पर रगडे और कहे कि जैसे तुमहारी छाल चिकनी है वैसे ही हमारे हाथ हो जाये। इस प्रक्रिया के बाद पीछे मुडे और वैसे ही घर आ जाये।“ कान्हा के गाइड ने जब मुझे इंडियन घोस्ट ट्री दिखाया तो मैने झट से उसे छत्तीसगढ मे इसके प्रयोग से जुडी ये बात बतायी। कान्हा मे पर्यटको को यह पेड विशेष तौर पर दिखाया जाता है। कान्हा ही क्या कुछ सालो पहले मै पेंच टाइगर रिजर्व मे सरकारी मेहमान था, तब भी हर कोई इसी पेड पर नजर जमाये हुये था। इसे सामान्य बोलचाल की भाषा मे कुरलु कहा जाता है। पहले ये पेड बडी संख्या मे थे पर इसके औषधीय उपयोगो के कारण ये तेजी से कम होते जा रहे है। इसकी गोन्द बहुउपयोगी है। गोन्द एकत्र करते-करते लोग इसे दीमक से भी तेज गति से पूरी तरह से नष्ट कर देते है।

नाना प्रकार के कैसर की चिकित्सा मे परम्परागत तरीके से प्रयोग किये जा रहे 35,000 से अधिक नुस्खो को रपट के रुप मे लिखते समय इस पेड का नाम मेरे मन मे बार-बार आता रहा है। मै इसके दिव्य पर विचित्र गुणो से अचम्भित हूँ। मै ऐसी कम से कम तीन वनस्पतियो को जानता हूँ जो अकेले कैसर के लिये अनुपयोगी है पर जब कुरलु के पौध भाग उसमे मिलाये जाते है तो वे उपयोगी हो जाती है। मजे की बात तो यह है कि कुरलु के ये पौध भाग अकेले कुछ कर पाने अक्षम है। यह माँ प्रकृति का चमत्कार है पर मै उन लोगो को भी नमन करना चाहूंगा जिन्होने इस चमत्कार को अपनी अथक मेहनत से जान कर जनसाधारण के लिये उपयोगी बनाया। उन लोग यानि देश के पारम्परिक चिकित्सक।

कान्हा मे एक सफारी के दौरान गाइड ने वनस्पतियो मे मेरी रुचि देखकर पूछा कि क्या आप मेरी माँ के लिये कुछ दवा बता पायेंगे? उन्हे गठिया है। दर्द के बारे मे रात को सो नही पाती है। मैने गाइड को आस-पास उग रही बहुत सी वनस्पतियाँ दिखायी और कहा कि ये पार्क के बाहर भी है। इनकी सहायता से आप माँ को तत्काल राहत दिलवा सकते है। मुझे बडा आश्चर्य हुआ कि वनौषधीयो की खान मे बैठकर कान्हा मे लोग नाना प्र्कार के रोगो से ग्रस्त दिखे।

पार्क के बाहर रोगियो के आने का क्रम शुरु हो गया। दरअसल सफारी के बाद एक बुजुर्ग महिला मुझसे मिलने आयी। उनके पति दो बार दुर्घटनाग्रस्त हो चुके थे। इससे उनकी याददाशत कम हो गयी थी। सारी दवाए बेकार सिद्ध हो रही थी। मैने उन्हे पीपल की पत्तियो के साधारण प्रयोग से लेकर नाना प्रकार की चटनियो और पारम्परिक फसलो के असाधारण प्रयोग बताये। ये प्रयोग वर्तमान मे चल रही दवाओ के साथ किये जा सकते थे। उन्होने इसे बडे ध्यान से सुना और एक बार मंडला चलकर रोगी को देखने का अनुरोध किया। उस समय तो ये सम्भव नही था। उन्होने वापस जाकर सम्भवत: यह बात औरो को बतायी होगी जिससे लोग मर्ज लेकर आने लगे। रात बारह बजे तक यह सिलसिला चलता रहा। उसके बाद उन लोगो का दौर आरम्भ हुआ जिन्हे विशेष समस्याए थी। बडी संख्या मे ऐसे लोग भी थे जो ऐसी वनस्पतियो के अस्तित्व के बारे मे जानना चाहते थे जिन्हे खाने से शराब का कोई बुरा प्रभाव शरीर पर न हो। मैने उन्हे निराश नही किया।

मुझे लगता है कि कुछ दिनो के प्रशिक्षण के बाद मै कान्हा के फारेस्ट गाइडो को पार्क मे उपलब्ध वनस्पतियो के साधारण प्रयोग सीखा सकता हूँ। कान्हा केवल टाइगर के लिहाज से नही बल्कि वनस्पतियो के लिहाज से भी स्वर्ग है। यह अलग बात है कि पर्यटको को इस बारे मे अधिक जानकारी नही दी जाती है। ऐसा नही है कि पर्यटक यह सब नही जानना चाहते। पहली सफारी मे मुझे वनस्पतियो के आस-पास रुकता देखकर दूसरे दिन बडी संख्या मे पर्यटक अपने साथ सफारी पर ले जाने की जिद करने लगे। मै कान्हा मे वनस्पतियो पर आधारित एक प्रदर्शन केन्द्र की उम्मीद कर रहा था। पर ऐसा कुछ यहाँ दिखा नही। (क्रमश:)

कान्हा के कुछ चित्र

कुरलु के फल

कुरलु के तने मे बाघ के पंजो के निशान। गाइड ने कहा कि बाघ ऐसे निशान लगाता है, मैने कहा कि शायद बाघ के हाथो मे भी अपरस हो।

सुप्रभात कान्हा

संतुलन बनाये हुये यह चट्टान भूकम्प मे भी नही गिरी। जब यहाँ गाँव थे तब आदिवासी इसकी पूजा करते थे।

साल के बीच सुबह

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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Wednesday, May 20, 2009

ग़ुटखे के अभिशाप से अछूते नही है कान्हा के वन्य जीव

ग़ुटखे के अभिशाप से अछूते नही है कान्हा के वन्य जीव

(मेरी कान्हा यात्रा-6)
- पंकज अवधिया


“कान्हा मे बन्दर आपको सडक पर कुछ चाटते दिख जायेंगे। सडक माने जंगल के अन्दर की सडक। पिछले कुछ सालो से उनकी यह विशेष गतिविधि बढती जा रही है। शायद दूसरे जानवर भी ऐसा करते हो।“ साथ चल रहे स्थानीय लोगो ने यह रहस्योघाटन किया। यह मेरे लिये नये किस्म की खबर थी। जब लोगो ने बन्दर की इस विशेष गतिविधि के कारण की जानकारी दी तो मेरे होश उड गये। मै कारण का खुलासा आगे करुंगा। पहले कान्हा मे पर्यटको द्वारा फैलायी जाने वाली गन्दगी के बारे मे चर्चा करते है।

सफारी के दौरान जैसे ही मेरे सहयात्री ने बिस्किट खाकर रैपर फेकना चाहा, गाइड ने कडे शब्दो मे ऐसा करने से मना कर दिया। उसके कडे शब्द सुनकर मुझे खुशी हुयी कि चलो किसी को तो चिंता है पार्क की। कुछ आगे जाने पर हमे जंगली फल गिरे दिखायी दिये। मैने गाइड से फलो को उठाकर दिखाने की माँग की तो उसने साफ शब्दो मे मना कर दिया। उसने कहा कि जंगल को कुछ दे नही सकते तो कुछ ले जा भी नही सकते। मैने कहा कि तस्वीर लेने के बाद मै फलो को वापस रख दूंगा। फिर भी वह तैयार नही हुआ। हद तो उस समय हो गयी जब सामने वाली गाडी से किसी बच्चे ने चाकलेट का रैपर फेक दिया। हमारी गाडी के ड्रायवर ने गाडी धीरे की और फिर चलती गाडी मे झुककर जमीन से रैपर उठा लिया। ऐसा मैने कई बार देखा। यह देखकर अच्छा लगा कि पार्क से जुडे छोटे-बडे लोग सफाई का पूरा ध्यान रखते है। मेरे ड्रायवर पिंकी ने कहा कि सर, पार्क से हमारी रोजी-रोटी जुडी है। हम किसी भी हालत मे इसे गन्दा नही होने देंगे।

चलिये अब सडक चाटने वाले बन्दरो पर वापस लौटे। ये बन्दर तम्बाकू के आदी हो गये है। पार्क के अन्दर रैपर फेकना तो मना है पर गुटखा खाकर हर दो मिनट मे थूकना मना नही है। गुटखा तो ड्रायवर से लेकर गाइड और पर्यटको सभी की पसन्द है। मैने मोटे तौर पर आँकलन से पाया कि यदि तीन लोग भी गुटखा खाने वाले है किसी भी जिप्सी मे तो पाँच घंटो की सफारी मे वे सौ से अधिक जगहो पर थूकते है। पार्क मे दसो गाडियाँ जाती है। जब पर्यटको का आना चरम पर होता है तो गाडियो की संख्या बहुत बढ जाती है। पहले लार मिश्रित तम्बाकू युक्त थूक को जिज्ञासु बन्दरो ने बतौर प्रयोग चखा होगा फिर इसके आदी हो गये होंगे। इन्हे रोज की पर्याप्त खुराक मिल जाती है पर बरसात के उन तीन महिनो मे वे क्या करते होंगे जब पार्क बन्द रहता है?

बन्दरो का यह व्यसन शीर्ष समाचार बन सकता है। मै कैमरे लेकर इसे फिल्माने की बाट जोहता रहा पर मुझे यह दृश्य नही दिखायी दिया। दूसरे गाइडो से पूछा तो वे हैरानी से मुझे तकते रहे कि लोग तो कान्हा मे टाइग़र देखने आते है। ये महाश्य, थूक चाटने वाले बन्दरो को खोज रहा है। अगली यात्रा मे शायद कुछ चित्र मिल सके।

गुटखे से केवल वन्य जीव ही अप्रत्यक्ष रुप से प्र्भावित नही हो रहे है बल्कि वनस्पतियो पर भी इसका प्रभाव पड रहा है। मानव आबादी के पास किसी भी जंगली क्षेत्र मे आपको जंगल के अन्दर जाती पगडंडी मे कुछ विशेष पौधो की कमी अलग से महसूस होगी। ये पौधे रोज राहगीरो द्वारा गुटखा थूके जाने के कारण नष्ट होते जाते है। सभी पजातियो पर इसका एक जैसा प्रभाव नही होता है। कान्हा मे इस कम समय की यात्रा के दौरान मै इसका अध्ययन नही कर पाया पर पार्क प्रबन्धन यदि गुटखे के इस प्रयोग को जारी रखना चाहता है तो उसे अवश्य ही वनस्पतियो पर इसके कारण हो रहे दुष्प्रभावो की पडताल कर लेनी चाहिये। (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)


कान्हा यात्रा के कुछ चित्र
टाइगर देखते पर्यटक

बारहसींघा जिसके लिये कान्हा विश्व प्रसिद्ध है
जंगली भैसा जो चाहे तो गाडी पलटा दे (पर अब उसने हिंसा का रास्ता छोड दिया है)
जंगल झरना यानि अमलतास
गिद्ध

बाँस के झुरमुट मे बेपरवाह लेटी बाघिन (हाथी के हौदे से ली गयी तस्वीर)
शाम ढले साल तले

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Tuesday, May 19, 2009

“हीरो” कहलवाने की बडी कीमत चुका रहे है कान्हा के फारेस्ट गार्ड

“हीरो” कहलवाने की बडी कीमत चुका रहे है कान्हा के फारेस्ट गार्ड

(मेरी कान्हा यात्रा-5)
- पंकज अवधिया



“जब हम दोनो कैम्प की ओर लौट रहे थे तब भालू ने आक्रमण कर दिया। मेरे पास लाठी थी। मैने लाठी से अपनी रक्षा करनी चाही तो भालू ने लाठी को पकड लिया। हम गुत्मगुत्था हो गये। मेरे साथी ने छाते से भालू को ठेलना चाहा तो छाता ही मुड गया। साथी ने कैम्प मे जाकर मदद लानी चाही। उसके जाने से मै अकेला हो गया। वह मादा भालू थी। उसके बच्चो की आवाज आ रही थी। उसने मुझे पटक दिया। पहले पैरो फिर पेट पर उसने आक्रमण कर घाव बना दिये। फिर पूरी खोपडी ही खोल दी। मै चुपचाप पडा रहा। मुझे वैसी ही हालत मे छोडकर भालू जंगल मे गुम हो गया।“ कुछ इन्ही शब्दो मे भालू के हमले से घायल हुये एक फारेस्ट गार्ड पर आधारित लघु फिल्म कान्हा मे दिखायी जाती है। इस हमले मे फारेस्ट गार्ड की जान तो बच गयी पर सिर के घाव के निशान दिल दहला देते है। इस फिल्म मे कुछ और फारेस्ट गार्डो की आप-बीती दिखायी गयी है। फिल्म मे आखिर मे कहा जाता है कि ये फारेस्ट गार्ड हमारे हीरो है और संरक्षण मे प्रथम पंक्ति के सिपाही है। इस फिल्म को देखकर मन रोमांचित हो जाता है।

कान्हा नेशनल पार्क मे जब सफारी के लिये जाते है तो फारेस्ट गार्ड के जीवन की असलियत दिखायी देती है। “अरे, यहाँ तो आदमी साइकिल मे खुले घूम रहे है, यहाँ भला टाइगर कैसे दिखेगा?” मेरे सहयात्री ने गाइड से प्रश्न पूछा। प्रश्न खत्म ही हुआ था कि हमे झाडियो मे टाइगर दिख गया है। हम सफारी मे प्रयोग की जाने वाली खुली जिप्सी मे बैठे थे। कुछ देर पहले जो व्यक्ति साइकिल पर उस टाइगर के सामने से गुजरा था वह व्यक्ति फारेस्ट गार्ड था। वह अपनी जान जोखिम मे डालकर वहाँ से गुजरा था। वह जंगल के अन्दर स्थित कैम्प से आ रहा था। यदि टाइगर या किसी दूसरे जंगली जानवर से उसकी मुलाकात हो जाती तो उसके पास सिवाय लाठी के कुछ नही था। सफारी के दौरान कई बार दूर से सरकारी गाडी को आते देखकर हमारे ड्रायवर ने गाडी रोकी। हर बार हमारे गाइड ने खडे होकर अदब से सेल्यूट मारा और फिर हमारी गाडी आगे बढी। मुझे बताया गया कि ये पार्क के अधिकारी है। वे बन्द जिप्सी मे चल रहे थे। पूरी तरह से जोखिम से बचकर। एक साधारण पर्यटक की तरह मेरे मन मे इस भेदभाव पर प्रश्न उठे। क्या एक अधिकारी और एक फारेस्ट गार्ड की जान अलग-अलग किस्म की है? क्यो फारेस्ट गार्ड को साइकिल मे बिना सुरक्षा के जंगल से गुजरना पडता है? कान्हा मे फारेस्ट गार्डो पर जंगली जानवरो के हमले अक्सर होते रहते है। इंटरनेट पर भी ऐसे दुखद समाचारो का अम्बार है। मैने पढा है कि हाथी का चारा काटने गये एक वनकर्मी को बाघ ने मार डाला। मैने जितने भी समाचार देखे उनमे किसी मे भी किसी अधिकारी के मरने या घायल होने की खबरे नही थी। तो क्या यह मान लिया जाये कि :”हीरो” कहलवाने की बहुत बडी कीमत चुका रहे है कान्हा के फारेस्ट गार्ड?

मै इस लेखमाला मे लगातार लिखता रहा हूँ कि केवल समस्या गिनाना मेरा उद्देश्य नही है। मै समाधान भी सुझाता चलूंगा। कान्हा मे शोध के नाम पर देश-विदेश के ढेरो अनुसन्धानकर्ता अरबो बहा चुके है और नित नयी जटिल शब्दावलियो के विकास मे लगे है पर जमीनी स्तर पर आम फारेस्ट गार्डो को हो रही समस्या के लिये सोचने का समय किसी के पास नही है। मुझे साइकिल सवार फारेस्ट गार्ड को देखते ही एटीवी (आल टेरेन व्हीकल) की याद आ गयी। सभी तरह की भू परिस्थितियो मे चलने वाली चार चक्को की मोटरसाइकिलनुमा एटीवी को आपने विदेशी फिल्मो मे देखा होगा। अफगानिस्तान मे अमेरिकी सेना इसका प्रयोग बखूबी कर रही है। मैने डिस्कवरी चैनल पर बर्फीले भेडियो पर शोध कर रहे एक शोधकर्ता के पास यह गाडी देखी थी। उसने इसमे परिवर्तन करके ऊपर पिंजरानुमा जाली लगवा ली थी। इससे वह भेडियो के बीच घूमते हुये सुरक्षित रह पाता था। इस एटीवी का भारतीय संस्करण कान्हा के फारेस्ट गार्डो को उपलब्ध करवाया जा सकता है। यदि इसकी उपयोगिता और बढानी हो तो कान्हा क्षेत्र मे प्रचुरता से उगने वाले करंज और महुआ के बीजो से प्राप्त तेल से इस एटीवी को चला कर एक नया उदाहरण प्रस्तुत किया जा सकता है। इस एटीवी से फारेस्ट गार्डो की कार्य क्षमता बढ जायेगी। चौबीसो घंटे उनके सिर पर मंडराता खतरा कम होगा। वे रात बेरात गश्त मे जाकर शिकारियो को सफलतापूर्वक पकड सकेंगे।

मुझे याद आता है कि कृषि की शिक्षा के दौरान हमारे एक प्रोफेसर खेत भ्रमण के समय कडा रुख अपनाते हुये हमे पेंट मोडकर खेत के अन्दर घुसकर काम करने के लिये मजबूर कर देते थे। उस समय यह अजीब लगता था पर उनके इस रवैये ने बहुतो को जमीनी हकीकत से परिचित करा दिया। कान्हा के सन्दर्भ मे मै इसे इसलिये याद कर रहा हूँ क्योकि इसके माध्यम से मै पार्क के अधिकारियो से कुछ कहना चाहता हूँ। बन्द गाडियो मे चलने की बजाय वे भी एटीवी मे चले और उन्ही परिस्थितियो से गुजरे जिन परिस्थितियो से उनके मातहत गुजरते है। तभी वे मिल-जुल सही मायने मे काम कर पायेंगे।

बीच जंगल मे सफारी के दौरान एक कैम्प मे हम रुके। अन्दर बहुत हलचल मची हुयी थी। पता चला कि एक धामन साँप अन्दर घुस आया है। अब इसे मारना नही था इसलिये फारेस्ट गार्ड बाहर निकालने की जुगत मे थे। काफी मशक्क्त के बाद वह बाहर निकला। फारेस्ट गार्ड ने बताया कि ये दो दिनो मे पाँचवी बार घुसा है। वह बहुत घबराया हुआ था। नया रंगरुट लगता था। शायद नयी भर्ती थी। जंगल से वास्ता नही पडा था। टीवी के बिना नीन्द नही आती थी। अब यहाँ तो टीवी था नही। ऊपर से जंगली जानवरो की समय-असमय हाजरी लगती रहती है। उसने पता नही मुझे क्या समझा और कहा कि साहब, यदि आप कोशिश करे तो मै इस कालापानी से निकल सकता हूँ। बाद मे लोगो ने दबी जुबान से बताया गया कि नयी भर्ती मे स्थानीय लोगो की उपेक्षा की गयी है। स्थानीय लोग जंगल और उसके जीवो को अच्छे से जानते है इसलिये उनके हाथो मे जंगल अधिक सुरक्षित रहता है। मुझे इस बारे मे ज्यादा नही मालूम पर अनुभव से यह कह सकता हूँ कि इन सब मामलो मे स्थानीय लोगो को प्राथमिकता कभी भी घाटे का सौदा नही होती।

भालू के हमले से घायल हुये फिल्म वाले फारेस्ट गार्ड से मेरी मुलाकात नही हो पायी। बेरियर पर मुझे बताया गया कि वे दो दिन की छुट्टी पर है। मेरे वापस आने के बाद न जाने अब तक कितने और फारेस्ट गार्ड अनावश्यक खतरा मोल ले चुके होंगे? मेरा यह लेख उनकी आवाज है। मुझे विश्वास है कि आपका सहयोग इसे नक्कारखाने मे तूती की आवाज नही बनने देगा। (क्रमश:)

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Monday, May 18, 2009

मौत के सारे इंतजाम पर चिकित्सा के एक भी नही

मौत के सारे इंतजाम पर चिकित्सा के एक भी नही

(मेरी कान्हा यात्रा-4)
- पंकज अवधिया



कान्हा मे सुबह की सफारी के दौरान गाइड ने एक विशेष प्रकार की ततैया के घरौन्दे दिखाये। मेरे मुंडन कराये गये खुले सिर को देखकर चेतावनी भरे स्वर मे वह बोला कि आप तुरंत टोपी पहन ले। इन ततैयो ने एक अंग्रेज पर्य़टक की गंजी खोपडी पर आक्रमण कर दिया था। दंशो से उसकी खोपडी फूल गयी और उसे तुरंत मंडला ले जाना पडा। इस तरह की घटनाए अक्सर होती रहती है। मैने घरौन्दो की तस्वीरे खीची और फिर गाइड से पूछा कि मंडला क्यो ले जाते है? क्या पार्क की ओर से चिकित्सा विशेषकर आपात चिकित्सा की व्यवस्था नही है? उसने कहा कि है तो पर सरकारी डाक्टरो को तो आप जानते ही है। कोई यहाँ आना ही नही चाहता। छोटी घटना हो या बडी, मंडला ही भागना पडता है। मुझे एकाएक विश्वास नही हुआ। कान्हा आते समय मैने मोचा नामक गाँव मे अस्पताल का साइन बोर्ड देखा था। सफारी के बाद वहाँ गया तो गाइड की बात सच निकली। पार्क प्रशासन मौत के सारे इंतजामो के बीच घायल पर्यटको को क्या ऐसे ही मरने छोड देता है?

रात को अपने होटल मे लौटकर मैने एक बार फिर गाइड की बात की परीक्षा करनी चाहिये। रात के दस बजे मैने झूठमूठ तबीयत खराब होने की शिकायत की। हालत बिगडते देखकर होटल मालिक ने हाथ खडे कर दिये। आनन-फानन मे एक गाडी बुलवायी गयी और मुझसे मंडला जाने को कहा गया। अब मुझे यहाँ की लचर व्यवस्था पर पक्का यकीन हो गया। दूसरे दिन जब मैने दसो होटलो और रिसोर्ट का भ्रमण किया तो वहाँ भी आपात चिकित्सा की कोई व्यवस्था नही दिखी। रात मे चर्चा के दौरान मुझे बताया गया कि ऐसे रिसोर्ट जो जंगल के एकदम पास है वहाँ हट्स एक –दूसरे से काफी दूरी पर है। रात मे आस-पास जंगली जानवरो के कारण पर्यटक हट्स तक ही सीमित रहते है। पानी का स्त्रोत और मानव आबादी के कारण हिरण सुरक्षा की आस मे बडी संख्या मे हट्स के पास आ जाते है। इन हिरणो के पीछे माँसाहारी जीव भी आ जाते है। भिलाई से गये एक पर्यटक ने बताया कि एक छोटे बच्चे के साथ वे ऐसे ही हट्स मे ठहरे। रात को बच्चे को उल्टियाँ होनी शुरु हुयी। अपने साथ लायी दवाओ को आजमाने के बाद पर्यटक दम्पत्ति ने बाहरी मदद चाही। पर बियाबान जंगल मे निकल नही सके। अचानक उन्हे ढोल की आवाज सुनायी दी। मदद की आस मे वे पुकारते रहे पर कोई जवाब नही आया। रात रोते-रोते कटी। सुबह जैसे-तैसे रिसोर्ट के रिसेप्शन मे पहुँचे तो पता चला कि मन्डला जाना होगा। रात मे बाघ रिसोर्ट परिसर मे आ गया था। उसे भगाने के लिये ढोल बजाये जा रहे थे। अच्छा हुआ जो पर्यटक रात को मदद के लिये बाहर नही निकले।

कान्हा और देश के दूसरे नेशनल पार्को मे पर्यटको के साथ घटी ऐसी दुर्घटनाओ के बारे मे कही से जानकारी नही मिलती है। न किसी वेबसाइट मे और न ही स्थानीय मीडिया मे। हमेशा ही ऐसे पार्को के बारे मे बढा-चढा के बताया जाता है। कहा जाता है कि सच्चाई लिखने पर पर्यटन उद्योग को मार लग सकती है। मेरा उद्देश्य भारतीय पर्यटन को प्रभावित करना नही है। बल्कि नग्न सत्यो को सामने रखकर सकारात्मक उपाय सुझाना है। अब आप ही बताइये, एक चिकित्सक की व्यव्स्था पार्क प्रबन्धन नही कर सकता। वह पार्क प्रबन्धन जो प्रति पर्यटक सैकडो रुपये शुल्क लेता है। हजारो की संख्या मे पर्यटक अपनी जान हथेली पर लिये आते है और बहुत से पैसे गँवाकर लापरवाही का खामियाजा भुगतकर फिर कभी नही आने की कसम खाकर लौट जाते है। ढेरो पुरुस्कारो और तमगो को सीने पर सजाये पार्क प्रबन्धन तक यदि यह बात जायेगी तो निश्चित ही मेरा लेखन सार्थक हो जायेगा। (क्रमश:)

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Saturday, May 16, 2009

कान्हा की हवा बिगाडता एलर्जी वीड

कान्हा की हवा बिगाडता एलर्जी वीड

(मेरी कान्हा यात्रा-3)
- पंकज अवधिया


नाना प्रकार की एलर्जी के शिकार लोगो को आमतौर पर चिकित्सक हवा बदलने की सलाह देते है। देश भर के बहुत से चिकित्सक रोगियो को कान्हा नेशनल पार्क जैसे स्थानो मे जाने की सलाह देते है। इसमे कोई शक नही है कि यह पार्क मनवजनित प्रदूषणो से काफी हद तक मुक्त है। यहाँ आते ही शरीर स्फूर्ति से भर जाता है। नसो मे नयी ऊर्जा का संचार होने लगता पर यह भी नग्न सत्य है कि एलर्जी फैलाने वाली गाजर घास (पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस) यहाँ अपना साम्राज्य जमाये हुये है।

अपनी यात्रा के दौरान मै पन्द्रह से अधिक होटलो और रिसोर्ट मे गया और सभी जगह मैने बागीचे मे गाजर घास का प्रकोप देखा। भरी गर्मी मे यह हालात है तो पता नही साल के बाकी महिनो मे क्या होता होगा। आस-पास के गाँवो मे पूछताछ करने पर पता चला कि गाजर घास का प्रकोप पिछले कुछ समय से बढा है। पार्क के अन्दर सफारी के दौरान मैने साथ चल रहे गाइड से गाजर घास के बारे मे पूछा तो उसने कहा कि यह नाम वह पहली बार सुन रहा है। पार्क के अन्दर मुझे उसकी अधिक संख्या नही दिखायी दी। मै सडक के आस-पास की बात कर रहा हूँ। क्योकि गाडी से उतरकर मुआयना करने की अनुमति तो पर्यटको को है नही। रात मे चर्चा के दौरान स्थानीय लोगो ने दावा किया कि गाजर घास पार्क के अन्दर भी फैली हुयी है।

अमेरिका से आयातित गेहूँ के साथ आयी गाजर घास आज पूरे देश मे साम्राज्य जमाये हुये है। यह जैव-विविधता के लिये अभिशाप है। कान्हा मे इसके प्रकोप को देखकर मन दुखा। पास ही जबलपुर है जहाँ राष्ट्रीय खरप्तवार अनुसन्धान संस्थान है। इस संस्थान ने अपने “लोगो” मे गाजर घास को लगा रखा है। गाजर घास प्रबन्धन के नाम पर देश मे अरबो रुपये फूँके जा चुके है पर जमीनी स्तर पर कुछ हासिल नही हुआ दिखता है। जबलपुर के इतने पास कान्हा और आस-पास के क्षेत्रो मे गाजर घास का प्रकोप दिया तले अन्धेरा वाली बात लगती है।

गाजर घास और गाडियो का सीधा सम्बन्ध है। श्रीलंका मे गाजर घास नही थी। वैज्ञानिक साहित्य बताते है कि भारत से आयी शांति सेना के वाहनो के साथ गाजर घास के बीज पहली बार पहुँचे और अब यह खरपतवार श्रीलंका के लिये अभिशाप बन चुका है। कान्हा मे पर्यटक वाहन गाजर घास के फैलाव मे अहम भूमिका निभा रहे है। आस्ट्रेलिया मे भी इसी तरह की समस्या देखी गयी है। उन्होने इसका समाधान निकाला। नेशनल पार्क मे घुसने से पहले गाडियो को अच्छी तरह से धो लिया जाता है ताकि गाडियो से चिपके गाजर घास के बीज और दूसरे शहरी खरप्तवार धुल जाये और पार्क के अन्दर न जा पाये। आस्ट्रेलिया मे यह उपाय कारगर रहा। कान्हा मे इसे दोहराया जा सकता है। यह खर्चीली प्रक्रिया नही है। इससे होने वाला लाभ दूरगामी और स्थायी है। इससे नये बीजो के प्रवेश पर अंकुश लगेगा। पार्क मे फैली गाजर घास को एक अभियान चलाकर खत्म करने की जरुरत है। मुझसे पहली बारिश होने के बाद कान्हा आने को कहा गया है ताकि मै गाजर घास का खौफनाक चेहरा देख सकूँ।

होटलो और रिसोर्ट मे फैली गाजर घास को तो आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है। जिस स्थान पर मै ठहरा था वहाँ तो मैने यह शुभ काम स्वयम ही कर दिया पर होटल वाले को चेताया कि जमीन मे पडे बीजो से और पौधे निकल सकते है। इसलिये यह अभियान समूल नाश तक जारी रखना होगा। मन तो करता है कि गाजर घास की उपस्थिति के आधार मे होटलो की रेटिंग कर दूँ ताकि पर्यटक सही होटल का चुनाव कर सके। सबसे बुरी बात यह लगी कि ज्यादातर रिसोर्ट मालिक इसके बारे मे नही जानते है। उन्हे जगाना जरुरी है। कान्हा क्षेत्र मे बेकार जमीन मे गाजर घास का साम्राज्य है। बागीचे के लिये इन्ही बेकार जमीन से मिट्टी ले जायी जाती है। मिट्टी के साथ असंख्य बीज अन्दर चले जाते है और साल दर साल बागीचो मे फैलते रहते है।

गाजर घास कैसे वन्य जीवो और वनस्पतियो के लिये अभिशाप बन रहा है, इस पर कान्हा मे शोध नही हुये है। मैने कहा न कि टाइगर पर सारा ध्यान है। पर टाइगर से जुडे लोगो को मै चेताना चाहूंगा कि गाजर घास के अभिशाप से टाइगर भी अछूता नही रहेगा। गाजर घास का खात्मा माने असंख्य वन्य जीवो और वनस्पतियो की रक्षा। पार्क प्रबन्धन को अब जागना ही होगा। (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)


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बाघ है तो जहान है, नही तो सब वीरान है

बाघ है तो जहान है, नही तो सब वीरान है
(मेरी कान्हा यात्रा-2)
- पंकज अवधिया



बाघ है तो नेशनल पार्क है। यह बात गलत नही है। कान्हा मे नब्बे से अधिक बाघ है। यहाँ पर्यटक सबसे अधिक संख्या मे आते है। देश भर मे बाघो का अवैध शिकार चरम पर है। अभ्यारण्यो मे भी वे सुरक्षित नही है। पन्ना का ही उदाहरण ले। देखते-देखते दसो बाघ जंगल से गायब हो गये और सरकारी दस्तावेजो मे बने रहे। बाघ नही तो भला पर्यटक क्यो आयेंगे? पर्यटक नही आयेंगे तो महंगे होटलो का क्या होगा? पन्ना मे हाहाकार मच गया। एक नर बाघ बचा तो वंश वृद्धि के लिये एक मादा की जरुरत महसूस हुयी। यह फैसला हुआ कि कान्हा से एक बाघिन को पन्ना ले जाया जाये। सारी तैयारियाँ पूरी हो गयी। पर स्थानीय होटल वालो और पर्यटन से जुडे निज संस्थानो को यह बात हजम नही हुयी। उन्होने हडताल कर दी कि बाघिन को नही ले जाया जाना चाहिये। लम्बी चली हडताल का नतीजा सिफर रहा और हेलीकाप्टर से बाघिन को पन्ना ले जाया गया। कान्हा की इस यात्रा के दौरान रात मे चर्चा मे स्थानीय लोगो ने अपना पक्ष बताया। उनका कहना था कि पन्ना वाले इतने सारे बाघ नही बचा पाये तो इस बात की क्या गारंटी कि यह बाघिन भी बची रहेगी। फिर वे उस नर बाघ के जीवित होने का प्रमाण माँग रहे थे जिसके लिये मादा को ले जाया जाना था। उनका दावा था कि वह नर भी सरकारी दस्तावेजो तक सीमित था। लोगो ने बताया कि हमारी हडताल जायज थी पर वन्य जीवो पर काम कर रही सस्थाओ ने समर्थन नही दिया। सजा के तौर पर डीजल से चलने वाली गाडियो को अन्दर जाने की छूट दे दी गयी जिससे जिप्सी वालो को बडा घाटा उठाना पड रहा है। बतौर पर्यटक मै उनकी बाते सुनता रहा।

“अरे, वहाँ मत जाइये। वहाँ टाइगर है ही नही।“ रायपुर के एक आधुनिक काफी शाप मे बैठे कुछ लोग आपस मे चर्चा कर रहे थे। उनकी चर्चा रायपुर के पास स्थित बारनवापारा अभ्यारण्य पर केन्द्रित थी। बारनवापारा एक टाइगर के न होने के कारण वह लाभ नही दे पा रहा है जितना कान्हा जैसे पार्को से मिल रहा है। पर बारनवापारा मे टाइगर नही है, यह बात मुझे नही पच रही है। तीन साल पहले मैने कोर जोन मे शाम को एक टाइगर देखा था। हमारे साथ गाइड भी था। आज तीन साल के बाद अचानक ही यह कहा जा रहा है कि यहाँ टाइगर है ही नही। न तो किसी टाइगर के मरने की खबर मैने पढी और न ही गायब होने की। आखिर तीन साल पहले बेखौफ घूमने वाला यह टाइगर गया कहाँ?

कान्हा मे शाम की सफारी के लिये निकलते समय मैने गाइड को दो टूक कह दिया कि मुझे टाइगर नही देखना है। उसे विश्वास नही हुआ। उसने कई बार पूछकर इस बात की पुष्टि करनी चाही। हर बार उसे वही जवाब मिला। मैने कहा कि ऐसी जगह चलो जहाँ पर्यटक कम जाते हो। उसने ऐसा ही किया। डेढ घंटे तक हम ऐसे स्थानो मे घूमते रहे जहाँ दूसरी गाडियाँ दिखायी तक नही दी। ऐसा बिल्कुल नही था कि जिन स्थानो मे हम घूम रहे थे वहाँ कुछ भी नही था। हमने बारहसिंघा, हिरण, मोर, जंगली सुअर, साम्भर, भेडिये, सोन कुत्ते सभी देखे पर किसी को देखने के लिये हमने गाडी नही रोकी। वनस्पतियो के दर्शन करते हुये हम आगे बढते रहे। गाइड से रहा न गया और उसने पूछा कि यदि टाइगर गाडी के सामने आ गया तो भी क्या आप नही देखेंगे? मैने मुस्कुरा दिया।

अचानक ही कुछ दूरी पर पर्यटक गाडियो का काफीला दिखायी दिया। सभी गाडियाँ लहर की तरह आगे-पीछे हो रही थी। इसका मतलब था कि वे सभी टाइगर के लिये रुकी हुयी थी। हमारी गाडी भी उस ओर मुडी। दूर जंगली बेर के पेड के नीचे टाइगर शिकार किये हुये बाइसन को खा रहा था। सारे के सारे पर्यटक नजर गडाये बैठे थे। उनके पास कैमरे थे। सभी चेतावनियो के बावजूद वे शोर मचा रहे थे। जिस तरह बाघ के आने पर बन्दर डालियो मे उछलकूद मचाने लगते है उसी तरह पर्यटको मे भी खलबली मची थी। बाघ को प्रायवेसी चाहकर भी नही मिल रही थी। जैसे ही वह झाडियो मे घुसता गाडियाँ नयी जगह पहुँच जाती। बाघ को चैन नही था। गाडियो की संख्या बढती जा रही थी। कोई वहाँ से जाने को तैयार नही था।

रात को हमे पता चला कि सुबह बाघ का दिखना तय है क्योकि माननीय मुख्य न्यायाधीश आये हुये है। उनके लिये बाघ को हाथियो से घेरा जायेगा और फिर हाथियो की पीठ पर सवार होकर पर्यटको को बाघ तक ले जाया जायेगा। अगले दिन सुबह की सफारी के दौरान एक जगह हाथी और पास खडी गाडियाँ दिख गयी। पास ही एक बाघिन को घेरा गया था। हमसे कहा गया कि खटिया गेट के पास जाकर पर्ची कटवा आये और बाघ दर्शन के लिये नम्बर लगवा ले। सौ रुपये प्रति व्यक्ति की पर्ची कटवाकर हम लौटे तो न हाथी दिखे और न ही पर्यटक। हमे बताया गया कि बाघिन का मूव्हमेंट हो गया है। हमे तेजी से आगे बढे तो हमे फिर हाथी और पर्यटक दिखायी दे गये। तीन हाथी पर्यटको को अपनी पीठ पर लादकर पास ही बैठी बाघिन के पास ले जाते और कुछ देर मे वापस आ जाते। महावतो के हाथ गरम करने पर वे अधिक देरी तक बाघिन के पास हाथी को रोके रखते। मेरा नम्बर आया तो सीढी लगाकर पन्द्रह साल के हाथी पर मै चढा। यह कद मे छोटा था। महावत ने हाथी को चलने का इशारा किया और पेडो से रगडते हुये हम आगे बढे। तीखी ढलान के बाद बाँस के झुरमुट के पास जाकर हाथी रुक गया। झुरमुट मे गर्मी से बचने छाँव मे आराम कर रही बाघिन को साफ-साफ देखा जा सकता था। मेरे तो होश फाख्ता थे। बाघिन को तो शायद आदत हो गयी थी। उसने हमारी तरफ देखा तक नही। मैने तस्वीरे ली। महावत खडा रहा और कहा कि आराम से देखिये। मेरे मन मे सुरक्षा को लेकर अनगिनत प्रश्न घूम रहे थे। इस तरह से बाघिन को देखना कितना सुरक्षित है? यदि हाथी बैठ गया तो? या बाघिन ने हमला कर दिया तो? कही हम ही फिसल पडे तो? ऐसा नही है कि हाथी से बाघ दर्शन मे कान्हा मे कभी कोई हादसा नही हुआ है। हादसे हुये है पर पर्यटको से यह बात छुपा कर रखी जाती है। मुझे दो दिल दहलाने वाली घटनाओ के बारे मे बताया गया।

एक बार बाघ दर्शन के दौरान एक बच्चा हाथी के सामने गिर पडा। बच्चे के अचानक गिरने से बाघ हडबडा गया और दूर भाग गया। तुरंत ही हाथी ने अपनी सूंड से बच्चे को ऊपर खीच लिया। दूसरी घटना महावत के बच्चे के साथ हुयी। जब महावत का बच्चा गिरा तो बाघिन ने बिना देरी उसे गर्दन से पकड लिया। उस छुडाने के लिये महावतो ने हाथियो को उसके पीछे दौडाया। दो किमी के बाद बाघिन ने उसे छोडा। तब तक उसकी मौत हो चुकी थी। एक और घटना मुझे अपने मोहल्ले के एक व्यक्ति से मिली। जिस हाथी पर वह सवार था वह बाघ के पास पहुँचते ही बिदक गया। महावत ने उसे नीचे बाघ की तरफ पीठ करके खडे रहने को कहा। उस व्यक्ति की हालत पतली हो गयी। और कोई रास्ता नही था। महावत कुछ दूरी पर गया और फिर हाथी को सम्भाल कर वापस आया। व्यक्ति को फिर से हाथी पर चढा लिया गया। ये कुछ मिनट उसके लिये मौत से साक्षात्कार की तरह थे। उसने कसम खायी कि अब दोबारा कान्हा नही जाऊँगा। कान्हा के उजले पक्ष के बारे मे तो सब लिखते है पर इसके कृष्ण पक्ष विशेषकर पर्यटको के जीवन से जुडे प्रश्नो को सामने नही आने दिया जाता है। पार्क प्रबन्धन पहले ही आपसे फार्म भरवाकर अपनी जिम्मेदारी से बच जाता है। यह अलग बात है कि छोटे अक्षरो मे लिखी शर्तो को पर्यटक पूरा नही पढ पाते है और पार्क जाने की हडबडी मे हस्ताक्षर कर देते है।

एक तरफ कान्हा मे वन्य प्राणियो को पूरी स्वतंत्रता दिये जाने का दावा किया जाता है दूसरी तरफ जिस तरह से बाघ पर दबाव बनाया जाता है विशेषकर हाथियो के माध्यम से, वह ठीक नही जान पडता है। मुझे बाघिन से डर कम लग रहा था उस पर दया ज्यादा आ रही थी। मुझसे पहले बीसो पर्यटको ने उसे हाथियो पर आकर देखा था। दिन की तेज गर्मी मे उसे आराम के कुछ पल भी मिल नही पा रहे थे। वायरलेस पर सूचना आयी कि अभी पन्द्रह और गाडियाँ आने वाली है। हमने महावत के हाथ गरम किये थे इसलिये बाघिन के पास खडे रहने पर जब उसने देर तक कोई प्रतिक्रिया नही दी तो महावत ने हाथी को कुछ इशारा किया। उसने तेज साँसे ली। इस आवाज से बाघिन ने सिर उठाकर देखा। साथ चल रहे लोगो के चेहरे पर प्रसन्नता के भाव उमड पडे। कुछ और तस्वीरे ली गयी। पता नही ऐसे दिन मे कितनी बार बाघ की दिनचर्या मे खलल डाला जाता होगा।

इस तरह का बाघ दर्शन मन को विचलित कर देता है। क्या हमारे विशेषज्ञ दूसरे विकल्पो पर विचार नही कर सकते जिससे पर्यटक भी सुरक्षित रहे और बाघ को भी व्यवधान न आये। गर्मी मे वन्य प्राणियो की प्यास बुझाने के लिये पार्क मे जगह-जगह पर तश्तरियाँ बनायी गयी है। लोगो ने बताया कि इन पानी से भरी तश्तरियो मे दूसरे वन्य प्राणी तो आ जाते है पर बाघ ज्यादा नही रुकते है। उन्हे मालूम है कि सडक से आसानी से दिख जाने वाली इन तश्तरियो मे आना मतलब पर्यटको की नजर मे आना। पर्य़टक की एक गाडी रुकी माने पलक झपकते ही दसो गाडियाँ रुकने लगेंगी। और फिर देखादेखी का अनचाहा खेल शुरु हो जायेगा।

यदि पार्क प्रबन्धन के पास दूसरे विकल्प नही है तो एक बाघ के दिखने पर निश्चित गाडियो के पास तक जाने और कुछ निश्चित समय तक देखने की व्यवस्था होनी चाहिये। ऐसा नही कि घंटो तक गाडियाँ बाघ को घेरे रहे। इसी तरह हाथी से लाटरी द्वारा चुने हुये पर्यटको को ही जाने दिया जाना चाहिये वह भी बहुत कम संख्या मे। जहाँ पर हम हाथी पर सवार होने वाले थे वहाँ पर एक रेंजर प्रबन्धन मे लगे हुये थे। मैने उनसे पूछा कि यदि बाघिन यहाँ आ जाये तो क्या होगा? उन्होने कहा कि ऐसा हो सकता है और हम कुछ नही कर सकते। पर्यटको को वे गाडियो मे रहने की सलाह दे रहे थे। पर उनकी बातो को अनदेखा करके पर्यटक जमीन पर खडे थे। रेंजर साहब की गाडी मे प्राथमिक चिकित्सा की कोई सुविधा नही थी। आपातकालीन परिस्थितियो के लिये कुछ भी नही था। इस तरह की लापरवाही पर्यटको के लिये अभिशाप बन सकती है। (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)


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Friday, May 15, 2009

साल के फूल, बवासिर और कान्हा

साल के फूल, बवासिर और कान्हा

(मेरी कान्हा यात्रा-1)
- पंकज अवधिया


“21 लौंग और 21 साल के फूल व फल लीजिये और फिर उसमे पाँच तरह की पत्तियो को मिलाइये। एक मात्रा बवासिर (पाइल्स) से प्रभावित लोगो को दीजिये और उन्हे इस महारोग से सदा के लिये मुक्ति दिलवाइये।“ कान्हा नेशनल पार्क के गाइड ने मुझे यह जानकारी दी तो मैने तुरंत की इसे दर्ज कर लिया। कान्हा मे साल (शोरिया रोबस्टा) के जंगल है। अभी उनमे पुष्पन और फलन हो रहा है। साल के जंगल छत्तीसगढ मे भी है। पिछले सप्ताह मै इन जंगलो मे था। साथ मे पारम्परिक चिकित्सक भी थे। उन्होने फूलो के प्रयोग से किसी भी तरह के दस्त की चिकित्सा के बारे मे बताया था। वे शायद कान्हा के गाइड की तरह इसके बवासिर मे उपयोग के विषय मे नही जानते होंगे। मैने इन जानकारियो को सीजीबीडी नामक डेटाबेस मे दर्ज कर लिया। इस डेटाबेस मे साल पर आधारित आठ हजार से अधिक पारम्परिक औषधीय मिश्रणो के विषय मे जानकारी है। यह विडम्बना ही है कि इन मिश्रणो के बहुत कम जानकार अब जीवित है।

कान्हा नेशनल पार्क दशको से भारत ही नही दुनिया भर के लोगो को आकर्षित कर रहा है। यहाँ का मुख्य आकर्षण रायल बेंगाल टाइगर है। टाइगर के नाम पर ही ज्यादातर पर्य़टक आते है। शहरी भागदौड से दूर शांति के कुछ पल की तलाश मे भी लोग आते है। भरी गर्मी मे जब मैने यहाँ जाने का मन बनाया तो सबसे पहले ठहरने के स्थान की खोज-खबर ली। इंटरनेट मे जानकारियो का अम्बार है पर 400 रुपये एक दिन से लेकर 16,000 रुपये एक दिन तक के होटलो ने मुझे पशोपेश मे डाल दिया। मैने आन-लाइन बुकिंग करानी चाही तो मित्रो ने सलाह दी कि अभी ज्यादा पर्यटक नही है इसलिये वही जाकर मनपसन्द होटल चुन लेना। पार्क के अन्दर जाने के लिये मुक्की गेट और खटिया गेट है। मुझे खटिया गेट जाने की सलाह दी गयी। बताया गया कि रायपुर से मुक्की गेट जाने का रास्ता इतना खराब है कि 53 किमी के एक भाग को पार करने मे साढे तीन घंटे लग सकते है। रायपुर से कवर्धा, चिल्फी, बिछिया और अंजनिया होते हुये खटिया गेट पहुँचने की सलाह दी गयी। मैने टाटा इंडिका चुनी और 13 मई की सुबह कान्हा की ओर निकल पडा।

कान्हा नेशनल पार्क पर एक जैसी जानकारियाँ इंटरनेट पर मिलती है। सारा ध्यान टाइगर पर होता है। इस एकतरफा आकर्षण के चलते कन्हा के दूसरे पक्षो पर चर्चा नही ही की जाती है। मुझे टाइगर मे जरा भी रुचि नही है। यह पढने मे अटपटा लग सकता है पर यह सच है। फिर कान्हा जाने की क्या जरुरत? मित्रो का यह प्रश्न सही था। मै कान्हा वनस्पतियो के लिये जा रहा था।

गाडी मे ड्रायवर के साथ सफर करने मे बडी बोरियत होती है पर कवर्धा के बाद से जंगलो के शुरु होते ही मन बाहर लग गया। एक जगह आग लगी हुयी थी। बहुत से छोटे-बडे पेड जल रहे थे। पास जाकर देखा तो यूकिलिप्टस का सरकारी प्लांटेशन था। सडक किनारे स्थित इस प्लांटेशन मे आग की ओर किसी का ध्यान नही था। आस-पास कोई दिख भी नही रहा था। आग बुझाने की गरज से पास पहुँचा तो देखा कि पेडो के नीचे उग रहे जैट्रोफा के पौधे भी जल रहे थे। आग बुझाना सम्भव नही था। आमतौर मे जैट्रोफा के पौधे आसानी से नही जलते है क्योकि उनके अन्दर लेटेक्स भरा होता है। आग से वे झुलस अवश्य रहे थे। जैट्रोफा और यूकिलिप्टस के साथ पलाश के पौधे भी उगे हुये थे। वे भी जल रहे थे। काफी देर रुकने के बाद हम उस स्थान से आगे बढे। हमने पास के थाने मे इसकी सूचना देनी चाही पर उन्होने इसमे रुचि नही दिखायी।

बायोडीजल के स्त्रोत के रुप मे जैट्रोफा का बहुत प्रचार-प्रसार किया गया पर जमीनी स्तर पर यह असफल रहा। सफर के दौरान बहुत से गाँवो के रुककर मैने जैट्रोफा के बारे मे लोगो के विचार पूछे। सभी ने नकारात्मक उत्तर दिये। सरकारी जमीन पर अभी भी इसे देखा जा सकता है। चिल्फी घाटी मे सडक के किनारे लगा जैट्रोफा अब जंगलो के भीतर फैल रहा है। घाटी मे चढते हुये बहुत सी जगहो पर मैने यह देखा। चिल्फी के बाद साल के जंगलो मे भीतर तक यह पहुँच गया है। लोगो ने बताया कि जैट्रोफा का यह निर्बाध फैलाव जंगल मे नित नयी समस्याए पैदा कर रहा है।

चिल्फी के नौ किमी पहले एक ढाबे पर चाय के लिये हम रुके। ढाबे मे एक बैगा आदिवासी से मुलाकात हो गयी। वह हमसे बात करने मे कतराता रहा। ढाबे वाले ने बताया कि यह सोन कुत्ता का शिकारी है और महिने मे कई कुत्ते पकडकर शहरियो को बेचता है। भारत मे सोन कुत्ता के शिकार पर प्रतिबन्ध है। यह जंगली कुत्ता जंगल मे बाघ से भी खतरनाक माना जाता है। यह समूह मे शिकार करता है। लोग बताते है कि जब ये किसी हिरन का पीछा करते है तो दौडते हिरन का माँस नोच-नोच कर खाते रहते है जब तक की वह गिर न जाये। बडे-बडे शिकारी सोन कुत्ता को देखकर राह बदल लेते है। सोन कुत्ता का शिकार कल्पना से परे है। मुझे बैगा की बात पर विश्वास नही हुआ। उसने कुछ प्रमाण दिखाये। आमतौर पर बैगा आदिवासी शिकार के तरीको की जानकारी गोपनीय रखते है। किसी को भी इसकी जानकारी नही दी जाती है। हम तो चाय पीने रुके थे इसलिये इतने कम समय मे कुछ जान पाना सम्भव नही था। उसका पता लेकर आगे बढने मे ही समझदारी थी।

जिस रास्ते मे हमारी गाडी दौड रही थी उस रास्ते मे बचपन मे अक्सर जाना होता था। ननिहाल जबलपुर मे है। राज्य परिवहन की बसे इसी मार्ग से जाती थी। अल सुबह रायपुर से रवाना होकर दिन भर का सफर करते हुये रात को जबलपुर पहुँचती थी। उस समय रास्ते मे घने जंगल हुआ करते थे। इतने सालो बाद इस बार जब फिर से उस रास्ते से गुजरना हुआ तो जंगलो की जगह खेत और मैदान दिखे। दिल बैठ गया।

दोपहर दो बजे कान्हा क्षेत्र मे हमारी गाडी पहुँच गयी और कुकुरमुत्तो की तरह चारो ओर छोटे-बडे होटल और रिसोर्ट दिखायी देने लगे। हम बढते रहे और खटिया गेट तक आ पहुँचे। गेट के पास ही एक मोटल दिखा। नीचे उतरकर किराया पूछा और कमरे देखे तो बडा आश्चर्य हुआ कि एक व्यक्ति के लिये मात्र 750 रुपये पर अच्छा कमरा उपलब्ध था। तैयारी तो तीन-चार हजार रुपये वाले कमरे की थी पर इतने कम पर कमरा मिल जाने से सुखद आश्चर्य हुआ। मित्रो ने बताया था कि गर्मी मे एसी की जगह कूलर वाला कमरा लेना क्योकि पावर कट होने पर जनरेटर से कूलर एक बार चल जाता है पर एसी मे मुश्किल होती है। वैसे जब तक मै कान्हा मे रहा पावर कट जैसी कोई बात देखने मे नही आयी।

कान्हा मे सुबह और शाम दो सफारी होती है। सुबह पाँच से ग्यारह और शाम को चार से सात। पार्क के बाहर खुली जिप्सी गाडियाँ मिल जाती है। इसमे छह लोग बैठ सकते है। आप चाहे तो पूरी गाडी बुक करा सकते है। यदि आपकी संख्या कम है तो दूसरो को बिठाकर खर्च का भार कम कर सकते है। एक सफारी के लिये वन विभाग 680 रुपये लेता है जिसमे एक गाइड का शुल्क भी होता है। जिप्सी वाले सुबह की सफारी का 1500 और शाम की सफारी का 1000 रुपये लेते है। पार्क मे बडे ही कडे नियम है। गाडी का हार्न नही बजाया जा सकता। गति 20 किमी प्रति घंटे की होती है। पर्यटको को नीचे नही उतरने दिया जाता। पार्क से आप कुछ ले जा नही सकते है सिवाय छायाचित्रो और स्मृतियो के। सफारी मे टाइगर के अलावा बहुत से वन्य जीव आसानी से दिख जाते है। सफारी से लौटने के बाद पर्यटक होटलो मे लौट जाते है। सक्षम पर्य़टको के लिये स्थानीय लोगो द्वारा नृत्य का आयोजन किया जाता है। इसके लिये 2500 से 3500 रुपये लिये जाते है। नृत्य एक-डेढ घंटे का होता है। शाम सात बजे से खटिया गेट मे पास वाइल्ड लाइफ फिल्म शो का आयोजन भी किया जाता है। (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)


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