Tuesday, June 30, 2009

तेन्दुए, जंगली सुअर, भालू, लकडबघ्घे सभी मिलेंगे आपको राजधानी की सडको पर

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-30
- पंकज अवधिया

तेन्दुए, जंगली सुअर, भालू, लकडबघ्घे सभी मिलेंगे आपको राजधानी की सडको पर

गाँव के चरवाहे को हल्की सी झपकी आ गयी। वह गाँव से दूर मवेशियो को चरा रहा था। जब उसकी नीन्द खुली तो उसने मवेशियो के समूह के बीच कुछ काले-काले जीव देखे। उसने जोर से आवाज लगायी और उस ओर लाठी लहरायी तो वे काले जीव वहाँ से भागे। चरवाहे ने इन्हे बरहा अर्थात जंगली सूअर के रुप मे पहचाना। वह उल्टे पाँव वापस आ गया। यह घटना छत्तीसगढ की राजधानी रायपुर से मात्र बीस-पच्चीस किलोमीटरकी दूरी की है। इस क्षेत्र मे धान के खेत है पर खेतो की मेड पर बबूल और अर्जुन के वृक्ष। जंगल का नामो-निशान नही है। क्षेत्र मे खारुन नदी बहती है जो मानसून न आने के कारण नाली की तरह पतली हो गयी है। बडी-छोटी सभी गाडियो की दिन-रात आवाजाही वाले ऐसे क्षेत्र मे बरहा कल से आ गये है। ये एक नही, दो नही बल्कि तीन झुंडो मे है और एक झुंड मे 15 से 17 बरहा है।

मानसून की बाट जोहते किसानो ने धान की नर्सरी तैयार की है। छोटे-छोटे पौधे अंकुरित हो रहे है। बरहा के दल इन्ही नये पौधो को खोदकर खा रहे है। इतना ही नही वे खेतो मे लोट रहे है जिससे पूरी नर्सरी चौपट हो रही है। इस क्षेत्र के ज्यादातर किसानो ने बरहा को अपने जीवन मे पहली बार देखा है। उनसे कैसे निपटना है-वे नही जानते है। बरहा के खेतो मे आने और नर्सरी को बरबाद करने की खबर क्षेत्र मे जंगल की आग की तरह फैली। एक युवा किसान ने अपने खेत के चारो ओर बिजली के तार लगा लिये। उनमे करंट दौडने लगा। जब बरहा के दल खेत मे आये तो उन्हे झटका लेगा। बडे बरहा तो बच गये पर एक नवजात बरहा की मौत हो गयी। पूरा दल वहाँ से लौट गया। बरहा को मरा देखकर वहाँ से गुजर रहे कुछ मनचलो ने उसे उठाया और बिना देरी के पकाकर खा गये। पर यह खबर दबी नही रह सकी। करंट लगाने वाले से लेकर बरहा को खाने वाले तक सभी कानूनी मामले मे फँस गये।

उधर बरहा का दल भी इस घटना से क्रोधित था। अल सुबह जब तुलसी नामक गाँव के दो बच्चे शौच के लिये खेत की ओर निकले तो दल ने उन पर आक्रमण कर दिया। दोनो बच्चे बुरी तरह से घायल हो गये। एक को तो शहरी अस्पताल ले जाना पडा। दोनो घायलो के पैरो का माँस बाहर आ गया था इस हमले से। पूरे क्षेत्र मे सनसनी फैल गयी। बरहा के दल के क्षेत्र के आने के चौबीस घंटो के भीतर इतना सब हो गया। सारी बात बिगड गयी। मुझे आज शाम को इस बारे मे पता चला। मैने तुरंत ही गाडी से गाँवो की ओर निकलने का मन बनाया पर तेज बारिश के कारण यात्रा कल तक टल गयी।

गाँव वाले इस बात को अभी न समझे पर बरहा का इतनी बडी संख्या मे आना एक स्थायी संकट के आगमन की सूचना है। छत्तीसगढ मे आम लोगो के खेत घेरो से बन्द नही होते है। एक से दूसरे खेत जाया जा सकता है। यहाँ दशको से जंगली जानवर नही रहे इसलिये कभी इस ओर ध्यान नही दिया गया। ऐसे मे अचानक बरहा के आ जाने से एक गम्भीर समस्या खडी हो सकती है। यदि ये कम संख्या मे आते तो एक बार मानव आबादी से दूर रखा जा सकता था पर ये बडे दलो मे आये और आते ही लोग उनसे उलझ पडे। ऐसे व्यवहार की अपेक्षा बरहा को भी नही होगी। उन्होने पहले अपने बच्चे को खोया और फिर लोगो को माँस खाते देखा। वे अपने को निश्चित ही असुरक्षित समझ रहे होंगे। तभी तो इस घटना से सम्बन्ध न होने के कारण भी दो इंसानी बच्चे उनके शिकार हो गये। आगे भी बेकसूर लोगो के इस तरह घायल होने की सम्भावना से इंकार नही किया जा सकता है।

क्षेत्र के लोग रात को घरो से बाहर नही निकल रहे है। शौच के लिये भी नही। कुछ लोग लाठी को सहारा मान बैठे है पर लाठी के सहारे रात के घने अन्धेरे मे बरहा के दलो से लडना सम्भव नही है। उनका पक्ष भारी रहेगा और मनुष्यो को भारी हानि उठानी पडेगी। इस क्षेत्र मे धान के अलावा सब्जियो की फसले भी होती है। बरहा के पास पानी है, रहने के लिये नदी के किनारे के खोल और खाने के लिये नाना प्रकार की फसले, अब वे यहाँ से नही जाने वाले। ये दिन दूनी रात चौगुनी की गति से बढते है। कुछ साल पहले इस क्षेत्र मे बन्दरो के दल आये। अब वे यहाँ के स्थायी निवासी हो गये है। किसानो की फसले बरबाद हो रही है और घर के छ्प्पर भी। अभी बन्दरो ने मनुष्यो पर आक्रमण शुरु नही किया है।

बरहा प्रभावित क्षेत्र मे फसल के दौरान किसानो की रात खेतो मे कटती है। लकडी का मचान बनाकर खेतो मे सोना होता है और बरहा के आते ही आग जलाकर शोर मचाना होता है। जिन लोगो ने तारो की बाड लगायी है उन्हे निचली वाली कतार से नीचे एक और कतार लगानी पडती है। ताकि उसके नीचे से बरहा नही निकल सके। पर यह स्थायी उपाय नही है। बहुत से भागो मे किसानो बाड के नीचे लकडी के नुकीले कील गडा देते है। इससे भी बरहा को अन्दर घुसने मे तकलीफ होती है। सबसे प्रभावी उपाय है काँटे वाली स्थानीय वनस्पतियो से खेत की घेराबन्दी। मै प्रभावितो को यही सलाह देता हूँ कि ऐसी वनस्पतियाँ लगाये जिससे बाड के लाभ के अलावा उपयोगी बीज और दूसरे भाग मिलते रहे ताकि अतिरिक्त आमदनी होती रहे। इस क्षेत्र मे गटारन के पौधे लगाये जा सकते है। इसके बीजो की स्थानीय औषधि बाजार मे नियमित माँग है। केतकी भी अच्छा विकल्प है। पूरा गाँव इसे लगा रहा है तो फिर इसके रेशो से रस्सी बनाने का उद्योग विकसित किया जा सकता है। बहुत से भागो मे थूहर की बाड भी लगती है। थूहर के सभी भाग उपयोगी है। गाँवो मे मवेशियो के ज्यादातर रोग थूहर के सरल प्रयोग से दूर हो जाते है। इन वनस्पतियो को एक बार लगाने और कुछ समय तक देखभाल करने की जरुरत है फिर ताउम्र ये अपने आप फैलती रहती है। शुरुआत के कुछ समय वनस्पतियो के जमने तक किसानो को मचान के सहारे बरहा से फसल की रक्षा करनी होगी।

यह उचित समय है जब Human-wildlife conflicts (HWC) के क्षेत्र मे काम कर रही स्वयमसेवी संस्थाए बिना देर के इस क्षेत्र मे आये और अपने अनुभव से बरहा के विषय मे सही समझ आम लोगो मे विकसित करे। ऐसा होना चाहिये पर मुझे इसकी उम्मीद कम ही लगती है। ज्यादातर ऐसी संस्थाए सम्मेलनो और चर्चाओ के आयोजन मे अधिक रुचि लेती है। यदि जमीन मे उतरना ही पडे तो वे टाइगर प्रोजेक्ट की ओर भागती है क्योकि उसमे नाम भी है, पैसा भी। ऐसे मे जंगली सूअरो यानि बरहा पर कौन ध्यान देगा?

राजधानी के इतने पास बरहा का नया आतंक मचा है पर मीडिया अभी जागा नही है। राजधानी क्षेत्र मे तेन्दुआ, लकडबग्घा जैसे वन्य जीव अक्सर देखे जाने लगे है। जंगल किस तेजी से खत्म हो रहे है, वन्य जीवो के बडी संख्या मे आगमन से यह साफ दिख रहा है। इस क्षेत्र के किसानो और आम लोगो के लिये आने वाले दिन बडी मुसीबत भरे हो सकते है, यदि समय पर हालात पर काबू करने के प्रयास नही किये गये। कल मै इस क्षेत्र मे जाने का प्रयास करुंगा और फिर आपको इस नयी समस्या के सभी पहलुओ पर विस्तार से जानकारी देने का प्रयास करुंगा। (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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अपनो को खोने वाले बच्चो के मन मे किस रुप मे बसते है भालू दादा?

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-29
- पंकज अवधिया

अपनो को खोने वाले बच्चो के मन मे किस रुप मे बसते है भालू दादा?


मेरा बचपन ज्यादातर शहर मे बीता। बचपन मे भालू की जो छवि पराग, नन्दन जैसी बाल पत्रिकाओ ने बनायी वो भालू दादा या भालू मामा की थी। बाल कविताओ मे भालू इसी रुप मे मिलते थे। पुराने रिकार्डो के गीतो मे भी भालूओ को नाच दिखाकर मनोरंजन करने वाले जीव के रुप मे मन मे बसा लेता था। बचपन मे भालू सरकस मे साइकल चलाते हुये दिख जाता था। सरकस मे जब जानवरो की परेड होती थी तो भालू आकर्षण का केन्द्र होते थे। भालू को सरकस की मिनी ट्रेन मे बैठा देखकर मै कल्पना के अद्भुत संसार मे खो जाता था। भालू का यही रुप मेरे द्वारा रचित बाल कहानियो मे भी दिखा। कुछ बडा हुआ तो मदारी को भालू थामे देखा। वह बडी कुशलता से भालू को डुगडुगी बजाकर नचाया करता था। भालू को दादा और मामा की तरह आज भी पूरे देश मे बच्चो के सामने प्रस्तुत किया जाता है। पर सभी बच्चे इतने खुशकिस्मत नही होते कि वे भालू को दादा और मामा के रुप मे देख सके।

जंगल यात्रा के दौरान जटियाटोरा गाँव के एक शिक्षक़ से यूँ ही चर्चा चल रही थी। उन्होने बताया कि वन्य जीवो का मामा, चाचा या दादा जैसे सम्बोधनो से कविताओ और कहानियो के माध्यम से प्रस्तुतिकरण जंगल के पास रहने वाले ग्रामीण बच्चो पर अजीब सा प्रभाव डालता है। उन्होने मुझे एक बालक से मिलवाया जिसके परिजनो को उसकी आँखो के सामने भालू ने घायल कर दिया था। बाद मे अस्पताल ले जाते हुये उनकी मौत हो गयी थी। निश्चित ही जब वह बालक पुस्तको मे भालू के मसखरे रुप को पढता होगा तो अजीब तरह के मानसिक द्वन्द मे फँस जाता होगा। मैने उस बालक से इस बारे मे बात करने की कोशिश की पर उसकी उलझन देखकर मै शांत हो गया। शिक्षक ने बताया कि बहुत से ऐसे छात्र कक्षा मे भालू के सन्दर्भ मे ऐसी बाते होने पर चुप से हो जाते है। वे या तो शून्य को निहारने लगते है या लघु शंका के लिये चले जाते है। बहुत से ऐसे भी बच्चे होते है जिनमे मन मे भालूओ को दो छवियाँ बन जाती है। एक तो वह भलुआ जो कि दिन मे कभी भी गाँव मे घुसकर दहशत फैला देता है और दूसरी वह छवि जो पुस्तको और गीतो से बनती है।

मेरे नाना जी जबलपुर के नामी गिरामी वकील थे। उनके पास एक मुवक्किल आया करता था। उसकी एक आँख ही सलामत थी। पूरे शरीर मे जख्म के निशान थे। मेरी माँ उस समय छठवी-सातवी कक्षा मे रही होंगी। उन्हे धुन्धली याद है कि उस व्यक्ति का नाम अर्जुन था। वह एक गाँव से दूसरे गाँव जा रहा था तभी भालू ने उसपर हमला कर दिया। उसने लम्बे संघर्ष के बाद भालू को मार डाला पर तब तक वह बुरी तरह से लहूलुहान हो चुका था। आज भी उस व्यक्ति के बारे मे बताते समय माँ के चेहरे मे दहशत के भाव आ जाते है। कई दशको बाद आज भी जब मै अपनी जंगल यात्रा के दौरान भालुओ से हुयी मुलाकातो के बारे मे उन्हे बताता हूँ तो उन्हे पुरानी बाते याद आ जाती है। वे मेरी इन मुलाकातो से खुश नही दिखती है। मुझे माँ के अन्दर जटियाटोरा का वही बालक नजर आता है जिसने भालू के हमले मे अपने परिजन को खोया है।

एक प्रसिद्ध अभ्यारण्य के पास एक बालक जब सुबह तालाब गया तो लकडबघ्घे ने उस पर आक्रमण कर दिया। आक्रमण बडा ही जबरदस्त था। वह बालक को घसीटते हुये तालाब के बीच मे ले गया। घायल बालक ने जीवटता दिखायी और उसकी पकड से आजाद होकर तैरकर दूसरे किनारे पर आ गया। हो-हल्ला सुनकर गाँव वाले आ गये और बालक को अस्पताल ले जाया गया। तन के जख्म तो भर गये पर मन के जख्म कहाँ भरते है? जब मै उस बालक से मिला तो इस घटना को चार साल हो चुके थे। उसके पिता ने मुझे एक रंगीन चित्रो से भरी पुस्तक दिखायी जिसमे वन्य जीवो को मनुष्यो की वेशभूषा मे बडे ही रोचक ढंग से दिखाया गया था। बालक को यह पुस्तक बेहद पसन्द थी पर जब भी लकडबघ्घा वाला पन्ना आता उसके चेहरे के भाव बदल जाते थे। उसने पेन से उस चित्र को गोद डाला था पर फिर भी ऐसा लगता था कि उसे लकडबघ्घे की छवि दिखती थी उसमे। यह दिल दहलाने वाला अनुभव था।

भारत गाँवो मे बसता है और जंगलो के लगातार कटने से मनुष्यो व वन्य जीवो के बीच संघर्ष तेज हो गया है। इसका सीधा प्रभाव बच्चो पर पड रहा है। यह प्रभाव इतना गहरा होता है कि बच्चे ताउम्र इसे भुला नही पाते है। मै मन के इन जख्मो को बचपन मे ही भर देना चाहता हूँ। इसलिये मैने इस अनछुए पहलू पर यह लेख लिखा है। मुझे लगता है कि देश के बाल लेखको को एक मंच पर आकर इस पर गहनता से विचार करना चाहिये और ऐसे बाल साहित्य की रचना करनी चाहिये जो ऐसे दुखी मन को राहत पहुँचा सके। यह एक कठिन कार्य है पर इसे चुनौती के रुप मे लेकर हम निश्चित ही इस लक्ष्य को पा सकते है, ऐसा मेरा विश्वास है। ऐसे बच्चो से रोज मिलने वाले गुरुजन सुझाव देते है कि पाठ्य़ पुस्तको मे मनुष्यो और वन्य जीवो के बीच इस बढते संघर्ष के विषय ने सरल शब्दो मे बताना चाहिये। यह भी बताना चाहिये कि ये वन्य जीव जंगल से गाँवो की ओर क्यो आ रहे है और वे कौन से उपाय है जिनकी सहायता से इस संघर्ष को टाला जा सकता है। वे दोहराते है कि यह सब बिल्कुल सरल भाषा मे होना चाहिये तभी बच्चे इसमे रुचि लेंगे। ये बच्चे जब बडे होकर देश की बागडोर सम्भालेंगे तो उनके प्रयास और निर्णय़ इस संघर्ष को टालने मे मील का पत्थर साबित होंगे। वन्य जीवो से नफरत करने वाले बहुत से बच्चे आज बडे होकर देश की योजना बना रहे है। जो हुआ सो हुआ पर अब और देर नही करनी चाहिये। (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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Monday, June 29, 2009

साँप-बिच्छू, उन्हे दूर रखने वाली वनस्पतियाँ और हमारे बुजुर्ग

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-28
- पंकज अवधिया

साँप-बिच्छू, उन्हे दूर रखने वाली वनस्पतियाँ और हमारे बुजुर्ग


रात को जब हम वापस लौट रहे थे तब दूर सडक मे कुछ रोशनी दिखायी दी। पास आये तो तीन साये नजर आये। फिर उनके हाथ मे चीनी टार्च दिखायी दी। ड्रायवर ने कहा कि रात को जंगल मे रुकना ठीक नही है। वे तीन थे जबकि गाडी मे हम चार थे। गाडी जब पास आयी तो वे सडक के बीचो-बीच आ गये। हमे गाडी धीमी करनी ही पडी। वे हमे नही रोक रहे थे बल्कि सडक मे कुछ तलाश रहे थे। हमने गाडी रोकी तो वे सब अपने जूतो से किसी जीव को कुचल रहे थे। हमारी गाडी की रोशनी पडी तो हमे मरा हुआ बिच्छू दिखायी दिया। काले रंग का बडा बिच्छू। जिन्होने इसे मारा था वे मौज-मस्ती के लिये जंगल आये हुये थे। पास मे उनकी बाइक खडी थी। रात के नौ बजे उन्हे टार्च की रोशनी मे यह निरीह प्राणी दिखा तो उन्होने मारने मे जरा भी देर नही की।

बिच्छू को देखकर साथ चल रहे पारम्परिक चिकित्सक बोले कि यह कम जहरीला था। बिच्छू के बारे मे साफ और सरल नियम है। जितना बडा बिच्छू उतना कम जहर। “बताओ, कहाँ काटा है यह बिच्छू?” पारम्परिक चिकित्सक ने लडको से पूछा। लडके बोले कि हमे काटा नही है। पर किसी आते-जाते को काट सकता था इसलिये हमने इसे मार दिया। इस पर पारम्परिक चिकित्सक बिफर पडे और क्रोधित होकर बोले कि रात भर टार्च जलाकर जंगल की जमीन को देखते रहो। हजारो जहरीले जीव मिलेंगे। मारते रहना सबको। अरे, इसने कुछ बिगाडा नही था तो इसे मारा क्यो? वह अपने रास्ते जा रहा था। वैसे ही जंगल मे चलती सडक पार करने का जोखिम उठा रहा था। तुम लोग जाओ अपने ठिकाने। क्यो यहाँ बिच्छू के ठिकानो पर आकर उत्पात मचा रहे हो? पारम्परिक चिकित्सक की डाँट का असर दिखा और वे तीनो अपनी बाइक की ओर बढ गये।

इसमे कोई दो राय नही कि जितना धैर्य हमारी बुजुर्ग पीढी मे दिखता है उतना हमारी और नयी पीढी मे नही। मुझे याद आता है कि कुछ वर्षो पहले एक बडा नाग हमारे खेतो मे डेरा जमाये हुये था। जब भी मै खेत जाता तो पिताजी उसके बारे मे बताते थे। कहते थे कि वह तो आवाज सुनकर दूर निकल जाता है। कभी भी फन काढकर अपना रुतबा नही जताता है। दूर शहरो से आये हमारे रिश्तेदारो को जब खेत मे इसके बारे मे बताया जाता था तो वे झट से खेत से दूर होकर गाडी मे बैठ जाते थे। पिताजी हंटर जूते पहनते है और बडे मजे से खेतो मे घूमते है। हमारे खेत मे काम करने वाले श्रमिको मे एक नयी पीढी का युवा आया। जब उसे पता चला कि यहाँ नाग है तो उसने सबसे पहले उसे ढूँढा और फिर उसका काम तमाम कर दिया। जब पिताजी को यह पता चला तो वे खूब नाराज हुए। उन्होने उसे उसी पल बाहर का रास्ता दिखा दिया। वह युवा बाहर जाकर कहता रहा कि मैने तो सबकी जान बचायी। उल्टे मुझे ही नौकरी से निकाल दिया। वह अबोध था। साँप की असली महत्ता किसान जानते है। इसलिये वे कभी भी साँपो को बाहर का रास्ता नही दिखाते है।

इस जंगल यात्रा के दौरान एक पहाडी मन्दिर मे सुस्ताते हुये गाँव के बुजुर्गो की बाते सुनने का अवसर मिला। एक बुजुर्ग बता रहे थे कि रात को खाना खाते वक्त एक गेहुँआ साँप उनके सामने आ गया। बुजुर्ग ने धार्मिक आस्था के चलते उसे प्रणाम किया और उसे अनदेखा कर दिया। झोपडी मे लाइट तो थी नही। उनकी पत्नी को पीठ पर कुछ ठंडा सा अहसास हुआ तो उन्होने पीठ को हिला दिया। वह अहसास जाता रहा। पत्नी ने साँप को अन्दर आते नही देखा था। उन्होने अपने पति को यह बताया। बुजुर्ग ने ध्यान नही दिया। नीचे गिरने के बाद साँप फिर पीठ पर चढ गया। इस बार पत्नी ने और जोर से झटका दिया। अबकी बार साँप सामने की ओर गिरा। बुजुर्ग ने देख लिया। इससे पहले कि वे कुछ करते वह बाहर चला गया। वे लोग खाना खाते रहे। वह साँप फिर घूमकर आ गया। इस बार पीठे पर चढते हुये बुजुर्ग ने देख लिया। साँप के सिर को पकडा और बाहर खुले मे ले जाकर साँप को छोड दिया। कुछ मंत्र पढे और साँप को घुडकी देते हुये कहा कि अब आया तो छोडूंगा नही। फिर साँप नही आया। बुजुर्ग अपने साथियो को यह सब मजे से बता रहे थे। वे इस बात से अंजान थे कि हम यह सब सुन रहे थे। हमारी आँखे आश्चर्य से चौडी हो रही थी। पर उन सब के लिये यह रोजमर्रा के जीवन की बात लग रही थी। साँपो और दूसरे विषैले जीवो को उनकी पीढी ने बेवजह नही मारा इसलिये ये आज बडी संख्या मे हमारे आस-पास है और माँ प्रकृति द्वारा तय की गयी भूमिका निभा रहे है। हमारी पीढी वन्य प्राणियो पर बडी-बडी बाते तो कर लेती है पर इनके सामने पडने पर मारने मे जरा भी देर नही करती है। यह सब चलता रहा तो साँप जैसे जीव आने वाले कुछ वर्षो मे पूरी तरह समाप्त हो जायेंगे।

उन तीन लडको से मिलने के बाद हम आगे बढे तो ड्रायवर ने गाडी की गति धीमी कर दी। उसने बताया कि उसे सडक पर बहुत से छोटे जीव दिख रहे है। इस बार मानसून मे देरी के कारण उनमे अफरा-तफरी का माहौल है। अचानक ड्रायवर ने गाडी सडक के नीचे उतार ली। हम एक ओर झुक गये। उसने एक साँप को बचा लिया था पर सडक से नीचे उतरने के कारण पहिये के नीचे एक गिरगिट आ गया था। कुछ नही किया जा सकता था। हमने यह निश्चय किया कि अगली बार से रात होने से पहले ही लौट आया करेंगे ताकि हमारी गाडी से कम से कम नुकसान हो। आमतौर पर हम जंगल मे तब तक बढते रह्ते है जब तक कि अन्धेरा नही हो जाता। अन्धेरा होने के बाद वापसी की प्रक्रिया शुरु होती है। वापसी नान-स्टाप होती है।

पारम्परिक चिकित्सको के पास बहुत सी ऐसी जडी-बूटियाँ होती है जो साँपो और ऐसे ही विषैले जीवो को दूर रखती है। इन वनस्पतियो को पैर के निचले हिस्से मे बाँध लिया जाता है। हम अपने जूतो मे इसे रख लेते है। पर पारम्परिक चिकित्सक इनके प्रयोग के खिलाफ है। जंगल मे गन्ध महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। ऐसे मे एक नयी गन्ध लेकर जंगल मे प्रवेश करना जंगल के लिये ठीक नही है। आप तो जानते ही है कि वे नंगे पाँव चलते है। उनके चलने से जमीन मे जो कम्पन होती है उससे साँप जैसे जीव अपने आप किनारा कर लेते है। फिर बेवजह जडी-बूटियो का प्रयोग किया ही क्यो जाये? पारम्परिक चिकित्सको का यह तर्क सही जान पडता है। (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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Sunday, June 28, 2009

कोआ के झरती, आमा के फरती और दुबले अमित के स्वस्थ्य होने का राज

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-27
- पंकज अवधिया

कोआ के झरती, आमा के फरती और दुबले अमित के स्वस्थ्य होने का राज


“कोआ के झरती, आमा के फरती।” जंगल से गुजरते वक्त हमारी गाडी मे पुराने छत्तीसगढी गीत बज रहे थे। उन्ही मे से एक मे ये पंक्तियाँ थी। मै तो गाने को गाने की तरह सुन रहा था। ध्यान बाहर की ओर था कि कुछ नयी वनस्पतियाँ मिल जाये। “ये गाना गडबड है। इसे फिर से सुनाओ।“पिछली सीट पर बैठे पारम्परिक चिकित्सक की आवाज से मेरा ध्यान टूटा। “कोआ के झरती, आमा के फरती। ये बिल्कुल गलत है।“ पारम्परिक चिकित्सक ने अपनी बात दोहरायी। कोआ महुआ के फल को कहा जाता है। आमा यानि देशी आम। गाने की इस पंक्ति का अर्थ था कि जब महुआ के फल यानि कोआ गिरते है तब आम के फल लगते है। पारम्परिक चिकित्सक के अनुरोध पर हमने रिवाइंड करके इसे सुना। गाने की पंक्ति यही थी। पर वास्तव मे ऐसा नही होता है। इसे होना चाहिये था “आमा के झरती, कोआ के फरती” यानि जब आम के फल गिरते है तब कोआ मे फल आते है। पारम्परिक चिकित्सक ने सही पकडा था। इस गीत के गीतकार राज्य के ख्यातिनाम गीतकार है। अभी तक शायद ही उन्हे किसी ने टोका हो। अपनी बात सही निकलने पर पारम्परिक चिकित्सक शेष गाने ध्यान से सुनते रहे और उन्होने बहुत से गानो मे तकनीकी गल्तियाँ पकडी।

रास्ते मे जंगल के अन्दर दीमक की बाम्बी की मिट्टी खोदता एक व्यक्ति दिखायी पडा। अच्छी सेहत वाला यह व्यक्ति हमे देखकर पास आ गया। मैने उसे पहचान लिया। वह अमित था। वही अमित जो कुछ ही हफ्तो पहले दुबला-पतला हुआ करता था। उसे दोस्त तांतू कहकर चिढाते थे। वह रायपुर का ही रहने वाला था। उसने इंजिनियरिंग पढाई की थी और अब वह किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा है। इंटरनेट पर उसने मेरे लेख पढे और मुझसे मिलने चला आया। उसे ऐसी वनस्पतियाँ चाहिये थी जिससे उसका दुबलापन दूर हो जाये। मैने कहा कि जो जैसा है, वैसा ही अच्छा है। यहाँ मै उसके जैसे दुबला होना चाहता हूँ और वह है कि मेरे जैसा मोटा होना चाहता है। उसने जिद नही छोडी। वह बहुत से शहरी जिम मे गया। दूध-केला खाया। डाक्टरो से मिला पर बात नही बनी। किसी ने कहा कि शादी कर लो तो मोटे हो जाओगे। वह अभी तो प्रतियोगी परीक्षाओ की तैयारी मे था। इसलिये शादी के बारे मे तो सोच भी नही सकता था। और फिर इस बात की कोई गारंटी भी नही थी। एक बार जंगल यात्रा के दौरान मैने उसे साथ रख लिया। रास्ते मे जितने पारम्परिक चिकित्सक मिले सबके वह पीछे पड गया। अंतत: एक पारम्परिक चिकित्सक ने मदद के लिये हामी भर दी। पर जब चिकित्सा की विधि के बारे मे उसे बताया गया तो उसके होश उड गये।

पारम्परिक चिकित्सक ने दो टूक कह दिया कि मेहनत करनी होगी, वो भी जमकर मेहनत। इस पर अमित ने बेसब्र होकर कहा कि मुझे दुबला नही होना है बल्कि मोटा होना है। यदि मै मेहनत करुंगा तो और दुबला हो जाऊँगा। इस पर पारम्परिक चिकित्सक ने खुलासा किया कि मेहनत के बाद पौष्टिक़ खाने से शरीर बनेगा। शरीर मे जो माँस बनेगा वह स्थायी तौर पर रहेगा। यह तुम्हे बीमार नही करेगा। अमित को इसके लिये डेढ महिने तक पारम्परिक चिकित्सक के साथ रहना था। फीस के रुप मे वहाँ आ रहे रोगियो के लिये जंगल से जडी-बूटियाँ एकत्र करनी थी। मुझे शक था कि अमित यह चुनौती शायद ही स्वीकार कर पायेगा। दिन मे देर से उठने वाले अमित की शाम कैफे काफी डे मे गुजरती थी। एसी के बिना नीन्द नही आती थी। वो क्या गाँव मे टिकेगा? पर दूसरे दिन ही वह अपनी बाइक मे सवार होकर पारम्परिक चिकित्सक के घर पहुँच गया।

शुरुआत मे पारम्परिक चिकित्सक अपने ही साथ उसे जंगल ले जाने लगे। पैदल चलने का चस्का लगा तो उसने बाइक को छोड दिया। आस-पास जाने के लिये साइकिल रख ली। दिन भर की व्यस्तता से उसकी भूख बहुत बढ गयी। उसे दो समय चावल मिलता था और कभी-कभी दाल व साग। जब वह वनस्पतियाँ लेने जाता तो रास्ते मे जंगली फल मिल जाते थे। सुबह और शाम का नाश्ता जोर का होता था। बरकन्द, बिलाईकन्द, राम कन्द, रावण कन्द, बेन्दरा कन्द, जगमंडल कन्द, पातालकुम्हडा, गोल कन्द जाने कौन-कौन से कन्द उसे खाने को मिलते थे। ये कन्द बहुत ही स्वादिष्ट होते थे। वह बिना देरी इन्हे खा जाता था। मेरी जंगल यात्रा के दौरान पारम्परिक चिकित्सक अमित के बारे मे बताते रहे पर मुलाकात इस बार ही हुयी। उसकी सेहत अच्छी हो गयी थी।

अमित गर्मजोशी से मिला। उसने अब तक 36 प्रकार के कन्द खा लिये थे। उसे उनके नाम जबानी याद थे। पारम्परिक चिकित्सक बताते है कि रावण की लंका मे आक्रमण से पहले भगवान राम की सेना ने इन्ही कन्द-मूलो से अपार शक्ति प्राप्त की थी। पारम्परिक चिकित्सको ने इनमे से बहुत से कन्द-मूलो के बारे मे जानकारी बन्दरो से प्राप्त की है। सम्भवत: बन्दरो ने भी इन पारम्परिक चिकित्सको से बहुत कुछ सीखा होगा। मै लम्बे समय से इन कन्द-मूलो के विषय मे जानकारी एकत्र कर रहा हूँ। मुझे तो सबसे पहले इनका सामरिक महत्व दिखता है। भविष्य़ ँऎ छत्तीसगढ के जंगलो मे होने वाले किसी सैनिक अभियान के लिये इन कंद-मूलो से सम्बन्धित जानकारी बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकती है। इसमे बहुत से कन्द आम लोगो की दिनचर्या मे शामिल किये जा सकते है जिससे उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ सके। एडस के बहुत से रोगी जब आखिर उम्मीद लेकर पारम्परिक चिकित्सको की शरण मे आते है तो इन्ही कन्दो का भोजन दिया जाता है। पर इन कन्दो के विषय मे आम लोगो को बताने से पहले कुछ सावधानी भरे कदम उठाने जरुरी है।

ये कन्द जंगल मे सीमित मात्रा मे है। इन कन्दो पर मनुष्य ही आश्रित नही है बल्कि भालू और जंगली सुअर जैसे वन्य जीव भी अपनी शक्ति के लिये इनका नियमित सेवन करते है। यदि इन कन्दो के विषय मे जानकारी शहरो तक पहुँच गयी तो इन्हे पाने के लिये मारामारी मच जायेगी और देखते ही देखते जंगल के जंगल साफ हो जायेंगे। इसलिये प्रचार से पहले इन कन्दो की जैविक खेती की विधियाँ विकसित करने की जरुरत है। यह सच है कि खेती से औषधीय वनस्पतियो के गुण प्रभावित होते है पर जंगल जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करके काफी हद तक औषधीय गुणो को बरकरार रखा जा सकता है। जैविक खेती से जंगलो पर दबाव कम होगा। जंगलो से एकत्र किये गये चन्द कंदो को नये कन्द के उत्पादन के लिये उपयोग किया जायेगा। लिखने और पढने मे यह सब आसान लगता है। पर जमीनी स्तर पर यह कठिन कार्य है। भारतीय जंगलो मे विलुप्त हो रही सफेद मूसली को बचाने के लिये इसकी खेती को प्रोत्साहित किया गया। पर सफेद मूसली का प्रचार प्रसार बढने से जंगलो पर दबाव और बढ गया। सफेद मूसली की खेती पौध-सामग्री माफिया के चंगुल मे फँस गयी। अधिक उत्पादन के चक्कर मे जैविक खेती को ताक पर रख दिया गया। आज बडे पैमाने पर खेती तो हो रही है पर उच्च गुणवत्ता का उत्पाद नही मिल पा रहा है।

अमित से मिलकर दिल को सुकून मिला। यह केवल जडी-बूटियो का ही प्रभाव नही था बल्कि उसका त्याग भी था। आजकल के युवा आकर्षक डिब्बो मे बन्द उत्पादो पर अधिक विश्वास करते है। उनमे से बहुत कम ही अमित की तरह जंगल मे जाकर समय गुजारना पसन्द करते है। मुझे उम्मीद है कि डेढ महिने पूरे होने तक अमित स्वस्थ्य जीवन की कुंजी प्राप्त कर लेगा और आजीवन अपने परिवार व मित्रजनो मे इसे बाँटता रहेगा। (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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Saturday, June 27, 2009

इंसानी काम-पिपासा बुझाता पथर्री टेटका और मनोकामनाए पूरी करता चीटीखोर

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-26
- पंकज अवधिया

इंसानी काम-पिपासा बुझाता पथर्री टेटका और मनोकामनाए पूरी करता चीटीखोर


“अरे, बचाओ, कोई तो बचाओ, गुफा मे छिपकली है। ये हमारी ओर ही आ रही है।“ एक सँकरी गुफा मे कुछ पल पहले ही पेट के बल घुसे कुछ लडको ने मदद के लिये पुकारा था। हम कुछ करते उससे पहले ही वे एक-एक करके गुफा के द्वार से वापस आ गये। ये पर्यटक थे। गुफा के पास मै पारम्परिक चिकित्सको के साथ वनस्पतियो की तस्वीरे ले रहा था। हम साल मे कई बार इस गुफा के पास आते है पर ठन्ड मे ही इसके अन्दर जाते है। स्थानीय लोगो की मान्यता है पेट के बल इस तंग गुफा मे सरकने से पेट की बहुत सी बीमारियो मे लाभ मिलता है। इसके लिये लोगो को खाली पेट आने को कहा जाता है। फिर गुफा से निकलने के बाद पास के झरने से भरपेट पानी पीने को कहा जाता है। गुफा तक पैदल आना और जाना होता। अब पर्यटक तो पूरे नियम-कायदो को मानते नही है। वे ऐसे ही गुफा मे घुस जाते है। कई बार लोग फँस भी जाते है। यह अच्छी बात है कि अब तक किसी की मौत गुफा मे फँसने से नही हुयी है।

गर्मियो और बरसात मे इस गुफा के अन्दर जाना सही नही होता है। गुफा ठंडी होती है इसलिये गर्मियो मे बहुत से छोटे जीव इसमे शरण लिये होते है। बरसात मे भी बिलो मे पानी भर जाने के कारण बहुत से साँप यहाँ डेरा जमाये रहते है। इस साल गर्मी का मौसम लम्बा खिच गया है। पानी बरस ही नही रहा। इस कारण हमने गुफा मे प्रवेश नही किया। हमने पर्यटको को समझाया भी पर वे कहाँ मानने वाले थे।

गुफा के द्वार से घबराये हुये पर्यटक निकले तो पारम्परिक चिकित्सक गुफा के उस छोर तक पहुँचे जहाँ सुरंगनुमा द्वार मे गुफा खत्म होती थी। वे जानते थे कि पर्यटको के प्रवेश से परेशान होकर छोटे जीव उसी द्वार से बाहर निकलेंगे। ऐसा हुआ भी। पर जिन्हे छिपकली कहा जा रहा था वे दुर्लभ राक केमेलियान यानि चट्टानी गिरगिट निकले। इन्हे स्थानीय भाषा मे “पथर्री टेटका” कहा जाता है। पहले ये बडी संख्या मे जंगल मे दिख जाते थे पर अब इनके दर्शन दुर्लभ हो गये। कामशक्ति बढाने के लिये इसका प्रयोग किया जाता है। अब कामशक्ति बढती है कि नही, ये तो इसे इस्तमाल करने वाले जाने पर इसके कारण ये तेजी से गायब हो रहे है। पारम्परिक चिकित्सक बताते है कि साधारण वनस्पतियो मे कामशक्ति को बढाने की जबरदस्त शक्ति होती है फिर क्यो शहरी लोग इस निरीह जीव के पीछे भागते है?

गुफा से बाहर निकलते ही ये जीव खुले मे आ गये। अब इनके आसमान मे मँडराते शिकारी पक्षियो की नजर मे आने का खतरा बढ गया था। पारम्परिक चिकित्सको ने जल्दी से कलमी नामक वृक्ष की पत्तियो को एकत्र करने को कहा। हमने इन पत्तो को जोडकर एक आवरण बनाया और फिर इसे उस चट्टान पर रख दिया जिसके पीछे इन्होने शरण ली थी। ये मनुष्यो को नुकसान नही पहुँचाते है। यह जानकर पर्यटको की जान मे जान आयी।

कुछ दिनो पहले ही स्थानीय अखबारो मे रायगढ के पास की एक खबर प्रकाशित हुयी थी। खबर के अनुसार गर्मियो मे किसी गुफा को देखने गये देशी-विदेशी पर्यटको पर मधुमख्खियो ने हमला कर दिया। इसमे पहले कि उन्हे शहर के अस्पताल की ओर रवाना किया जाता उनकी जान चली गयी। गर्मियो मे छोटी पड गयी जलधाराओ और ठन्डी गुफाओ मे जाने से बचना चाहिये। शायद मारे गये पर्यटको ने इस चेतावनी पर ध्यान न दिया हो। मुझे याद आता है कि मैनपुर के पास एक डोंगर है जहाँ से पैरी नदी निकलती है। गर्मियो मे वहाँ विशेष प्रकार की वनस्पतियाँ उगती है। पर जब भी हम गर्मियो मे वहाँ जाते है तो पारम्परिक चिकित्सक हमे साफ मना कर देते है। नमी होने के कारण यहाँ बडी संख्या मे मधुमख्खियो का डेरा है। वे अपने क्षेत्र मे किसी तरह के दखल को बर्दाश्त नही करती है। इस क्षेत्र के कमार आदिवासी बडी मात्रा मे शहद का एकत्रण इस तरह के डोंगरो से करते है। वे पीढीयो से इस कार्य को कर रहे है। जब शहद एकत्रण का काम खत्म हो जाता है तभी पारम्परिक चिकित्सक डोंगर पर जाने देते है पर तब भी पूरी सावधानी बरती जाती है। जंगल के भले ही “जंगल राज” चलता हो पर इस “जंगल राज” के भी कुछ कठोर नियम होते है। इन नियमो का सम्मान किये बिना जंगल मे जाना बडी आफत मोल लेने जैसा है।

इस जंगल यात्रा के दौरान पारम्परिक चिकित्सको ने बताया कि गर्मी मे चीटीखोर जिसे पेंगोलीन भी कहा जाता है, गुफाओ मे अक्सर शरण लेते है। उन्होने इस बात का खुलासा किया कि तेन्दुए इस जीव से बहुत डरते है। वे इसे खाते नही है क्योकि खतरा दिखने पर शल्को से ढका यह जीव गेन्द की तरह गोल घूमकर अपने नाजुक अंगो को उसमे बन्द कर लेता है। पारम्परिक चिकित्सको ने दावा किया कि इस जीव की उपस्थिति वाले भाग मे तेन्दुआ नही होता है। यह एक महत्वपूर्ण जानकारी है। पेंगोलीन दीमको को चट कर जाता है। उसकी थूथन की बनावट ही ऐसी होती है कि वह दीमक की बाम्बी मे आसानी से घुस सके। जिस जंगल मे पेंगोलीन होते है वहाँ दीमक की आबादी पर अंकुश लगा रहता है। पेंगोलीन और तेन्दुए दोनो ही शर्मीले जीव माने जाते है। बेशरमी का सारा जिम्मा तो मनुष्यो ने ले रखा है। मैने अपने लेखो मे पहले लिखा है कि कैसे अन्ध-विश्वासी मनुष्य़ पेंगोलीन के माँस को खाता है और उनके शल्को को व्यापारियो के पास बेच देता है। शल्को से समस्त मनोकामना पूर्ण करने वाली अंगूठी बनायी जाती है। मुझे नही लगता कि किसी निरीह जीव को मारकर उसके अंगो से बनायी गयी अंगूठी किसी का भला कर सकती होगी?

पेंगोलीन से तेन्दुए डरते है, इस बारे मे दुनिया भर के वैज्ञानिक साहित्य कुछ नही बताते। मैने भी इससे पहले इसके बारे मे नही सुना है। पर मुझे पारम्परिक चिकित्सको की बातो पर विश्वास हो रहा है। Human-wildlife conflicts (HWC) के मामलो मे यह जानकारी बहुत काम आ सकती है। इसी उद्देश्य से मै इस लेखमाला मे इस बारे मे लिख रहा हूँ।

रास्ते मे एक छोटे व्यापारी से मुलाकात हुयी। मुझे बताया गया था कि पेंगोलीन जैसे जीवो के अंगो के व्यापार से उसने खूब कमाया है। बातो ही बातो मे मैने पेंगोलीन के शल्को से बनी अंगूठी के बारे मे चर्चा छेडी तो व्यापारी की आँखो मे चमक आ गयी। सिर पर हाथ रखकर कहा कि इस अंगूठी के लिये लोग मुँहमाँगे दाम देने को तैयार है पर मैने अब यह काम छोड दिया है। व्यापारी की बात सुनकर मुझे लगा कि उसे सदबुद्धि आ गयी होगी। पर वापस लौटते वक्त पारम्परिक चिकित्सको ने बताया कि जंगल मे अब इक्के-दुक्के पेंगोलीन ही बचे है, बडी संख्या मे इन्हे मारा गया है। अब पेंगोलीन बचे ही नही है तो भला व्यापारी क्यो न सिर पर हाथ रखेगा? मेरी समझ मे असल बात आ गयी। मै पेंगोलीन के भविष्य़ के लिये चिंतित हूँ पर भारत मे जंगल के राजा की ओर ध्यान देने वाला कोई नही है तो पेंगोलीन जैसे छोटे जीवो पर कौन ध्यान देगा? (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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Friday, June 26, 2009

समस्त दुखो को हरने वाली माला और जख्मी वृक्षो की मरहम-पट्टी

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-25
- पंकज अवधिया

समस्त दुखो को हरने वाली माला और जख्मी वृक्षो की मरहम-पट्टी

“अब हाथ मे एक हजार एक की दक्षिणा रखे और इस सारे दुख को हरने वाली माला को प्राप्त करे।“ इस जंगल यात्रा के दौरान मैने सडक के किनारे हाल ही मे बने एक डेरे पर अपनी गाडी रुकवायी। बाहर से ही यह साफ झलक रखा था कि यह किसी तांत्रिक का डेरा है। रंग-बिरंगे झंडे लगे थे। आस-पास के गाँवो से बडी संख्या मे लोग जमा थे। मेरे साथ स्थानीय पारम्परिक चिकित्सक थे इसलिये मुझे सीधे ही तांत्रिक से मिलने का अवसर मिल गया। मेरे अन्दर प्रवेश करते ही वो जोर से चिल्लाया कि तू बहुत दुखी है इसलिये मेरे दर पर आया। तेरे लिये यह माला और यह शिव पत्र उपयुक्त रहेगा। किसी वृक्ष के जडो से बनी ताजी माला मुझे दे दी गयी। मै जडो को पहचान नही पाया। फिर एक पत्ती मुझे दी गयी जिसमे महामृत्युंजय मंत्र लिखा हुआ था। इस ताजी पत्ती को घर के द्वार मे रखने की बात कही गयी और दावा किया गया कि इससे सारे दुख द्वार से ही उल्टे पैर वापस चले जायेंगे। पत्ती को देखकर मै झट से पहचान गया कि यह तो कुल्लु की ताजी पत्तियाँ है।

कुछ दिनो पहले ही मैने कुल्लु की नयी पत्तियो से युक्त वृक्ष देखे थे और जंगल मे उनकी तस्वीरे ली थी। धार्मिक प्रयोजनो के लिये कुल्लु का प्रयोग मेरे लिये नयी बात थी। पारम्परिक चिकित्सको ने कान मे फुसफुसाकर कहा कि यह जडो की माला भी कुल्लु से ही बनी है। मेरे आश्चर्य और क्रोध का ठिकाना नही रहा। आश्चर्य इसलिये क्योकि मैने ऐसी माला पहली बार देखी थी। और क्रोध इसलिये क्योकि जडो का एकत्रण यानि वृक्ष का सर्वनाश। इस पत्ती और जड के एकत्रण से इस क्षेत्र के कुल्लु के वृक्ष तेजी से खत्म हो रहे होंगे। मै झट से वहाँ से उठा और तेजी से डेरे के बाहर आ गया। पारम्परिक चिकित्सको ने तांत्रिक से बात की और बाहर आ गये। बिना विलम्ब हमने पास के जंगल की ओर कूच कर दिया।

जंगल की पथरीली जमीन पर हमे एक घायल कुल्लु का वृक्ष मिला। सम्भवत: तांत्रिक के चेले तो यह दुष्कृत्य किया होगा। इस समय सब सभी कुल्लु के वृक्ष नयी पत्तियो से लदे है ऐसे मे यह वृक्ष पत्ती विहीन था। यानि इससे पत्तियाँ एकत्र की गयी थी। काफी खोजबीन के बाद कुछ और वृक्ष दिखे। उनकी हालत भी बिगडी हुयी थी। जडो के लिये आस-पास की मिट्टी मे खुदायी के ताजे निशान थे। सारी तस्वीरे लेने के बाद हम उल्टे पैर डेरे पर पहुँचे और कडे शब्दो मे तांत्रिक को हडकाया। वह तांत्रिक बाहर से आया था। उसे तो बस ऐसी किसी वनस्पति का अनूठा प्रयोग बताना था जिसके बारे मे आम लोग कुछ नही जानते थे। उसके सामने कुल्लु का वृक्ष पडा तो वह उसी की जड और पत्तियो के पीछे लग गया। मैने उसे समझाने की कोशिश की तो पहले जंगल मे कुल्लु के असंख्य वृक्ष थे पर आज गिने-चुने ही बचे है। आज भी गोन्द की तलाश मे लोग टंगिया लेकर कुल्लु को घायल करने घूम रहे है। पारम्परिक चिकित्सको ने बडी मुश्किल से इन्हे बचाये रखा है। ऐसे मे इसकी जड की माला और पत्तियो का नया प्रयोग इसे हमेशा के लिये समाप्त कर देगा। “अभी से यह गोरखधन्धा बन्द होना चाहिये।“ तांत्रिक को आखिरी चेतावनी दे दी गयी। हमारी बातो का गाँव वालो पर भी असर पडा था। उन्होने भी डेरा उठाने के लिये जोर डाला। हमे आगे बढ गये।

जंगल मे हमे सूखे झरनो के किनारे बहुत से कुल्लु के नये पौधे मिले। नये पौधो को देखकर उम्मीद की कुछ किरण जागी। साथ चल रहे पारम्परिक चिकित्सको ने बताया कि बहता पानी कुल्लु के बीजो को दूर-दूर तक फैलाने मे मदद करता है। जबलपुर मे नर्मदा मैया को भी ऐसी ही भूमिका मे मैने देखा है। वहाँ भी तट पर नये पौधे और पुराने वृक्ष दिख जाते है। इंटरनेट पर स्टरकुलिया यूरेंस खोजने पर बहुत कम वेबसाइट मिलती है। इस पर ज्यादा शोध नही हुये है। मेरे मन मे योजना बन रही है कि मै देश भर के कुल्लु वृक्षो की तस्वीरे एक स्थान पर लाने के उद्देश्य से एक वेबसाइट बनाऊँ। इस वेबसाइट मे इस वृक्ष से सम्बन्धित सभी जानकारियो को प्रस्तुत करुँ ताकि नयी पीढी माँ प्रकृति के इस अनुपम उपहार को बचाने के लिये सामने आ सके।

कुल्लु की तरह ही सलिहा के वृक्ष भी संकट मे है। रास्ते मे हम उस स्थान पर रुके जहाँ एक समय सलिहा का जंगल हुआ करता था। इसकी गोन्द के औषधीय उपयोग है। बडी व्यवसायिक माँग भी है। यही कारण है कि सलिहा का यह जंगल देखते ही देखते खत्म हो गया। अब इसके गिने-चुने वृक्ष बचे है। जब भी इस रास्ते से गुजरता हूँ तो उनसे हाल-चाल पूछ लेता हूँ। इस बार जब हम वहाँ पहुँचे तो बहुत से वृक्ष लहूलुहान थे। उनके चोटिल भागो से पतली गोन्द बह रही थी। गोन्द का मुख्य हिस्सा एकत्र करके लोग जा चुके थे। इस बेहरमी से चोट की गयी थी कि बहुत से वृक्षो का बचना मुश्किल दिख रहा था। यह तो मेरा सौभाग्य था कि पारम्परिक चिकित्सक मेरे साथ थे। उन्होने पहले जख्मो पर हाथ रखा और फिर पास से सेन्हा नामक वृक्ष की पत्तियाँ ले आये। उन्होने इसमे पास की गीली मिट्टी मिलायी और एक लेप तैयार किया। फिर यह लेप वृक्ष के जख्मो मे लगा दिया। उन्होने लहा कि एक सप्ताह तक यदि यह लेप ऐसे ही लगा रहा तो वृक्ष बच जायेंगे। हम तो वहाँ रुककर पहरेदारी नही करने वाले थे। गोन्द एकत्र करने वालो का क्या भरोसा? दिल्ली से एक फोन आया नही कि स्थानीय व्यापारी उन्हे जंगल से गोन्द एकत्र करने दौडा देंगे और जख्म के ऊपर कई और जख्म हो जायेंगे। मुझे बहुत से धराशायी वृक्ष भी दिखे। मैने इसे लकडी माफिया की करतूत माना पर पारम्परिक चिकित्सको ने बताया कि मानसून मे देरी के कारण जो रोज गर्म हवाओ के तूफान चल रहे उससे ही ये वृक्ष गिरे है। इनके गिरने के बाद आस-पास के गाँव वाले इन्हे उठाने मे जरा भी देरी नही करते है। पारम्परिक चिकित्सको ने समझाया कि इन गिरे हुये वृक्षो पर बहुत से सूक्ष्मजीव अपना पोषण करते है। माँ प्रकृति ने इन्हे ऐसे ही नही गिराया है। पर जब गाँव वाले इन्हे ले जाते है तो सारे किये कराये पर पानी फिर जाता है। जंगल मे जो कुछ भी होता है अपने आप, उसके पीछे कुछ न कुछ उद्देश्य अवश्य होता है।

पास के कस्बे मे हमे व्यापारियो के पास बडी मात्रा मे कुल्लु और सलिहा की गोन्द होने का अनुमान था। कस्बे मे पहुँचने के बाद हमने गाडी दुकान के काफी पहले रोक दी। फिर एक पारम्परिक चिकित्सक को गोन्द के बारे मे पता करने भेजा। व्यापारियो ने कह दिया कि यह गोन्द अभी स्टाक मे नही है। फिर ड्रायवर को भेजा। उसने प्रभावी ढंग से बात की और बडी मात्रा मे खरीदने का प्रलोभन दिया तब कुछ व्यापारियो ने बताया कि बाहर के व्यापारियो के लिये इन गोन्द को एकत्र करवाया गया है। उन्होने कहा कि अभी तो हम इसे नही बेच सकते है पर आप सौदा करो तो तीन दिन के भीतर हम इतना ही माल दे सकते है। निश्चित ही व्यापारियो के हौसले बुलन्द थे।

हम वापस उसी रास्ते से लौटे। तब तक तांत्रिक का डेरा उठ चुका था। अभी तो कुल्लु वृक्ष पर से संकट टल गया था पर हमे इस बात का अहसास है कि हमे आजीवन गश्त पर आते रहना होगा। (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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चवन्नी दुकाल, कैंसर रोगियो के लिये औषधीय धान और देशी खेती

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-24

- पंकज अवधिया

चवन्नी दुकाल, कैंसर रोगियो के लिये औषधीय धान और देशी खेती


पहले यहाँ बहुत घना जंगल हुआ करता था। सभी तरह के जानवर थे। मुझे याद है कि तब सामने वाली गली से बाघ ने हमारे मोसी (मवेशी) को मार दिया था। सामने वाले घर के अन्दर घुसकर एक बच्चे को उठा लिया था। जब बच्चे का पिता पीछे दौडा तो बाघ ने बच्चे को चीर कर मार डाला। अब बाघ नही है पर तेन्दुए है। तेन्दुए हमे नुकसान नही पहुँचाते। कभी-कभार दिख जाते है। खेती मे बरहा (जंगली सूअर) का आक्रमण होता रहता है। हम रात भर जागकर खेत की रखवाली करते है। आदमी होने के अहसास से बरहा दूर रहते है। हम बजरबट्टू का भी सहारा लेते है। गाँव मे कुछ लोगो के पास भरमार बन्दूके है, लाइसेंसी। उसके प्रयोग से हम बरहा को भगाते है। इस बन्दूक के प्रयोग से उन्हे मारना मना है। जब फल पकते है तो गाँव मे भालू आ जाते है। पीपल के फल जिसे स्थानीय भाषा मे पिकरी कहा जाता है, भालूओ को बहुत पसन्द आते है। भालू शैतान प्राणी है। वह न केवल जिज्ञासु होता है बल्कि आपके पीछे-पीछे चला आता है। उसे मालूम है कि आदमी उसकी तुलना मे कम शक्तिशाली है। सुदूर गाँव मे श्री बालकराम अपने गाँव का हाल बता रहे थे। अपनी जंगल यात्रा के बीच पहाडो की गोद मे बसे इस गाँव मे रुकना सुखद लग रहा था। शाम का वक्त था और घटाओ ने गाँव को घेरना शुरु कर दिया था। मानसून के विलम्ब से सभी चिंतित है। गाँव वालो को लग रहा था कि आज पानी जरुर गिरेगा। काफी देर तक काले-काले बादल जस के तस रहे तो एक बुजुर्ग ने कह ही दिया कि लम्बा बाँस लेकर थोडा सा छेद करना होगा तभी पानी गिरना शुरु होगा। सभी हँस पडे।


रास्ते भर खेत की पूरी तैयारी कर मानसून की प्रतीक्षा मे बैठे किसान दिखे। उन्होने स्थानीय भाषा मे चवन्नी दुकाल की आशंका व्यक्त की यानि मानसून मे देरी ऐसे ही जारी रही तो चवन्नी से ज्यादा नही मिलेगा। चवन्नी दुकाल सुनने मे साधारण शब्द लगे पर किसानो के लिये यह रोंगटे खडे कर देने वाला शब्द है। छत्तीसगढ मे धान की नयी किस्मे अधिक अवधि की है। जितनी लम्बी अवधि उतनी अधिक उपज पर यह भी कडवा सत्य है कि जितनी लम्बी अवधि उतनी ही अधिक वर्षा पर निर्भरता। राज्य मे ज्यादातर वर्षा आधारित खेती होती है। फसल की हर महत्वपूर्ण अवस्था मे पानी का संकट रहता है। जरा भी देरी यानि बडा नुकसान। सिंचित खेती कम भागो तक सीमित है। यात्रा के दौरान मैने देखा कि खेतो मे खाट बिछाये किसान लेटे हुये थे। आसमान की ओर टकटकी लगाये थे। वे बताते है कि इस उमस मे घर गरमता है। इसलिये बाहर खेतो मे रहना ही ठीक लगता है। वे रात को भी वही सो जाते है। ऐसे ही किसानो के एक समूह के पास मैने गाडी रुकवायी। वे बुजुर्ग किसान थे। उनसे चर्चा का दौर चल पडा।


उन्होने बताया कि पहले अल्प अवधि जिसे स्थानीय तौर पर हरुना कहा जाता है, की किस्मे लगायी जाती थी। ये जल्दी पकती थी और मानसून पर निर्भरता के आधार पर चुनी गयी थी। उत्पादन इतना हो जाता था कि साल भर अन्न की जरुरत नही होती थी। जब से लम्बी अवधि की सरकारी खाद और दवा माँगने वाली किस्मे आयी है किसानो का सिरदर्द बढ गया है। मानसून मे पिछले कुछ सालो से बडी देरी हो रही है। देरी से बुआई मतलब कीटो और रोगो का प्रकोप। किसान जैविक खेती करे तो पडोस के किसानो से कीटनाशको के कारण भागे कीडे बडी संख्या मे आ जाते है। ऐसे मे जैविक खेती कर रहे किसानो को मजबूरन एक-दो बार कीटनाशको का प्रयोग करना ही पडता है। वे बताते है कि जैविक खेती तभी सफल होगी जब बडे इलाके मे सब किसान मिलजुल कर यह खेती करे। चर्चा के दौरान एक युवा किसान ने कृषि अधिकारी का यह फरमान सुनाया कि किसानो को मानसून मे देरी के कारण अल्प अवधि के किस्मो को प्राथमिकता देनी चाहिये। ऐसी सलाहे देना आसान है पर लम्बी अवधि की किस्मो के बीजो का इंतजाम करके बैठे किसान अब अल्प अवधि के बीज लाये कहाँ से? क्या सम्बन्धित विभाग उनके लिये कोई व्यवस्था कर रहा है? नही ना, फिर जबानी सलाह से क्या लाभ?


रात को लौटते समय आखिर काले-काले बादलो ने बरसना शुरु कर दिया। राजधानी से आ रहे फोन बता रहे थे कि उडीसा मे कुछ हलचल हुयी है इसलिये पानी गिरने की सम्भावना है। तेज वर्षा के बीच आई.ए.एन.एस. के स्थानीय संवाददाता का फोन आ गया। वे मानसून मे हो रही देरी के कारण धान पर पडने वाले प्रभावो के विषय मे पूछ रहे थे। मैने उन्हे किसानो के हवाले से चवन्नी दुकाल की बात बतायी और यह भी बताया कि कैसे बुजुर्ग किसान अल्प अवधि की पारम्परिक किस्मो की खेती को छोडने पर पछता रहे है? बारिश की आवाज सुनकर संवाददाता ने इस बारे मे पूछा तो मैने कहा कि हम बारिशकर की तरह बारिश ले कर आ रहे है। बारिश होती रही। पर जैसे ही हम राजधानी के पास पहुँचे बारिश बन्द हो गयी। पूरा इलाका वैसा ही गर्म और सूखा लगने लगा। आद्रा नक्षत्र के लगने के समय मृग नक्षत्र वाले समय की तरह बादलो का व्यवहार समझ से परे है। मृग की तरह कुलाँचे भरकर बादल कही-कही पर बरस रहे है। मानसून का इंतजार सभी को है।


इस जंगल यात्रा की एक बडी उपलब्धि यह रही कि मुझे इस बार पारम्परिक और औषधीय धान के पाँच नये प्रकारो के विषय मे न केवल जानकारी मिली बल्कि बीज भी मिल गये। इन औषधीय धानो को किसान अभी तक बो रहे है। वे जानते है कि सरकारी दवाए और खाद से इनकी गुणवत्ता कम हो जायेगी इसलिये वे पारम्परिक खेती कर रहे है। इस देशी खेती मे वे कीडो से लडने के लिये न केवल देशी बल्कि विदेशी वनस्पतियो का ही प्रयोग कर रहे है। किसानो ने बताया कि धान के प्रमुख कीडे फुडहर, कर्रा और बेशरम नामक वनस्पतियो के सरल पर प्रभावी प्रयोग से नियंत्रण मे आ जाते है। उन्होने माहो नामक कीट के लिये बेशरम और बंकी के लिये कर्रा को बडा ही उपयोगी पाया है। वे विस्तार से बताते है कि कीटनाशक के रुप मे प्रयोग के लिये देशी वनस्पतियो को एक निश्चित समय पर एकत्र किया जाता है। इस समय विधि-विधान का ध्यान रखा जाता है। एक बुजुर्ग किसान ने एक विशेष प्रकार के बीज देते हुये मुझे बताया कि कैंसर के रोगी को इस औषधीय धान को खिलाना चाहिये। मै उस प्रकार के बारे मे जानता था। उनको कैंसर मे इसके उपयोग के अलावा इस औषधीय धान के दूसरे उपयोगो के विषय मे जानकारी नही थी। मैने उन्हे विस्तार से कोदो, कुटकी, रागी, साँवा आदि पारम्परिक फसलो के बीजो के साथ इसके सरल प्रयोग को बताया। यह औषधीय धान दूसरी औषधीय वनस्पतियो के साथ वात रोगो और ह्र्दय रोगो मे उपयोगी है। सिकल सेल एनीमिया से प्रभावित रोगियो को भी इसे दिया जाता है। मैने इन बीजो की तस्वीरे ली। किसानो से बातचीत कर एक फिल्म तैयार की। मुझे उम्मीद है कि जिस दिन इन किसानो के सराहनीय कार्यो की कीमत योजनाकार जान और मान लेंगे उस दिन धान के कटोरे इस छत्तीसगढ की कायापलट होने मे जरा भी देर नही लगेगी। (क्रमश:)


(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)


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Thursday, June 25, 2009

हुंर्रा का तांडव, घायल ग्रामीण और सिमटते जंगल

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-23
- पंकज अवधिया

हुंर्रा का तांडव, घायल ग्रामीण और सिमटते जंगल


सुबह के नौ बजे थे। विश्म्भर ध्रुव अपने घर के आँगन मे बैठे हुये थे। घर का दरवाजा खुला हुआ था। बच्चे बाहर खेलने गये हुये थे। उनका काला कुत्ता उनके पास बैठा हुआ था। तभी अचानक तूफान की गति से कोई जीव दरवाजे से अन्दर घुसा और फिर विश्म्भर पर झपट पडा। शरीर का जो भी हिस्सा सामने दिखायी पडा उसमे उसने दाँत गडा दिये। विश्म्भर दर्द से व्याकुल हो उठा। उन्होने उस पर काबू करने का असफल प्रयास किया और आँगन के एक कोने पर दबोचना चाहा। उस जीव ने अपनी पकड ढीली की और फिर जैसे आया था वैसे ही दरवाजे से ओझल हो गया। खून से लथपथ विश्म्भर को कुछ पलो के लिये कुछ समझ नही आया। उनके पास खडा उनका काला कुत्ता मारे डर वैसे ही खडा रहा। विश्म्भर की चीख सुनकर घर वाले बाहर आये। घायल भागो को देखने के बाद उनके घर वालो को लगा कि यह किसी पागल कुत्ते की हरकत है। विश्म्भर ने चिल्लाकर कहा कि हुंर्रा ने आक्रमण किया है। हुंर्रा यानि लकडबघ्घा।

विश्म्भर के घर मे आने से पहले उसने पास के एक गाँव मे कई लोगो को ऐसी चोटे पहुँचायी थी। विश्म्भर के घर से निकलने के बाद वह पास के लोगो को घायल करते हुये पास के जमाही गाँव पहुँचा। वहाँ उसकी नजर अवधराम यादव पर पडी। वे नाले मे रहे थे। बिना किसी देरी के वह उन पर टूट पडा। दर्द से व्याकुल अवधराम ने अपने दर्द को भुलाकर उसे दबोच लिया और नाले मे पटककर उस जीव को मौत के घाट उतार दिया। इस तरह लकडबघ्घा का तांडव समाप्त हुआ। यह घटना लगभग एक माह पूर्व की है। स्थानीय अखबारो ने इस खबर को प्रकाशित किया। घायलो को पाँच सौ रुपयो की मदद दी। खबरो के अनुसार जिस व्यक्ति पर पहले आक्रमण हुआ था उसे बहुत चोट लगी थी। उसे रायपुर के मुख्य अस्पताल मे भेजा गया।

अपनी इस जंगल यात्रा के दौरान मैने घायलो से मिलने का मन बनाया। पिछले कई सालो से मैने जाने-अंजाने, चाहे-अनचाहे मनुष्य़-वन्यपशुओ के टकराव के बारे मे काफी जानकर्रियाँ एकत्र की है। चाहे-अनचाहे इसलिये क्योकि मेरी जंगल यात्रा वनस्पतियो के लिये होती है। जानवरो से मुलाकात का मन नही रहता है। पर फिर भी जब आप जंगल जायेंगे तो उसके सभी पहलुओ की जानकारियाँ आपके सामने आयेंगी। ऐसे मे आप किसी भी पहलू को नजरन्दाज नही कर सकते है। Human-wildlife conflict (HWC) का मामला भी ऐसा ही है। इस पर दुनिया भर के संगठन काम कर रहे है। शोध के लिये अरबो बहाये जा रहे है। इस पर महंगी ट्रेनिंग हो रही है, सात सितारा होटलो मे बैठके हो रही है, ग्रंथ प्रकाशित हो रहे है, एक बडा गुट सक्रिय है जो इस मामले मे किसी नये को घुसने नही देना चाहता है पर जमीनी स्तर पर हालात बद से बदतर हो रहे है। जमाही गाँव के इस मामले मे मै घायल हुये ग्रामीणो और बेमौत मारे गये लकडबघ्घे दोनो की ओर से शोक मना रहा हूँ। बस मन मे यही प्रश्न आता है कि क्या आगे इस तरह की मुठभेड को रोका जा सकता है? यदि हाँ, तो कैसे?

जमाही, जोगीडिपरा और चरोदा गाँवो के पास घटारानी जंगल है। पहले यह घना जंगल हुआ करता था। अन्दर मे धँसकुड नामक स्थान है जहाँ देवी का मन्दिर है। पहले वहाँ जाना बहुत कठिन था। पर हाल के वर्षो मे इस मन्दिर की महिमा बढने से हजारो की संख्या मे पर्यटक आते है। देखते ही देखते जंगल साफ हो रहे है और सडके बन रही है। जिज्ञासु शहरी पर्यटक मन्दिर के आस-पास के जंगलो मे दूर-दूर तक जा रहे है। आस-पास के जंगलो मे गुटखे के पाउच, बीयर की बोतले और यहाँ तक की प्रयोग कर फेके गये कंडोम दिखायी दे जाते है। इसी कारण मैने श्रद्धालु की जगह पर्यटक शब्द का प्रयोग किया है। मन्दिर से लगा हुआ एक झरना है जो केवल बरसात मे ही झरता है। यह झरना पर्यटको के आकर्षण का केन्द्र ही नही है बल्कि जंगली जावो के लिये पानी का स्त्रोत भी है। मन्दिर के पुजारी बताते है कि रात को आज भी जंगली जानवरो के कारण वापस गाँव लौट जाना पडता है। लकडी के लिये जंगलो की कटाई से मेरे देखते ही देखते यह क्षेत्र विरल होता जा रहा है। आने वाले कुछ वर्षो मे यह मैदान बन जायेगा। इस जंगल के अन्दर शरण लिये प्राणी बढती मानवीय गतिविधियो से त्रस्त है। इस बार मानसून मे देरी होने से प्यास से जंगल मे हाहाकार मचा हुआ है। यह लकडबघ्घा भी इसी प्यास से व्याकुल होकर बाहर आया होगा। इस जंगल यात्रा के दौरान बुजुर्ग ग्रामीणो ने बताया कि मोबाइल और मोटरसाइकिल के शोर से ये जानवर कुद्ध हो जाते है। मोबाइल पर गाना बजाकर पर्यटक मजे से जंगल मे घूमते है। आमतौर पर लकडबघ्घा मनुष्यो पर आक्रमण नही करता है। इस लकडबघ्घा को किसी ने चोट पहुँचायी होगी जिससे वह हिंसक हो गया होगा।

अवधराम जिन्होने लकडबघ्घा को मारा था, से मिलने जब मै उनके गाँव जमाही पहुँचा तो रात हो चुकी थी। वे खाना खा रहे थे। हमे बताया गया कि उनकी श्रवण शक्ति बहुत कम है। वे बाहर आये। मैने उनके जख्मो की तस्वीरे ली। फिर घटना की विडियो रिकार्डिंग का निश्चय किया। अन्धेरे मे यह काम दुषकर साबित हुआ। लट्टू की रोशनी मे उनसे बात की। गाँववालो का कहना था कि यदि अवधराम ने हिम्मत नही दिखायी होती तो वह लकडबघ्घा जाने कितने लोगो को इस तरह घायल करता। इस नजर से देखा जाये तो उन्हे लकडबघ्घा को मौत के घाट उतारने के लिये इनाम मिलना चाहिये था वन विभाग से। वे गाँव के हीरो है। मैने यह सुनिश्चित करना चाहा कि क्या लकडबघ्घा खुद घायल था? इस पर मुझे चौकाने वाली घटना का पता चला। नियमानुसार ऐसे हादसो मे मारे गये जंगली जीवो को मुख्यालय ले जाया जाता है फिर वहाँ तस्वीरे वगैरह लेकर लाश को जला दिया जाता है। पर गाँव मे मुझे एक युवा मिला जिसे लकडबघ्घा की लाश ठिकाने लगाने का जिम्मा मिला था। उसने बोरे मे उसे बन्द किया और उसी नाले मे बहा दिया। मुझे इस बात पर शक ही है कि इस जंगली जीव की मौत सरकारी दस्तावेजो मे दर्ज हुयी होगी अधिकारिक तौर पर।



(पहले चित्र मे "गाँव के नायक" अवधराम और दूसरे चित्र मे विश्म्भर के जख्म )

चरोदा
गाँव के विश्म्भर से कहा गया कि चोट से बहने वाले खून को रोका न जाये। जितना खून निकलेगा उतना ही जहर बाहर निकलेगा। चौबीस घंटो से अधिक रुक-रुक कर जख्मो से खून रिसता रहा। आज घटना के एक महिने बाद भी उसके जख्मो मे वैसा ही दर्द की जैसा उस समय था। उसका दाहिना हाथ काम नही कर रहा था। हाथ मे जगह-जगह पर गठान बन गयी है। उसकी पीडा चेहरे पर साफ दिखती है। मुआवजा के पाँच सौ कब के खर्च हो गये। अब चिकित्सक ने हाथ खडे कर लिये है। उनसे कहा गया है कि राजनेता को चिकित्सा के लिये अर्जी दी जाये। वे जानते है कि अर्जियो से ज्यादा कुछ नही होने वाला। कमोबेश यही हालत दूसरे घायलो की है। एक बार खबर छपने के बाद अब यह बासी हो गयी है। अखबार इस विषय मे फिर से नही छापना चाहते है। इस हताशा भरे माहौल को देखकर मैने निश्चय किया कि इस लेखमाला के माध्यम से मै सारा घटनाक्रम सामने लाऊँगा।

मेरे एक वन अधिकारी मित्र ने इस घटना के बारे मे मेरे विश्लेषण को सुना तो झट से बोले कि ब्लाग मे इसे लिखने की बजाय एक शोध पत्र तैयार किया जाये। मेरा नाम उसमे जरुर रखना। लकडबघ्घा का हमला दूसरे जंगली जीवो की तुलना मे कम होता है। यकीन मानो हमे शोध पत्र पढने के लिये विदेश बुलाया जायेगा। मैने विनम्रतापूर्वक मित्र से कहा कि यह विशुद्ध स्थानीय घटना है। मै योजनाकारो तक अपनी आवाज पहुँचाना चाहता हूँ। साथ ही अपने देशवासियो को भी उनकी भाषा मे समस्या के विषय मे बताना चाहता हूँ इसलिये मै हिन्दी मे ब्लाग के माध्य्म से अपने विचार व्यक्त कर रहा हूँ। विदेशो मे अंग्रेजी मे इसके बारे मे बताने से निश्चित ही वाह-वाही मिलेगी पर इससे जमीनी स्तर पर कुछ नही होगा। (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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तेन्दुआ, सनसनीखेज खबरो के चक्कर मे अखबार और गहराता संकट

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-22
- पंकज अवधिया

तेन्दुआ, सनसनीखेज खबरो के चक्कर मे अखबार और गहराता संकट


श्री विश्वास रात की पाली समाप्त कर वैगन रिपेयर शाप से लौट रहे थे। रेल्वे क्रासिंग के आस उन्हे कोई बडा सा जंगली जानवर उछलकर झाडियो के अन्दर जाते दिखा। उन्हे लगा कि ये तेन्दुआ है। बस यह बात जंगल मे आग की तरह फैल गयी। दूसरे दिन राजधानी के अखबारो मे यह खबर छप गयी। मनुष्यो और जंगली जानवरो की समस्याओ के लिये लम्बी दूरी तक सफर जब-तब मै करता रहता हूँ। इस बार जिस स्थान पर तेन्दुए के दिखने की बात हो रही थी वह घर से महज आठ-दस किलोमीटर की दूरी पर है। फिर मै वहाँ कैसे न जाता? कल सुबह ही मै उस स्थान की ओर रवाना हो गया। उस स्थान पर पहुँचने पर मैने पाया कि वहाँ इस घटना के बारे मे कम लोग जानते है। अखबारो मे कहा गया था कि लोग दहशत मे है। पर वहाँ तो मजे से बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे। जिन झाडीनुमा जंगलो मे तेन्दुए को देखने की बात की जा रही थी वहाँ पर भैसे मजे से चर रही थी। मैने रुककर इस बारे मे पूछना चाहा तो चरवाहो ने कहा कि पिछले साल ऐसी घटनाए हुयी थी पर हाल की घटना के बारे मे ऐसी कोई खबर नही है। मुझे बडा ही आश्चर्य हुआ। हम आगे बढते गये।

वैगन रिपेयर वर्कशाप के मुख्य द्वार के सामने गेट पास के लिये हमे रोक दिया गया। झाडीनुमा जंगल तक जाने के लिये यही से अन्दर जाना पडता है। पास मे रेल्वे पुलिस का थाना था। मैने वहाँ जाकर तेन्दुए के हमले की घटना के बारे मे जानना चाहा। साथ ही आस-पास के लोगो से भी बात की। उन्होने चौकाने वाला खुलासा किया कि तेन्दुए के हमले की खबर सही नही है। अखबारो मे खबर को सनसनीखेज बनाने के लिये ऐसा किया होगा। किसी जंगली जीव को श्री विश्वास ने झाडियो मे घुसते देखा। न उसने श्री विश्वास पर आक्रमण किया और न ही उन्होने मदद के लिये कर्मचारियो को बुलाया। अखबारो मे छपी यह बात भी गलत निकली कि यह घटना मार्निग वाक के दौरान हुयी। मुझे बडी ही कोफ्त हुयी कि राजधानी क्षेत्र मे शहर के इतने पास से अखबारो मे गलत रिपोर्टिंग क्यो की जा रही है? साथ ही इस बात का संतोष भी हुआ कि तेन्दुए ने आक्रमण नही किया। मेरा अनुमान सही था। जंगली जीव बिना परेशान किये इस तरह की हरकत आमतौर पर नही करते है।

कुछ महिनो पहले जब एक तेन्दुआ शहर के टिम्बर मार्केट मे घुस आया था तब वह दो दिनो तक इलाके मे रहा। उसने किसी को भी नुकसान नही पहुँचाया। वह बचता रहा। कुछ मकानो की दूसरी मंजिल पर सीढीयो से गया पर कुत्ता समझकर बिना दरवाजा खोले ही अन्दर से लोगो ने उसे झिडक दिया। वह वापस चला गया। पूजा करते वक्त एक व्यवसायी ने उसे देखा तो शोर मचाया गया। उस समय भी उसने आक्रमण नही किया।

वन विभाग की एक थ्योरी के बारे मे मैने पिछले लेख मे आपको बताया था कि जंगल से जंगली जीव मालगाडी की रेक मे सवार होकर आते है। फिर मालगाडी के वैगन रिपेयर वर्कशाप से गुजरने पर वे वही उतर जाते है। प्रभावित क्षेत्र मे आम लोगो से बातचीत करने पर पता लगा कि अन्दर पानी की एक बडी झील है। साथ ही और भी दूसरे जल स्त्रोत है जहाँ इस भीषण गर्मी मे भी पर्याप्त जल है। सालो से इसी कारण यहाँ बहुत से जंगली जीव पनप रहे है। इस वीरान क्षेत्र मे मानव की गतिविधियाँ सीमित है इसलिये वहाँ ये बिना किसी डर के रह रहे है। आस-पास के तेजी से कट रहे जंगलो से दूसरे जीवो के आने का क्रम जारी है। वे रेलगाडी से नही आ रहे है। वे रात को उन रास्तो से आ रहे है जहाँ से आम आदमी गुजरता है और जहाँ भी पानी मिल रहा है, वही डेरा जमा रहे है। रात को आम रास्तो से गुजरने वाले ट्रक वालो के बीच गर्मियो मे बडी संख्या मे जंगली जीवो के दिखने की चर्चा आम है। बहुत से जीव जाने-अनजाने ही तेज रफ्तार गाडियो की चपेट मे भी आ जाते है। वैगन रिपेयर शाप मे स्थानीय लोगो ने कहा कि आने वाले सालो मे यह समस्या बहुत बढेगी और इससे कई जाने जा सकती है।

मुझे बताया गया कि वन विभाग का अमला लगातार तेन्दुए की तलाश मे है। मै उनसे नही मिल पाया। शाम चार बजे एक बार फिर से इस स्थान पर आने का मन बनाकर मै वापस लौटने लगा। तभी प्रदेश के प्रसिद्ध घटारानी क्षेत्र से फोन आ गया कि एक माह पहले किसी लकडबघ्घे के आक्रमण से घायल हुये आठ ग्रामीणो मे से एक की हालत बहुत खराब है। उसके एक हाथ ने काम करना बन्द कर दिया है। मैने बिना विलम्ब उस ओर का रुख किया। (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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Tuesday, June 23, 2009

रुको, मत मारो, मुझे तेन्दुए से बात तो कर लेने दो

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-21
- पंकज अवधिया


रुको, मत मारो, मुझे तेन्दुए से बात तो कर लेने दो


“सिट, टेक फुड, सिट-सिट, गुड ब्वाय, ओह नो, यू ब्लडी बास्ट*-----।“ जंगल के एक अधिकारी शहर के बाहरी हिस्से से पकडे गये एक तेन्दुए को यह सब कह रहे थे। तेन्दुआ एक छोटे से पिंजरे मे बन्द था। पिंजरा इतना छोटा था कि वह ठीक से घूम भी नही सकता था। खडा होता तो सिर लोहे की जाली से टकरा जाता। उसे खाना दिया जा रहा था पर वह कैसे भी बाहर निकलने की कोशिश कर रहा था। उसके चारो ओर लोगो का हुजूम लगा हुआ था। वे चिल्ला रहे थे। ऐसी आवाजे निकाल रहे थे जिससे तेन्दुआ आवेश मे आकर जोर से आवाज निकाले। इससे भीड का मनोरंजन होता। अधिकारी थोडा हटते तो लोग कंकड भी पिंजरे के अन्दर फेकते। अधिकारी की अंग्रेजी मे बडबड सुनकर बाजू मे खडे एक अदने से कर्मचारी ने कहा कि साहब, इससे छत्तीसगढी मे बोलिय्रे। यह अंग्रेजी नही समझेगा। इस पर अधिकारी ने घूर कर उस कर्मचारी को देखा और फिर कहा कि साहब, तुम हो कि मै? तेन्दुआ क्या आदमियो का भाषा समझता है?

बात आयी-गयी हो गयी। साहब शान से क्लब मे यह किस्सा सुनाते और उनके साथी घंटो तक अदने से कर्मचारी की बात पर हँसते रहते। मैने यह किस्सा कर्मचारी नही बल्कि उस अधिकारी से सुना था। पर मुझे हँसी नही आयी। आज समाचार पत्रो मे छपी एक खबर की ओर मैने उनका ध्यान दिलाया तो उनकी भी हँसी रुक गयी।

खबर थी कि मुम्बई के चिडियाघर के किसी उच्च अधिकारी को कन्नड सीखनी पड रही है जिससे वे बाघ से बात कर सके। दरअसल यह बाघ बंगलुरु से लाया गया है और यह केवल कन्नड मे दिये गये निर्देशो को समझ पाता है। इस खबर से कर्मचारी की खिल्ली उडा रहे अधिकारी के होश उड गये। उन्होने उस कर्मचारी को बुलवाकर उससे माफी माँग ली। चलिये उन्होने देर से ही सही पर अपना साहबपना तो छोडा। मुझे मालूम है कि आपमे से बहुतो के लिये यह आश्चर्य का विषय होगा कि जंगली जानवर स्थानीय भाषा को कुछ-कुछ समझते है। भले ही वे सटीक अर्थ न जाने पर बोलने के ढंग से काफी कुछ समझ जाते है।

जंगल यात्रा के दौरान चाहे-अनचाहे जंगली जानवरो से मुलाकात हो जाती है। साथ चल रहे लोग बहुत बार अंग्रेजी या हिन्दी का प्रयोग करते है, ऐसे मे स्थानीय लोग छत्तीसगढी या दूसरी स्थानीय भाषाओ के कडे प्रयोग की बात करते है। मैने अपने लेखो मे यह बार-बार लिखा है कि कैसे पारम्परिक चिकित्सक सरल स्थानीय भाषा के प्रयोग से जंगली जानवरो से होने वाली सम्भावित मुठभेड को टाल देते है।

कुछ दिनो से रायपुर के बाहरी क्षेत्र मे एक तेन्दुए के दिखने की खबर है। आज सुबह ही अखबार मे छपा है कि वैगन रिपेयर वर्कशाप परिसर मे किसी रेल्वे अधिकारी के ऊपर उसने उस समय हमला कर दिया जब वे सुबह टहल रहे थे। उन्होने शोर मचाया तो दूसरे कर्मचारी आ गये। इस बीच तेन्दुआ भाग गया। अब जोर-शोर से तेन्दुए को घेरने की तैयारियाँ चल रही है। कुछ दिनो पहले ऐसी ही शिकायत आयी थी तब वन विभाग की गश्त बढा दी गयी थी। उस समय एक लकडबग्घा दिखा था। विभाग ने यह मान लिया कि इसी ने आक्रमण किया होगा। रात को मशाल जलाकर तेन्दुए की खोज की जा रही है। मैने पहले लिखा है कि रायपुर के आस-पास किसी जंगल तक पहुँचने मे डेढ-दो घंटो से कम का समय नही लगता है। रायपुर जंगल से सटा हुआ नही है। पर जिस भाग मे जंगली जानवर आजकल मिल रहे है वह दो सौ एकड की खाली जमीन है जहाँ झाडियाँ उग आयी है। पहले वहाँ भारतीय सेना की छावनी थी। जंगली जानवर वहाँ कैसे पहुँच रहे है, यह पहेली ही है। वन विभाग वाले जैसे सब जानते है। वे कहते है कि जंगलो से गुजरने वाली मालगाडी पर वे सवार हो जाते है और फिर यहाँ उतर जाते है। ऐसे यात्री जंगली जानवरो के बारे मे पहले कभी नही सुना गया है। वन विभाग इसी थ्योरी पर अटका हुआ है।

तेन्दुए ने रेल्वे के अधिकारी पर हमला किया, ये बात कुछ हजम नही हो रही है। ज्यादातर मामलो मे परेशान नही किये जाने पर तेन्दुए आदमियो से उलझते नही है। यदि जंगली जानवरो के साथ बच्चे हो या आप उनके क्षेत्र मे दखल करे तो ही वे आक्रमण करते है। जंगल मे माँद मे बैठे तेन्दुए की ओर पीठ करके हमने घंटो की कडी मेहनत से पातालकुम्हडा के कन्द एकत्र किये है। न हमने तेन्दुए मे रुचि, ली न ही उसने हममे। फिर इस शहर मे आकर उसे क्या हो गया?

शहरी हो या ग्रामीण सभी जानते है कि जंगल कम हो रहे है इसलिये जानवर मानव बस्ती की ओर आ रहे है। इस बार तो मानसून मे हो रही देरी ने वन्य प्राणियो को बेहाल कर दिया है। वे बडी संख्या मे जंगल से बाहर निकलकर पानी की तलाश कर रहे है। हो सकता है ऐसे ही पानी की तलाश मे यह तेन्दुआ रायपुर के पास आ गया हो। किसी क्षेत्र मे तेन्दुआ है कि नही, यह जानना मुश्किल काम नही है। वन विभाग के लिये और भी मुश्किल नही। फिर तेन्दुए वाले क्षेत्र मे बडी संख्या मे जाकर शोर मचाना, मशाले जलाकर चकाचौन्ध करने की जरुरत क्या है? इससे तो तेन्दुआ अपने आप को प्रभावित महसूस करेगा और इंसानो को दुश्मन मान बैठेगा। उस क्षेत्र मे उसकी उपस्थित जानने के लिये इंसानो को जंगली व्यवहार करना जरुरी नही है। खबरे कहती है कि तेन्दुए को पकडने के लिये बकरा बाँधा जा रहा है। पर अनुभव बताता है कि यह विधि बहुत समय और धैर्य दोनो माँगती है। इस बीच हो सकता है कि फिर तेन्दुए और इंसानो की झडप हो जाये। ऐसे मे तेन्दुए से कैसे निपटा जाये? इसका जवाब उन्ही जंगलो के लोग देते है जहाँ तेन्दुए रहते है। अभी तो कही भी पानी की व्यवस्था कर दी जाये तो झट से उस क्षेत्र के जंगली जानवर वहाँ आ जायेंगे। किसी सूखी पडी डबरी मे टैकर से पानी डालकर भी यह काम किया जा सकता है। पास मे वाच टावर या गाडी खडी करके निगरानी रखिये, आपको कितने जानवर है, यह पता लग जायेगा। एक बार उसका अता-पता जानने के बाद फिर उससे निपटा जा सकता है।

तेन्दुए को कैद करके उसे तंग पिंजरे मे रखना और कुछ समय बाद उसे फिर जंगल मे छोड देना, यह प्रक्रिया जंगल और इंसानो दोनो के लिये सही नही जान पडती है। पर वन विभाग तो जैसे लकीर का फकीर है। वह इसी राह पर चलता है। अपनी जंगल यात्रा के दौरान बहुत बार मैने साथ चल रहे लोगो को तेन्दुए को देखकर ये कहते हुये सुना है कि ये पिंजरे से छूटा हुआ तेन्दुआ है। ऐसे तेन्दुए अपने आपको इंसानो से बचाते फिरते है और यदि कोई इंसान गल्ती से सामने आ जाये तो अपने पूर्व अनुभव के चलते आक्रमण करने मे देरी नही करते है। यह गौर करने वाली बात है कि उनके आक्रमण का उद्देश्य जान लेना नही होता है। वे घायल करके इंसानो को अक्षम कर देते है। फिर उन्हे वैसा ही छोड कर चले जाते है।

बहुत से मामलो मे एक बार पकडे जाने के बाद वन विभाग उन्हे चिडियाघर भेज देता है। वहाँ पिंजरे मे वे गोल चक्कर लगाते रहते है दिन-रात। आपको वे सामान्य लगे पर वे वास्तव मे अपना मानसिक संतुलन खो चुके होते है। यदि उन्हे फिर से बाहर छोड दिया जाये तो भी वे वैसे ही गोल चक्कर लगाते रहेंगे।

आज मैने बहुत कोशिश की कि उस क्षेत्र मे जा सकूँ जहाँ तेन्दुआ दिखा है। वन विभाग के साथ रात की गश्त कर सकूँ। मै एक बार तेन्दुए से रुबरु होना चाहता हूँ ताकि मै अपने अनुभव से यह जान सकूँ कि आखिर उसे परेशानी क्या है? उसे अभिव्यक्ति का अवसर दिये बिना ही बर्बरता से कब्जे मे ले लेना मुझे सही नही जान पडता है। तेन्दुए और दूसरे जंगली जानवर इस क्षेत्र मे लगातार आ रहे है। समस्या की जड जानना जरुरी है। यदि जड पता लग गयी तो हम बिना इन्सानो और जानवरो को नुकसान पहुँचाये बीच का रास्ता निकाल सकते है। अभी रात के एक बज रहे है। बारह बजे मुझे उस इलाके मे जाना था। मै फोन का इंतजार कर रहा हूँ। सुबह चार तक भी फोन आ जाये तो मै अपनी गाडी मे निकल जाऊँगा। यदि ऐसा नही हुआ तो मै कल सुबह दस बजे वहाँ जाने की कोशिश करुंगा। इतना बडा राज्य है पर कोई भी प्राणी विशेषज्ञ तेन्दुए की सुध लेने इच्छुक नही दिखता। आखिर किसी को तो जाना ही होगा तेन्दुए से बात करने----- (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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Sunday, June 21, 2009

मोंगरी मछली, टाइफा, जलकुम्भी और डूमर

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-20
- पंकज अवधिया
दस जून, 2009

मोंगरी मछली, टाइफा, जलकुम्भी और डूमर


इन दिनो राजधानी मे जलीय खरप्तवारो से अटे तालाबो की सफाई की मुहिम चल रही है। मेरे एक मित्र को ऐसे ही एक तालाब की सफाई का ठेका मिला है। उस तालाब मे केवल जलकुम्भी की ही समस्या नही है। नाना प्रकार के जलीय खरप्तवारो ने ऐसा तांडव मचाया है कि पूरा तालाब एक समतल हरे-भरे मैदान की तरह दिखता है। तालाब के एक हिस्से मे ही पानी दिखता है। इसी स्थान पर आस-पास के लोग नहाते है। यहाँ बडी मात्रा मे कपडे भी धोये जाते है धोबियो के द्वारा। शहर के योजनाकारो ने ढाई लाख रुपये दिये है इस तालाब को बीस दिनो के अन्दर साफ करने के लिये। इस तालाब के किनारे पीपल के कुछ पुराने पेड है। मैने मित्र को सलाह दी है कि यहाँ ऐसे वृक्ष लगाये जो कि जल को शुद्ध रख सके। शहरी योजनाकारो का दबाव है कि गुलमोहर लगाया जाये। निश्चित ही गुलमोहर गर्मियो मे फूलो से लदकर बढिया दिखायी देता है पर यह उथली जडो वाला होता है। जरा-सा भी तूफान सहन नही कर पाता है। आजकल बरसात मे जो अन्धड चलती है उससे हर बार गुलमोहर के वृक्ष गिर जाते है और विद्युत व्यवस्था ठप्प हो जाती है। मैने तालाब के लिये डूमर के वृक्ष लगाने की सलाह दी है।

डूमर सबके लिये जाना पहचाना नाम है पर उसके पौधो का जुगाड करना आसान नही है। वन विभाग से तो उम्मीद नही है। इसलिये अपनी इस जंगल यात्रा के दौरान मै डूमर के पौधे एकत्र करने की सोच रहा था। जब मैने साथ चल रहे पारम्परिक चिकित्सको को यह बताया तो उन्होने पहली बारिश के बाद आने को कहा। उस समय बहुत से पौधे मिल सकते है। डूमर की चर्चा छिडी तो बात बहुत दूर तक गयी। बात करते –करते हम डूमर के एक पुराने वृक्ष तक जा पहुँचे।
डूमर यानि देशी अंजीर। इसके फल बडे ही स्वादिष्ट होते है। बच्चे इसे बडे चाव से खाते है। तांत्रिक डूमर को तंत्र साधना के लिये उपयोग करते है। डूमर को विनाशक शक्तियो का प्रतीक भी माना जाता है। कई बार जब मै इसकी तस्वीर लेने काफी पास चला जाता हूँ तो बहुत से बुजुर्ग इस वृक्ष से दूर रहने की चेतावनी देते है। अन्ध-विश्वास के पाश मे जकडा समाज अपने स्वार्थ के लिये अशक्त महिलाओ को टोनही कहकर प्रताडित करता है। इस टोनही नामक पात्र को विशेष वनस्पतियो से जोडकर देखा जाता है। डूमर भी इन वनस्पतियो मे से एक है। टोनही से सम्बन्धित अन्ध-विश्वास की जडे बहुत गहरी है। पारम्परिक चिकित्सक भी इससे अछूते नही है। डूमर की वानस्पतिक संरचना ऐसी होती है कि इसके स्पष्ट फूल नही होते है। आम लोगो को इसके फल लगे ही दिखते है। इसके फूल किसी ने नही देखे है। मैने लोगो को अक्सर यह कहते सुना है कि टोनही ही उस फूल को देख पाती है। उनकी बाते सुनकर मै मजाकिये लहजे मे यह कहने से नही चूकता हूँ कि मुझे टोनही से मिलवा दे ताकि मै फूल की दुर्लभ तस्वीर दुनिया को दिखा सकूँ।

इस जंगल यात्रा के दौरान डूमर के तथाकथित फूल के बारे एक नयी कहानी सुनने को मिली। पारम्परिक चिकित्सको ने मुझे पास के तालाब से पकडी गयी मोंगरी मछली दिखायी और उसे काटा। मछली के अन्दर से गोल लाल संरचना निकली। पारम्परिक चिकित्सक बोले, “यही डूमर का फूल है। यह मछली इस फूल को निगल लेती है।“ उस लाल संरचना को देखने से वह साफ माँसल संरचना दिख रही थी। उसमे कोई वानस्पतिक भाग नही था। फिर भला ये कैसे डूमर का फूल हुआ? जंगल मे जब आप पारम्परिक चिकित्सको या स्थानीय लोगो के साथ चलते है तो चाहकर भी तर्को को मुँह के अन्दर रखना पडता है। भूत-प्रेत और तंत्रो की ढेरो ऐसी बाते होती है जिसका कोई वैज्ञानिक आधार नही होता है पर फिर भी इन्हे उनका विश्वास मानकर अनदेखा करना होता है। मैने इस बार भी ऐसा ही किया।

मित्र को जिस तालाब की सफाई का काम मिला है वहाँ टाइफा नामक जलीय खरप्तवार आधे से अधिक तालाब मे अपना कब्जा जमाये हुये है। इसे उखाडना टेढी खीर है। इसे मैने रावण की संज्ञा दी है। इसे जितना काटो उतना ही यह बढता जाता है। हाल के कुछ वर्षो मे इसका फैलाव प्रदेश भर के जल स्त्रोतो मे बढा है। बरसाती नालो और नहरो से यह किसानो के खेत तक पहुँच रहा है। धान के खेतो मे पानी होने के कारण यह मजे से उगता है। एक बार जमने के बाद सालो-साल तक यह फैलता ही जाता है। इसे स्थानीय भाषा मे चितावर कहा जाता है।

इस जंगल यात्रा के दौरान मैने जंगल के अन्दर के तालाबो मे इसका प्रकोप देखा। लम्बी घास की तरह दिखने वाले इस खरप्तवार मे बहुत सी चिडियो का बसेरा होता है। इनमे से ब्लैकबर्ड भी होती है। प्रकृतिप्रेमी इस विशेष चिडिया को बहुत पसन्द करते है। पर किसानो विशेषकर धान के किसानो के लिये यह अभिशाप है। टाइफा मे घर बनाने के बाद यह आस-पास के बडे क्षेत्र मे उग रही धान की फसल को बाली की अवस्था मे बहुत नुकसान पहुँचाती है। किसान जानते है कि यह कहाँ रहती है? इसलिये भी वे टाइफा को जड से उखाडने की कोशिश करते है पर कम ही सफल हो पाते है।

मित्र वाले तालाब मे जब टाइफा को नष्ट किया गया तो ब्लैक बर्डस का आशियाना उजड गया। जब ये बडी संख्या मे शहर मे उडने लगी तो बहुत से पक्षी प्रेमी चिंतित हो उठे। उन्हे लगा कि चिडियो का आशियाना उजाडना ठीक नही है। कुछ ने मुझसे समर्थन माँगा। मैने उन्हे इस चिडिया से होने वाले नुकसान के विषय मे बताया। यह भी बताया कि टाइफा के रहते तालाब आम लोगो के उपयोग के लिये नही खुल पायेगा। अब आपको फैसला करना है कि चिडिया जरुरी है या मनुष्यो का यह तालाब? फिर टाइफा के नष्ट होने से ये चिडिया मरेंगी नही। हजारो एकड मे टाइफा का राज है। ये वहाँ जाकर बस जायेंगी। ब्लैक बर्डस दूसरी वनस्पतियो मे भी घोसला बनाती है। टाइफा विदेशी खरप्तवार है और इन चिडियो ने इसे हाल ही मे घोसला बनाने के लिये चुना है। काफी देर के बाद वे माने। ऐसी समस्या होती ही रहती है। बडी संख्या मे तोते फसल को नुकसान पहुँचाते है। किसान इन्हे मारना चाहते है पर पक्षी प्रेमी विरोध का स्वर बुलन्द कर देते है। ऐसे मे किसी एक के पक्ष मे निर्णय देना कठिन हो जाता है।

आम लोगो विशेषकर किसानो के लिये टाइफा और जलकुम्भी जैसी विदेशी वनस्पतियाँ अभिशाप बनी हुयी है। इन विदेशी वनस्पतियो के प्रबन्धन मे पारम्परिक चिकित्सक कई बार अहम भूमिका निभाते है। वे इन विदेशी वनस्पतियो के साथ प्रयोग करते है और इनके औषधीय उपयोग विकसित करने की कोशिश करते है। देश के बहुत से हिस्सो मे जलकुम्भी के साथ सालो से रहते हुये पारम्परिक चिकित्सको इसके उपयोग ढूँढ निकाले है। वे इसके पौध भागो का प्रयोग बहुत से औषधीय मिश्रणो मे कर रहे है। इस तरह नये उपयोगो के सामने आने से आम लोग इनका प्रयोग करने लगते है और इस तरह इनकी बढती आबादी मे अंकुश लग जाता है। मैने इस जंगल यात्रा के दौरान पारम्परिक चिकित्सको से टाइफा के नये उपयोग विकसित करने का अनुरोध किया है। यह प्रसन्नता की बात है कि उन्होने इसे चुनौती के रुप मे स्वीकार कर लिया है। (क्रमश:)

टाइफा

तालाब मे टाइफा का प्रकोप

डूमर के फल

जलकुम्भी का प्रकोप

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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लौकी, कोल्ही-केकडी और दूसरी वनस्पतियो से बने औषधीय तेल

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-19
- पंकज अवधिया
दस जून, 2009

लौकी, कोल्ही-केकडी और दूसरी वनस्पतियो से बने औषधीय तेल


जंगल मे साथ चल रहे पारम्परिक चिकित्सको के साथ जब नाना प्रकार के औषधीय तेलो की चर्चा हुयी तो उनमे से कुछ ने रोजमर्रा उपयोग होने वाली सब्जियो से तैयार औषधीय तेल के विषय मे रोचक जानकरियाँ दी। सब्जियो से औषधीय तेल बनाने की बात मेरे लिये नयी नही थी। अपने शोध आलेखो मे मैने लौकी से औषधीय तेल निर्माण पर काफी कुछ लिखा है। यह तेल देश के दूसरे भागो मे भी प्रचलित है पर अलग-अलग रुपो मे। छत्तीसगढ मे इस तेल का प्रयोग बच्चो के लिये किया जाता है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि लौकी से राज्य मे 1500 से अधिक प्रकार के तेल बनाये जाते है। ये तेल हाथ-पैर मे होने वाली जलन से लेकर जोडो की मालिश के लिये प्रयोग किये जाते है। लौकी का प्रयोग अकेले भी होता है और अस्सी से अधिक औषधीय वनस्पतियो के साथ भी।

देश के दूसरे हिस्सो मे इस तेल के निर्माण मे आधार तेल के रुप मे नारियल के तेल का उपयोग होता है जबकि हमारे यहाँ सरसो और काली तिल के तेलो का प्रयोग होता है। इस जंगल यात्रा के दौरान पारम्परिक चिकित्सको ने स्थानीय वनस्पतियो के प्रयोग से लौकी के मूल तेल को समृद्ध बनाने की विधियाँ बतायी।

मुझे उन पारम्परिक चिकित्सको के साथ उनके गाँव जाने का मौका मिला। मैने वहाँ घर मे फली हुयी लौकी देखी। चूँकि इसका प्रयोग दवा के रुप मे होना था इसलिये बिना सरकारी खाद-पानी से इसे उगाया गया था। जंगल मे कर्रा और भिर्रा के बहुत से पेड है। जब लौकी मे कीडो का प्रकोप होता है तो पारम्परिक चिकित्सक इन दोनो जंगली वृक्षो से सत्व तैयार करके उनका छिडकाव कर देते है। जंगल मे हल्दी की बहुत सी प्रजातियाँ भी है। इनमे से एक डोकरी हल्दी है। पारम्परिक चिकित्सक इसके सत्व से लौकी की सिंचाई करते है। गोबर की खाद का प्रयोग करते है। उन्हे पता है कि नीम और गेन्दे के सत्वो का भी प्रयोग किया जा सकता है। पर वे कहते है कि इनका प्रयोग लौकी के औषधीय गुणो को कम कर देता है। नीम और गेन्दा के सत्वो का प्रयोग वे दूसरे पौधे के लिये करते है। लौकी तोडने के बाद से तेल निर्माण मे दो महिनो का लम्बा समय लगता है। यदि सूरज देवता अधिक मेहरबान नही रहे तो और अधिक समय लग सकता है। पारम्परिक चिकित्सको ने खुलासा किया कि वे अपने रोगियो को इस तेल के घटको के बारे मे नही बताते है। लौकी का नाम सुनकर हो सकता है कि रोगी समझ बैठे कि ये प्रभावकारी तेल नही है। साल मे एक बार बडी मात्रा मे तेल निर्माण के बाद वे दोबारा इसे कम ही बनाते है। वे इस तेल को बाजार मे बेचते नही है पर फिर भी यह देश भर मे पहुँचता रहता है।

देश के विभिन्न कोनो से जडी-बूटी बेचने वाले पारम्परिक चिकित्सको के पास आते रहते है। जैसे उत्तराखंड की बहुत सी वनस्पतियाँ छत्तीसगढ मे नही मिलती है। पारम्परिक चिकित्सक उन जडी-बूटियो के लिये इन पर निर्भर रहते है। आमतौर पर जडी-बूटी बेचने वाले पारम्परिक चिकित्सको से वनस्पतियो के एवज मे पैसे नही लेते है। वे या तो यहाँ की वनस्पतियाँ ले जाते है या कुछ नुस्खो की जानकारी। ये जानकारियाँ जडी-बूटी बेचने वाले वापस लौटकर अपने क्षेत्र के पारम्परिक चिकित्सको को देते है। फिर अगली बार जब लौटते है तो उनके पास बताने को बहुत कुछ होता है। इस तरह शहद एकत्र करने वाली मधुमक्खियो की तरह जडी-बूटी बेचने वाले पारम्परिक ज्ञान को समृद्ध करते रहते है। इन जडी-बूटी बेचने वालो पर किसी का ध्यान नही जाता है। सैकडो पारम्परिक चिकित्सको से मिलने के कारण इनके पास ज्ञान का अकूत भंडार होता है। मैने इनके साथ महिनो बिताये है और इनके ज्ञान का दस्तावेजीकरण किया है। एक और अनोखी बात। बहुत बार यह देखने मे आता है कि एक राज्य से लायी गयी जडी-बूटियो के विषय मे दूसरे राज्य के पारम्परिक चिकित्सक अधिक जानने लगते है। केरल के औषधीय धान निवारा का ही उदाहरण ले। वैज्ञानिक यह कह रहे है कि इस धान के विषय मे जानकारी केरल के कुछ भागो तक ही सीमित है। पर जमीनी हकीकत कुछ और है। जडी-बूटी बेचने वालो या किसी अन्य स्त्रोतो से यह धान छत्तीसगढ पहुँचा और पारम्परिक चिकित्सको ने इसे बढाया। उन्होने नये प्रयोग किये। उन्होने स्थानीय औषधीय धान के साथ इसे आजमा कर देखा। जब मैने इस ज्ञान का दस्तावेजीकरण किया तो वैज्ञानिक चौक पडे। उन्हे विश्वास ही नही हुआ कि छत्तीसगढ के पारम्परिक चिकित्सक इस बारे मे इतना जानते होंगे।

चलिये अब लौकी के तेल पर लौटे। मुझे याद आता है कि दुर्ग जिले के पारम्परिक चिकित्सको के साथ एक बार मै धान के खेतो का भ्रमण कर रहा था। हम खेतो और मेडो मे उग रहे पौधो से पेट भर रहे थे। किसी की पत्तियाँ खा रहे थे तो किसी की फली। तभी हमारी नजर कोल्ही-केकडी पर पडी। यह वनस्पति का स्थानीय नाम है। यदि इसका हिन्दी रुपांतरण करे तो इसका अर्थ हुआ सियार की ककडी। इसका फल बहुत छोटा होता है पर उसे खाते ही एक भरी-पूरी ककडी की याद ताजा हो जाती है। पारम्परिक चिकित्सको ने बताया कि जब लू लग जाये या तेज ज्वर हो तो हम लौकी और इस वनस्पति से तैयार किये गये तेल की सहायता से रोगी की चिकित्सा करते है। तेल से पूरे शरीर की मालिश की जाती है फिर नीम की छाँव मे रोगी को लिटा दिया जाता है। इससे बहुत लाभ होता है।

बहुत से पाठक इस बात की शिकायत करते रहते है कि इस लेखमाला के साथ वनस्पतियो के वैज्ञानिक नाम, चित्र और दूसरी जानकारियाँ नही है। उनकी शिकायत सही है। पर मेरी भी विवशता है। मेरे पास दो विकल्प है। या तो मै हर लेख मे उल्लेखित वनस्पतियो के बारे मे विस्तार से लिखूँ या जिसके बारे मे एक बार लिख दिया है उसके बारे मे न लिख कर नया लिखूँ। मै दूसरे विकल्प को प्राथमिकता देता हूँ। मेरे पास अभी तक किये गये वानस्पतिक सर्वेक्षणो से इतना ज्ञान एकत्र हो गया है कि अगले पचास सालो तक मै बिना रुके लिख सकता हूँ। फिर नित नयी जानकारियाँ आ रही है। आप तो जानते ही है कि मेरे द्वारा ली गयी चालीस हजार से अधिक तस्वीरे इंटरनेट पर है। बीस हजार से अधिक शोध आलेख आन-लाइन है। करोडो पन्नो की मधुमेह की रपट अपलोड होने वाली है। इस रपट के साढे छै लाख पन्ने आन-लाइन है। हिन्दी के हजारो लेख भी उपलब्ध है। इनके कही भी एक ही जानकारी का दोहराव बहुत कम है। कोल्ही-केकडी का ही उदाहरण ले। इसके विषय मे हजारो पन्ने इंटरनेट पर है। तस्वीरे भी है। ऐसे मे हर लेख मे इस जानकारी को दोहराना व्यर्थ लगता है। आप पाठको से अनुरोध है कि विस्तार के लिये गूगल का सहारा ले और मनचाही जानकारी प्राप्त कर ले। इकोपोर्ट पर भी चले जाये जहाँ मैने मधुमेह की रपट के कुछ अंश डाले है।

अब विषय पर फिर लौटते है। लौकी के तेल के विषय मे समृद्ध ज्ञान होते हुये भी एक भी व्यवसायिक उत्पाद बाजार मे नही है। आम भारतीयो के पास इसकी जानकारी नही है। देश के बहुत से राज्यो मे पारम्परिक चिकित्सको की सुध लेना सरकारो ने शुरु किया है। योजनाकार यदि चाहे तो लौकी के सैकडो प्रकार के तेलो के निर्माण के लिये कुटिर उद्योग लगाने की पहल की जाये ताकि पारम्परिक चिकित्सको के साथ किसानो का भी हित हो सके। (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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Saturday, June 20, 2009

ह्रदय रोगी, औषधीय धान और दुर्लभ ज्ञान

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-18
- पंकज अवधिया
दस जून, 2009

ह्रदय रोगी, औषधीय धान और दुर्लभ ज्ञान


जंगल मे कुछ दूर चलने पर साथ चल रहे पारम्परिक चिकित्सको ने मजाक मे कहा कि क्या आपको अस्सी साल के जवान से मिलना है? मैने हामी भरी तो उन्होने एक गाँव का रुख किया। दोपहर का समय था। गाँव सुनसान था। हम आधा गाँव घूम आये पर कोई नही दिखा। उन बुजुर्ग के घर मे पूछताछ की गयी तो पता चला कि जंगल गये है। हम उसी दिशा मे निकल पडे। जल्दी ही हमे वो मिल गये। परिचय हुआ। बातचीत का दौर चल पडा। उम्र के इस पडाव मे भी उनके बाल काले थे। दाँत सलामत थे। लकडी का बोझा उठाकर चल लेते थे। उस बोझे को मैने उठाने की कोशिश की तो वह टस से मस नही हुआ। बडी मुश्किल से दो लोग उठा पाये। यह जडी-बूटी का असर दिखता था। पर उन्होने दो टूक कह दिया कि मै भात और साग खाता है। जडी-बूटी के बारे मे जानता हूँ पर स्वयम कम ही सेवन करता हूँ। उन्हे तेलिया कंद की तलाश थी इसलिये हमसे विदा लेकर वे कुछ देर के लिये पास की पहाडी पर चले गये।

उनके जाने के बाद पारम्परिक चिकित्सक खुसुर-फुसुर करने लगे। फिर मेरे पास आकर एक स्वर मे बोले कि इनके पास एक विशेष धान है जिसमे औषधीय गुण है। वे इसे किसी को न देते है और न ही ज्यादा कुछ बताते है। यही धान उनकी अच्छी सेहत के लिये भी जिम्मेदार है। आप बात करे हो सकता है कि आपको कुछ जानकारी मिल जाये।

जब वे बुजुर्ग पहाड से लौटे तो उन्होने अपने घर चलकर लाल चाय पीने का निमंत्रण दिया। मैने ड्रायवर को भेजकर गाडी मे रखा तेन्दुफूल नामक औषधीय धान मंगवा लिया। अब खाली हाथ किसी के घर चाय पर जाना ठीक नही है। मैने यह धान उन्हे दिया तो उनकी आँखो मे चमक आ गयी। उन्होने इसके बारे मे सुना तो बहुत था और साथ ही इसे पाने की कोशिश भी की थी पर सफलता नही मिली थी। अब तेन्दुफल खुद गाडी मे सवार होकर उनके घर तक पहुँचा था। इन बीजो को बढाकर वे आगे कुछ सालो ने इतना धान पैदा कर लेंगे कि वे खुद खा सके और दूसरो को भी उपहार स्वरुप दे सके। मैने उन्हे बताया कि मै औषधीय धान से सम्बन्धित पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान का दस्तावेजीकरण कर रहा हूँ। फिर उन्हे विस्तार से मधुमेह की चिकित्सा मे प्रयोग होने वाले औषधीय धानो के विषय मे बताया। ये जानकारियाँ साथ चल रहे पारम्परिक चिकित्सको के लिये भी नयी थी। वे ध्यान से सुन रहे थे। बुजुर्ग ने पूरी बात सुनी तो उन्हे अपने गोपनीय धान के विषय मे बताने का मन हुआ। वे अन्दर गये और कोठार से धान लेकर लौटे। उन्होने कहना शुरु किया,” ये मेरे सियानो की अमानत है। मै अभी तक इन बीजो को सम्भाल कर रखा हूँ। जिस खेत मे इसकी खेती करता हूँ वहाँ दूसरी फसल नही लगाता। परम्परागत खुर्रा बोनी करता हूँ। भगवान भरोसे खेती करता हूँ। चाहे कीडे आये या रोग, सरकारी दवा नही डालता हूँ। जितना उत्पादन होता है उसे साल भर पूरे परिवार के लिये उपयोग लाता हूँ। मेरे सियान इसके बारे मे बहुत से प्रयोग बता कर गये है पर ज्यादातर प्रयोग अब प्रचलन मे नही है। बडे लडके को कुछ बताया है पर उसकी रुचि इसमे नही है। यह जल्दी पकने वाला धान है। इसका स्वाद और रंग-रुप अच्छा नही है पर फिर भी चूँकि ये औषधि है इसलिये मै इसकी खेती मन लगाकर कर रहा हूँ। मै इसके साथ खेतो मे खरपतवार की तरह उग रही भाजियो को खाता हूँ और साल भर मजे से रहता हूँ।“ मैने पूछा कि इस औषधीय धान का नाम क्या है? उन्होने कहा कि नाम तो मुझे भी पता नही है। इस पर मैने उनका नाम पूछा।“अनंतराम” उनका जवाब आया। मैने उन्हे बताया कि मै जब इस औषधीय धान के विषय मे अपने डेटाबेस मे लिखूंगा तो इसका नाम “अनंतराम औषधीय धान” रखूंगा।

उनसे मुझे इस धान के दुर्लभ उपयोग के विषय मे जानकारी मिली। ह्रदय रोगियो के लिये उन्होने इस धान को उपयोगी बताया। उन्होने ऐसे रोगियो के लिये तीन सौ दिनो तक इस धान को खाने की विधि बतायी। पहले दिन रोगी गरम भात के रुप मे इसे अकेले खाये। दूसरे दिन इसे बनाते समय इसमे चार की छाल का सत्व डाले फिर सत्व युक्त गर्म भात रोगी को दिया जाये। तीसरे दिन कौहुआ की छाल का सत्व, फिर चौथे दिन महुआ की छाल, पाँचवे दिन रोहिना की छाल, छठवे दिन हर्रा की छाल, सातवे दिन गिन्धोल की छाल, ऐसे तीन सौ से अधिक वनस्पतियो के बारे मे विस्तार से जानकारी दी। जैसा कि आप जानते है मै कापी-पेन लेकर जंगल नही जाता। जो कुछ सुनता और देखता हूँ वह दिमाग मे रह जाता है। उस दिन जंगल से लौटने के बाद मै रात भर उनकी बतायी बातो को डेटाबेस मे डालता रहा। कुल सत्रह घंटो मे यह कार्य पूरा हुआ। अब मुझे उनसे एक बार फिर मिलकर यह सुनिश्चित करना है कि कही कोई गल्ती तो नही है। उन्होने बताया कि तीन सौ दिनो तक इस धान का प्रयोग सामान्य स्वास्थ्य के लिये भी वरदान है। इससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढती है। उन्होने दूसरे रोगो मे भी इसके प्रयोग के विषय मे बताया। उनके ज्ञान से अभिभूत होकर मैने उन्हे औषधीय धान पर तैयार की जा रही 250 जीबी से अधिक आकार की एक रपट को सरल भाषा मे समझाने का मन बना लिया। जब मैने यह प्रस्ताव उनके सामने रखा तो वे मुस्कुराकर बोले कि इतना सब जानकर मै क्या करुंगा? मै पारम्परिक चिकित्सक तो हूँ नही। आप ही इसे अगली पीढी के लिये सम्भाल कर रखे।

उन्होने मुझे उस औषधीय धान के कुछ बीज देने चाहे। मैने इंकार कर दिया। मैने अपने परिचित किसानो और पारम्परिक चिकित्सको के पास औषधीय धानो के बीज रख छोडे है पर सभी पूरी सावधानी से उसे नही बढा रहे है। ऐसे मे मै एक और नया बीज लेकर क्या करुंगा? अनंतराम जिस ढंग से बरसो से इसे सम्भाल कर रखे हुये है, उसे देखकर तो लगता है कि बीज सही हाथो मे है। यह बीज बहुराष्ट्रीय कम्पनियो से बचा रहना चाहिये। क्लाइमेट चेंज का नारा बुलन्द करने वाले आजकल ऐसे परम्परागत बीजो की तलाश मे है जो विपरीत वातावरणीय परिस्थितियो मे भी उग सके (Climate resistant crops)। वे सीधे अनंतराम जैसे किसानो के कोठार पर धावा नही बोलेंगे। पहले वे पास के सरकारी शोध संस्थान के किसी वैज्ञानिक को एक प्रोजेक्ट देंगे। यह प्रोजेक्ट उस क्षेत्र के पारम्परिक किस्मो और उनसे जुडी जानकारियो के एकत्रण से सम्बन्धित होगा। अनंतराम से बलात ही बीज ले लिया जायेगा। फिर वह बीज रायपुर के शोध संस्थान मे पहुँचेगा। वहाँ से कटक के रास्ते फिलीपींस और फिर सीधे कलामेट चेंज वालो के पास। तब उस्का नाम “अनंतराम औषधीय धान” नही रह जायेगा। छत्तीसगढ से हजारो किस्मे इसी रास्ते से बाहर गयी है। आज भी ये जारी है।

मैने उन्हे धन्यवाद दिया और जल्दी ही वापस आने का वायदा कर आगे की राह पकडी। साथ चल रहे पारम्परिक चिकित्सक प्रसन्न थे। वे अनंतराम को दशको से जानते थे पर उन्होने कभी इस बारे मे किसी पारम्परिक चिकित्सक को नही बताया। आज जब वे खुले तो पूरे ज्ञान सागर को उडेल दिया और हम सब धन्य हो गये। (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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स्त्री रोग, रोहिना और “ट्री शेड थेरेपी”

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-17
- पंकज अवधिया
दस जून, 2009

स्त्री रोग, रोहिना और “ट्री शेड थेरेपी”


घने जंगल मे एक वृक्ष की ओर इशारा करते हुये साथ चल रहे पारम्परिक चिकित्सको ने कहा कि आम महिलाओ को अपने कष्टो से मुक्ति के लिये इस वृक्ष की देखरेख शुरु कर देनी चाहिये। देख-रेख यानि सुबह से शाम तक इसकी सेवा। जितना हो सके उतना समय इसके साये मे गुजारना चाहिये। पारम्परिक चिकित्सक की बात सुनकर मैने कैमरा निकाल लिया और विभिन्न कोणो से उस वृक्ष की तस्वीर लेने लगा। यह मेरा जाना-पहचाना वृक्ष था। मैने इसके पारम्परिक उपयोगो का दस्तावेजीकरण किया है पर जैसा कि आप जानते है, हर वानस्पतिक सर्वेक्षण से नयी जानकारियाँ मिलती है। मै तस्वीरे लेता रहा और पारम्परिक चिकित्सक अपनी बात कहते रहे। साधारण महिलाओ को तो इस वृक्ष के साये मे रहना चाहिये। पहले जंगलो मे बहुत से ऐसे स्थान होते थे जहाँ ये वृक्ष समूह मे उगा करते थे। तब पारम्परिक चिकित्सक महिलाओ के परिवारजनो से कहते थे कि यदि सम्भव हो तो उस वृक्ष समूह के साये मे मिट्टी की अस्थायी झोपडी बना ले और वही रहकर औषधीयो का सेवन करे। उनका कहना था कि साधारण रोग तो केवल वहाँ रहने ही से दूर हो जाते है। दूसरी औषधीयो की आवश्यकत्ता नही होती है।

मुझे याद आता है कि कुछ वर्षो पहले मेरी मुलाकात एक महिला पारम्परिक चिकित्सक से हुयी थी। आमतौर पर पुरुष पारम्परिक चिकित्सक ही मिलते है। महिला पारम्परिक चिकित्सक चाह कर भी अपनी सेवाए नही दे पाती है। जिस महिला पारम्परिक चिकित्सक की मै यहाँ बात कर रहा हूँ वे श्वेत प्रदर (ल्यूकोरिया) की चिकित्सा मे माहिर है। सुबह ही से दूर-दूर से रोगी उनके घर के सामने एकत्र हो जाते है और फिर चिकित्सा का सिलसिला शुरु होता है। सप्ताह मे पाँच दिन वे रोगियो को देखती है। बचे हुये दो दिनो मे एक दिन आराम करती है जबकि दूसरे दिन अपने बडे बेटे के साथ जंगल जाती है ताकि जडी-बूटियाँ एकत्र की जा सके। मेरी उनसे बहुत बार जंगल मे मुलाकात हुयी है। उनके गाँव के पास ही जंगल है। पहले उनका गाँव जंगल के अन्दर था पर अब मनुष्यो ने जंगल से जैसे नाता तोड लिया है। तभी तो जंगल गाँव से दूर जाता जा रहा है। इन महिला पारम्परिक चिकित्सक से मैने घंटो बात की है। उनका कहना था कि मै सरकार से कहकर एक विशेष प्रकार के वृक्ष का रोपण बडे पैमाने मे करवा दूँ ताकि आम महिलाए लम्बे समय तक रोगमुक्त रह सके। यह विशेष वृक्ष स्थानीय भाषा मे रोहिना कहलाता है। यदि आप किसी वन अधिकारी से इसके बारे मे पूछेंगे तो वे आपको केवल इसकी लकडी की उपयोगिता के बारे मे बता पायेंगे। उससे आगे एक शब्द भी नही। आम लोग भी इसके बारे मे कम जानते है पर जानकार पारम्परिक चिकित्सको के लिये यह ईश्वर के वरदान से कम नही है।

डेढ दशक से भी अधिक समय से मेरी नजर रोहिना की घटती आबादी पर है। इसकी लकडी बहुत मजबूत होती है। यही गुण इसके लिये अभिशाप बना हुआ है। सालो से इसकी अवैध और वैध कटाई हो रही है। पहले आसानी से दिख जाने वाला यह वृक्ष आज खोजने पर मुश्किल से मिल पाता है। सरकारी दस्तावेजो मे इसकी संख्या उतनी ही है जितनी दशको पहले थी। पर जमीनी सच्चाई दिल दहला देने वाली है। रोहिना की छाल कुछ मात्रा मे व्यापार मे है। पर इसकी अधिक माँग नही होने के कारण व्यापारियो से इसे उतना खतरा नही है। फिर भ्रष्टाचार भी इसकी जान बचाये हुये है। रोहिना की छाल मे बडे पैमाने पर स्थानीय तौर पर मिलावट होती है। अर्थात रोहिना की छाल कम मात्रा मे एकत्र की जाती है और दूसरी प्रजातियो की अधिक। इस तरह की मिलावट से न केवल दिल्ली जैसे महानगरो के व्यापारी अनजान है बल्कि देश-विदेश की जानी-मानी दवा कम्पनियाँ भी। एक बार उत्तर भारत से आये एक दवा विशेषज्ञ को रोहिना की छाल दी गयी तो वे उसे पहचान नही पाये। जब उन्होने इसका रासायनिक विश्लेषण किया तो और भ्रमित हो गये। उन्होने जीवन भर मिलावटयुक्त रोहिना की छाल का प्रयोग किया था। ऐसे मे पहली बार शुद्ध छाल का अनुभव पाकर वे भ्रमित हो गये।

प्राचीन भारतीय ग्रंथ इस वृक्ष का उल्लेख तो करते है पर यह आश्चर्य का विषय है कि जितनी जानकारी आज पारम्परिक चिकित्सको के पास है उसका एक प्रतिशत हिस्सा भी इन ग्रंथो मे नही है। इस वृक्ष के गुणो का बखान करती दसो जीबी के फाइल मैने तैयार की है पर फिर भी इस ज्ञान का कोई अंत नही दिखता है।

मुझे याद आता है कि कुछ वर्षो पहले एक महिला महाविद्यालय मे मै गाजर घास पर व्याख्यान दे रहा था। व्याख्यान के बाद मैने पारम्परिक ज्ञान दस्तावेजीकरण के अपने काम पर भी कुछ कहा। इस पर वहाँ के प्राचार्य ने मुझे कैम्पस के लिये उपयुक्त वृक्ष प्रजाति सुझाने को कहा। उस समय उनकी योजना गुलमोहर जैसे सजावटी वृक्ष लगाने की थी। मैने बिना विलम्ब रोहिना का सुझाव दिया। इसके गुणो के बारे मे जानकर उन्होने सहमति दे दी पर काफी मशक्कत के बाद भी वे इसके पौधे नही लगा पाये। उन्होने देश भर की नर्सरियाँ खोज डाली पर रोहिना नही मिला। मैने कुछ पौधे अपने सम्पर्को से उन्हे उपलब्ध करवाये। इस घटना से यह सबक मिला कि रोहिना के प्रवर्धन पर शोध जरुरी है। अपनी हर जंगल यात्रा के दौरान इसके प्रवर्धन के विषय मे अधिक से अधिक जानकारी जुटाने का प्रयास करता हूँ।

रोहिना के साथ यदि चार का वृक्ष अपने आप उग रहा हो तो ऐसा स्थान वात रोगियो के लिये उपयुक्त है। यदि रोहिना के साथ धोबन के वृक्ष उग रहे हो तो ऐसा स्थान श्वेतकुष्ठ से प्रभावित रोगियो के लिये वरदान है। यदि रोहिना के साथ धौरा, सलिहा, धोबन, कुर्रु और चार उग रहे हो तो ऐसे स्थान मे कम जीवनी शक्ति वाले व्यक्तियो को समय बिताना चाहिये। यदि रोहिना के साथ बाँस उग रहा हो और पास मे दीमक की बडी बाम्बी हो तो पेट के रोगियो को वहाँ रहना चाहिये। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि ऐसे हजारो वृक्ष मिश्रण है पारम्परिक चिकित्सको के पास और हर वृक्ष मिश्रण की अपनी अलग उपयोगिता है। इस छोटे से उदाहरण से यह स्पष्ट होता है कि क्यो माँ प्रकृति ने विविधता को अपनाया है। ये तो मनुष्य़ है जो विविधता को समाप्त कर एकरसता ला रहा है और हजारो एकड जमीन मे एक ही तरह की वनस्पति रोप रहा है। वृक्ष की छाँव से चिकित्सा को “ट्री शेड थेरेपी” का नाम दिया गया है। यदि आप इसे गूगल मे खोजेंगे तो सारे सन्दर्भ छत्तीसगढ ही से मिलेंगे। यह छत्तीसगढ का विश्व समुदाय को एक अनुपम उपहार है।

जब रोहिना को देखने के बाद हम दूसरे वृक्ष की ओर बढे तो पारम्परिक चिकित्सको ने इसका एक फल मुझे दे दिया। मुझे इसे अपने ड्राइंग रुम मे सजाकर नही रखना था बल्कि लौटते समय ऐसी जगह पर रोप देना था जहाँ इसके वृक्ष न हो। ऐसे ही उपहारो का सिलसिला चलता रहा तो उन्हे उम्मीद है कि स्त्री रोगो को हरने वाले ये देव-तुल्य वृक्ष बडी संख्या मे माँ प्रकृति के पास फिर से होंगे। (क्रमश:)

रोहिना का वृक्ष

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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Friday, June 19, 2009

लाल पानी वाला ग्लास और महिनो से ज्वर से जूझता रोगी

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-16
- पंकज अवधिया
बारह जून, 2009

लाल पानी वाला ग्लास और महिनो से ज्वर से जूझता रोगी


कुछ दूर चलने के बाद हम एक ऐसे स्थान पर पहुँचे जहाँ भुईनीम के बहुत से छोटे-छोटे पौधे उग रहे थे। पारम्परिक चिकित्सक ने रोगी से कहा कि मैने घेरा बना दिया है। आप उन पौधो पर मूत्र विसर्जन कर दे। रोगी ने ऐसा ही किया। इसके बार उसे लकडी के ग्लास मे पानी पीने को दिया गया। पानी का रंग लकडी के कारण लाल हो चुका था। पारम्परिक चिकित्सक ने कहा कि आप सब बरगद के इस पुराने वृक्ष के साये मे बैठे और जब रोगी को अगली बार मूत्र विसर्जन की इच्छा हो तो भुईनीम के दूसरे घेरे पर करे। इसबीच मै अपने दूसरे रोगियो को देख लेता हूँ। अलग-अलग तरह के लकडी के ग्लास मे पानी पीने के बाद पाँच घेरो मे मूत्र विसर्जन करना होगा। उसके कुछ समय बाद मै रोग का कारण बता पाऊँगा। रोगी और उसके परिजन पूरी तत्परता से यह कार्य करने लगे।

इस जंगल यात्रा मे निकलने के कुछ दिनो पहले ही से एक पारिवारिक मित्र मुझसे लगातार सम्पर्क कर रहे थे। उनकी पत्नी पिछले तीन महिनो से परेशान थी। दिन भर हल्का ज्वर रहता था। उन्होने चिकित्सक बदले और फिर दवाईयाँ बदली पर ज्वर का आना बन्द नही हुआ। किसी ने मलेरिया कहा, किसी से टायफाइड तो किसी ने लू लगना बताया। तीन महिनो तक नाना प्रकार की एंटी-बायटिक खा-खा कर उनकी हालत खराब हो गयी। मरता क्या न करता। उन्होने किसी तांत्रिक की शरण ली। मजेदार बात यह रही कि तांत्रिक ने मेडीकल रपट की माँग की। रपट को उलटने और पलटने के बाद उसने फरमान जारी किया कि यह एक तरह का ब्लड कैंसर है। उसने दावा किया कि अभी मशीने इसे नही पकड पायेंगी। पर मैने पकड लिया है। आप मुम्बई मे अमुक गाडी से अमुक लाज मे जाइये और अमुक कैंसर विशेषज्ञ से मिलिये। इतने रुपये का पैकेज है। मेरा नाम लेंगे तो कुछ कम हो जायेगा। उसके फरमान देखकर लगा मानो वह कमीशन पर काम करने वाला ट्रेवल एजेंट हो।

मित्र ने तांत्रिक का रंग देखकर फिर किसी नये चिकित्सक से मदद ली। चिकित्सक ने कहा कि यह किसी तरह का कैंसर नही है। पर उसने फिर से लैब टेस्ट करवाये। उसके बाद फिर ज्वर की दवा और एंटीबायटिक का पुराना कोर्स शुरु हो गया। इतने लम्बे समय के बाद मित्र को पारम्परिक चिकित्सको की याद आयी। मुझे घेर लिया गया। थकहार कर मैने एक बुजुर्ग पारम्परिक चिकित्सक के पास जाने को कहा। मित्र ने पूछा कि रपटो की एक प्रति रख लूँ। मैने उस पुस्तकनुमा फाइल देखकर विनम्रतापूर्वक कहा कि पारम्परिक चिकित्सक के लिये ये किसी काम की नही। उनका रोग के निदान और समाधान का अपना तरीका है। उन पर विश्वास हो तो ही जाओ। वह तैयार हो गया।

हमारे साथ जाने की बजाय उसने पारम्परिक चिकित्सक के गाँव मे ही मिलने की बात कही। जैसा कि आपने पहले पढा है कि परलोक वाहन ने कैसे मेरी गाडी को ठोकर मारी थी जिसके कारण मुझे पारम्परिक चिकित्सक तक पहुँचने मे देरी हो गयी थी। मेरे पहुँचने से पहले ही पारम्परिक चिकित्सक से उनकी मुलाकात हो चुकी थी।

इस बीच रोगी के मूत्र विसर्जन के दौर के बीच मैने यह निर्णय लिया कि मै जंगल जाऊँगा और फिर वापस लौटते हुये मित्र की गाडी के साथ हो लूंगा। मित्र ने मेरी बात मान ली और हम आगे बढ गये। हल्की बारिश के बाद जंगल मे सुनहरी धूप फैल चुकी थी। सूखी वनस्पतियो मे हल्की फुहार से कुछ ताजगी आ रही थी। कुररु (कुल्लु नही) की गोन्द डंठलो के सिरो से बाहर निकल रही थी। जब उस पर सूरज की किरणे पडती तो वह सोने के समान दिखायी देती थी। बारिश के बाद तितलियाँ तेजी से इधर-उधर उड रही थी। गर्मी के दिनो मे जमीन मे जहाँ भी लवण मिलता है नर तितलियाँ उन्हे एकत्र करने बैठ जाती है। इसे वैज्ञानिक भाषा मे “मड-पडलिंग” कहा जाता है। जब बारिश होती है तो लवण बह जाते है और सारा ताना-बाना अस्त-व्यस्त हो जाता है। नर तितलियो को नये लवण स्त्रोत के लिये फिर से मशक्कत करनी पडती है। नर तितलियाँ इन लवणो को प्रणय उपहार के रुप मे मादा तितलियो को देती है। तब ही उनका प्रणय निवेदन स्वीकार किया जाता है। ये लवण मादा तितलियाँ अंडो के विकास मे प्रयोग करती है। कुछ तितलियाँ गाडी के शीशे से आकर टकराने लगी। मैने कुछ देर रुकने का मन बनाया।

हमारा रुकना बेकार नही गया। हमे एक मोर के दर्शन हो गये। ड्रायवर ने उसके जख्मी बदन की ओर इशारा करते हुये अनुमान लगाया कि किसी शिकारी जीव से इसकी हाल ही मे मुठभेड हुयी है। मोर के जाने के बाद उस मार्ग से एक साही गुजरा। साही के काँटे पूरी तरह सलामत थे। उस पर किसी शिकारी की नजर नही पडी थी वरना जिस वन क्षेत्र मे हम उस समय थे वहाँ हर साप्ताहिक बाजार मे तांत्रिको की एक दुकान लगती है जहाँ साही के काँटे खुलेआम बिकते है। इतने सारे काँटे कि जंगलो मे साही पर हो रहे जुल्म को बताने के लिये पर्याप्त होते है।

मित्र की पत्नी जंगल मे पारम्परिक चिकित्सक के परीक्षणो के बीच तरोताजा महसूस कर रही थी। जंगल की हवा होती ही ऐसी है। शाम को पारम्परिक चिकित्सक ने किसी भी तरह की औषधि देने से इंकार कर दिया। उन्होने कहा कि यदि मेरे ज्ञान पर विश्वास है तो सारी दवाए बन्द करके लाल पानी वाले ग्लास का पानी रोज सुबह-शाम पीओ। लाभ होगा। मित्र को यह हजम नही हुआ। वह तो ढेरो दवाओ की उम्मीद कर रहा था। फिर जब उसने फीस देनी चाही तो पारम्परिक चिकित्सक ने हाथ जोड लिये। उन्होने गाँव के एक युवक को बुलाया और पूछा कि ग्लास के कितने पैसे हुये? युवक ही ग्लास बनाकर पारम्परिक चिकित्सक को दिया करता था।“चौबीस रुपये” युवक ने कहा। मित्र को एकाएक विश्वास नही हुआ। उसने चिल्हर न होने के कारण तीस रुपये देने चाहे तो उन्होने मना कर दिया। मित्र ने कोने मे ले जाकर मुझसे कहा कि यह आदमी ठीक नही जान पडता है। पैसे ही नही लेता मतलब इसकी दवा मे दम नही है। मित्र की बात भी सही थी। वह ऐसे शहर मे जीता था जहाँ बिना महंगी फीस के कुछ काम नही होता। जो व्यक्ति तीन महिनो मे लाखो गँवा चुका हो उससे यदि कोई कहे कि दिन भर के चौबीस रुपये हुये तो भला उसे अविश्वास तो होगा ही। पर कुछ समय बाद उसे बात समझ मे आ गयी। पारम्परिक चिकित्सको को चिकित्सा के लिये पैसे लेने की मनाही है। यह उनके पूर्वजो की शपथ है।

मित्र ने वापस आकर अपनी पत्नी को उसी ग्लास से पानी पिलाना आरम्भ किया। रात मे पानी भरकर ग्लास रख दिया जाता था और सुबह लाल पानी को पी लिया जाता था। ऐसी ही शाम को भी किया जाता था। दूसरे दिन से ही रोगी मे सुधार हुआ और तीन-चार दिनो मे सब कुछ सामान्य हो गया। पारम्परिक चिकित्सक ने पन्द्रह दिन के बाद आने को कहा था। रोगी ने ठीक होते ही ग्लास का उपयोग बन्द कर दिया। कल ही मित्र का फिर फोन आया कि फिर से ज्वर आने लगा है। ग्लास कही गुम हो गया है। किसी शहरी चिकित्सक के पास फिर से गये तो उसने कहा कि ग्लास के पानी के कारण ही ज्वर आ रहा है। चिकित्सक ने फिर टेस्ट कराये और एंटीबायटिक का दौर शुरु हो गया। ज्वर कम होने का नाम नही ले रहा है। क्षमा माँगते हुये उसने फिर से पारम्परिक चिकित्सक के पास ले चलने की बात कही।

मै असमंजस मे हूँ। मेरा मानना है कि जिस भी चिकित्सा प्रणाली मे पूरा विश्वास हो उसी मे आगे बढना चाहिये। डाँवाडोल की स्थिति गडबड होती है। क्या भरोसा कि एक बार ठीक होने के बाद फिर वह ग्लास से तौबा कर ले।

पारम्परिक चिकित्सक ने रोग का पता लगाने के लिये भुईनीम का प्रयोग किया था। उन्हे रोगी के जोडो की सूजन देखकर वात की समस्या का अहसास हुआ था। अलग-अलग औषधियो को खिलाने के बाद उन्होने पौधो पर मूत्र विसर्जन करने इसलिये कहा था ताकि पौधो पर इनके प्रभाव को देखकर रोग की पुष्टि की जा सके। आमतौर पर बीजा नामक वृक्ष की लकडी से ग्लास बनाये जाते है। उसमे रखा पानी मधुमेह के रोगियो के लिये वरदान माना जाता है। ऐसे ग्लास शहरो मे भी बिकते है। पर लकडी के लिये सही वृक्ष का चुनाव और ग्लास बनाने की पारम्परिक विधि अहम भूमिका निभाती है। शहरी ग्लास बनाने वाले इस बात को नही समझते है। वात रोगो के लिये बीजा की लकडी से बने ग्लास को जडी-बूटियो से बने घोल से लम्बे समय तक उपचारित किया जाता है। फिर इसे रोगियो को दिया जाता है। ऐसा नही है कि आधुनिक विज्ञान ने बीजा के लकडी को नही आजमाया है पर ज्यादातर शोधो मे वैसे प्रभाव नही देखने को मिलते है जैसे कि पारम्परिक चिकित्सको के पास उपलब्ध ग्लास से मिलते है। शोधकर्ता शहरी ग्लासो पर प्रयोग करते है। बहुत से विदेशी शोधकर्ताओ ने इस अंतर का स्पष्ट उल्लेख किया है। पारम्परिक चिकित्सक खुद पैसे नही कमाते। वे जानते है कि उनकी नकल से शहरी लोगो को ठग सकते है। यही कारण है कि मरते दम तक पूरी विधि वे किसी को नही बताते है। केवल अपने चेलो को ही सब बताते है, पूरी तरह से आश्वस्त होने पर।

बारह जून की जंगल यात्रा मे एक दिन मे जाने कितने अनुभव मिल गये और ज्ञान अर्जन हो गया। अभी भी इस यात्रा के बारे मे बहुत कुछ लिखना शेष है। (क्रमश:)


(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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जंगलो के लिये अभिशाप ढाबे और उनकी काली करतूते

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-15
- पंकज अवधिया
बारह जून, 2009

जंगलो के लिये अभिशाप ढाबे और उनकी काली करतूते


“चाय के साथ मसाला पापड ले आना। मसाला पापड मिलता है ना यहाँ?” मैने तो सिर्फ चाय के लिये कहा था पर ड्रायवर ने उसमे मसाला पापड भी जोड दिया। हमारी योजना एक ढाबे मे रुककर चाय पीने की थी ताकि वहाँ गाडी खडी करके पीछे के पहाड को पैदल पारकर पारम्परिक चिकित्सको के गाँव पहुँचा जाये और फिर उनके साथ जंगल जाया जाये। हम अक्सर इस ढाबे मे आते थे। विशेषकर उन दिनो मे जब मै इस क्षेत्र विशेष मे वानस्पतिक सर्वेक्षण कर रहा था। ढाबा वही था पर इसके मालिक बदलते रहते है। अभी किसी बाहरी व्यक्ति के पास इसका मालिकाना हक है। छोकरे भी उसने बाहर के ही रखे है। इस बार जब हम ढाबे के पास पहुँचे तो सारी रंगत ही बदली-बदली नजर आयी। ढाबे के पीछे काफी दूर तक जंगल साफ हो चुका था। पहले ढाबे के सामने खटिया लगी होती थी जिसमे ट्रक वाले अपनी पीठ सीधी कर लिया करते थे। अब पीछे तक ढाबे का विस्तार हो गया था।

इस बीच मसाला पापड के साथ चाय आ गयी। मसाला पापड मे टमाटर और प्याज की टापिंग की गयी थी। दोनो ही बडे ताजे लग रहे थे। जैसे ही मैने एक टुकडा खाया टमाटर के टुकडो से रस टपक पडा। खून की तरह लाल रस। मेरा मुँह लाल हो गया। हाथ भी लाल हो गया। मेरे क्रोध का ठिकाना नही रहा। तुरंत छोकरे को बुलाया। “इसमे रंग डाला है। कौन-सा रंग? जरा डिब्बा दिखाओ?” मेरी बात सुनकर वह झट से डिब्बा ले आया। डिब्बा देखकर मेरे होश उड गये। यह कपडो को चटक रंग देने वाला रसायन था। अब मै तो रंग चुका था और कुछ किया नही जा सकता था इसलिये डाँट-डपट के बाद मसाला पापड वापस लौटा दिया। मैने मालिक से शिकायत की। फिर रसोई का मुआयना किया। इतनी सारी उल्टी-पुल्टी सामग्रियाँ थी कि ढाबे के खाने से नफरत हो गयी। हम जंगल की ओर चल पडे।

ढाबे के आस-पास घने जंगल मे बहुत से पुराने वृक्ष थे जिन्हे पारम्परिक चिकित्सको ने चिन्हित करके रखा था। अब वे नही दिख रहे थे। गाँव पहुँचते तक हमे अवैध खुदाई के बहुत से चिन्ह मिले। जब पारम्परिक चिकित्सको से मुलाकात हुयी तो उनकी रुलाई फूट पडी। ढाबे के नये मालिक की ये सारी करतूते थी। जंगल साफ हो गया है। अवैध खुदाई हो रही है। देर रात तक लोगो का जमावडा होने लगा है। ये ट्रक वाले नही थे बल्कि आस-पास के शहरो से आने-वाले लोग है। अधिक लोगो के आने से बेकार भोजन सामग्री का ढेर बढता जा रहा है। यह सामग्री माँसाहारी वन्य प्राणियो को आकर्षित कर रही है। ये वन्य प्राणी गाँव पार कर आते है। पहले रात मे ये गाँव की गलियो से गुजरते थे पर अब दिन मे कभी भी आ जाते है। ग्रामीण जानते है कि इनसे बचने मे ही भलाई है। यदि ये मारे गये तो उन्हे जेल भेज दिया जायेगा। ढाबे मे भालू तो जैसे डेरा जमाये ही रहते है। वैसे भी ये कचरा प्रेमी होते है। लकडबग्घे और तेन्दुए भी आ जाते है।

एक ग्रामीण ने दबे स्वर मे बताया कि ढाबे मे कुछ लोगो को उसने वन्य प्राणियो के शारीरिक अंग बेचते देखा है। बडी गाडियो मे सवार शहरी इन अंगो की मुँहमाँगी कीमत देते है। शहरी वैसे ही अन्ध-विश्वासी होते है, ग्रामीणो से ज्यादा। भालू के नाखून से लेकर तेन्दुए की हड्डियाँ बिकती है। मुझे ग्रामीण की बातो पर एकाएक विश्वास नही हुआ। मुख्य मार्ग मे स्थित ढाबे मे ऐसा खुलेआम होना आश्चर्य का विषय था। पर ग्रामीण की बात का अविश्वास भी तो नही किया जा सकता था।

मुझे याद आता है कि वानस्पतिक सर्वेक्षण के दौरान एक बार छत्तीसगढ के हीरा क्षेत्र मे जाना हुआ। वहाँ सरकारी गाडियो को एक ढाबे मे खडा देखकर उसे बडा ढाबा मानकर खाने के लिये रुक गये। रुकते ही ढाबे के कुछ लोग आये और पूछने लगे कि क्या आपको हीरे चाहिये? क्या आप हीरे खरीदने आये है? मेरे आश्चर्य का ठिकाना नही रहा। क्या अब ऐसे दिन आ गये है कि हीरे ढाबे मे बिकेंगे? मैने कहा कि हम तो जडी-बूटी की खोज मे आये है तो उनका शक यकीन मे बदल गया। वे पीछे ही लग गये। तब हमने बिना खाये-पीये लौटने मे ही अपनी भलाई समझी।

ऐसे ही एक ढाबे मे हमने वन्य प्राणियो की खाल के नाम पर कुत्ते की खाल बिकती देखी। महानगर से आया एक खरीददार मुँहमाँगे दाम पर उसे ले गया। खाल को रंगा गया था ताकि वह बाघ की पुरानी खाल जैसी लगे। जानकार झट से पहचान जाते पर नौसीखीये बेवकूफ बन जाते है। किसी तांत्रिक ने उस नौसीखीये से कहा था कि बाघ की खाल मे बैठकर पूजा करने से समस्त मनोकामनाए पूर्ण होगी। अब तो वह कुत्ते की खाल पर बैठा अपनी मनोकामना पूर्ण होने की बाट जोह रहा होगा। उस ढाबे के मालिक को जब हमने हडकाया तो वह बोला कि अमुक दिन आना तो मै असली खाल दे दूंगा। इसका मतलब ढाबे से खालो का व्यापार हो रहा था। खाल पर इस चर्चा से दिल को छूने वाली एक घटना याद आ रही है।

छत्तीसगढ मे जतमाई गढ है। यहाँ झरना है और माँ का मन्दिर भी। एक बार एक हिरण वहाँ भटकता हुआ आ गया और मन्दिर के पास ही उसने प्राण छोड दिये। पुजारी के लिये यह घटना अनर्थ से कम नही थी। माँ जिन वन्य प्राणियो की रक्षा करती है वे ही यदि मन्दिर के पास आकर जान देने लगे, मतलब कुछ गडबड है। पुजारी ने उसका अंतिम संस्कार किया पूरे विधि विधान से और फिर खाल को अपने पास रख लिया। खाल मे गुलाल लगाकर उसकी पूजा शुरु हो ग्यी। उस दौरान मै गया तो खाल की पूजा देखकर मैने प्रश्न किये। सारी बाते पता चली। मुझे पुजारी के वन्य-प्राणी प्रेम पर अभिमान हुआ। वह चाहता तो वह खाल उसके लिये पैसे का एक बडा स्त्रोत थी। पर उसने जंगल और वन्य प्राणियो को धार्मिक आस्थाओ के नजरिये से देखा है। यह नजरिया कभी भी वन्य प्राणियो व मनुष्यो के बीच दीवार नही खडी करेगा।

अपनी इस जंगल यात्रा के दौरान ढाबे के बारे मे और भी चौकाने वाली बाते पता चली। ग्रामीणो का साफ कहना था कि कही भी कुछ खम्बे गडाकर ढाबे बना लिये जाते है और फिर देखते ही देखते वे बहुत बडे हो जाते है। फिर आस-पास ढाबो की बाढ आ जाती है। आज जब ज्यादातर ट्रक वाले अपना खाना खुद पकाकर खाने मे विश्वास करते है ऐसे मे ढाबे कम होने की बजाय बढते जा रहे है। ढाबे की आमदनी उन कार्यो से हो रही है जो सीधे तौर पर ढाबे से सम्बन्धित नही है। पारम्परिक चिकित्सक तो साफ शब्दो मे कहते है कि वन की सुरक्षा मे लगे विभागो को एक “ढाबा निगरानी समिति” बनानी चाहिये।

मुझे मालूम है कि हम शहरी ढाबो को लेकर बहुत उत्साहित रहते है। हम इसके उजले पक्ष को तो देखते है पर इसके कृष्ण पक्ष को अनदेखा कर देते है। इसी कम देखे और कम जाने पक्ष को सामने रखना इस लेख का उद्देश्य है। (क्रमश:)


(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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Thursday, June 18, 2009

बिना हर्ब का हर्बल व्याग्रा और बरसात की प्रतीक्षा मे बैठा जंगल

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-14
- पंकज अवधिया
बारह जून, 2009

बिना हर्ब का हर्बल व्याग्रा और बरसात की प्रतीक्षा मे बैठा जंगल


“इस बार बरसात मे देर हो रही है। लक्षण ठीक नजर नही आ रहे है। लाल कीडो की खोज मे मै एक हफ्ते से भटक रहा हूँ पर अभी तक वे नही निकले है। यदि पानी नही गिरा या देर से गिरा तो मुश्किल बढ जायेगी।“ इस जंगल यात्रा के दौरान बरसात मे हो रही देरी से हर कोई परेशान दिखा। लाल कीडा एक तरह का बग है जो कि पानी गिरने के बाद ही जमीन पर निकलता है। पारम्परिक चिकित्सक जीवित और स्वाभाविक मौत मरे, दोनो ही प्रकार के लाल कीडे को एकत्र कर लेते है। लाल कीडे की सहायता से बहुत से रोगो की पहचान की जाती है। आम तौर पर रोगी को नंगे बदन लिटा कर उसके पेट मे कुछ कीडे छोड दिये जाते है। ये कीडे रोगी को कोई नुकसान नही पहुँचाते है। पारम्परिक चिकित्सक बस कीडो के बदले व्यवहार का अध्ययन करते है। इससे ही वे रोगो का पता लगाते है। अब उनके पास आधुनिक प्रयोगशाला तो है नही। मैने अपने लम्बे अनुभव से यह पाया है कि बहुत बार आधुनिक लैब के परिणाम इनके सामने बौने साबित हो जाते है।

पारम्परिक चिकित्सक बडे जतन से इन कीडो को लम्बे समय तक रखते है। मरे हुये कीडो से रक्त सम्बन्धी रोगो की चिकित्सा की जाती है। इन्हे वनस्पतियो के साथ मिलाया जाता है पर अपनी निगरानी मे पारम्परिक चिकित्सक इसका प्रयोग करते है। इस बार बरसात न होने होने से लाल कीडे खोजे नही मिल रहे है। इससे पारम्परिक चिकित्सको को विकल्पो की शरण मे जाना होगा।

रेड वेलवेट माइट का मौसम भी अब आने ही वाला है। इस बार इनके आने मे देरी होगी क्योकि मानसून भटक गया है। अभी-अभी ग्वालियर से खबर आयी है कि वहाँ समय से पहले ये धरती से बाहर निकल आये है। छत्तीसगढ मे पारम्परिक चिकित्सक बेसब्री से इस माइट की प्रतीक्षा मे है। इस माइट का एक बडा व्यापार है। पारम्परिक चिकित्सको के उलट व्यापारी मन ही मन प्रार्थना कर रहे है कि इस बार पानी कम गिरे और न गिरे तो और अच्छा। क्यो? क्योकि कम पानी मतलब माइट के मुँहमाँगे दाम। कम पानी के वर्षो मे एक-एक माइट की कीमत लगती है। दाम आसमान छूने लगते है। व्यापारी मरे हुये माइट को सुखाकर अपने पास रख लेते है। जब दाम और बढते है तब वे गोदाम से इन्हे निकालते है। पारम्परिक चिकित्सक कम मात्रा मे माइट एकत्र करते है। वे अल्प-मात्रा मे इसके प्रयोग के पक्षधर है क्योकि इनकी तासिर गर्म मानी जाती है। वे इन्हे एकत्र करते ही इनसे चूर्ण और तेल बना लेते है और फिर उसी रुप मे साल भर प्रयोग करते है। देश-दुनिया के बाजार मे यह हर्बल व्याग्रा के रुप मे बिकता है पर पारम्परिक चिकित्सक इसके ढेरो उपयोग जानते है। वे साधारण ज्वर से लेकर मधुमेह की जटिल अवस्था मे इसका प्रयोग करते है। माइट तो हर्ब (वनस्पति) नही है पर फिर भी माइट से बना तेल इसी नाम से बेचा जाता है। इसे खाने की सलाह भी दी जाती है और इसके तेल के बाहरी प्रयोग की। पारम्परिक चिकित्सक जब इन व्यवसायिक उत्पादो को देखते है तो ठहाके मार के हँसते है। फिर अपनी झोपडी के पीछे जाकर दूब सहित दूसरे साधारण खरपतवार ले आते है और कहते है कि ये साधारण वनस्पतियाँ इस व्याग्रा की बाप है। ये वनस्पतियाँ आकर्षक डब्बो मे बन्द नही है इसलिये कोई इनकी कद्र नही जानता।

बरसात मे हो रही देरी से रेड वेलवेट माइट के व्यापारियो के अलावा वन्य प्राणियो के शिकारी भी खुश है। अपनी इस जंगल यात्रा के दौरान कच्ची सडको मे चलते हुये हमे हर दस कदम पर रुकना पडता था। सभी जगह फन्दे लगाये गये है। इतने मजबूत फन्दे कि यदि आदमी इसमे फँस जाये तो वह भी न निकल पाये। शिकारियो के हौसले बुलन्द लगते है। जहाँ भी फन्दे दिखे हम समझ जाते है कि आस-पास पानी है। प्यास के मारे वन्य-प्राणी जैसे ही पानी की ओर आते है फन्दे मे फँस जाते है। इस बात के स्पष्ट संकेत मिलते है कि उन्हे फन्दे लगे होने का अहसास है पर प्यास के आगे वे मजबूर है। जब सारे फन्दे अपना काम कर चुके होते है तो वे बेफिक्री से पानी पीते है। पर उनकी बेफिक्री स्थायी नही होती। शिकारी रातो-रात फन्दो को खाली कर देते है। बायसन के लिये लगाये गये एक फन्दे मे हमारी मारुति आल्टो का अगला हिस्सा फँस गया। गाडी बिल्कुल डरी नही। उसे पूरा विश्वास था कि हम उसे किसी भी हाल मे निकाल लेंगे। हमने ऐसा किया भी।

आज ही अखबारो मे यह खबर आयी कि पिथौरा मे दो बायसन मारे गये है। शिकारियो ने फन्दे को शायद ज्यादा कारगर नही समझा और पानी मे ही यूरिया और कीटनाशक मिला दिया। दो बायसन वहाँ पर मरे पाये गये। अखबारो और जंगल विभाग के लिये तो बात यही समाप्त हो गयी। बायसान को जला दिया गया और जुर्म दर्ज कर लिया गया। पर जहर मिले पानी की ओर किसी ने ध्यान नही दिया। वह अंब भी जंगल मे वैसे ही है और प्यास से व्याकुल वन्य-प्राणियो को मौत खुला निमंत्रण दे रही है। न जाने कितने और जीव उस जहर भरे पानी को पीयेंगे और मरते जायेंगे। जब पानी सूख जायेगा और पहली बारिश से डबरी भरेगी तो एक बार फिर जहर अपना असर दिखायेगा। जंगलो से गुजरने वाले हमारे जैसे साधारण लोग जब इतनी सी बात समझ सकते है तो सक्षम विभाग क्यो नही जहरीले पानी युक्त स्त्रोतो को बन्द करने की पहल करते है? मुझे याद आता है कि एक बार बारनवापारा के जंगलो मे बायसन के मरने की खबर सुनकर हम लोग वहाँ गये थे। मरे हुये बायसन को ले जाया जा चुका था। जहरीले पानी की डबरी वैसे ही थी। ग्रामीणो ने मदद की तो हम लोगो ने बबूल के काँटो से उसे घेर दिया ताकि उस ओर का रुख कोई वन्य प्राणी न करे। सब ऐसा क्यो नही करते?

बरसात नही होने के कारण अब बाइक सवार जंगलो मे बढ गये है। ये शिकारी नही बल्कि शिकार के शौकीन है। ये चिडियो के शिकारियो की तलाश मे रहते है। मरी हुयी चिडियो को खरीदकर वही पकाकर खा लेते है। जंगल मे चिडियो को पकाकर खाये जाने के बहुत से ताजे निशान मिलते रहते है। बाइक सवार अपने साथ बीयर की बोतल लाते है पर वापस नही ले जाते है। बाइक सवारो की इस करतूत से सबसे बडी हानि उन पारम्परिक चिकित्सको को होती है जो नंगे पैर जंगलो मे चलते है। निश्चित ही काँच के टुकडे वन्य प्राणियो के लिये भी मुसीबत बनते होंगे।

बुजुर्ग किसान बरसात मे हो रही देरी के चलते आस-पास के मन्दिर के पुजारियो के पास आ जाते है। पुजारी राजधानी से खरीदे हुये पंचांग को बाँचते है और फिर बताते है कि इस दिन वर्षा का सम्भावना है। किसान उस दिन की बेसब्री से प्रतीक्षा करते है। फिर मायूस होकर पंचांग की अगली तारीख लेने चले जाते है। वे अपने खेतो का भी मुआयना करते है। विशेष वनस्पतियो पर उनकी नजर है। इसी से वे पूर्वानुमान लगा लेंगे कि इस बार मौसम कैसा रहने वाला है?

इन विपरीत परिस्थितियो को झेल रहे जंगल के आम लोगो के बीच कैमरा लिये घूमते हुये मन मे बडी टीस होती है। कष्टो का दस्तावेजीकरण मन को भारी कर देता है। (क्रमश:)


(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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Wednesday, June 17, 2009

परलोक वाहन की ठोकर और बिजली बरसात मे भटकता कुंज

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-13
- पंकज अवधिया
बारह जून, 2009

परलोक वाहन की ठोकर और बिजली बरसात मे भटकता कुंज


सामने घना जंगल था। काले बादल आसमान पर थे। बिजली चमक रही थी। राहगीर गाँवो मे रुक गये थे। तेज अन्धड चल रहा था। ऐसे मे बीच जंगल मे हमारी गाडी चली जा रही थी। कुछ देर मे शाखाए गिरने लगी। हमारी गति कम हो गयी। जंगल मे चलते-चलते हम कुल्लु का वृक्ष भी ढूँढते जा रहे थे। अचानक जंगल मे एक व्यक्ति की छाया दिखायी दी। ब्रेक लगाया और ची इ इ ई की आवाज के साथ गाडी रुक गयी। क्या तुमने भी वही देखा जो मैने देखा? मैने ड्रायवर से पूछा। वह बोला कि हाँ, पीछे जंगल मे एक आदमी तो दिखा है। गाडी पीछे ली तो वह साफ-साफ दिखने लगा। अचानक बिजली कडकी और माहौल डरावना लगने लगा। गाडी को देखकर वह आदमी पास आ गया। उसने सोचा कि हम रास्ता न भटक गये हो। खिडकी खोली तो उसने गाडी के अन्दर झाँका। “अरे, डाक्टर साहब, नमस्कार।“ मै चौक पडा। मैने पूछा, “कौन? मै पहचान नही पाया।“ “मै कुंज, विश्वनाथ जी का पोता।“ उसने कहा।

विश्वनाथ जी से तो मिलने मै जा रहा था। वे पारम्परिक चिकित्सक है और जंगल का चप्पा-चप्पा जानते है। मै उनके साथ काफी समय तक रहा भी पर मैने कभी कुंज को वहाँ नही देखा। दरअसल विश्वनाथ जी के रोगियो से तंग आकर उनके बेटे ने उन्हे बाहर का रास्ता दिखा दिया था। अपने परिवार से दूर वे लोगो का इलाज करते और फक्कडी का जीवन जीते।

“साहब, दादा आपके बारे मे बहुत बताते थे। आपकी खीची तस्वीरो का सेट उनके पास था। वे जाते-जाते मुझे दे गये है।“कुंज की इन बातो से मेरी तन्द्रा टूटी। कुंज ने बताया कि वह पिताजी से विद्रोह करके दादा के पास आ गया और बहुत सा ज्ञान प्राप्त कर लिया। अब दादा के रोगी उसी के पास आते है। श्री विश्वनाथ अब उडीसा के घने जंगलो मे किसी आश्रम मे रहते है। वे अब शायद ही लौटे। कुंज की बात सुनकर अब मुझे उसका खराब मौसम मे बाहर निकलना आश्चर्यजनक नही लग रहा था। मैने अपने लेखो मे पहले लिखा है कि आसमानी बिजली से झुलसे वृक्ष पारम्परिक चिकित्सा मे बहुत उपयोगी माने जाते है। बिजली गिरने के बाद जितनी जल्दी प्रभावित वृक्ष के पास पहुँचे उतनी ही कारगर औषधि मिलती है। कुंज के दादा इस तरह के अनोखे प्रयोगो मे दक्ष है। उनके जाने के बाद अब यह कुंज की जिम्मेदारी थी। बिजली से प्रभावित वृक्ष तक पहुँचने के लिये पारम्परिक चिकित्सक बहुत जोखिम उठाते है। इस जोखिम के बदले उन्हे ऐसी औषधि मिलती है जो साल भर मे अनगिनत लोगो को राहत पहुँचा पाती है।

“कुंज, गाज से डर नही लगता?” मैने पूछा। “उसने वृक्षो की ओर इशारा करते हुये कहा कि बजरंगबली साथ मे है तो किस बात का डर? मैने उसकी अंगुली की दिशा मे देखा तो बहुत से बन्दर दिखायी दिये। आम लोगो की यह धारणा है कि आसमानी बिजली से बन्दर बचे रहते है। वे वृक्ष बदलते रहते है। कुंज भी उनका अनुसरण कर रहा था। “और साहब, हम लोगो को मान्यता कब मिलेगी? दादा कहते थे कि डाक्टर साहब से सम्पर्क मे रहना तो वे एक दिन जरुर पारम्परिक चिकित्सा को मान्यता दिलायेंगे।“ कुंज ने मेरे पुराने जख्म को कुरेद दिया। जब से मैने पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान का दस्तावेजीकरण शुरु किया है उससे पहले से ही मै पारम्परिक चिकित्सको को कानूनी मान्यता दिलाने की शपथ लिये हुये हूँ। कानूनी मान्यता की आस मे न जाने कितने साथी बिछुड गये पर अभी भी मान्यता दूर की कौडी नजर आती है। हमारे देशवासी इस पारम्परिक ज्ञान का मूल्य नही जानते है। वे विश्वास को अन्ध-विश्वास कहते है। विदेशी इस ज्ञान के पीछे दीवाने है पर पारम्परिक चिकित्सक के पक्ष मे कोई भी खडा नही होना चाहता है।

कुंज से मुलाकात ने मुझे तरोताजा कर दिया। सुबह जब मै अपनी गाडी से शहर के अन्दर ही था तब एक बडा हादसा होते-होते बचा। मै गाडी चला रहा था। ड्रायवर बगल की सीट मे बैठा था। शहर के अन्दर भीडभाड वाले इलाके मे जैसे ही मैने एक आटो को ओवरटेक करना चाहा भडाक से आवाज आयी है और मेरी खिडकी से सटकर एक दस चक्के का ट्रक निकला। इतना सट के कि शीशे के परखच्चे उड गये। मैने गाडी अन्दर की ओर कर ली और ट्रक की चपेट मे आने से बच गया। सब कुछ पलक झपकते ही हो गया। हमारे देखते ही देखते डगमगाता हुआ ट्रक नजरो से ओझल हो गया। हम बच तो गये पर गाडी का दरवाजा अटक गया। खरोच के निशान आ गये। ड्रायवर बाहर निकला पर ट्रक का नम्बर नोट नही कर पाया। मैने गाडी किनारे की। गाडी की बाडी पर असर था। गाडी सलामत थी। मैने बिना घर मे फोन किये सफर जारी रखने का मन बनाया। बार-बार मन मे लोगो की चेतावनी ध्यान मे आ रही थी। “आप वैज्ञानिक हो, दस तरह की बाते मन मे चलती रहती है, आप तो ड्रायविंग नही किया करो।“ और जाने क्या-क्या। ड्रायवर ने गाडी चलाने का अनुरोध किया तो मैने मना कर दिया। हम आगे बढे।

कुछ दूर चलने पर देखा कि एक जगह पर भीड लगी है। उस ट्रक ने एक जीप को ठोकर मारी थी। कुछ दूर पर दो और गाडियो से टकराने के बाद वह गायब हो गया था। जीप वाले को अस्पताल ले जाया जा रहा था। हम सौभाग्यशाली रहे। रात को जब लौटे तो वही ट्रक एक पुलिस थाने मे खडा दिखा। वह पकडा गया था। लोगो ने उसकी पिटाई की थी और उस पर मामला दर्ज किया जा चुका था। उसे अपने किये की सजा मिल गयी थी। रेत की ट्रको पर खेप पूरी करने का दबाव रहता है। जितनी अधिक खेप, उतने अधिक पैसे। इसी लालच मे वे शहरी लोगो की जान के दुश्मन बन जाते है।

कुंज के प्रश्न का जवाब मेरे पास नही था। मैने वही घिसा पिटा जवाब देकर उसे संतुष्ट करने का प्रयास किया। उससे विदा लेकर हम आगे बढे। हमे एक और पारम्परिक चिकित्सक से मिलना था। मै उनसे दस-बारह साल बाद मिलने जा रहा था। एक वनग्राम मे पहुँचने के बाद हमे वहाँ की फिजा बदली-बदली लगी। पारम्परिक चिकित्सक के घर के आस-पास नये घर बन गये थे। गाँव का नक्शा बदल गया था। बरामदे मे घुसते ही उनकी हार लगी तस्वीर देखकर मन बैठ गया। उनका लडका पूजा कर रहा था। मै बरामदे मे बैठकर उसकी प्रतीक्षा करने लगा फिर पैदल ही गाँव की गलियो मे निकल गया। लोगो से चर्चा हुयी। उन्होने बताया कि पारम्परिक चिकित्सक के गुजरने के बाद से अब रोगी कम आते है। लडके ने पिताजी से ज्यादा कुछ सीखा नही।

इस बीच खबर आयी कि लडके की पूजा समाप्त हो गयी है। मै घर आ गया। लडके ने पहचान लिया और फिर मेरे मुंडाये हुये सिर को देखकर बोला कि ये कैसे? कैंसर हो गया है क्या? मैने मुस्कुराकर कहा कि नही भाई, बालो को विशेष उपचार के लिये साफ किया है। उससे बात चल निकली। मुझे यह जानकर बडा ही दुख हुआ कि लडके ने जंगल जाना छोड दिया है। अब वह दुकान से दवाए खरीदकर रोगियो को देता है। क्रोसीन और एनासीन से उसकी आलमारी भरी पडी थी। मैने जंगल से लायी साधारण जडी-बूटी उसे दिखायी तो उसने हाथ जोड लिये। वह नही पहचान पाया। वह अपने को पारम्परिक चिकित्सक कहता है पर उसकी चिकित्सा मे परम्परा का नामोनिशान नही है। उसके पिता शायद उसे करीब से जानते थे। यही कारण है कि वे पारम्परिक चिकित्सा के सारे राज अपने साथ ले गये। उन्होने रक्त सम्बन्धी रोगो का गूढ ज्ञान मुझे दिया था जो अब दस्तावेज के रुप मे मेरे पास उपलब्ध है। मैने लडके को ये दस्तावेज देने चाहे तो उसने लेने से इंकार कर दिया। यह सब कुछ बडा ही दुखदायी था।

वापस लौटते समय ड्रायवर गाडी चलाता रहा और मै जंगल मे पारम्परिक चिकित्सको के साथ बिताये दिनो की याद मे खोया रहा। (क्रमश:)


(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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बुढापे मे जवानी लाने वाला कठपीपल और चरवाहे का रतनजोतीय दर्द

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-12
- पंकज अवधिया
दस जून, 2009

बुढापे मे जवानी लाने वाला कठपीपल और चरवाहे का रतनजोतीय दर्द


देवस्थानो मे अक्सर पीपल और बरगद के वृक्ष होते है। “ये बरगद ही है ना?” मैने यह प्रश्न पूछा और बिना उत्तर की प्रतीक्षा किये ही उसकी तस्वीर लेने लगा। “नही ये बरगद नही, कठपीपल है।“ मै चौक पडा। कठपीपल मेरे लिये सुना हुआ नाम था पर मैने इसे देखा नही था। मैने कैमरे से नजरे हटाकर उस वृक्ष को ध्यान से देखा तो वह बरगद की तरह ही दिखा। पास से पत्तियो को देखा तो वे बरगद से हटकर लगी पर पीपल की तरह तो बिल्कुल नही थी। “कठपीपल?”। आश्चर्य के साथ मै खुश भी हो रहा था। जिस वृक्ष के बारे मे मैने पारम्परिक चिकित्सको से सुनकर सैकडो पन्ने लिखे थे वह आज सामने था। अब वह वृक्ष मुझे किसी देवता के समान लगने लगा था।

“यहाँ केवल दो कठपीपल है। एक आपके सामने और दूसरा वो रहा। ये आस-पास कही नही है। यह तो इस देवस्थान का प्रताप है जो यहाँ इसने आसन ग्रहण किया है।“ स्थानीय लोगो ने बताया। दूसरे कठपीपल को देखा तो उसकी विशालता देख आँखे चौडी हो गयी। उस पुराने वृक्ष को चबूतरे से घेर दिया गया था। मन्नत माँगने के लिये लोगो ने नारियल बाँध रखे थे। हर साल इसी के साये मे मेला लगता है। मुझे लगा कि मेरे जंगल आने का उद्देश्य पूरा हो गया। स्थानीय लोगो के अनुसार इस कठपीपल की महिमा अपरम्पार है। आमतौर पर लोग इसे बरगद मान बैठते है। कोई पूछता नही तो कोई बताता भी नही। पर जानकार पारम्परिक चिकित्सक इसकी बडी सेवा करते है और विशेष तिथियो मे इसके पौध भागो को एकत्र करके अपने पास जतन से रख लेते है। नाना प्रकार के वात की चिकित्सा करने वाले पारम्परिक चिकित्सक अपने पास लकडी से बना एक बेलन रखते है। औषधीय तेलो से मालिश के बाद इस बेलन को प्रभावित भागो मे चलाया जाता है। इसमे पारम्परिक चिकित्सक की कुशलता तो रहती ही है साथ ही बेलन जिस लकडी से बना होता है उसकी भी विशेष भूमिका होती है। आमतौर पर पुराने महुआ और तेन्दु के वृक्ष के भीतरी भाग से इसे बनाया जाता है। लकडी का बेलन कई प्रकार के असाध्य रोगो की चिकित्सा मे भी प्रयोग किये जाते है। जैसे मौत से जूझते कैंसर के मरीज की चिकित्सा के दौरान आराम के पलो मे बेलन पूरे शरीर मे फिराया जाता है। कठपीपल से बना बेलन इसी कार्य के लिये प्रयोग होता है। आमतौर पर सोलह किस्म के बेलन पारम्परिक चिकित्सक उपयोग करते है पर हमेशा शुरुआत कठपीपल के बेलन से होती है। मैने कठपीपल के बेलन देखे थे और उनके प्रयोग भी पर कठपीपल के वृक्ष को पहली बार देखा।

आपसे बातचीत मे मै भले ही गम्भीर लगूँ पर मुझे जंगल मे एक अबोध बच्चे की तरह जाना होता है। हर जानी-अनजानी चीजो पर अबोध बच्चे की सी प्रतिक्रिया करनी होती है। यदि मै अपने आप को विशेषज्ञ मान बैठता और देवस्थान के बरगद के बारे मे स्थानीय लोगो से नही पूछता तो मेरी हेकडी बनी रहती पर अमूल्य ज्ञान प्राप्त नही कर पाता। इस जंगल यात्रा की सुबह का ही किस्सा ले।

सफर के दौरान हमने बडे बाँध से आ रही सिचाई नहरो को देखा। उसमे रतनजोत लगा हुआ था अंतहीन कतारो मे। बस फिर क्या था गाडी नहर के किनारे पर ले ली। मुख्य मार्ग छोड दिया। तस्वीरो का दौर शुरु हो गया। रतनजोत पर ढेरो कीडे मिले, यह दिखा कि कैसे इसका रोपण स्थानीय वनस्पतियो को नुकसान पहुँचा रहा था, कैसी मिट्टी मे यह अच्छे से उग रहा था और कैसी मे इसकी बढत प्रभावित हो रही थी। अचानक हमे एक बकरी चराने वाला मिला। नहर के किनारे जहाँ मोटरसाइकिल चलती थी, वहाँ हमारी चार पहिया को देखकर वह ठिठका। ड्रायवर ने मेरा परिचय देना चाहा पर मैने उसे मना किया। मैने ऐसे ही पूछा, “ये कौन सा पौधा है? हम लोग व्यापारी है, मुख्य मार्ग से जा रहे थे, इस पौधे को देखकर इधर आ गये।“ अब चरवाहे ने रतनजोत के बारे मे बताना शुरु किया। कुछ देर के बाद वह खीझ कर बोला कि अब मुझे जाना है। उसकी खीझ का कारण जानना चाहा तो उसने खुलासा किया कि पहले नहर के किनारे घास और दूसरे खरप्तवार उग जाते थे। इससे उंनके जानवरो को चारा मिल जाता था। उसके साथी चरवाहे यही आते थे पर जब से रतनजोत लगा है, इसकी सघन आबादी के कारण दूसरी वनस्पति उगती नही है। अब हमे आधे दिन की दूरी पार करनी होती है तब ढंग का चारा मिलता है। चरवाहे का दर्द सुनकर मुझसे रहा नही गया। मैने उसकी बातो की फिल्म तैयार कर ली। चरवाहे का दर्द बयाँ करता था कि कैसे वातानुकूलित कमरो मे बनायी गयी योजनाओ मे आम आदमी का ध्यान नही रखा जाता है?

जंगल से वापस लौटकर जब मैने ई-मेल चेक किया तो मुझे आस्ट्रेलिया से एक वैज्ञानिक मित्र का सन्देश मिला। वे वहाँ रतनजोत का विरोध कर रहे है। उन्हे दूसरे ही दिन एक सरकारी बैठक मे भाग लेकर रतनजोत के दुष्प्रभावो के बारे मे बताना था। इस बैठक मे बडी संख्या मे रतनजोत समर्थक आने वाले थे। उनकी तैयारी जोरदार थी। वैज्ञानिको ने मेरे शोध लेखो और तस्वीरो को पहले ही अपनी प्रस्तुति मे शामिल कर लिया था। वैज्ञानिक मित्र कुछ और शोध सामग्री चाहते थे। मैने उन्हे चरवाहे की समस्या वाली फिल्म अंग्रेजी सब टाइटिल के साथ भेज दी। दूसरे दिन व्याख्यान के बाद उस वैज्ञानिक मित्र ने यह फिल्म दिखायी तो लोगो ने गहरी रुचि दिखायी। स्थानीय वनस्पतियो की रक्षा के लिये वहाँ कठोर से कठोर कदम उठाये जाते है। रतनजोत भारत की तरह उनके लिये भी विदेशी पौधा है जिसे वे बरदाश्त नही करने वाले। वैज्ञानिक मित्र ने मुझे बताया कि इस फिल्म ने जंग जीतने मे मदद की।

मैने यह फिल्म एक स्थानीय योजनाकार को भी दी थी पर उन्होने इसे किनारे पटकते हुये कहा कि सब बकवास है। रतनजोत से क्रांति हो रही है। देश भर के अखबारो को देखो, कहाँ चरवाहे की बात सुनते हो।

चलिये अब कठपीपल पर वापस आये। शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढाने के लिये पारम्परिक चिकित्सक 36 से अधिक प्रकार के जंगली फलो को मिलाकर एक मिश्रण तैयार करते है। इस मिश्रण को लम्बे समय तक दिया जाता है। इसमे कठपीपल के फल अहम भूमिका निभाते है। पारम्परिक चिकित्सक यह दावा करते है कि ऐसे मिश्रणो का सही प्रयोग सालो तक रोगो से रक्षा कर सकता है। रोगो का कम आक्रमण यानि शरीर को कम क्षति। शरीर को कम क्षति यानि बुढापे मे भी उसी दक्षता से काम किया जा सकता है जैसे जवानी मे किया जाता है।

उस क्षेत्र विशेष मे कठपीपल के प्रति भक्ति देखकर लगा कि वहाँ इसे कोई खतरा नही है।पर मुझे दूसरे क्षेत्रो के पारम्परिक चिकित्सको की बात याद आ रही है। उन्होने कठपीपल की घटती संख्या पर सदा ही चिंता दिखायी है। मैने कठपीपल की ढेरो तस्वीरे रख ली है। इनके आधार पर मै विभिन्न जंगलो मे इनकी उपस्थिति का पता लगाता रहूंगा और इन पर नजर रखने की कोशिश करता रहूंगा। (क्रमश:)

कठपीपल का विशाल वृक्ष

रतनजोत से साये मे चरवाहा

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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Tuesday, June 16, 2009

एंटी-एजिंग गुणो वाली खपरा भाजी और भिम्भौरा की मिट्टी

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-11
- पंकज अवधिया
दस जून, 2009

एंटी-एजिंग गुणो वाली खपरा भाजी और भिम्भौरा की मिट्टी


“रोक लो, रोक लो। एक और भिम्भौरा। यही रुको मै अन्दर जाकर तस्वीर लेकर आता हूँ।“जब भी मै भिम्भौरा या दीमक की बाम्बी के पास ऐसे गाडी रुकवाता हूँ तो मेरे साथ चल रहे लोग खीझ उठते है। “कैसा वैज्ञानिक है? जब देखो तक भिम्भौरा की ही तस्वीरे लेता रहता है। अभी-अभी तो दस तस्वीरे ली थी। अब फिर गाडी रुकवा रहा है।“ ऐसी जाने क्या-क्या बाते उनके मन मे चलती रहती है। पर मेरा तस्वीरे लेना कम नही होता है। भिम्भौरा चाहे बडे हो या छोटे अपने आप मे काफी जानकारियाँ समेटे हुये होते है।

भिम्भौरा यदि छोटा हो तो गाडी मे बैठे-बैठे ही पता लग जाता है कि आस-पास रेतीली मिट्टी है। क्योकि रेत के महल बडे नही होते है। यदि भिम्भौरा बहुत ऊँचा होता है तो उस जगह बरसात मे चलने की हम सोच भी नही सकते है। कोशिश रहती है कि कैसे भी पानी गिरने से पहले उस स्थान से गाडी बाहर आ जाये। एक बार ऐसे स्थानो मे गाडी फँसी नही कि लेने के देने पड जाते है। जितना गाडी को बाहर निकालो उतनी और फँसती जाती है। भिम्भौरा को भूमिगत जल का सूचक भी माना जाता है। आधुनिक शोध इस बात की पुष्टि करते है कि जहाँ पुराना भिम्भौरा होता है वहाँ भूमिगत जल होता ही है। भिम्भौरा दीमक का घर होता है। जंगलो मे टूटे हुये भिम्भौरा अक्सर दिख जाते है। इससे हम इस बात का अनुमान लगा लेते है कि यहाँ भालूओ का आना-जाना है। भिम्भौरा की तोड-फोड भोजन की तलाश मे भालू करते है। आमतौर पर भिम्भौरा से लोग दूर ही रहते है। यह माना जाता है कि यहाँ विषैले साँप रहते है। यह बात गलत भी नही है। मुझे तस्वीरे लेता देखकर अक्सर स्थानीय लोग दूरी बनाये रखने की सलाह देते है।

शहरो मे जब दीमक का प्रकोप बढ जाता है तो विशेषज्ञ भिम्भौरा खोजते है। भिम्भौरा मे दीमक की रानी होती है जो बडी संख्या मे बच्चे देती रहती है। घरो के अन्दर आप दीमको पर जितना भी अंकुश लगा ले जब तक भिम्भौरा रहेगा और रानी जिन्दा रहेगी, समस्या का हल नही निकलेगा। पेस्ट कंट्रोल वाले दीमको को तो मारते है पर कभी भी रानी को नही मारते है। इससे साल दर साल उन्हे दीमक मारने का ठेका मिलता रहता है। शहरी इलाको मे दीमक के समूल नाश के लिये रानी को खत्म किया जाता है। इसके लिये बडे भिम्भौरा की तलाश की जाती है। फिर उसके सभी प्रवेश मार्गो को बन्द करके उसमे फास्फीन गैस छोडी जाती है। इससे हजारो की संख्या मे दीमक और उनकी रानी का नाश हो जाता है। भिम्भौरा के अन्दर रहने वाले साँप भी मर जाते है।

मैने इस जंगल यात्रा मे बहुत से ऊँचे भिम्भौरा देखे। मैने उनकी तस्वीरे तो ली ही साथ ही उनकी मिट्टी भी एकत्र कर ली। पारम्परिक चिकित्सा मे भिम्भौरा की मिट्टी का विशेष महत्व है। इसका प्रयोग बाहरी और आँतरिक तौर पर औषधि के रुप मे होता है। भले ही सारे भिम्भौरा एक जैसे दिखे पर पारम्परिक चिकित्सक भिम्भौरो को सौ से अधिक प्रकारो मे बाँटते है। साधारण जुकाम से लेकर कैंसर जैसे जटिल रोग की चिकित्सा मे नाना प्रकार के भिम्भौरा से एकत्र की गयी मिट्टी के प्रयोग से रोगियो की जान बचायी जाती है। मैने अभी तक देश भर मे नाना प्रकार के भिम्भौरा की दस हजार से अधिक तस्वीरे खीची है। सबकी अपनी कहानी है। विशेष वनस्पतियो के पास बने ऊँचे भिम्भौरा से मिट्टी एकत्र करके पारम्परिक चिकित्सक उसे उन पारम्परिक मिश्रणो मे मिलाते है जो कि जटिल होते है। जटिल यानि जिनमे दो सौ से ज्यादा वनस्पतियो का प्रयोग किया जाता है। ऐसे मिश्रण भिम्भौरा की मिट्टी के बिना अधूरे माने जाते है। मुझे याद आता है कि उत्तरी छत्तीसगढ के पारम्परिक चिकित्सको ने कुछ वर्षो पहले इस तरह के भिम्भौरा का जिक्र करते हुये कहा था कि जब भी अवसर मिले मै उनके लिये यह विशेष मिट्टी लेकर आऊँ। उन्होने एक मंत्र भी दिया था। भिम्भौरा के सामने खडे होकर पहले इसे पढना था फिर हाथ जोडकर भिम्भौरा को प्रणाम करना था। उसके बाद ही लकडी से मिट्टी खोदना था।

मैने बतायी गयी विधि अपनायी। मुझे मंत्र दोहराता देखकर तिहारु ने मजाक मे कहा कि आप भी बैगाई जानते है क्या साहब? मंत्र पर मेरा विश्वास कुछ कम है पर यदि मै सही विधि नही अपनाऊँगा तो पारम्परिक चिकित्सक मुझसे यह उपहार स्वीकार नही करेंगे। मैने मिट्टी एकत्र की और उसे लाल कपडे मे रख लिया। अब जल्दी ही मै उत्तरी छत्तीसगढ के पारम्परिक चिकित्सको से मिलने की कोशिश करुंगा।

तिहारु ने भिम्भौरा मे मेरी रुचि देखकर बताया कि इन पर बहुत सी वनस्पतियाँ उगती है। इस ऊँचे भिम्भौरा से एकत्र की गयी खपरा भाजी का प्रयोग इस क्षेत्र के पारम्परिक चिकित्सक रोगियो की जीवनी शक्ति बढाने के लिये करते है। खपरा भाजी से मुझे बस्तर के पारम्परिक चिकित्सको की याद आ गयी। प्रसव के बाद कम जीवनी शक्ति वाली महिला को वे इसी खपरा भाजी को खाने की सलाह देते है। साथ मे हल्दी युक्त औषधीय चावल भी दिया जाता है। भिम्भौरा से एकत्र की गयी मिट्टी मे वनस्पतियाँ मिलाकर सरसो तेल के साथ लेप बनाया जाता है। फिर इस लेप को महिला के तलवो पर खूब देर तक मला जाता है। खपरा भाजी से मुझे उत्तरी छत्तीसगढ के पारम्परिक चिकित्सक भी याद आते है जो इस भाजी के साथ दूसरी वनस्पतियो को पानी मे उबालकर भाप को ज्वर के कारण पीडा सह रहे रोगी की ओर छोडते है। फिर ज्वर उतर जाने के बाद भिम्भौरा की मिट्टी को मल-मल कर स्नान करने की सलाह देते है। तिहारु की बातो से तो सारा का सारा “खपरा-पुराण” याद आ गया।

अपनी एंटी-एजिंग प्रापर्टी के कारण खपरा भाजी पर देश-विदेश मे बहुत अनुसन्धान हुये है पर ज्यादातर शोधकर्ताओ ने व्यापारियो से खपरा भाजी खरीदी और प्रयोग किये। यदि वे स्वयम जंगल मे जाते और पारम्परिक विधियो के अनुसार इसे एकत्र करते तो वे सही मायने मे इसके दिव्य औषधीय गुणो को जान पाते। (क्रमश:)

भिम्भौरा

ग्रामीण जिसने भिम्भौरा की मिट्टी एकत्र करने मे मदद की

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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Monday, June 15, 2009

नया मोबाइली संवाद, सेन्हा और कुल्लु से आलिंगन

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-10
- पंकज अवधिया
दस जून, 2009

नया मोबाइली संवाद, सेन्हा और कुल्लु से आलिंगन


राजधानी से घंटो का सफर करके हम जंगल पहुँचे तो भूख लग गयी। एक उम्र थी जब कुछ भी खाये, न खाये सब चल जाता था पर अब दो समय का खाना जरुरी लगता है। अब जंगल भ्रमण काम के लिये होता है मौज-मस्ती के लिये नही, इसलिये जंगल पहुँचकर खाना बनाना और फिर मजे से खाना नितांत असम्भव लगता है। अल सुबह जब घर से निकलते है तो शहर के होटल खुले नही होते है। आस-पास के कस्बो मे गरम जलेबी और आलू-पोहा के साथ चाय मिल जाती है। इसी के सहारे पहले दिन गुजार लेते थे। जंगलो मे स्थित सुदूर गाँवो मे जलपान गृह मुश्किल से मिलते है। वहाँ सुबह वाला नाश्ता होता है जिसे दिन भर या दूसरे दिन तक बेचा जाता है। इस नाश्ते का भी अपना मजा है पर अब यह पचता नही है। इसलिये आजकल घर से दाल-भात लेकर निकलते है। अपने लिये भी और ड्रायवर के लिये भी। खाने की हडबडी रहती है क्योकि हम ज्यादा से ज्यादा समय जंगल मे घूमना चाहते है। जैसे ही रात हुयी कैमरे का काम खत्म हो जाता है। इस बार की जंगल यात्रा मे ऐसे ही एक अनजान वन ग्राम मे हम रुक गये। छोटा सा होटल था जिसे ग्राहको की उम्मीद नही थी। छोटी गाडी मे दो शहरियो को देखकर उन्हे अटपटा लगा।

मैने पूछा कि क्या हम यहाँ खाना खा सकते है? आपके यहाँ चाय पी लेंगे। होटल वाला तैयार हो गया। हमे नमक और प्याज मिल गया। बातो ही बातो मे मैने होटल वाले से अनुरोध किया कि कोई स्थानीय आदमी दिलवा दो तो हम आस-पास के जंगल घूम आयेंगे। होटल वाले ने हमे बडे ही अटपटे ढंग से घूरा। फिर अपने दोस्तो के साथ बातचीत मे मशगूल हो गया। कुछ देर बाद मैने फिर से अपनी बात दोहरायी। होटल वाले ने इसे अनसुना कर दिया। मोबाइल पर वे सब गाना सुन रहे थे। अपनी ही दुनिया मे मगन दिखते थे। हमे तो जंगल घूमना था। अकेले नही जाना चाहते थे। किसी को तो ले जाना ही था। यदि दिन भर का मेहनताना देना होता तो भी। पता नही मुझे क्या सूझी मैने अपना एन 73 मोबाइल निकाला और वही गाना बजा दिया जो उन लोगो के मोबाइल मे बज रहा था। गाना फिल्म कयामत से कयामत तक का था, गजब का है दिन, देखो जरा। अब एन 73 मे जबरदस्त आवाज आती है। अचानक ही वे सब पास आ गये और मोबाइली गाना सुनने लगे। कुछ पलो मे माहौल बदल गया और उनमे से एक व्यक्ति जिसका नाम तिहारु था, साथ चलने के लिये तैयार हो गया। उसकी शर्त यही थी कि जंगल भ्रमण के दौरान मोबाइल मे गाना ऐसे ही बजते रहना चाहिये। संवाद स्थापित करने के इस नये ढंग ने मुझे आश्चर्य मे डाल दिया।

“ये सेन्हा है, साहब। इसका कोई भाग उपयोग मे नही आता।“भरी गर्मी मे नयी पत्तियो से युक्त सेन्हा के पौधो और बडे पेडो की ओर इशारा करते हुये तिहारु ने कहा। तिहारु के ये शब्द कि इसका कोई भाग उपयोग मे नही आता, मेरे लिये सुकून भरे थे। इसका साफ मतलब था कि सेन्हा को हमारी आने वाली पीढी भी देख पायेगी। कोई उपयोग नही होने के कारण यह मानव आबादी के बढते दबाव से बचा रहेगा जबकि थोडी भी उपयोगी प्रजातियो को आज की पीढी बिना किसी दया के निपटा देगी। सेन्हा के फल बडे आकर्षक होते है। पर व्यापारी इसे एकत्र नही करवाते है। अक्सर वे इन फलो को मेरे पास भेजकर कहते जरुर है कि इसका कोई उपयोग बताइये। ये जंगल मे बहुत है। कोई नया उपयोग बतायेंगे तो जितनी मात्रा मे बोलेंगे हम एकत्र करवा देंगे। मैने सेन्हा के औषधीय गुणो पर काफी जानकारियाँ एकत्र की है। पारम्परिक चिकित्सक इसके पौध भागो का प्रयोग नाना प्रकार के रोगो की चिकित्सा मे करते है। पर मेरी तरह वे भी डरते है कि इसके उपयोग सार्वजनिक होने पर इसके लिये मारामारी मच जायेगी। मेरे लिये यह बडी दुविधा वाली स्थिति है। ज्ञान यदि नये शोधो के लिये उपलब्ध न कराया जाये तो इसका प्रसार नही हो पायेगा। यदि उपलब्ध कराया तो इसके सार्वजनिक होने मे देर नही लगेगी। सार्वजनिक होते ही यह प्रजाति खतरे मे पड जायेगी। भले ही यह ब्लाग और यह लेखमाला हिन्दी मे है पर स्टैट काउंटर के आँकडे बताते है कि दुनिया भर की जानी-मानी दवा कम्पनियो से लोग इस पर नजर गडाये है। वे एक नही पाँच नही, सत्रह घंटो तक इस ब्लाग पर टिके रहते है। फिर भारतीय शोध संस्थानो के माध्यम से शोध के नाम पर जानकरियाँ माँगते है। हाल ही मे “अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग” नामक लेखमाला मे कैंसर की जडी-बूटी पर लिखे गये लेख की प्रति लेकर कुछ विदेशी पर्यटक उस लेख मे वर्णित स्थान की तलाश करते पाये गये है। इतनी जल्दी यह सब होगा इसकी मुझे उम्मीद नही थी। एक ओर तो मुझे अपने अनुभव आप सब से बाँटने मे आनन्द आता है वही दूसरी ओर गिद्ध नजरो से डर भी लगता है। यही कारण है कि मूल लेखो से स्थान और विशेषज्ञो की पहचान हटाकर सम्पादित लेखो को यहाँ प्रस्तुत करता हूँ।

तिहारु से मिलते ही मुझे कुल्लु के पेड की याद आयी। वह इसे इस नाम से नही जनता था पर जब मैने उसकी तस्वीर दिखायी तो उसने झट से कहा कि पास की पहाडी मे एक-दो पेड है। उसने भी वही बात दोहरायी कि उसके देखते ही देखते यह आस-पास के जंगलो से साफ हो गया। पता नही कब ये बचे हुये एक-दो पेड भी कट जाये। हमने पहले उसी ओर का रुख किया। पथरीली जमीन मे ही कुल्लु मिलता है यह आप पहले पढ चुके है। इस बार भी हमे वह ऐसी ही परिस्थितियो मे मिला। कान्हा मे जब हमने इसे देखा तो इसमे फल लगे थे। जब चार जून की यात्रा वाले स्थान पर इसे द&#