Friday, July 24, 2009

“रेगिस्तानी जहाज” के कहर से सफाचट होती औषधीय वनस्पतियाँ और वन्य जीव

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-57
- पंकज अवधिया

“रेगिस्तानी जहाज” के कहर से सफाचट होती औषधीय वनस्पतियाँ और वन्य जीव


“न जाने जंगल को किसकी नजर लग गयी है, छोटी वनस्पतियाँ खोजे नही मिलती है। हम जंगल मे काफी भीतर तक चले जाते है फिर भी उपयोगी वनस्पतियो का नामोनिशान नही मिलता है। साहब, क्या कोई कीडा देखा है आपने जो जंगल के जंगल साफ कर दे?” पिछली बहुत सी जंगल यात्राओ के दौरान पारमरिक चिकित्सको की ऐसी बाते मुझे सुनने को मिल रही थी। मै उनके साथ जंगल मे अन्दर तक गया भी पर कारण का पता नही लगा। इस बार की जंगल यात्रा के दौरान मेरा सारा ध्यान औषधीय कुकुरमुत्तो पर था। हमने गाडी से एक घाटी पर चढाई की और जल्दी ही चोटी पर आ पहुँचे। अचानक ही सडक के किनारे जंगल के थोडा भीतर एक अजीब सा व्यक्ति दिखायी दिया। वह वेशभूषा और चेहरे-मोहरे से छत्तीसगढ का नही लग रहा था।

मैने सुना था कि पहाडी के इस भाग मे वन्य पशु बहुलता से है। हम गाडी से उतरना पसन्द नही करते है जहाँ, वहाँ वह व्यक्ति आराम से खडा था। मैने गाडी पीछे करने का मन बनाया। गाडी को पीछे करने पर वह व्यक्ति घने जंगल मे घुसने लगा। तब तक साथ चल रहे पारम्परिक चिकित्सक उतर कर उसके पास तक पहुँच चुके थे।

मैने पास से उसे देखा तो वेशभूषा से ही पहचान गया कि ये राजस्थान से आये है। पारम्परिक चिकित्सको ने भी झट से पहचान की कि ये भेड-बकरी वाले है जो जंगल मे घूम-घूम कर साल भर अपनी भेड-बकरियो को चराते है। पहले वे हर साल छत्तीसगढ आते थे पर अब स्थायी तौर पर रहने लगे है। मैने उस व्यक्ति से डरकर भागने का कारण पूछा तो उसने कहा कि वन अधिकारी समझ कर वह भाग रहा था। मैने गाडी मे रखे पेडे उसे दिये। अब रुक ही गये थे तो मैने आस-पास की तस्वीरे लेनी आरम्भ की। वह व्यक्ति हमे संश्य से देखता रहा। अचानक कुछ दूरी पर हलचल नजर आयी। हम उस ओर बढ चले।

कुछ दूर ही गये थे कि हमारे सामने एक नही बल्कि नौ “रेगिस्तानी जहाज” थे। इस जंगल मे ये ऊँट क्या कर रहे है? मेरे मन मे कई प्रश्न उमडने लगे। मैने कैमरा निकाला और उनकी फिल्म बनाने लगा। ध्यान से देखा तो पता चला कि ये ऊँट सलिहा के एक बडे वृक्ष की पत्तियाँ खा रहे थे। उनके खाने की रफ्तार गजब की थी। इतने सारे ऊँटो का दबाव सहते-सहते वृक्ष एक ओर झुकता जा रहा था। फिर अचानक जोर की आवाज के साथ गिर गया। मन आक्रोश से भर गया। छत्तीसगढ मे जिन वृक्षो की संख्या पिछले एक दशक मे कम हुयी है उनमे सलिहा शीर्ष वृक्षो मे है। ग्रामीण तो इसे नुकसान पहुँचा ही रहे है। रही-सही कसर ये ऊँट पूरी कर रहे थे। मैने फिल्माँकन जारी रखा। सलिहा को गिराने के बाद ऊँट आगे बढे और कोरिया नामक औषधीय वनस्पति को खाने लगे। कुछ ही समय मे पूरी वनस्पति चट कर गये। ऊँट के इतने पेटू होने की बात मैने सुनी थी पर देखी नही थी। हम फिर उस व्यक्ति के पास लौटे।

“आप कहाँ से आये है?” मैने पूछा। “आप समझ लो कि गुजरात-राजस्थान से आये है। कुछ गुजरात के है और कुछ राजस्थान के।“उस ने कहा। जब हमने पूछा कि कौन-कौन सी वनस्पतियाँ इसे पसन्द है तो उसने कहा कि जंगल मे लगभग सब कुछ ये खा जाते है पर सलिहा, बेर और कोरिया विशेष रुप से पसन्द है। छत्तीसगढ और राजस्थान की वनीय वनस्पतियो मे जमीन-आसमान का फर्क है। यहाँ आकर ऊँटो का खान-पान बदल गया है। वे अब ज्यादा पेटू हो गये है। ऊँट यहाँ के जंगलो के लिये नही बने है और यहाँ के जंगल ऊँटो के लिये। जंगल बडा ही असहज महसूस कर रहा है। उसकी सभी जीवो के लिये जिम्मीदारियाँ है। वह इन्हे पूरी नही कर पा रहा है।

मैने अपने लेखो मे पहले जंगली हाथियो के विषय मे लिखा है। वे विशाल वृक्षो को धराशायी कर देते है। शहरियो को लगता है कि इससे जंगल नष्ट हो रहे है पर वास्तव मे हाथी इसी जंगल के लिये बने है और जंगल हाथियो के लिये। गिरे हुये वृक्ष पर असंख्य छोटे जीव आश्रित रहते है। माँ प्रकृति ने ही ऐसी व्यवस्था की है कि हाथी वृक्षो को गिराये और छोटे जीवो तक उसे पहुँचाये। ऐसी अवस्था ऊँट के लिये नही है।

उस व्यक्ति को साथ लेकर हम उसके डेरे की ओर बढे। पास पहुँचने पर हमने भेड-बकरियो का एक बडा समूह देखा जो बडी निर्दयता से जंगल की छोटी वनस्पतियो को खा रहा था। पारम्परिक चिकित्सक उस ओर भागे यह जानने के लिये ये झुंड किसे खा रहा है और किसे छोड रहा है? मैने कैमरा झूम किया तो यह झुंड सब कुछ सफाचट करने वाला दिखायी दिया। अब साफ हो गया था कि जंगल से जडी-बूटियो को कौन साफ कर रहा था? पर अभी तो और भी बुरी खबरे सुननी बाकी थी।

मैने उस व्यक्ति से पूछा कि वन्य जीवो के आने पर क्या आप वृक्ष पर चढ जाते है तो उसने कहा कि मै तो चढ जाऊँ पर परिवार की महिलाए और बच्चे क्या करेंगे? अरे, साहब, यहाँ तो एक भी जंगली जानवर नही है। मुझे उस व्यक्ति की बात पर विश्वास नही हुआ क्योकि इस जंगल से रात को गुजरते हुये मैने दसो बार जंगली जानवरो को देखा था। तेन्दुए बहुत अधिक संख्या मे है यहाँ। बाद मे जब हम उसके परिवार की तस्वीरे लेने लगे और वह व्यक्ति दूर चला गया तो मैने फिर से वही प्रश्न किया। परिवार की महिलाओ ने बताया कि हमारे पास बडी संख्या मे खूँखार कुत्ते है जो जंगली जानवरो को खदेड देते है। छोटे जानवरो को तो मार भी देते है। एक बुजुर्ग महिला ने कहा कि मर्दो ने तो तेन्दुए को भी “निपटाया” है, भेड-बकरियाँ तेन्दुए की आसान शिकार जो है।

हम जैव-विविधता के लिये अभिशाप बने इस खतरे को आँखो के सामने देख रहे थे। गाँव की पंचायत को कुछ पैसे देकर खुलेआम बिना निगरानी के चरायी हो रही है। न केवल वनस्पतियाँ बल्कि वन्य-जीवो का भी स्थायी नुकसान हो रहा है। किसी को इसकी सुध नही है। उस व्यक्ति ने जब हमसे दूर भागने की कोशिश की थी तभी लग गया था कि कुछ गडबड है। बाद मे उस व्यक्ति ने जानकारी दी कि पूरे राज्य मे उसके जैसे दसो दल है जो जंगल मे चरायी करवा रहे है।

“आजकल इस जलाश्य मे हिरण नही दिखते है?” वापस लौटते हुये मैने एक ग्रामीण से पूछा तो उसने बिना देर के कहा कि हिरणो की घास तो भेड-बकरियाँ चट कर रहे है। अब हिरण नही है तो उन पर आश्रित रहने वाले माँसाहारी जीव या तो पास के गाँवो की ओर बढ रहे है या बेमौत मर रहे है। मैने जब इस बारे मे तस्वीरे और समाचार अपने मित्रो को दिखाया तो वे बोले कि यह खोजी पत्रकारिता कहलाती है। आप तो वैज्ञानिक है आपको यह काम शोभा नही देता है। आप इसे किसी स्थानीय अखबार को दे दे वह अपने गणित के आधार पर निर्णय कर लेगा कि इसे छापना है या नही।

नया राज्य बनाने के बाद छत्तीसगढ को जो अभिशाप भोगने पड रहे है उनमे से एक जैव-सम्पदा को खतरा भी है। आपने ऐसी किसी जानकारी के विषय मे आवाज उठायी नही कि इस पर राजनीति होने लगती है। सत्तापक्ष पर विपक्ष पिल पडता है और सत्तापक्ष न चाहकर भी इसे अपनी इज्जत की लडाई मानकर इस पर लीपा-पोती करने लगता है। समस्या जस की तस रहती है। जैव-सम्पदा की रक्षा की जिम्मेदारी दलगत राजनीति से उठकर है। पता नही कब हमारे राजनेता की समझ मे यह छोटी-सी बात आयेगी? (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

© सर्वाधिकार सुरक्षित

जैव-विविधता के गढ देवस्थल, अंकोल, झगडहीन, डाफर कान्दा और पारम्परिक चिकित्सक

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-56
- पंकज अवधिया

जैव-विविधता के गढ देवस्थल, अंकोल, झगडहीन, डाफर कान्दा और पारम्परिक चिकित्सक


हम सपाट मैदानी क्षेत्र मे लगातार चले जा रहे थे। चारो धान के खेत थे। जंगल का नामोनिशान नही था। धान के खेत मे किसान बडी संख्या मे अपने कार्यो मे लगे हुये थे। अचानक हमे एक स्थान पर घने वृक्षो का समूह दिखायी दिया। साथ चल रहे लोगो ने कयास लगाया कि शायद कोई बडा तालाब होगा। पर जब उस स्थान तक पहुँचे तो पता चला कि वह पास के गाँव के पवित्र स्थल है जहाँ ग्राम देवता विराजते है। उस स्थान मे वृक्ष इतने अधिक घने थे कि हमे दिन मे अन्दर जाने के लिये टार्च का सहारा लेना पडा। इस बीच हमारी ग़ाडी देख पास के खेतो से कुछ किसान आ गये और उस स्थान की महिमा बताने लगे।

उह्नोने बताया कि यह स्थान पहले घने जंगल मे हुआ करता था। साल मे एक बार गाँव के बैगा के साथ लोग बडा जोखिम उठाकर यहाँ आया करते थे। आज तो जंगल पूरी तरह से साफ हो चुके है। केवल यही स्थान बचा है। इस स्थान से वृक्ष की कटाई प्रतिबन्धित है। पर जैसा कि आप जानते है कि प्रतिबन्ध इसे तोडने वालो को अक्सर उकसाता है। यहाँ भी ऐसा ही हुआ पर वृक्षो को काटने वाले शीघ्र ही अनजान रोगो से मारे गये। यह बात जंगल मे आग की तरह फैल गयी। उसके बाद से यहाँ के वृक्ष जस के तस है। उनके बीज यहाँ गिरते रहते है और नये पौधे तैयार होते रहते है। अब गाँव वाले साल मे कई बार यहाँ पूजा के लिये आते है। वैज्ञानिक भाषा मे ऐसे स्थानो को “सेकरेड ग्रुव” कहा जाता है। ऐसे स्थान वनस्पतियो के संरक्षण और संवर्धन की दिशा मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है।

कुछ समय मे ही हमने इस स्थान मे पचपन से अधिक प्रकार के बडे वृक्षो की गिनती कर ली। इनमे अंकोल के वृक्षो की संख्या सबसे अधिक थी। अंकोल के नये और पुराने सभी प्रकार के वृक्ष थे। इनके फल जमीन मे गिरे हुये थे और वर्षा के बाद अंकुरित हो रहे थे। किसानो ने बताया कि कुछ समय पहले इन फलो को चूसने के लिये यहाँ स्कूली बच्चो का जमावडा लगा रहता था। अंकोल औषधीय महत्व का वृक्ष है। इसके सभी पौध भागो का उपयोग औषधि के रुप मे होता है। आप इसकी महत्ता के बारे मे मेरे पिछले लेखो मे पढ चुके है। मैने इस वृक्ष के पारम्परिक चिकित्सकीय उपयोगो के विषय मे विस्तार से लिखा है। कही अंकोल हो और उसके उपयोग मे दक्ष पारम्परिक चिकित्सक आस-पास न हो ऐसी कैसे हो सकता है? अंकोल नाना प्रकार के कैंसर की जटिल अवस्था मे प्रयोग किया जाता है। “देसी कीमोथेरेपी” मे जिन वनस्पतियो का प्रयोग होता है उनमे अंकोल का नाम सम्मान से लिया जाता है। देसी कीमोथेरेपी से शरीर को बहुत कम नुकसान होता है और इसका प्रभाव स्थायी होता है। मैने “देसी कीमोथेरेपी” शब्द का प्रयोग सबसे पहले इस लेख मे किया है। इसके विषय़ लिखा बहुत है पहले।

किसानो ने बताया कि साढे पाँच सौ से अधिक पारम्परिक चिकित्सक इस स्थान पर आकर पूजा-अर्चना करते है और यहाँ से वनस्पतियाँ एकत्र करते है। इन पारम्परिक चिकित्सको की सूची गाँव के शिक्षक के पास थी। बाद मे जब मैने अपने डेटाबेस मे इन नामो को खोजा तो कुछ नाम ही मिले। इसका अर्थ यह था कि अब जल्दी हे मुझे इन पारम्परिक चिकित्सको से मिलना होगा। पर इसके लिये मुझे तैयारी करनी होगी। मैने कैसर के पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान पर तैयार की गयी रपट मे व्यवसायिक दुरुपयोग से बचाने के लिये कूट शब्दो का प्रयोग किया है। अब मै पारम्परिक चिकित्सको की सुविधा के लिये इसे हिन्दी मे तैयार कर रहा हूँ। साथ ही छतीसगढी भाषा मे एक आडियो सीडी तैयार कर रहा हूँ। इससे मेरे पास उपलब्ध ज्ञान उन तक पहुँच जायेगा और यदि वे चाहेंगे तो अपना ज्ञान डेटाबेस के लिये दे पायेंगे।

एक दिन मे तो इतने सारे पारम्परिक चिकित्सको से मिलना सम्भव नही था इसलिये कुछेक से मैने मुलाकात की। शिक्षक महोदय ने बताया कि उन्होने मोटे तौर पर जो अन्दाज लगाया है उसके अनुसार इस स्थान की जडी-बूटियो से पारम्परिक चिकित्सक बारह हजार से अधिक नुस्खे बनाते है। इनमे से ज्यादातर जटिल रोगो से सम्बन्धित है। शिक्षक महोदय के प्रयासो की जितनी तारीफ की जाये उतनी कम है।

यह जानकर सुखद आश्चर्य हुआ कि पारम्परिक चिकित्सक अपने अनुभव के आधार पर इस स्थान को जडी-बूटियो के सत्वो से सींचित करते रहते है। वे इन जडी-बूटियो के लिये दूर-दूर की यात्रा करते है। सत्वो का सींचन वृक्षो को औषधीय ग़ुणो से परिपूर्ण रखता है। मेरे साथ आये पारम्परिक चिकित्सको को झगडहीन, डाफर कान्दा जैसी अनमोल वनस्पतियाँ दिख गयी। वे इन्हे एकत्र करने के लोभ का संवरण नही कर पाये। किसानो ने उन्हे रोका और कहा कि कम से कम दो घंटे इस स्थान मे अपना श्रमदान दो फिर जडी-बूटियाँ ले जाना। पारम्परिक चिकित्सक सहर्ष तैयार हो गये। वे धान के उन खेतो मे गये जहाँ पारम्परिक खेती हो रही थी। वहाँ से उन्होने बडी मात्रा मे मोथा और कौआ-कैनी जैसे खरपतवारो का एकत्रण किया और फिर उन्हे निश्चित अनुपात मे मिलाकर उनका रस निकाला। इस रस को उन्होने सेमल के पुराने वृक्ष की जड मे डाला। उन्होने कहा कि इससे सेमल की जडो का अच्छा विकास होगा और जडे औषधीय गुणो से परिपूर्ण होंगी। अगली बार जब यहाँ के पारम्परिक चिकित्सक सेमल मूसली का एकत्रण करेंगे तो इसके प्रभाव से प्रसन्न हो जायेगे।

मुझे याद आता है अपने विश्वविद्यालीन शोध के दौरान मैने इन खरप्तवारो के सत्वो का प्रभाव धान, गेहूँ, चना और अलसी जैसी फसलो मे देखा था। वह शोध प्रयोगशाला स्तर का था पर बाद मे जब इसे किसानो के खेतो मे दोहरा गया तो सकारात्मक परिणाम मिले। इन सत्वो से इन फसलो की उपज पर प्रभाव पडता है। जैविक कृषि के क्षेत्र मे काम रहे शोधकर्ताओ और किसानो के लिये यह महत्वपूर्ण जानकारी है।

यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे ऐसे स्थान पर आने का मौका मिला। अब मुझे बार-बार यहाँ आना होगा। मै किसानो को जानकारियो के लिये धन्यवाद दे ही रहा कि मुझे फुफकारे सुनायी दी। किसानो ने कहा कि इस स्थान पर बहुत से अजगर है पर वे किसी को नुकसान नही पहुँचाते है। उन्होने ऐसे साँप की उपस्थिति की भी बात की तो नाग की तरह है पर दूसरो सर्पो को खा जाता है| वे किंग कोबरा की बात कर रहे थे। वह कभी-कभार ही दिखता है। यह मेरे लिये महत्वपूर्ण जानकारी थी।

इस स्थान पर आने से मुझे अचानक ही नियमगिरि के देव स्थलो की याद आ गयी। वे देवस्थल भी जैव –विविधता से परिपूर्ण थे। स्थानीय लोग सरल शब्दो मे बताते थे कि यदि कोई वन्य पशु हमला कर दे तो उस देवस्थल पर चले जाइये। हमलावर बाहर से ही वापस हो जायेगा। बाक्साइट के खनन के लिये नियमगिरि मे आँखे गडाये बैठी कम्पनी के नुमाइंदे इन देवस्थलो को उजाडते हुये कंवेयर बेल्ट को ले जाना चाहते थे। उन्हे इनके महत्व और आम लोगो की आस्था के विषय़ पता नही था। ऐसा ही हाल मैने बस्तर मे देखा। मैने असंख्य देवस्थलो की यात्रा की और उनकी तस्वीरे खीची पर आज लोहे के कारखाने के लिये उन्हे उजाड दिया गया है या उजाडने की तैयारी है। मेरी तो दोबारा वहाँ जाने की हिम्मत नही होती है। मन अवसादग्रस्त हो जाता है। आज जहाँ भारतीय वैज्ञानिक ऐसे देवस्थलो की महत्ता बताते दुनिया भर मे शोध-पत्र पढ रहे है वही हमारे देश मे इन्हे बचाने की सुध किसी को नही है। इनकी रक्षा के लिये आगे आने वालो को विकास-विरोधी कह दिया जाता है पर वास्तव ये विनाश-विरोधी होते है। पता नही कब समाज अपने सच्चे सेवको की कीमत समझेगा? (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

© सर्वाधिकार सुरक्षित

Tuesday, July 21, 2009

ग्रहण के दौरान उपयोग की जाने वाली वनस्पतियो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-55
- पंकज अवधिया

ग्रहण के दौरान उपयोग की जाने वाली वनस्पतियो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान

सूर्य ग्रहण से कुछ घंटो पहले जब मै यह लेख आरम्भ कर रहा हूँ तब मेरे पास रात भर जागने के लिये भरपूर पानी रखा हुआ है। मौसम बहुत ठंडा हो गया है क्योकि चौबीस घंटो से भी अधिक समय से घनघोर वर्षा हो रही है। मेरे पास पीने के लिये जो पानी है उसमे तुलसी की पत्तियाँ डाल दी गयी है। घर मे रखी सभी भोज्य सामग्रियो मे तुलसी मौजूद है। मै बचपन से देख रहा हूँ कि किसी भी ग्रहण के समय तुलसी का इसी तरह प्रयोग किया जाता है। ऐसा नही है कि ग्रहण के समय केवल तुलसी का ही प्रयोग किया जाता है। देश के अलग-अलग भागो मे अलग-अलग प्रकार की वनस्पतियो के प्रयोग के उदाहरण मिलते है।

मुझे याद आता है, बस्तर मे एक पारम्परिक चिकित्सक के साथ मै ग्रहण की चर्चा कर रहा था। उन्होने बताया कि ग्रहण के समय मंजूरगोडी नामक वनस्पति का महत्व बढ जाता है। इस वनस्पति को उन बेशकीमती वनौषधीयो के साथ रख दिया जाता है जिनका उपयोग पारम्परिक चिकित्सक साल भर करते है। मंजूरगोडी अपने आप मे एक बेशकीमती वनस्पति है। बहुत से पारम्परिक चिकित्सक कौआगोडी का प्रयोग करते है। वे ग्रहण से चौबीस घंटे पहले इसे एकत्र कर लेते है और फिर ग्रहण के दौरान इसे घर के बाहर टाँग कर रखा जाता है।

उत्तरी छत्तीसगढ के पारम्परिक चिकित्सक तो नेगुर के प्रयोग के पक्षघर है। वे इसकी पत्तियो को एकत्र करते है और फिर ग्रहण के दौरान तोरण के रुप मे प्रवेश द्वार पर लगा देते है। इन पत्तियो को गर्भवती महिलाओ के सिरहाने पर भी रख दिया जाता है। नेगुर की जडो को छोटे-छोटे टुकडो मे काट लिया जाता है फिर इसकी माला बनाकर छोटे बच्चो को पहना दी जाती है। बीमार बुजुर्गो के सिरहाने पर जड को रख दिया जाता है। पारम्परिक चिकित्सक ग्रहण के बीस दिन पहले से ही इस वनस्पति की सेवा शुरु कर देते है। पहले सात दिनो तक इसे गोबर के घोल से सींचा जाता है और फिर विभिन्न वनस्पतियो के सत्व से। नेगुर के पौध भागो को ग्रहण के तुरन्त बाद पास की बडी नदी मे प्रवाहित कर दिया जाता है।

मैने अपने शोध दस्तावेजो मे पहले यह लिखा है कि नेगुर को पारम्परिक चिकित्सक बहुत ही उपयोगी वनस्पति मानते है। आम लोगो के लिये भी यह पूजनीय है। आम लोग से अपने घरो के सामने लगाते है ताकि वे साल भर बीमारी से बचे रहे।

अपनी नियमगिरि यात्रा के दौरान उडीसा के पारम्परिक चिकित्सको से इस विषय मे चर्चा हुयी। उन्होने ग्रहण काल मे उपयोग की जाने वाली साठ से अधिक वनस्पतियो के विषय मे बताया। इनमे सबसे रोचक और प्रचलित उपयोग कलमी नामक वनस्पति का था। पर्वत के उन स्थानो से जहाँ से नदियो का उदगम होता है पारम्परिक चिकित्सक कलमी की जड ले आते है और फिर ग्रहण के दौरान इसे घर के विभिन्न कोनो मे रख देते है। अलाबेली नामक गाँव के पारम्परिक चिकित्सक बताते है कि पहले इस जड के काढे से ग्रहण के पहले और बाद मे नहाने की परम्परा थी पर अब कम ही लोग इस बारे मे जानते है।

हाल की जंगल यात्रा के दौरान मुझे पारम्परिक चिकित्सको से नयी जानकारी मिली। वे आज के सूर्य ग्रहण की तैयारियाँ कर रहे थे। उन्होने दस पुराने वृक्षो के नीचे से मिट्टी एकत्र की और फिर उसे सुरक्षित रख लिया। पीपल, बरगद, गस्ती, पाकर, नीम, भिरहा, कलमी, गिन्धोल, सेमर और सलिहा के पुराने वृक्ष इस हेतु चुने गये। ग्रहण से पहले वे इस मिट्टी का लेप तैयार करके अपने शरीर मे लगा लेंगे और ग्रहण के समाप्त होते ही नदी मे स्नान कर लेंगे। ऐसा केवल पारम्परिक चिकित्सक ही करते है। आम लोगो को ऐसा करने की सलाह नही दी जाती है।
बहुत से भागो मे तुलसी के साथ नीम का प्रयोग लिया जाता है। ग्रहण के दौरान बेल की नयी पत्तियो को चबाने की परम्परा भी है। बेल के साथ नीम की पत्तियो को भी चबाया जाता है। बागबहरा के पारम्परिक चिकित्सक बताते है कि ग्रहण के दौरान बुजुर्गो विशेषकर जटिल रोगो से ग्रस्त बुजुर्गो का बहुत ध्यान रखा जाता है। ग्रहण के पहले और बाद पाँच प्रकार की वनस्पतियो को जलाकर धुँए को कमरे के हर कोने तक पहुँचाया जाता है। इनमे भिरहा की पत्तियाँ सबसे अधिक मात्रा मे डाली जाती है। मैने अपने शोध दस्तावेजो मे पहले लिखा है कि भिरहा के धुँए की सहायता से आज की पीढी बरसात मे मच्छरो को दूर रखती है। इसका धुँआ इतना कडवा होता है कि छोटे बच्चे रो पडते है। कई मायनो मे इसे नीम से बेहतर माना जाता है।

जबलपुर मे मेरी नानी ग्रहण के दौरान बहुत सी वनस्पतियो के प्रयोग की सलाह देती थी। इनमे तुलसी और नीम प्रमुख थी। ग्रहण के पहले सूतक लगने के बाद से ही खाना-पीना बन्द कर दिया जाता था और ग्रहण के दौरान भजन किया जाता था। “दादी माँ के नुस्खे” विषय पर जानकारी एकत्र करते समय मैने देश भर की दादी माँओ द्वारा सुझाये गये हजारो ऐसे नुस्खो के विषय मे जानकारी एकत्र की जो ग्रहण के समय उपयोग की जाने वाली वनस्पतियो से सम्बन्धित है। आज भी ग्रामीण क्षेत्रो मे इनका प्रयोग हो रहा है।

औषधीय कीडो और मकौडो के जानकार पारम्परिक चिकित्सक ग्रहण के पहले और बाद मे इनका एकत्रण नही करते है। इस बार रेड वेलवेट माइट यानि रानी कीडे देर से निकले है मानसून मे देरी के कारण पर पारम्परिक चिकित्सक इस ग्रहण के कारण इस बार माइट को एकत्र करने मे देर कर रहे है। व्यापारी इस बात को नही मानते है इसलिये व्यवसायिक स्तर पर एकत्रण जारी है।

मैने हजारो वनस्पतियो के विषय मे इस तरह की जानकारियाँ एकत्र की है। परम्परा के रुप मे पारम्परिक चिकित्सक और आम लोग इन्हे अपनाते है। हमारी तरह वे इसके वैज्ञानिक कारण ढूँढने की कोशिश नही करते है। पारम्परिक ज्ञान का दस्तावेजीकरण करते समय सभी जानकारियो को जस का तस लिख देना होता है। इसी नियम के कारण ये जानकारियाँ मेरे पास सुरक्षित रह पायी है। कौन जाने आने वाले समय मे यह पारम्परिक ज्ञान मानव जाति के बहुत काम आये।

आधे घंट मे जंगल की यात्रा शुरु करनी है। तेज बारिश के कारण नदी-नाले अटे हुये है। घर के सामने ही पानी भरा हुआ है। ड्रायवर का अता-पता नही है पर फिर भी उम्मीद है कि हम इस यात्रा मे जा पायेंगे---- (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

© सर्वाधिकार सुरक्षित

वनस्पतियो का पारम्परिक उपचार और इससे विषैले साँपो से बचाव

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-54
- पंकज अवधिया

वनस्पतियो का पारम्परिक उपचार और इससे विषैले साँपो से बचाव

कल रात से तेज बारिश शुरु हो गयी है। अब हफ्तो तक घने जंगलो मे जाना मुश्किल हो जायेगा। सडक मार्ग से घने जंगलो को निहारा तो जा सकेगा पर अन्दर घुस पाना सम्भव नही होगा। जंगलो का चप्पा-चप्पा जानने वाले भी इस मौसम मे जंगल से दूर रहते है। पता नही कहाँ पानी भरा हो या कहाँ दलदल हो। सारी जडी-बूटियाँ उन भागो से एकत्र कर ली जाती है जो ऊपरी भाग मे है। बरसात मे नाना प्रकार के विषैले जीव निकल आते है। साँपो का भय सबसे अधिक होता है। मै हर बार दूर से घने जंगओ को निहारकर मन मसोस कर रह जाता हूँ। कई बार जाँबाज पारम्परिक चिकित्सको ने मेरे मन से साँप का डर दूर करने के लिये बहुत से उपाय किये पर कुछ उपायो को मैने अपनाया और शेष को अपनाने की हिम्मत ही नही हुयी।

दो तरह के साँप स्थानीय तौर पर पिटपिटी और डोन्ह्रिया के नाम से जाने जाते है। ये साँप अक्सर नही काटते है। मनुष्य़ को देखते ही राह बदल देते है। पिटपिटी को तो गाँव के बच्चे उठा-उठाकर फेकते रहते है। यह उनका ग्रामीण खिलौना है। मै बचपन से यह सुन रहा हूँ कि इन दोनो साँपो मे से किसी एक के काट लेने पर ज्यादा नुकसान नही होता है पर एक सीमित अवधि तक दूसरे विषैले साँप नही काटते है। डोन्ह्रिया के काटने पर तो डेढ गाँजे का नशा आता है और फिर स्थिति सुधर जाती है। जब मै छत्तीसगढ के मैदानो मे सर्वेक्षण कर रहा था तब बहुत से लोगो ने इस साँपो से जबरदस्ती कटवाने की बात कही। एक बार तो डोन्ह्रिया को पकड भी लिया गया। वह काटने को तैयार ही नही होता था। मै जोश के साथ अपना पैर आगे करके बैठा था। काफी जद्दोजहद के बाद भी कोई नतीजा नही निकला। हम कुछ रुककर फिर से एक और प्रयास करने की योजना बनाने लगे।

तभी वहाँ से एक पारम्परिक चिकित्सक गुजरे। उन्होने देखते ही सारा माजरा समझ लिया। वे क्रोध मे बोले कि यह डोन्ह्रिया नही है बल्कि विषैला साँप है। इसका मतलब स्थानीय लोगो से साँप की पहचान मे भूल हुयी थी। अच्छा ही हुआ जो उसने मुझे काटा नही। अन्यथा लेने के देने पड जाते।

बाद मे जब मैने सर्प विष चिकित्सा मे महारत रखने वाले पारम्परिक चिकित्सको और सर्प विशेषज्ञो के बीच काम किया तो मुझे सही जानकारियाँ मिलने लगी। उन्होने बहुत सी ऐसी वनस्पतियो के विषय मे बताया जिन्हे खाने से शरीर मे एक विशेष प्रकार की दुर्गन्ध आने लगती है। उस दुर्गन्ध के कारण साँप दूर ही रहते है। मुझे गुम्मा की याद आती है। छत्तीसगढ मे धान के खेतो मे काम करने वाले लोग अक्सर इसके बारे मे बताते है। गुम्मा खरप्तवार की तरह बरसात के मौसम मे उगता है। इसकी भाजी बडे चाव से खायी जाती है। इसे खाने के बाद किसान बेधडक खेतो मे काम करते है साँपो के बीच। गुम्मा की गन्ध जो हमे महसूस नही होती है, साँपो को दूर रखती है।

मैने जब इस पारम्परिक ज्ञान के विषय मे अपने शोध दस्तावेजो मे लिखा तो विज्ञान जगत के तथाकथित महारथियो ने खूब मजाक उडाया। पर मैने इसका जमीनी स्तर पर प्रयोग देखा था। मै अपने कार्य मे लगा रहा। विज्ञान के पैरोकारो के साथ सबसे बडी समस्या यह है कि जिस रहस्य या मान्यता की व्याख्या वे नही कर पाते है उसे बिना देर किये अन्ध-विश्वास की संज्ञा दे दी जाती है। कालांतर मे जब वैज्ञानिक इसकी व्याख्या कर लेते है तो फिर उसे विज्ञान मान लिया जाता है। मैने अपने लम्बे अनुभव से यह पाया है कि आम लोगो का पारम्परिक ज्ञान विज्ञान सम्मत है। यदि आज का विज्ञान इसकी व्याख्या नही कर पा रहा है तो वह इस ज्ञान का नकारात्म्क पहलू नही है बल्कि आधुनिक विज्ञान की कमी है। अब भला अपनी गल्ती कौन मानता है? इसलिये सारा दोष पारम्परिक ज्ञान पर मढ दिया जाता है। पर इससे पारम्परिक ज्ञान और इसकी सहायता से जीवन जीने वालो पर कोई असर नही पडता है। वे बिना परवाह इसका उपयोग करते रहते है। मै तो इन्हे अन्ध-विश्वास की संज्ञा देने की बजाय विज्ञान मानते हुये व्याख्या के लिये खुला रखने की सलाह देता हूँ।

बहरहाल, गुम्मा के विषय मे शोध दस्तावेजो के प्रकाशित होने के बाद जब दुनिया भर के अलग-अलग भागो के पारम्परिक ज्ञान विशेषज्ञो ने इस बात की पुष्टि करनी आरम्भ की तो इस पारम्परिक ज्ञान को महत्ता मिली। साँपो के अधययन पर अपना जीवन कुर्बान कर देने वाले बहुत से विशेषज्ञो ने गुम्मा जैसी दसो वनस्पतियो के विषय मे बताया। इस सब के बावजूद हमारे देश मे इस ज्ञान का माखौल उडाया जाता रहा। पाश्चात्य जगत ने साँप प्रभावित क्षेत्रो मे अपनी सेना को सुरक्षित रखने के लिये इस तरह की वनस्पतियो पर शोध आरम्भ किया। तब जाकर भारतीय वैज्ञानिको को अपने पिछवाडे मे उग रही इस वनस्पति का महत्व पता चला। यहाँ भी इस पर शोध आरम्भ हुये है। मै इन्हे सही शोध नही कहता हूँ क्योकि इनका आधार मूल पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान होता है और इसी ज्ञान को शब्दो के आकर्षक साँचे मे डालकर ज्यादातर वैज्ञानिक बडी चतुराई से इसे अपने नाम कर लेते है। वैसे भारत मे यदि मुख्य धारा से हट कर काम करना है तो महात्मा गाँधी की यह बात हमेशा याद रखनी चाहिये।

First they ignore you, then they ridicule you, then they fight you, then you win
- Mahatma Gandhi.

चलिये, अब पारम्परिक चिकित्सको की ओर लौटते है। पारम्परिक चिकित्सको ने मुझे बताया कि यह सही है कि बहुत से साँपो के काट लेने पर दूसरे विषैले साँप बहुत दिनो तक नही काटते है। पर यह सब विशेषज्ञो की निगरानी मे किया जाना चाहिये। इसके लिये बहुत से नियम है। सरगुजा मे वानस्पतिक सर्वेक्षणो के दौरान पारम्परिक चिकित्सको ने मुझे पाँच दिनो की तैयारी की बात बतायी। पहले दिन पेट की सफाई की जाती है और फिर औषधीय चावल और कन्द-मूल खाने को दिये जाते है। यह क्रम तीसरे दिन तक चलता रहता है। चौथे दिन विशेष वनस्पतियो का सेवन आरम्भ होता है। पाँचवे दिन विशेष साँपो से कटवाया जाता है। इसके बाद पारम्परिक चिकित्सक नंगे पाँव उस व्यक्ति को जंगल मे ले जाते है और जानबूझकर विषैले साँपो को छेडने को कहते है। वे दावा करते है कि व्यक्ति की जीवनी शक्ति के आधार पर यह उपचार तीन से पाँच महिने तक कारगर रहता है। व्यक्ति को कुछ फर्क नही पडता है। उसमे किसी प्रकार के शारीरिक परिवर्तन नही आते है। हाँ, इन दिनो वह बीमार कम पडता है। यह साँपो का नही बल्कि वनस्पतियो का असर होता है।

अम्बिकापुर के अजीरमा गाँव मे अपनी शिक्षा के दौरान मैने एक पारम्परिक चिकित्सक से मुलाकात की थी। उनका कहना था कि ऐसे उपचार सभी साँपो के लिये उपयोगी न होकर करैत और नाग के लिये ही प्रभावकारी होते है। एक दशक से भी अधिक समय मे मैने सौ से ज्यादा ऐसी उपचार विधियो की जानकारियो का दस्तावेजीकरण किया है। साँपो के प्रकार और वनस्पतियो की उपलब्धता के आधार पर उपचार की विधि बदलती जाती है। एक दिन का भी उपचार होता है और सबसे लम्बा उपचार एक महिने का होता है। एक महिने लम्बा उपचार जहरीले कीटो से भी रक्षा करता है। दावा तो यह भी किया जाता है कि इससे भालू जैसे वन्य जीवो की आक्रमण की स्थिति मे कम नुकसान होता है।

गुम्मा भाजी हर साल मै शौक से खाता हूँ। साँपो के लिये नही बल्कि उसके स्वाद के लिये। जिन उपचारो के विषय मे मैने जानकारियो का दस्तावेजीकरण किया है उनमे से वनस्पति आधारित उपचारो को मैने अपनाया है। मैने अपने स्तर पर इसके प्रभाव का पूरा-पूरा आँकलन नही किया है पर इन उपचारो को सामान्य स्वास्थ्य के लिये बडा ही उपयोगी पाया है।

आज यह पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान कुछ लोगो तक ही सीमित है और इसका प्रयोग कम हो रहा है। इस बात की पूरी सम्भावना है कि यह आने वाले समय मे संरक्षण के अभाव मे विलुप्त हो जाये। इस ज्ञान की बडी महत्ता है। पर इसके लिये आधुनिक योजनाकारो और शोधकर्ताओ को इसे विस्तार से बताना होगा। यह सम्भव नही जान पडता है। यह मै उदाहरण के माध्यम से समझाना चाहूँगा। मैने औषधीय कीटो पर बहुत काम किया है। कल ही अमेरिका से एक जाने माने कीट वैज्ञानिक का सन्देश आया कि वे लाल चीटे जिसे स्थानीय भाषा मे चापरा या माटरा कहा जाता है, के औषधीय गुणो पर पूरी दुनिया मे उपलब्ध जानकारियो को एक स्थान पर एकत्र कर रहे है। उन्होने मेरे शोध पत्र का उल्लेख किया और कहा कि क्या आपके देश के चिकित्सा वैज्ञानिको ने इस चीटे से सम्बन्धित पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान पर शोध कार्य किये? मैने उन्हे विनम्रता से जवाब दिया कि बहुत से चिकित्सा वैज्ञानिको ने इसमे रुचि दिखायी पर जो जानकारी मेरे शोध पत्र मे है वह ऊँट के मुँह मे जीरे के समान है। असली जानकारी तो हजारो पन्नो की शक्ल मे है। कम्प्यूटर की भाषा मे कहे तो 2 जीबी से अधिक की सामग्री। अब इस सामग्री को दुनिया की कोई भी शोध पत्रिका मूल रुप मे प्रकाशित नही करेगी। वे इसे काट-छाँटकर कुछ पन्नो की सामग्री बना देंगे। इससे अर्थ का अंनर्थ भी हो सकता है। इसलिये सौ से अधिक शोध-पत्रो को पचपन से अधिक प्रतिष्ठित शोध पत्रिकाओ के माध्यम से प्रकाशित करवाने के बाद मैने यह राह छोड दी। अब अपने डेटाबेस मे इसे सुरक्षित रखता हूँ इस उम्मीद मे कि इस जीवन मे या इसके बाद कोई इसे मूल रुप मे प्रकाशित कर पाने मे सक्षम होगा।

चलिये, अब फिर वापस लौटते है। आपने छत्तीसगढ के नाग लोक का नाम तो सुना ही होगा। तलहटी वाले इस क्षेत्र मे बडी संख्या मे साँप पाये जाते है। हर साल इनके डसने के कारण बडी संख्या मे लोग मारे जाते है। ऐसा नही है कि साँप से बचने के उपचारो की जानकारी इस क्षेत्र मे नही है। जानकारियाँ है पर उन्हे फिर से पुनरजीवित करने की जरुरत है। इस साल मेरी योजना इस क्षेत्र मे जाकर महिनो गुजारने की थी पर यह सम्भव नही हो पाया। योजनाकार चाहे तो राज्य के एक क्षेत्र के उपयोगी पारम्परिक ज्ञान का उपयोग दूसरे क्षेत्र मे करके जनता को अकाल मौतो से बचा सकते है।

बरसात मे जंगल के भीतर घुसने के लिये मै तो अंतरिक्ष यात्रियो की तरह विशेष सूट बनाने की मंशा रखता हूँ। ऐसा सूट जिसके अन्दर बैचैनी न हो और वह जहरीले जीवो से बचा सके। स्थानीय स्तर पर दर्जी मेरी बात सुनते है और सूट तैयार करते है पर “परफेक्शन” आने मे अभी सालो लगेंगे-ऐसा लगता है। (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

© सर्वाधिकार सुरक्षित

Monday, July 20, 2009

आप भी मिले मेरे मधुका मित्र से जिन्होने असंख्य लोगो को नया जीवन दिया है

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-53
- पंकज अवधिया

आप भी मिले मेरे मधुका मित्र से जिन्होने असंख्य लोगो को नया जीवन दिया है

इंटरनेट पर सोशल नेटवर्किग साइटो मे मेरे इन असंख्य मित्रो के नाम नही मिलते है पर फिर भी मै उनसे जुडा हुआ हूँ। इनकी संख्या करोडो मे है पर मै अभी तक कुछ लाख मित्रो से अच्छे से मिल पाया हूँ। इन मित्रो के विषय़ मे मैने विस्तार से जानकारियाँ एकत्र की है। आशा है ये जानकारियाँ एक दिन आन-लाइन होंगी और मेरे ये मित्र आप सबके मित्र बन सकेंगे। आज एक ऐसे बुजुर्ग मित्र से मै आपको मिलवा रहा हूँ जो उडीसा मे आसन जमाये हुये है। इन वृक्ष मित्र को मै प्रेम से मधुका कहता हूँ। मेरे असंख्य मधुका मित्र है पर इनकी बात ही निराली है। आप के सामने सीजीबीडी डेटाबेस मे अंकित जानकारियाँ यहाँ संक्षेप मे प्रस्तुत है:

वृक्ष कहाँ पर है: उडीसा के पर्यटन स्थल नर्सिंगनाथ जाने के रास्ते मे बायी ओर। यह रास्ता नुआपाडा से नरसिंगनाथ की ओर जाता है।

वृक्ष का हिन्दी नाम:महुआ

वृक्ष का अंग्रेजी नाम: मधुका इंडिका

वृक्ष की आयु: सौ साल से अधिक

वृक्ष का सीजीबीडी डेटाबेस मे क्रमाँक:
85444

वृक्ष के आस-पास क्या जंगल है:पहले थे। अब तो सब साफ हो रहे है।

वृक्ष के आस-पास कैसी वनस्पतियाँ है: मौसम के अनुसार अलग-अलग प्रजाति की छोटी वनस्पतियाँ उगती है। इस वृक्ष के पास बीजा का एक पुराना वृक्ष है।

कितने प्रकार के पक्षी साल भर इस वृक्ष मे आते है: मैने पच्चीस प्रजातियो को अब तक देखा है। स्थानीय लोग इससे कही अधिक प्रजातियो के नाम बताते है।

क्या वृक्ष पर किसी पक्षी का स्थायी घोसला है: हर यात्रा के दौरान तीन से चार घोसले दिख जाते है।

वृक्ष के पास कितनी बार जा चुके है?: मै पिछले एक दशक मे 18 बार जा चुका हूँ।

क्या सभी यात्राओ की तस्वीरे है?: हाँ, सभी यात्राओ की तस्वीरे है। ये यात्राए अलग-अलग मौसम मे हुयी इसलिये इन तस्वीरो मे बडी विविधताए है।

कितने प्रकार के कीट इस वृक्ष पर देखे जा चुके है: मैने नौ प्रजाति के ऐसे कीटो को अब तक देखा है जो इस के विभिन्न पौध भागो को खाते है।

क्या मित्र कीट भी इस वृक्ष पर देखे गये है: धान की फसल के हानिकारक कीटो को खाने वाले मित्र कीट बडी संख्या मे इस वृक्ष मे आश्रय लेते है।

क्या किसान इस वृक्ष का उपयोग करते है?: हाँ, किसान विशेषकर बुजुर्ग किसान इसकी शाखाओ को अपने खेतो मे गाड देते है। शाखाओ को सिंचाई नालियो मे भी डाल दिया जाता है। वे कहते है कि इससे कीटो का प्रकोप कम होता है। वे महुआ के साथ दूसरी वनस्पतियो का भी प्रयोग करते है। महुये की पत्तियो का सत्व खरपतवारो के सत्व के साथ मिलाकर सब्जियो मे रोग नियंत्रण किया जाता है।

कितने प्रकार के सर्प इस वृक्ष मे देखे गये है: मैने तीन प्रकार के सर्प अब तक देखे है इस वृक्ष पर।

क्या आस-पास के लोग इस वृक्ष की पूजा करते है?: हाँ, साल मे कई बार। बहुत से घरो मे विवाह के बाद वर-वधू को इस वृक्ष की परिक्रमा करने को कहा जाता है।

क्या इसकी जडो का कोई उपयोग किया जाता है?: जडो से औषधीयाँ बनायी जाती है। डेढ सौ से अधिक नुस्खो मे इसकी जड का उपयोग किया जाता है।


क्या इसकी छाल का कोई उपयोग है?: हाँ, छाल से सिकल सेल एनीमिया के रोगियो की चिकित्सा की जाती है। छाल को तीन सौ से अधिक नुस्खो मे प्रयोग किया जाता है।

क्या इसकी शाखाओ का कोई उपयोग है?: हाँ, जिस घर मे शादी होने वाली रहती है वहाँ द्वार पर इन शाखाओ को टांगा जाता है। हरेली के दिन भी ऐसा ही किया जाता है।

क्या इसके फूलो का कोई उपयोग है?: हाँ, फूलो की शराब जनप्रिय है। पारम्परिक विधियो से बनी इस शराब को संतुलित मात्रा मे स्वास्थ्य के लिये अच्छा माना जाता है। हीमोफीलिया के रोगियो के लिये इस शराब का आँतरिक और बहारी प्रयोग होता है।

क्या इसके फलो का कोई उपयोग है?: फलो को खाया जाता है और इसका तेल भी बनाया जाता है। तेल का प्रयोग पच्चीस रोगो की चिकित्सा मे होता है।

क्या पूरे वृक्ष का कोई उपयोग है?: प्रथम वर्षा का जल एकत्र करने वाले पारम्परिक चिकित्सक इस वृक्ष से जल एकत्र करते है और वर्ष भर इसका प्रयोग करते है। इसकी छाँव का प्रयोग भी रोगियो के लिये किया जाता है। इसकी जड के पास से एकत्र की गयी मिट्टी से नाना प्रकार के रोगो की चिकित्सा की जाती है।

क्या स्थानीय लोग इससे जुडी कोई कहानी या कथा बताते है?: हाँ, बहुत पहले यहाँ अकाल पडा था। उस समय जंगल ने स्थानीय लोगो को सहारा दिया था। जिन वृक्षो का धन्यवाद करते वे नही थकते है उनमे यह भी है।

क्या इससे प्राप्त भागो को स्थानीय लोग एकत्र करके धनार्जन करते है?: हाँ, इसकी तस्वीरे डेटाबेस मे है।

कितने पारम्परिक चिकित्सक इस वृक्ष से पौध भाग एकत्र करते है?: पचास से अधिक। दूर-दूर से भी पारम्परिक चिकित्सक आते है।

इस वृक्ष ने अब तक कितने लोगो को जीवन दान दिया है?: असंख्य पर इसका कोई दस्तावेज नही है।

क्या पारम्परिक चिकित्सक इस वृक्ष को औषधीय गुणो से परिपूर्ण करने के लिये कुछ उपाय करते है?: हाँ, दीपावली के समय जंगली कन्दो के सत्वो से इसे सींचा जाता है।

क्या तांत्रिक इस वृक्ष के पास आते है?: हरेली और दीपावली के समय उनकी बैठक इसकी छाँव मे होती है।

क्या इस वृक्ष पर बान्दा है?: हाँ, है। स्थानीय लोग बताते है कि पहले वाला बान्दा सूख चुका है। पिछले साल से नये बान्दे ने अपना फैलाव आरम्भ किया है। इसकी तस्वीर ली गयी है।

क्या इन बान्दा का कोई स्थानीय उपयोग है?:
बान्दा के लिये स्थानीय लोगो और पारम्परिक चिकित्सको मे मारामारी मची रहती है। इसके औषधीय उपयोग है। बान्दा को लगातार एकत्र किया जाता है इसलिये इसका फैलाव धीरे-धीरे हो रहा है।

क्या वृक्ष पर आर्किड है?: हाँ, एक ही प्रकार का आर्किड है। इसकी तस्वीर ली गयी है।

क्या आर्किड के स्थानीय उपयोग है?: हाँ, आर्किड का प्रयोग बतौर औषधि होता है। स्थानीय लोग बताते है कि खरियार रोड के किसी धनी परिवार ने इस आर्किड को अपनी तिजोरी मे रखा है। हर साल दीपावली मे इसकी पूजा होती है। जिस साल क्षेत्र मे कम बारिश होती है उस साल बहुत से लोग इस आर्किड को अपने अन्न भंडार मे रखते है। आर्किड को पूजा-पाठ करके एकत्र किया जाता है।

कितनी सम्भावना है कि यह वृक्ष विकास की भेंट चढेगा?: यह वृक्ष सडक के एकदम किनारे है। यदि सडक का चौडीकरण हुआ तो इसे काट दिया जायेगा।

यदि इसे काटा गया तो क्या स्थानीय लोग इसे बचाने सामने आयेंगे?: ऐसा लगता तो है।
आपके सम्बन्ध कैसे है इस वृक्ष से: मित्र की तरह।

आपने कितनी बार इनसे आलिंगन किया है?: हर बार करता हूँ। मेरे साथ यात्रा कर रहे लोग भी करते है।

क्या युवा पीढी इसके महत्व को जानती है?: नही, पिछले साल कुछ मनचले युवको ने इसमे आग लगाने की कोशिश की थी। उन्हे स्थानीय लोग ने समझाइश दी है।

क्या आप इस वृक्ष के समकक्ष किसी दूसरे वृक्ष को जानते है?: हाँ, जब भी मै इसके पास जाता हूँ मुझे घटारानी क्षेत्र के महुआ वृक्ष (सीजीबीडी डेटाबेस के अनुसार क्रमाँक: 15418) की याद आ जाती है।

“लकडी माफिया” इसे किस नजर से देखता है?: स्थानीय आस्था के कारण इस ओर कम ही देखता है।

क्या वन विभाग को इसके महत्व के विषय मे जानकारी है?: स्थानीय लोग तो इन्कार करते है। मुझे उनकी बात सही लगती है।

आशा है, आपको मेरे इस मधुका मित्र से मिलकर प्रसन्नता हुयी होगी। मै उस दिन की प्रतीक्षा कर रहा हूँ जब मै सेटेलाइट की सहायता से इनकी स्थिति निर्धारित कर पाऊँगा और घर बैठे ही इन्हे देख पाऊँगा। जब भी कोई लालची नजर इस ओर उठेगी एक अलार्म बज उठेगा और स्थानीय लोगो को सूचना मिल जायेगी। वे दौड पडेंगे इस जीवनदाता को बचाने। (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

© सर्वाधिकार सुरक्षित

कोई तो बचाये मुझे कर्क राशि मे होने वाले इस सूर्य ग्रहण से?

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-52
- पंकज अवधिया


कोई तो बचाये मुझे कर्क राशि मे होने वाले इस सूर्य ग्रहण से?

22 जुलाई ,2009 का दिन मेरे लिये बहुत महत्वपूर्ण है। इस दिन सूर्य ग्रहण है। सुबह चार बजे से रात बारह बजे तक का व्यस्त कार्यक्रम है पर मेरी राशि और ज्योतिष रोडे अटका रहे है। यदि ज्योतिषीयो की माने तो मेरा जन्म कर्क राशि मे पुष्य़ नक्षत्र मे हुआ है और सूर्य ग्रहण भ्री कर्क राशि मे पुष्य़ नक्षत्र मे है। सारी दुनिया कर्क राशि वालो के लिये संकट खडा किये हुये है। घर से निकलने से मना किया जा रहा है। दुर्घटनाओ की आशंका है। मै बडे ही असम्नजस मे हूँ।

22 जुलाई को पहला निमंत्रण काली बाबा की तरफ से है। इस बाबा ने सुबह तीन बजे जंगल मे बुलाया है। तंत्र-मत्र दिखाने और सीखाने के लिये नही बल्कि जडी-बूटी के एकत्रण के लिये। आम तौर पर सूर्य ग्रहण के दौरान जडी-बूटियाँ एकत्र नही की जाती है। पर तंत्र से जुडे लोग विशेष किस्म की जडी-बूटियाँ ग्रहण काल मे ही एकत्र करते है। वे चन्द्र और सूर्य ग्रहण की प्रतीक्षा करते रहते है। मुझे तंत्र मे कम विश्वास है पर मै उनके साथ जाकर जडी-बूटी एकत्रण की विधियाँ देखना चाहता हूँ। उनकी शर्ते बडी कठिन है। हमे नंगे पाँव जंगल मे जाना होगा। जब ग्रहण के दौरान अन्धेरा हो जायेगा तो रोशनी नही करनी है। जहाँ खडे है वही खडे रहना होगा। योजना है कि उस स्थिति से पहले ही जडी-बूटियो तक पहुँच जाया जाये। काली बाबा अपने चेले चपाटो के साथ होंगे। उनके साथ शहरी धनाढयो की बडी संख्या होने की उम्मीद है। तंत्र की सबसे अधिक आवश्यकता उन्हे कुछ ज्यादा ही होती है। काली बाबा का कहना है कि लकडी के औजारो से दीमक की बाम्बी खोदी जायेगी और फिर हत्थाजोडी की तलाश की जायेगी। सुबह का समय जंगली जानवरो के लिये वापस लौटने का समय होता है। इतनी भीड मे उनके पास आने की उम्मीद कम ही है। पर मुझे लगता है कि मै ग्रहण के प्रति उनके व्यवहार को करीब से देख सकूंगा।

मैने रात को पास के एक शहर मे रुकने की योजना बनायी है ताकि तीन बजे तक काली बाबा के डेरे पर पहुँच सकूँ। जाहिर है इस जंगल यात्रा के दौरान मेरे मन मे ढेरो प्रश्न रहेंगे पर काली बाबा के सामने प्रश्न पूछने की मनाही है। इस बात की पूरी सम्भावना है कि उन्हे सवाल के जवाब नही मालूम हो इसलिये सवाल पूछने पर ही पाबन्दी लगा दी गयी है। नेरे साथ फिल्म बनाने वाले होंगे जबकि मै भी कैमरे से लैस रहूंगा।

ऐसा नही है कि ग्रहण के दौरान मै पहले घर से बाहर नही रहा हूँ। मैने बहुत बार पारम्परिक चिकित्सको के साथ ग्रहण के दौरान जंगल की यात्रा की है। वे जंगल कुछ लेने नही बल्कि देने जाते है। वे जडी-बूटियो का घोल बनाते है और फिर उस घोल को बडे वृक्षो की जडो मे डाल आते है। ऐसा वे पीढीयो से कर रहे है। वे इस बारे मे ज्यादा बताते नही है पर यह अवश्य कहते है कि यह प्रक्रिया उपयोगी वनस्पतियो को ग्रहण के कुप्रभाव से बचाने के लिये ही है।

ग्रहण के समय मे बहुत बार स्थानीय अन्ध-श्रद्धा निर्मूलन समिति के साथ आम लोगो को यह दिखाने के लिये बाहर बैठा हूँ कि इससे कोई नुकसान नही होता है। पर इस बार ज्योतिषीयो के अनुसार स्थिति सबसे खराब है। बहुत बडा अनर्थ होने वाला है। इसलिये पारिवारिक ज्योतिषी ने पहले ही चेतावनी दे दी है। चेतावनी तो सभी दे रहे है। एक अखबार कहता है कि कर्क राशि वालो को लगभग चारो ओर से संकट आयेंगे। मै इस वाक्य मे “लगभग चारो ओर” से डरा हुआ हूँ। चारो ओर लिखा होता तो कोई बात नही थी पर यह लगभग चारो ओर ने मुझे भयग्रस्त कर दिया है। सभी अखबार अलग-अलग मंत्र पढने की सलाह दे रहे है ग्रहण के दौरान। यह भी कह रहे है कि केवल यही मंत्र पढना है। दूसरे सभी मंत्र को भूल कर भी नही जपना है। मेरे पास बीस से अधिक मंत्र एकत्र हो गये है। इक्कीसवाँ मंत्र लेकर पारिवारिक ज्योतिषी अभी आते ही होंगे।

काली बाबा से निपटने के बाद एक सर्प विशेषज्ञ के पास जाना है। वे अपने चेलो को हरेली अमावस्या के दिन दीक्षा देते है। 22 जुलाई को ही हरेली अमावस्या भी है। हमे श्री गणेश नामक सर्प विशेषज्ञ के घर किये गये पिछले साल के प्रयोगो को दोहराना है। एक बार फिर विषयुक्त सर्पो के बीच नंगे बदन लेटना है और अपनी गुरु भक्ति का परिचय देना है। इस सब को सुनकर पारिवारिक ज्योतिष कहते है कि पिछली बार तो बच गये थे इस बार तो सब के सब सर्प डस लेंगे। सूर्य ग्रहण जो है मेरी राशि पर। वे जब सुनते है कि इसके बाद चावल के साथ सर्प विष का प्रसाद ग्रहण करने की योजना है तो उनसे रुका नही जाता है। वे पिताजी को आँखे फैलाकर डराते है और घोर अनर्थ की बात करते है।

इस सर्प विशेषज्ञ से मिलने के बाद उन कन्द मूलो को एकत्र करने जाना है जिन्हे हरेली अमावस्या के दिन चरवाहे पशुओ को खिलाते है। इससे पशु साल भर रोगो से बचे रहते है। देश के अलग-अलग हिस्सो मे अलग-अलग किस्म के कन्द खिलाये जाते है। बहुत से भागो मे तो इस दिन ग्रामीण भी कन्द मूलो का सेवन करते है। इन कन्दो को खोजने जंगल मे जाना होता है। पातालकुम्हडा जैसे कन्दो के लिये घंटे भर तक मेहनत करनी पडती है। आप एक किनारे पर खडे रहकर फोटोग्राफी नही कर सकते है। आपको स्वयम भी हाथ लगाना होगा। यदि गाँव मे नाना प्रकार के रोगी होंगे तो अलग-अलग प्रकार के कन्द लाने होंगे। यह मान्यता है कि आप जितने अधिक लोगो को कन्द-मूल देंगे उतना ही अधिक पुण्य आपको मिलेगा। मै यह अवसर खोना नही चाहता हूँ।

शाम होते-होते भी आराम का मौका नही मिलेगा। दर्जनो फोन आयेंगे कि आप हमारे गाँव आये रात को, आज तंत्र साधक और साधिकाए दिखेंगी। दूर से जलती हुयी आग दिखेगी जो ऐसे कुलाँचे मारेगी कि आप के होश उड जायेंगे। जाने कितने सालो से ऐसे फोन कालो के आधार पर मै उन गाँवो की यात्रा कर रहा हूँ और लोगो को बता रहा हूँ कि इस अन्ध-विश्वास से बाहर निकले। हमे एक बार भी आग का गोला नही दिखा। न साधक दिखे और न साधिकाए।

“कर्क राशि वाले वैसे ही साढे साती का दंश झेल रहे है। ऊपर से सूर्य ग्रहण। पंकज जी को कुछ हो गया तो मेरी जिम्मेदारी नही है।“पारिवारिक ज्योतिषी कुद्ध होकर फोन कर रहे है। परिवारजन कहते है कि वे मेरे शुभ-चिंतक है। वरना भला कौन फोन पर फोन करके चेतावनियाँ देता है? आजकल तो दक्षिणा पर ही सारा ज्योतिष टिका होता है। इस तरह की बाते मन को व्यथित कर देती है। 22 जुलाई, 2009 मेरे इस जीवन मे दोबारा नही आने वाला न ही ऐसी अनोखी खगोलीय घटना इस जन्म मे दोबारा घटने वाली है। मै अपनी योजना पर अडिग रहना चाहता हूँ। मै तो जंगल जाऊँगा। मैने पारिवारिक ज्योतिषी को दो टूक कह दिया है। वे नाराज हो गये लगते है पर मुझे उम्मीद है कि इस शुभ-चिंतक को साथ चलने के लिये जल्दी ही मना लूंगा। (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

© सर्वाधिकार सुरक्षित

Sunday, July 19, 2009

बीस हजार किस्मो की हर्बल टी वाला देश और जहरीली आम चाय पीते देशवासी

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-51
- पंकज अवधिया

बीस हजार किस्मो की हर्बल टी वाला देश और जहरीली आम चाय पीते देशवासी


पहाडी पर पारम्परिक चिकित्सक बहुत आगे निकल गये। मै तेजी से चढ नही पा रहा था। पीछे घने जंगल मे मुझे कुछ डर सा महसूस हो रहा था पर इतनी हिम्मत नही थी कि तेज कदमो से चलकर आगे जा रहे पारम्परिक चिकित्सको के साथ हो लूँ। एक वृक्ष की शाखा का सहारा लेना चाहा तो बहुत से ब्लिस्टर बीटल्स दिखायी दिये। ब्लिस्टर माने फफोले। जरा सा भी खतरा महसूस होने पर ये कीडे बिना देरी अपने शरीर से पिचकारी की तरह तरल छोडते है। जैसे ही यह तरल त्वचा के सम्पर्क मे आता है फफोले पड जाते है। बेहद दर्द होता है। ये कीडे दिखते सुन्दर है। मैने अपनी प्रयोगशाला मे इन्हे रखकर सालो तक शोध किया था पर प्रयोगशाला तो प्रयोगशाला होती है, प्रकृति मे उनकी शक्ति अलग ही होती है। इससे पहले कि वे मेरी ओर बढते मैने आगे बढने मे ही भलाई समझी। सीधी चढाई मे बडी तकलीफ होती है। विशेषकर जब जंगल मे बहुत नमी हो। अचानक आँखो के सामने अन्धेरा छाया और मै गिरने लगा। गिरते-गिरते मुझे लगा कि सामने दो लोग खडे है। मै कुछ समझता इससे पहले होश खो बैठा।

जब होश आया तो पारम्परिक चिकित्सक मुझे घेरे हुये बैठे थे। सचमुच दो नये लोग खडे थे। उन्होने ने ही मुझे गिरता देखकर पारम्परिक चिकित्सको को पुकारा था। ये नये लोग स्थानीय विश्वविद्यालय मे शोध कर रहे थे और वनस्पतियो की तलाश मे आये थे। वे पूरी तैयारी से थे। उनके पास सुरक्षा के सभी उपकरण थे, दवाईयाँ थी और साथ ही गरम पानी भी था। मुझे अपनी लापरवाही का ख्याल आया। मै अपने साथ कुछ भी लेकर नही चलता। कुछ दवाईयाँ रहती है तो वे गाडी मे छूट जाती है। कभी-कभी पीने का पानी रख लेता हूँ। सालो से जंगल जाने के कारण पारम्परिक चिकित्सको पर इतना अधिक विश्वास हो गया है कि लगता है, वे सब सम्भाल लेंगे।

शोधार्थियो ने मुझे दवाए देनी चाही तो पारम्परिक चिकित्सको ने मना कर दिया। उन्होने गरम पानी माँगा। फिर उसमे पास के कुछ वृक्षो की ताजी जडे डाल दी। कुछ समय बाद यह पानी मुझे पीने को दिया गया। मुझे कुछ राहत मिली। थोडे आराम के बाद हम आगे बढने के लिये तैयार हो गये।

छात्र जीवन ही से मुझे हर्बल टी के बारे मे जानने की बडी ही उत्सुकता रही है। उस समय लेमन ग्रास की पत्तियो से बनी चाय को ही एकमात्र हर्बल टी के रुप मे मै जानता था पर जब मैने पारम्परिक चिकित्सको के साथ अधिक समय व्यतीत करना आरम्भ किया तो इतनी सारी हर्बल टी के विषय मे जानकारी एकत्र हो गयी कि अब उन्हे याद रख पाना मुश्किल है। हर रोग के लिये पारम्परिक चाय उपलब्ध है। हम भले ही इसे हर्बल टी कहे पर पारम्परिक चिकित्सको के लिये यह काढा है। काढा का नाम सुनते ही कडवाहट की याद आ जाती है। पर सभी काढे कडवे नही होते है। यदि होते भी है तो पारम्परिक चिकित्सक जानते है कि कैसे उन्हे स्वादयुक्त बनाया जा सकता है।

मुझे याद आता है कि जब मै सरगुजा मे वानस्पतिक सर्वेक्षण कर रहा था तब गर्मी के दिनो मे एक बार गश खाकर गिर पडा था। पारम्परिक चिकित्सको ने पास ही उग रही मीठी पत्ती नामक वनस्पति को तोडा और पास की झोपडी मे मुझे ले गये। मीठी पत्ती को पानी मे उबाला और बोले, लीजिये, यह चाय पीजिये। इससे लू का असर चला जायेगा। सचमुच वह चाय कमाल की थी। इससे पहले स्कोपेरिया नामक उस वनस्पति को हम किसानो का दुश्मन समझते थे। हमे पढाया गया था कि इससे देखते ही उखाड कर नष्ट कर देना चाहिये। पर इसी बेकार समझी जाने वाली वनस्पति का यह गुण देखकर मै दंग रह गया।

आजकल मलेरिया पर शोध कर रहे दुनिया भर के वैज्ञानिक ऐसा घोल बना रहे है जिसे मलेरिया प्रभावित क्षेत्रो मे लोगो को पीना होगा। इस घोल को पीने वाले लोगो को जैसे ही मच्छर काटेगा, वह तुरंत मर जायेगा। इसे नयी खोज बताया जा रहा है और इस अकादमिक उपलब्धि पर विदेशी मुहर लगा दी गयी है। मुझे याद आता है, बस्तर के जंगलो मे किये जा रहे वानस्पतिक सर्वेक्षणो का समय जब मलेरिया से बचाव जरुरी था विशेषकर बरसात के दिनो मे। हमे शरीर को ढककर रखने की सलाह दी जाती थी। जंगल मे जाते वक्त खुले भाग मे मच्छर रोधी क्रीम लगाने की सख्त हिदायत थी। रात को रेस्ट हाउस मे मच्छरदानी लगानी पडती थी पर पारम्परिक चिकित्सक इन सब से बेपरवाह मजे से नंगे बदन जंगल मे आगे-आगे चलते रहते थे। यह उनकी हर्बल टी का असर था जिसे वे पीने को सभी को देते थे पर इसे बनाने की विधि किसी को नही बताते थे। स्वाद से यह स्पष्ट था कि इस चाय मे भुईनीम के पौध भाग होते थे पर शेष बीस अवयवो के बारे मे जानकारी नही मिल पाती थी। यह चाय पीने मे मिलजुले स्वाद वाली होती थी पर इसे पीने के बाद खूब पसीना आता था और शरीर मे नयी स्फूर्ति का संचार होता था। पारम्परिक चिकित्सक जंगल मे चलते समय एक विशेष प्रकार के मकोडो को पकडकर अपने पास रखने की बात कहते थे। एक जंगल यात्रा के दौरान दस मकौडे पकडने पर ही वे हर्बल टी का राज बताने को तैयार थे। यह शर्त बडी टेढी थी पर मुझे तो इसे पूरा करना ही था। मुझे यह जानकर बडा आश्चर्य हुआ कि मीठी पत्ती नामक उसी वनस्पति के कारण ही चाय स्वादिष्ट होती थी। शेष सभी अवयव बेहद कडवे थे। जब हमे मच्छर काटते थे तो अपने आप गिर कर तडपने लगते थे। कुछ समय बाद उनकी मृत्यु हो जाती थी। इस चाय का एक भी ऐसा अवयव नही था जो शरीर के लिये नुकसानदायक था। सभी के अपने फायदे थे।

पिछले सप्ताह ही जब मै अपने डेटाबेस मे हर्बल टी के गिनती लगा रहा था तो कुल संख्या बीस हजार से अधिक निकली। हर रोग के लिये हर्बल टी पारम्परिक चिकित्सको के पास उपलब्ध है। सभी को पीने का निश्चित समय है। दसो विधियाँ है। किस हर्बल टी के साथ क्या खाना है और क्या नही, यह भी ज्ञान उपलब्ध है। आप जानते ही है कि मै मधुमेह के पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान पर एक रपट तैयार कर रहा हूँ। मधुमेह के रोगियो को आधुनिक चिकित्सक नंगे पाँव चलने से मना कर देते है पर पारम्परिक चिकित्सक उन्हे नगे पाँव चलाते है दिन के अलग-अलग समय पर। उन्हे जंगल मे विशेष वनस्पतियो के ऊपर चलना होता है। यदि वनस्पतियाँ उपलब्ध नही होती है तो सूखे भागो का प्रयोग किया जाता है। ऐसे हर प्रयोग के बाद रोगी को विशेष हर्बल चाय दी जाती है। पारम्परिक चिकित्सक कहते है कि चलने के बाद चाय पीने से होने वाला लाभ दोगुना हो जाता है। मधुमेह की चिकित्सा से सम्बन्धित अद्भुत पारम्परिक ज्ञान हमारे देश मे है पर यह विडम्बना ही है इसे आम लोगो के लिये प्रयोग नही किया जा रहा है।

चलिये, अब वापस उसी पहाडी पर पहुँचते है जहाँ मै हर्बल टी पीकर आगे बढने की तैयारी कर रहा था। शोधार्थियो से विदा लेकर हम कुछ आगे बढे तो पारम्परिक चिकित्सको ने चौकाने वाली बात बतायी। उनका कहना था कि शरीर को आराम की जरुरत थी और आपने आराम नही किया इसलिये गश खाकर गिर गये। यदि आपने आराम किया होता तो ऐसा नही होता। गिरने के बाद शरीर को जब आराम मिल जाता तो वह फिर से सक्रिय हो जाता। हमने आपको काढा पिलाकर गल्ती की। शरीर ऐसे किसी भी सहारे का जल्दी से आदी हो जाता है। इसलिये जब तक जरुरी न हो तब तक जडी-बूटी का सहारा नही लेना चाहिये। शरीर को भगवान ने जबरदस्त शक्ति दी है। वह कैसी भी परिस्थिति मे अच्छे से कार्य कर सकता है पर किसी भी तरह का सहारा देने पर उसे कमजोर बनने मे देर नही लगती है। अब आगे आपको चढने मे जल्दी से थकान होगी। इसलिये सब कुछ जानते हुये भी वे कभी ही इस काढे का प्रयोग करते है।

घर वापसी के बाद मैने इस पर गहन चिंतन शुरु किया तो मुझे अपनी बहुत सी गल्तियो का अहसास हुआ। मेरी रोज की दिनचर्या मे ढेरो ऐसी चीजे थी जिनके बिना दिन अधूरा लगता था। सबसे बडी जरुरत तो चाय की थी। दिन मे दो बार चाय पीना जैसे मजबूरी हो गयी थी। फिर बुद्धिजीवी होने के लिये काफी का सेवन भी अक्सर हो जाता था। पारम्परिक चिकित्सक मुझे दसो बार समझाते रहे कि मै चाय को अलविदा कह दूँ तो मेरा स्वस्थ्य सुधर जायेगा पर मै अनसुना करता रहा। इस बार मुझे अपनी भूल का अहसास हुआ। मैने एक झटके मे चाय छोडने का मन नही बनाया। मुझे पारम्परिक चिकित्सको की हिदायत फिर याद आयी कि शरीर जिसका आदी हो गया हो उसे धीरे-धीरे छोडना चाहिये ताकि उसे तकलीफ न हो। मैने चाय इसी तरह धीरे-धीरे छोड दी। यदि मै आम इंसान होता तो शायद झट से हर्बल टी पीना शुरु कर देता पर मुझे पारम्परिक चिकित्सको की यह बात जमती है कि शरीर को रोजाना किसी भी प्रकार के काढे की जरुरत नही है। जहाँ तक हो सके इन काढो से दूर रहा जाय। जब कोई रोग जकड ले तब ही विशेषज्ञो की राय के आधार पर हर्बल टी का प्रयोग करे। इससे उसका जबरदस्त प्रभाव होगा।

चाय पर शोध पर अपना जीवन कुर्बान करने वाले मेरे एक अमेरिकी वैज्ञानिक मित्र को जब मेरे चाय छोडने के विषय़ मे पता चला तो वे बोले कि देखियेगा, अब आप को दुबले होने से कोई रोक नही सकेगा। आम चाय से शरीर का हार्मोनल संतुलन बिगड जाता है जो यह असंतुलन मोटापे को बढाता है। मैने उन्हे धन्यवाद दिया और पूछा कि आप अपने इस शोध के बारे मे दुनिया को क्यो नही बताते? इस पर वे बोले कि यदि मै यह कह दूँ तो दुनिया से आम चाय का जहरीला कारोबार समाप्त हो जायेगा और हमारी जान पर बन आयेगी। इसलिये हम सब कुछ जानते हुये भी चाय के बारे मे अच्छी लगने वाली बाते घुमा फिरा कर दुनिया को बताने मजबूर है। (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

© सर्वाधिकार सुरक्षित

हड्डी रोगो की चिकित्सा मे जुटा एक गाँव, खरदा कन्द और संवर्धित ज्ञान की महत्ता

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-50
- पंकज अवधिया

हड्डी रोगो की चिकित्सा मे जुटा एक गाँव, खरदा कन्द और संवर्धित ज्ञान की महत्ता


इस जंगल यात्रा के दौरान मै एक ऐसे गाँव पहुँचा जहाँ लगभग सभी घरो मे हड्डी रोगो की चिकित्सा होती थी। बडी संख्या मे रोगी यहाँ एकत्र थे। रोगियो लगातार यहाँ आते रहते है। सडक पर पडे गुटखे के पाउच और चिप्स के पैकेट इसके प्रमाण थे। आज से दस-बारह साल पहले जब मै उस गाँव मे आया था तब केवल एक ही पारम्परिक चिकित्सक रोगियो को देखते थे। मैने उनसे लम्बी बात की थी और फिर अपने बाटेनिकल डाट काम वाले शोध दस्तावेजो मे उनके बारे मे विस्तार से लिखा था। वे इतने सहज थे कि रोगियो को जडी-बूटी के बारे मे बता देते थे। पर फिर भी रोगी उनके हाथो से ही उन जडी-बूटियो को लेना पसन्द करते थे। इतने सालो के बाद एक बार फिर वहाँ जाकर मै रोमांचित था। अपना देश इतना बडा है कि एक ही स्थान मे दोबारा जाना कम ही हो पाता है। शायद इस जन्म मे देश के सभी कोनो तक जाकर पारम्परिक चिकित्सको से मिलना सम्भव ही नही हो पाये पर जितना सम्भव हो उतना तो किया ही जा सकता है।

गाँव पहुँचने पर मैने उसी पारम्परिक चिकित्सक से मिलने का मन बनाया। मै उनके घर पहुँचा तो वहाँ नाममात्र की भीड थी। पारम्परिक चिकित्सक तो दिखे नही। हाँ, उनकी शक्ल से मिलती0जुलती शक्ल वाला एक व्यक्ति रोगियो को देख रहा था। वह उनका लडका था। शायद उसने मुझे पहले देखा हो। झट से पहचान गया और घर के अन्दर ले गया। अन्दर खाट पर वही पारम्परिक चिकित्सक लेटे हुये थे। बहुत उम्र हो गयी थी उनकी। मुझे देख वे उठ बैठे और हम चर्चा करने लगे।

यह गाँव जंगलो से घिरा हुआ था। “था” इसलिये कह रहा हूँ क्योकि इस यात्रा के दौरान मैने खेत ही खेत देखे। धान के खेत जिनमे खेती की तैयारी चल रही थी। खेतो मे बबूल के वृक्ष जमे हुये थे। हाँ, कुछ परसा और पडरी के वृक्ष भी थे जो इस बात का अहसास करा रहे थे कि यहाँ पहले जंगल था। इन दस-बारह सालो मे सब कुछ कितना बदल गया। जंगल को स्थानीय लोगो ने चूल्हे मे फूँक डाला। अब वे बहुत पछता रहे है। जंगल से उन्हे सब कुछ मिल जाया करता था। वे इसे बचाते हुये इसका दोहन कर सकते थे जैसा कि उनके पूर्वज पीढीयो से कर रहे थे। अब उन्हे लकडी से लेकर दवाओ तक के लिये शहर पर निर्भर रहना होता है। और इन सब के लिये जेबे ढीली करनी होती है। जंगल के विनाश ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को असंतुलित कर दिया है।

“मुफ्त मे ज्ञान बाँटना मेरे लिये अभिशाप बन गया साहब।” बुजुर्ग पारम्परिक चिकित्सक की बातो मे गहरा दर्द छुपा हुआ था। उन्होने रोगियो की बढती भीड को देखते हुये गाँव के ही कुछ लोगो को अपना ज्ञान बाँट दिया। ज्ञान का वितरण हो रहा है- ऐसा सुनकर दूर-दूर से लोग आये। पारम्परिक चिकित्सक ने उन्हे विधि विधान से सब कुछ बताया और उनसे शपथ करवायी कि किसी भी हालत मे वे चिकित्सा के पैसे नही लेंगे। उनके चेलो ने सब कुछ एकस्वर से स्वीकार किया। पर सभी ने इसका पालन नही किया। बहुत से चेले आज भी नि:शुल्क चिकित्सा कर रहे है पर उनके अपने गाँव के चेलो ने इसे व्यापार बना दिया। अब आप तो जानते ही है कि व्यापार मे सब कुछ सीधा सादा नही होता है। जिसमे छल प्रपंच न हो वह कैसे सफल व्यापारी होगा? उनके चेलो ने सबसे पहले गुरु को बदनाम करने की राह पकडी। उनके बारे मे उडा दिया गया कि वे इलाज कम और जादू अधिक करते है। फिर इलाज के लिये मोटी फीस तय कर दी गयी। अनपढ चेलो ने शहरो के पैथोलाजी लैब से सम्पर्क कर लिया। अब रोगी को वहाँ से जाँच करवानी पडती थी। शहर के कुछ आधुनिक चिकित्सक भी इस व्यापार मे भागीदार हो गये। चेलो का भला हुआ पर गुरु के पास रोगियो का टोटा हो गया।

खरदा कन्द नाम से पहचानी जाने वाली वनस्पति पूरे प्रदेश मे मिलती है। पारम्परिक हड्डी विशेषज्ञ इसे अक्सर प्रयोग मे लाते है। पर इसके अलावा भी इस वनस्पति के ढेरो उपयोग है। इसका प्रयोग अनगिनत पारम्परिक नुस्खो मे होता है। इनमे से बहुत से ऐसे नुस्खे है जो इसके बिना अधूरे माने जाते है। जब से राज्य मे नयी पीढी के हड्डी विशेषज्ञो की बाढ आयी है तब से इस कन्द का मिलना कम हो गया है। न केवल स्थानीय उपयोग के लिये इसे एकत्र किया जा रहा है बल्कि अब तो व्यापारी भी बडी मात्रा मे इसका एकत्रण करवाकर महानगरो मे भेज रहे है। व्यापारी अपने सम्पर्को को बता रहे है कि कैसे इस कन्द का प्रयोग करना है? इस कन्द का एकत्रण करने वालो का कहना है कि यदि यही स्थिति रही तो आने वाले कुछ सालो मे कन्द के लिये मारामारी मच जायेगी।

देश मे औषधीय और सगन्ध फसलो की व्यवसायिक खेती कर रहे किसान कुछ चुनिन्दा फसलो तक ही सीमित है। इन फसलो से उन्हे उतना अधिक लाभ नही हो पा रहा है। मै अपने लेखो के माध्यम से खरदा कन्द जैसी वनस्पतियो की खेती की सलाह देता हूँ ताकि किसान इससे लाभ प्राप्त कर सके और जंगलो पर दबाव कम हो सके।

मुझे याद आता है कि सरगुजा मे अपने वानस्पतिक सर्वेक्षणो के दौरान मैने इस कन्द पर आश्रित रहने वाले एक बीटल को देखा था। वहाँ के पारम्परिक चिकित्सको ने बताया था कि यह कीट केवल इस वनस्पति को खाता है और इसी पर अपना जीवन चक्र पूरा करता है। यदि यह वनस्पति समाप्त हुयी तो यह कीट भी समाप्त हो जायेगा। इस कीट और वनस्पति सम्बन्ध की यह विशेषता थी कि कीट पूरी तरह से वनस्पति को नष्ट नही करता है और वनस्पति ने भी इस कीट को नष्ट करने के लिये इतने लम्बे समय मे रसायन विकसित नही किये। पारम्परिक चिकित्सको के लिये कीट और वनस्पति दोनो ही उपयोगी है। कीटो का प्रयोग बहुत ही कम मात्रा मे औषधि के रुप मे वे करते है। जिन जंगलो से कन्दो को बडी मात्रा मे उखाडा जा रहा है वहाँ इस कीट की हालत क्या हो रही होगी, यह कल्पना से परे है। मै उनके व्यवहार पर निगरानी रखना चाहता हूँ पर दूसरे कार्यो के कारण यह सम्भव नही हो पा रहा है। काश! ऐसे समय मे कोई शोधार्थी सामने आता और इस महत्वपूर्ण कार्य को अपने हाथ मे ले लेता पर अपने देश मे तो सभी ने विदेश का रुख करने की ठानी है।

बहरहाल, उस गाँव के बुजुर्ग पारम्परिक चिकित्सक की ओर लौटे। उन्होने अपनी बात जारी रखते हुये कहा कि उनके पूर्वजो ने इस कन्द का एक ही तरह से उपयोग बताया था। इसके दूसरी तरह से उपयोग के विषय मे मुझे जानकारी नही है। प्रचलित विधि तो चेलो मे बँट गयी और वे चेले मेरे बेटे को आगे बढने नही दे रहे है। इससे ही मै निराशा मे हूँ। मैने खाट पकड ली है। पारम्परिक चिकित्सक की ये बाते निश्चित ही दुख पहुँचाने वाली थी। क्या मै उनकी मदद कर सकता था? हाँ, कर तो सकता था। पर कैसे?

मेरी शोध की कई विधियो मे से एक विधि यह रही है कि किसी नुस्खे के विषय मे जानकारी होने पर मै उसी नुस्खे की चर्चा जितने भी पारम्परिक चिकित्सको से मिलता हूँ, उनसे करता हूँ। पारम्परिक चिकित्सक अपने अनुभव के आधार पर उस नुस्खे के गुण-दोष बताते जाते है। इससे उस नुस्खे के विषय मे जानकारी बढती जाती है। एक पंक्ति का नुस्खा इस तरह कालांतर मे हजारो पन्नो का हो जाता है। गाँव के इस बुजुर्ग पारम्परिक चिकित्सक से दस-बारह साल पहले मैने जो खरदा कन्द का नुस्खा सीखा था उसके साथ भी मैने ऐसा ही किया। आज खरदा कन्द का यह सरल नुस्खा कम्प्यूटर की 50 एमबी से अधिक की फाइल की शक्ल ले चुका है। इसमे इस कन्द के हजारो प्रयोग है। इसे तीन सौ से अधिक वनस्पतियो के साथ प्रयोग करके शक्तिशाली बनाया जा सकता है। अब वह समय आ गया था कि मै इस बुजुर्ग पारम्परिक चिकित्सक का ज्ञान “संवर्धित ज्ञान” के रुप मे उन्हे वापस करुँ। मैने उन्हे इसके विषय मे विस्तार से बताना आरम्भ किया। अपने मूल ज्ञान के इस विस्तार को जानकर वे अचम्भित थे। उन्होने इसका कुछ अंश ही लिया और फिर आजमाने की बात कही। इससे निश्चित ही उनके रोगियो को अधिक लाभ होगा। उनकी आँखो मे आँसू थे। वे धन्यवाद दे रहे थे पर इसमे मेरा कोई विशेष योगदान नही था। मैने तो बस इस ज्ञान को संवर्धित करने मे अपनी छोटी सी भूमिका निभायी। यह अलग बात है कि इसे संवर्धित करने मे न जाने कितना धन जेब से चला गया पर इस बात का सुकून है कि यह “संवर्धित ज्ञान” असंख्य रोगियो की जान बचा पायेगा।

इस मूल ज्ञान के संवर्धन का अभी अंत नही हुआ है। अभी मुझे ना जाने कितने और पारम्परिक चिकित्सको से मिलना है और उनसे इस ज्ञान के विषय मे जानना है। खरदा कन्द के ज्ञान को जानने के बाद बुजुर्ग पारम्परिक चिकित्सक ने मुझे एक उपयोगी नुस्खा बताया। यह नुस्खा सिकल सेल एनीमिया से सम्बन्धित था। राज्य की 17 प्रतिशत से अधिक आबादी इस लाइलाज समझे जाने वाले रोग से प्रभावित है। बहुत से रोगी इस मर्ज को साथ लिये लम्बे समय तक जीवित रह जाते है। उन्हे समस्याए आती रहती है। इन्ही समस्याओ के समाधान के लिये बुजुर्ग पारम्परिक चिकित्सक ने यह नुस्खा बताया। मैने सिकल सेल एनीमिया पर बहुत कुछ लिखा है। मैने उन्हे धन्यवाद दिया और उम्मीद जाहिर की तो इस मूल नुस्खे को संवर्धित करके मै वापस लौटाने एक दिन फिर से आऊँगा। (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

© सर्वाधिकार सुरक्षित

Saturday, July 18, 2009

तीन बून्दो से डायबीटीज का शर्तिया इलाज, जामुन की बाते और विष की सफाई

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-49
- पंकज अवधिया

तीन बून्दो से डायबीटीज का शर्तिया इलाज, जामुन की बाते और विष की सफाई


“तीन बून्द, केवल तीन बून्द से किसी भी प्रकार की डायबीटीज का जड से इलाज हो सकता है।“मेरे एक मित्र को जब मधुमेह पर लिखी जा रही लम्बी-चौडी रपट के विषय मे पता चला तो उन्होने एक विशेषज्ञ के बारे मे यह बताया। मैने पूछा कि क्या वे पारम्परिक चिकित्सक है या आधुनिक चिकित्सक? वे बोले कि पारम्परिक चिकित्सक के आस-पास है। पूरी तरह से पारम्परिक चिकित्सक नही है। यदि आप चाहो तो मै आपको उनके पास ले चलता हूँ। तीन बून्द मे डायबीटीज का जड से इलाज, ऐसा दावा करने वाले से मिलने मे भला क्या बुराई है? विशेषज्ञ मेरे शहर से सैकडो किलोमीटर की दूरी पर थे। सो, मुँह अन्धेरे ही हम उस ओर निकल पडे।

काफी दूरी तय करने के बाद हम विशेषज्ञ के ठिकाने पर आ पहुँचे। हमने उन्हे आने के विषय मे बताया नही था। हम आम रोगी बनकर जाना चाहते थे। उनके घर के सामने कुछ रोगी बैठे हुये थे। वे सभी हमारी तरह दूर से आये थे। एक तैतीस वर्षीय रोगी ने बताया कि उसके पूरे परिवार को डायबीटीज है। वह एलोपैथी की दवाए तो खाता ही है साथ ही हर उस व्यक्ति की सलाह मानता है जो जडी-बूटी के बारे मे बताता है। उसने तीन महिने तक बेल की पत्तियो के रस का सेवन किया था। फिर बोगनवीलीया की पत्तियो का रस भी पी गया था। गेहूँ का रस पी रहा था और साथ ही नोनी जैसे उत्पाद पर भी पैसे बहा रहा था। हम उसकी प्रयोगधर्मिता पर भौचक्क थे। हमे उसके पैंक्रियाज पर भी दया आ रही थी। पता नही कैसे-कैसे दिन उसे और देखने होंगे?

वह युवक हमसे बाते करते वक्त बार-बार छोटी सी मशीन को शरीर मे चुभोने को आतुर दिखता था। मुझे तो वह मधुमेह से ज्यादा “मधुमेह के भय” का मारा दिखा। यह भय खतरनाक है। यदि रोगी पढा-लिखा हो तो यह भय मधुमेह से ज्यादा उस पर हावी हो जाता है। शरीर बेवजह ही बोझ महसूस करने लगता है। पता नही बेल की पत्तियो के रस ने उसके शरीर का क्या हाल किया होगा?

बहरहाल, विशेषज्ञ को अपने दवाखाने मे आने मे समय था तो हम गाँव भ्रमण के लिये निकल पडे। इस बार मानसून मे देरी के कारण जामुन अभी तक नही शहरो मे नही आया है। गाँव मे जामुन से वृक्ष लदे हुये थे। फलो को तोडकर शहर ले जाने की तैयारियाँ हो रही थी। ग्रामीणो ने बताया कि शहर मे जामुन हाथो=हाथ बिक जाता है। शहर रोगो का घर है और यह फल रोगो को दूर रखता है। मधुमेह मे इसकी विशेष भूमिका है। मधुमेह के रोगी तो इस पर टूट पडते है। पेट भरने के बाद भी इसे खाते रहते है इस तर्ज पर कि मानो आज ही उन्हे मधुमेह से छुटकारा मिल जायेगा। फिर वे गुठलियो को रख लेते है। साल भर गुठलियो का चूर्ण के रुप मे सेवन करते रहते है। बिना किसी से पूछे और बिना किसी को बताये। इस पर मधुमेह की चिकित्सा मे पारंगत पारम्परिक चिकित्सक खूब हँसते है। वे कहते है कि “जामुन खाने की कला” के बारे मे लोग नही जानते है। जामुन कब खाना, कब नही खाना, जामुन खाने के बाद क्या पीना और क्या नही पीना, भोजन मे किस तरह का परहेज करना आदि-आदि जाने और समझे बिना शहरी रोगी बस खाने के लिये टूट पडते है। जामुन की गुठली यदि ठीक से नही चुनी गयी हो तो पेट और किडनी की कई प्रकार की बीमारियाँ हो सकती है। जामुन प्राकृतिक है, इसके ये तो मायने बिल्कुल नही है कि इससे केवल लाभ ही होगा। यह औषधी है तो इसे खाने की विधि होगी। उम्र के अनुसार अलग-अलग मात्रा होगी।

सबसे पहले तो जामुन स्वाद लेकर आराम से खाना चाहिये। हडबडी मे ज्यादा जामुन खाने की बजाय आराम से खाये गये जामुन ज्यादा लाभदायक है। जामुन पके होने चाहिये न कि बाजार की माँग के अनुसार शाखाओ से गिराये गये अधपके जामुन। शहरो मे तो जामुन पर मख्खियाँ भिनभिनाती रहती है। जब ठेले वालो को डाँटो तो वे कहते है कि जामुन को ढककर रखेंगे तो लोग कैसे जान पायेंगे कि हम जामुन बेच रहे है। मुझे अपनी रपट याद आती है जिसमे मैने जामुन के उन पक्षो के बारे मे विस्तार से लिखा है जिनके बारे मे प्राचीन चिकित्सा विशेषज्ञ शायद लिखना भूल गये थे।

गाँव के भ्रमण के बाद हम वापस लौटे तो विशेषज्ञ आ चुके थे। वह तैतीस वर्षीय युवक दवा लेकर बाहर निकल रहा था। उसके पास दसो किस्म की दवाए थी। कुछ तो टीवी वाले बाबाओ के उत्पाद थे। मुझे तो तीन बून्द से इलाज की बात बतायी गयी थी। मित्र ने शांत रहने को कहा और हम विशेषज्ञ के सामने पहुँच गये। उन्होने थोडी बहुत जानकारी ली और फिर मुझे मधुमेह का रोगी घोषित कर दिया। नाडी देखकर बोले कि आपने खूब अंग्रेजी दवाए ली है। जबकि मै न तो मधुमेह का रोगी हूँ और न ही कोई दवा ली है। वे लम्बी-चौडी दवाओ की सूची लिखने मे व्यस्त हो गये। मुझसे रहा नही गया। मैने तीन बून्दो वाले इलाज की चर्चा छेड दी। वे बोले कि तीन बून्दो वाली दवा की कीमत हजारो मे है। मै पैसे देने के लिये तैयार हो गया पर पहले पूछा कि क्या इस बात की गारंटी है कि रोग पूरी तरह ठीक हो जायेगा और आजीवन किसी दवा की जरुरत नही होगी? मैने उनसे यह भी कहा कि यदि आप गारंटी दे तो मै आपकी सिफारिश सरकार से कर सकता हूँ। आप निश्चित ही पुरुस्कार और सम्मान के हकदार होंगे। इस पर वे बगले झाँकने लगे। बोले कि गारंटी नही है। मैने कहा कि क्या आप उन रोगियो की सूची दे सकते है जिन्हे लाभ हुआ है। उनका जवाब स्पष्ट नही था। वे मुझे टालने की कोशिश करने लगे।

अगले रोगी को वे आवाज देते इससे पहले मित्र ने राज खोला और मेरा परिचय दिया कि ये वैज्ञानिक है और मधुमेह से सम्बन्धित पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान की रपट बना रहे है। इन्होने करोडो पन्ने मधुमेह पर लिखे है और अभी भी लिख रहे है। विशेषज्ञ ने परिचय सुन हाथ खडे करना ही ठीक समझा।

मैने अपनी रपट मे हजारो पारम्परिक चिकित्सको से मुलाकात से प्राप्त अनुभव को शामिल किया है। मुझे एक भी ऐसा पारम्परिक चिकित्सक नही मिला जिसने कुछ दिनो या चन्द दवाओ से इस मर्ज को ठीक करने का दावा किया हो। ज्यादातर ने तो साफ शब्दो मे कहा कि यदि कोई ऐसा दावा करे तो वह महज लफ्फाजी होगी। मेरी रपट मे वनौषधीयो का वर्णन तो है ही पर साथ मे सही वनौषधीयो के चुनाव पर काफी विस्तार से लिखा गया है। वनौषधीयो के प्रयोग के साथ कैसा भोजन लेना है, यह भी महत्वपूर्ण है। आज का शहरी मधुमेह रोगी मनचाहा भोजन करता है। अंग्रेजी दवाए तो लेता ही है पर साथ ही अपने अधकचरे ज्ञान से जडी-बूटियाँ भी लेता रहता है। यह मधुमेह से लडने की शरीर की क्षमता को कम कर देता है। शरीर रसायनो के सामने धराशायी हो जाता है। रोग से लडने की उसकी इच्छाशक्ति एक तरह से मर जाती है। वह रसायनो पर आश्रित हो जाता है। शरीर की एक बार ऐसी दशा हो गयी तो इससे बाहर निकलना बडा ही मुश्किल होता है। मधुमेह का पता लगते ही दवाओ का आश्रय लेने की बजाय शरीर को स्वस्थ्य बनाने की ओर ध्यान देना चाहिये। ऐसा करने से कुछ समय मे ही मधुमेह से लडने के लिये शरीर तैयार हो जाता है। फिर विशेषज्ञो की राय लेकर ही वनौषधीयो का सेवन करना चाहिये। सही विशेषज्ञो की सलाह लेनी चाहिये। कमीशन का काम करने वालो से बचके रहना चाहिये। चाहे उनका कितना भी बडा नाम क्यो न हो। एक बार मे एक वनौषधी से शुरुआत सही होती है। ऐसा नही कि आप नीम भी ले, बेल भी और जामुन भी। मौसमी फलो को ले। साल भर नाना प्रकार के फल मिलते रहते है। जब जामुन का मौसम न हो तो किसी भी रुप मे जामुन खाने की बजाय उस मौसम का फल खाइये।

अपने रोगियो को निपटाने के बाद विशेषज्ञ मेरी ओर मुखातिब हुये। हाथ जोडकर बोले कि आपने इस विषय मे इतना लिखा है इसलिये आपसे एक विनती है। मै तीन बून्दो वाला नुस्खा आपके सामने रखना चाहता हूँ, आप अपनी राय बताये। मेरे हामी भरने पर वे बोले कि मै बोगनवीलिया की पत्ती, उस काँटे वाली वनस्पति की पत्ती और आइक्सोरा के फूल का रस रोगियो को देता हूँ। उस काँटे वाली वनस्पति की पहचान मैने आमतौर से बागीचे मे उगने वाले सेंसीवेरिया के रुप मे की। मैने उनसे कहा कि आप किस आधार पर इन तीनो को मिलाते है? बोगनवीलिया और सेंसीवेरिया तो भारतीय मूल की वनस्पति नही है। आइक्सोरा की यह प्रजाति भी भारतीय नही लगती है। यह भारतीय पारम्परिक ज्ञान नही है। बोगनवीलिया को मधुमेह के लिये उपयोगी आजकल लोग बताने लगे है पर इसका कोई वैज्ञानिक और पारम्परिक आधार नही मिलता है। सेंसीवेरिया को जहरीला पौधा माना जाता है। विदेशो मे तो विशेषज्ञ इसे घर के बागीचे मे न लगाने की सलाह देते है क्योकि यह बच्चो और पालतू जानवरो के लिये नुकसानदायक हो सकता है। आइक्सोरा से मधुमेह के इलाज के विषय मे भी मुझे संश्य ही है। इस पर विशेषज्ञ ने कहा कि मैने अपनी परिकल्पना के आधार पर इसे बनाया है। मैने बिना देरी के कहा कि यह आपकी परिकल्पना न जाने कितनो के लिये अभी तक जानलेवा साबित हो चुकी होगी। भगवान जाने ऐसा मनमाना मिश्रण शरीर के अन्दर क्या गुल खिला रहा होगा? यह तो सरासर अपराध है मानव जीवन से खिलवाड का।

इस बीच दूसरे गाँव वाले भी आ गये। उन्होने मेरी बात सुनी तो विशेषज्ञ को समझाया कि भगवान का दिया सब कुछ है फिर चन्द पैसो के लालच मे यह गलत काम क्यो कर रहे हो? मुझे बताया गया कि वह विशेषज्ञ (अब तो उसे विशेषज्ञ कहना भी बेमानी लगता है) दसो एकड जमीन का मालिक है। धान और वनोपज का खरीददार है। उसकी ट्रके चलती है। महुवे की शराब और मुर्गियो का कारोबार है। और न जाने क्या-क्या धन्धे है। लडका फर्जी चिकित्सक है। बाप-बेटे मिलकर इस तीन बून्द वाले नुस्खे से लोगो को बेवकूफ बनाते है। इसके लिये बकायदा उन्होने आदमी रखे हुये है जो शहरो से रोगी पकड के लाते है।

मेरे मित्र भी सब कुछ सुन रहे थे। उन्होने कुछ दिनो पहले ही तीन बून्दो का सेवन किया था। मेरी बाते सुनकर उन्हे उबकाई आने लगी। मानो अभी वे बून्दे पेट मे हो। वे बडा असहज महसूस कर रहे थे। मै उन्हे लेकर डूमर के वृक्ष के पास गया जहाँ बन्दरो ने फल खाकर नीचे फेके थे। ताजे डूमर के फल एकत्र किये और छककर खाये। मित्र ने पूछा कि इससे तीन बून्दो का जहर तो उतर जायेगा पर क्या मधुमेह मे भी लाभ होगा? मैने कहा कि इससे शरीर को लाभ होगा। शरीर को लाभ होगा तो मधुमेह मे लाभ तो होगा ही। (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

© सर्वाधिकार सुरक्षित

लाखो की नाग मणियाँ, गोरोचन वाली गायो की हत्या और वशीकरण के दीवाने

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-48
- पंकज अवधिया

लाखो की नाग मणियाँ, गोरोचन वाली गायो की हत्या और वशीकरण के दीवाने


“मेरे पास दो नाग मणियाँ है। मैने इन्हे बीस लाख रुपये मे खरीदा है। क्या आप इसे एक करोड रुपयो मे बिकवा देंगे?” ये पंक्तियाँ है उन पत्रो मे से एक की जो मुझे अक्सर मिलते रहते है। ऐसे ई-मेल सन्देश भी मिलते रहते है। मै अक्सर इन्हे अनदेखा कर देता हूँ। पर इस बार हद हो गयी। एक व्यक्ति घर आ पहुँचा इन तथाकथित मणियो के साथ। पहले से मिलने का समय तय नही था इसलिये मैने इंकार कर दिया। वह सुबह से शाम तक घर के सामने बैठा रहा। शाम को मै क्लब जाने के लिये निकला तो उसे साथ मे बैठा लिया। गाडी चल पडी। मैने साफ शब्दो मे कह दिया कि मै इन पर विश्वास नही करता हूँ। आप मुझसे कोई उम्मीद नही रखे। उस व्यक्ति ने कहा कि आप एक बार मणियो को देख ले। बीस लाख की मणियो को देखने का लोभ मै भी नही छोड पाया। गाडी वापस मोडी और घर आ गया। उसने मणियाँ मेरे सामने रख दी और कहा कि आस-पास के सारे प्रवेश द्वार बन्द कर दो ताकि कोई सर्प न आ सके। व्यक्ति की बाते असाधारण थी पर मणि एकदम साधारण थी। मैने इसे पिताजी को दिखाने का मन बनाया। पिताजी भू-वैज्ञानिक है। मैने उन्हे बुलाया।

मणियो को देखकर पिताजी के चेहरे के भाव बदल गये। वे मणि को कम और उस व्यक्ति को ज्यादा देखने लगे। उनकी आँखो मे क्रोध के भाव थे। उस व्यक्ति ने पूरी कहानी सुनायी। बताया कि कैसे जान जोखिम मे डालकर उसने यह मणि प्राप्त की। उसने जब इसकी कीमत बीस लाख बतायी तो पिताजी से नही रहा गया। वे अपने कमरे मे गये और मुठ्ठी बाँधे वापस आये। जब उन्होने मुठ्ठी खोली तो उसमे ढेरो वैसी ही मणियाँ थी। यदि उस व्यक्ति वाली की कीमत लगाये तो करोडो की मणियाँ सामने बिखरी पडी थी। पिताजी ने कहा कि इन सब को बेच डालो, मै सब पाँच सौ रुपयो मे देने को तैयार हूँ। तुम एक-एक के बीस लाख ले लेना। उस व्यक्ति को काटो तो खून नही। उसने मणियाँ समेटी और जाने के लिये खडा हो गया। मेरी ओर मुखातिब होकर पिताजी ने कहा कि अपनी कालेज की पढाई के दौरान उन्होने उडीसा से ये नमूने एकत्र किये थे। ये उडीसा की पहाडियो मे यूँ ही पडे रहते है, रत्नो की खदानो के आस-पास। हम लोग के समय इसे अंगूठी मे लगाया जाता था। इस ठग ने इसे नाग मणि बना डाला। अभी पुलिस मे शिकायत करो ताकि यह दूसरो को न ठग पाये। बात आयी-गयी हो गयी। उस व्यक्ति को सबक मिल गया था। मुझे नयी जानकारी। हाँ, शाम का मेरा टेबल टेनिस खेलना चूक गया था।

तंत्र से जुडी बहुत सी ऐसी वस्तुओ का जबरदस्त बाजार है। इंटरनेट ने इस बाजार मे चार चाँद लगा दिये है। आप लेखो और दूसरे माध्यमो से जितना भी लोगो को जगाने की कोशिश करे सारे प्रयास इनकी मार्केटिंग के सामने असफल सिद्ध होते है। तंत्र के लिये गोरोचन का प्रयोग किया जाता है। मैने अपने लेखो मे लिखा है कि गोरोचन वाली गाय मुश्किल से मिलती है। गाँव वाले ऐसी गायो को विशेष महत्व देते है। देश के कई भागो मे इनकी पूजा भी की जाती है। इनका धार्मिक महत्व है। पर तंत्र से जुडे लोग गोरोचन से वशीकरण और मोहनी कार्यो को अंजाम देने का दावा करते है। इसके लिये गोरोचन की मुँहमाँगी कीमत दी जाती है। ग्रामीण इस बात को जानते है। बहुत से लालची ग्रामीण ऐसी गायो को जहर देकर मारने मे देर नही करते है। पैसे के आगे सब अन्धे हो जाते है। मैने अपने सर्वेक्षणो के माध्यम से अस्सी से अधिक ऐसी गायो की पहचान की थी। ये गाये अलग-अलग गाँवो मे थी।

मुझे एक बुजुर्ग पारम्परिक चिकित्सक ने बताया कि ऐसी गायो का मूत्र विशेष औषधीय गुणो से परिपूर्ण होता है। बतौर औषधि इस मूत्र का प्रयोग किया जाता है। सफेद दाग मे भी इस मूत्र का प्रयोग होता है। उन बुजुर्ग पारम्परिक चिकित्सको ने कहा था कि जहाँ भी ऐसी गाये मिले उनके लिये मै मूत्र लेता आऊँ। मैने बहुत बार ऐसा किया है और आज भी करता हूँ। जटिल रोगो से जूझ रहे रोगियो को ऐसी गायो की सेवा करने की सलाह दी जाती है। उनसे गायो को दिन मे कई बार स्पर्श करने की सलाह दी जाती है। पता नही इसका विज्ञान क्या है पर मैने रोगियो को लाभ होते देखा है।

जब से छत्तीसगढ अलग राज्य बना है तब से अचानक ही तांत्रिक गतिविधियो के लिये गोरोचन की माँग अचानक से बढी है। कनाडा और जर्मनी जैसे देशो से लोग पर्यटको के रुप मे आकर गोरोचन की माँग कर रहे है। परिणामस्वरुप गोरोचन वाली गायो की संख्या कम होती जा रही है। मैने ही बीस से ज्यादा गाये खोयी है।

आप गोरोचन की टीका लगाये बहुत से लोगो को महानगरो मे देखेंगे। पता नही इससे वे किसी को मोह पाते है या नही पर एक निरीह जीव को मारकर ऐसा काम करने वाले शायद ही अच्छा जीवन जी पाते हो। तंत्र के बढते मायाजाल का विरोध बहुत बडे पैमाने पर करना होगा तभी हम कुछ हद तक सफल हो सकते है।

कल ही क्लब मे एक स्थान पर भीड को देखकर मैने पूछा कि क्या माजरा है? मुझे देखते ही एक सज्जन बोले कि इनको दिखाओ, ये बता पायेंगे कि ये असली है या नही? एक धनाढ्य़ व्यक्ति नीले कपडो मे कुछ रखे हुये थे। मुझे देखकर बोले कि आप कुछ समय निकालकर मेरे घर पधारे तब मै इनका राज बताऊँगा। पास ही उनका घर था सो उनके साथ चल पडा। जब उन्होने नीले कपडे को खोला तो मेरी आँखे फटी की फटी रह गयी। वे बोले कि ये नाग मणियाँ है। अब मेरी सारी इच्छाए पूर्ण हो जायेगी। पैसा ही पैसा होगा। कुबेर का खजाना भी कम पड जायेगा। मैने इन मणियो को पहचान लिया। सेठ जी ने कुछ लाख रुपयो मे इन्हे खरीदी थी। वह ठग अपना काम कर गया था। मुझे पिताजी की बात याद आ गयी कि जब तक इस दुनिया मे बेवकूफ है, ठग कभी भूखे नही मरेंगे। (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

© सर्वाधिकार सुरक्षित

Friday, July 17, 2009

साँपो के आगे बेबस जडी-बूटियाँ और घायल साँप के आगे बेबस हम

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-47
- पंकज अवधिया

साँपो के आगे बेबस जडी-बूटियाँ और घायल साँप के आगे बेबस हम


“ये बीस जडी-बूटियाँ है। आप इन्हे घर ले जाइये और निश्चिंत हो जाइये। एक भी साँप नही आयेगा। आप पन्द्रह हजार रुपये दे दे। मै अभी इसे पालीथीन मे बाँध देता हूँ।“ उडीसा के एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल पर मै कल ही एक जडी-बूटी विक्रेता से चर्चा करने के लिये रुका था। बीस जडी-बूटियो के लिये पन्द्रह हजार कुछ ज्यादा नही है-मेरे प्रश्न पर विक्रेता थोडा नाराज हो गया और बोला कि आप तो किस्मत वाले हो जो इतने सस्ते यह मिल रही है। आप इतनी दूर से आये हो इसलिये सस्ता किया है। मैने कहा कि इतने सारे पैसे तो मेरे पास नही है। फिर उसने मोल-भाव शुरु कर दिया। इस बीच पास की बस्ती से कुछ शोर सुनायी दिया। धीरे-धीरे शोर हमारी ओर आने लगा। “साँप, साँप” की आवाज सुनकर हम चौकन्ने हो गये। देखा तो एक काला सा बडा साँप आया और जडी-बूटियो के बोरे के नीचे छुप गया। हम हडबडा गये। जब कुछ हल्ला शांत हुआ तो देखा कि विक्रेता दूर मे खडा है। जान मे जान आने के बाद याद आयी कि पन्द्रह हजार की बीस जडी-बूटियो के रहते भला कैसे साँप घुस गया? हम विक्रेता पर टूट पडे। वह घबरा कर बोला कि इस साँप पर असर नही होता बाकि सब साँप पर असर होता है।

पास मे एक मन्दिर था जहाँ काँवडिये बडी संख्या मे जल अभिषेक के लिये आ रहे थे। इन काँवडियो मे से कुछ के पास नाग साँप थे। वे साँप को दूध के पात्र मे कुछ समय तक डुबो देते थे और फिर दूध प्रसाद के रुप मे वितरीत कर दिया जाता था। मेरे कैमरे को देखते ही कुछ साँप वाले सक्रिय हो गये। उन्होने साँप पर चोट की और साँप गुस्से मे फन काढकर डसने की मुद्रा मे खडा हो गया। मैने इस मुद्रा मे साँप की अनगिनत तस्वीरे ली है पर फिर भी मन रखने के लिये मैने फ्लैश चमका दिया। नाग को देखकर मन मे आया कि फिर से जडी-बूटी विक्रेता के पास लौटा जाये और उसकी जडी-बूटियो को इस पर आजमाया जाये। हमे फिर से आता देख विक्रेता दुकान समेटने लगा। हमने नाग उसकी दुकान मे छोड दिया। वह बडे मजे से घूमता रहा। सभी जडी-बूटियाँ उस पर रखी एक-एक करके पर किसी ने भी असर नही दिखाया। विक्रेता के पास अभी भी इसका कारण था। उसने बेशर्मी से कहा कि नाग पर इनका असर नही होता है, बाकि सब पर होता है। लो कर लो बात। यह तो सरासर बेशर्मी है। हमने कडाई बरती तो वह जमीन पर आ गया और कहने लगा कि क्यो गरीब आदमी के पेट पर लात मारते हो?

आज रायपुर के अखबार दैनिक छत्तीसगढ ने उस जडी-बूटी की बडी सी तस्वीर प्रकाशित की जिसके बारे मे मैने पिछले लेखो मे लिखा है। अखबार ने प्रमुखता से यह प्रकाशित किया कि इससे साँप नही भागते है इसलिये आम नागरिक इसे न खरीदकर पर्यावरण के प्रति अपनी जागरुकता का परिचय दे। इस पर राजधानी मे व्यापक प्रतिक्रिया हुयी है। बहुत से फोन आये। कुछ फोन उन लोगो के भी थे जो इस तरह की जडी-बूटियो के व्यापार मे लगे है। उनका कहना था कि क्यो गरीब के पेट मे लात मारते हो? हमे अपना धन्धा करने दो।

कल की जंगल यात्रा के दौरान एक बहुत ऊँची पहाडी पर जाना हुआ। चढते-चढते पैरो मे गाँठ पड गयी, दम फूल गया। मै जिस स्थानीय पारम्परिक चिकित्सक के साथ था वे मजे से चढ रहे थे। काफी चढाई के बाद हम समतल स्थान पर पहुँचे जहाँ घना जंगल था। हम सोनपाठा की तलाश मे आये थे। पारम्परिक चिकित्सक उम्र के अंतिम पडाव मे थे। हाल ही मे गर्मियो के दिनो मे वे इस पहाडी मे आये थे तो लू के कारण वे बेहोश हो गये थे। रात उन्होने जंगल मे काटी और दूसरे दिन बडी मुश्किल से लौटे। घर वालो के मना करने के बावजूद वे मेरे साथ चल पडे। स्थानीय लोगो ने बताया कि इस क्षेत्र मे जडी-बूटियो की प्रचुरता होने के कारण बहुत से पारम्परिक चिकित्सक है। वे अपने ज्ञान से रोगियो को आराम पहुँचाने की कोशिश करते है। यदि असफल हो जाते है तो रोगियो को इस बुजुर्ग पारम्परिक चिकित्सक के पास भेजा जाता है। वे सोनपाठा के प्रयोग से उन्हे ठीक कर देते है। यह मेरे लिये आश्चर्य का विषय था कि क्या सभी रोगो की जटिल अवस्था मे सोनपाठा का विवेकपूर्ण प्रयोग इतना उपयोगी है?

बुजुर्ग पारम्परिक चिकित्सक ने बताया कि वे सोनपाठा के सैकडो नुस्खे जानते है। इन नुस्खो की सहायता से वे सभी रोगो की चिकित्सा कर रहे है कई दशको से। वे बोले कि पहले सोनपाठा के बहुत से वृक्ष थे जंगल मे पर धीरे-धीरे वे समाप्त होते गये। पता नही किसने यह अफवाह फैला दी है कि इससे साँप भागते है। अब सबके सब साँप के लिये इसे एकत्र करते है। यहाँ से व्यापारी बडी मात्रा मे इसे ले जाते है और फिर शहरो मे बेच देते है। शहरो मे लोग इसे अपने घरो मे रख देते है और पडे-पडे इसके फल सड जाते है। पहले पहाडी के नीचे ही यह मिल जाता था पर अब जंगल मे बहुत दूर जाना पडता है।

पहाडी पर कुछ जडी-बूटी संग्रहकर्ता मिले तो बुजुर्ग पारम्परिक चिकित्सक ने उनके हाथो मे सोनपाठा के फल देखकर उन्हे खूब खरी-खोटी सुनायी। फिर मुझे कहने लगे कि यदि यह सब जारी रहा तो मै रोगियो के लिये कुछ नही कर पाऊँगा। मेरे अनगिनत नुस्खे बेकार चले जायेंगे। मैने दशको से हजारो सोनपाठा के वृक्षो की सेवा की है। उन्हे जडी-बूटियो के घोल से सींचा है ताकि वे दीर्घायु हो। भरी बरसात मे उन्हे देखने गया पर मै अपने ही (मानव) समाज से उनकी रक्षा नही कर पाया। उनकी आँखो मे अफसोस के भाव थे जबकि इसमे उनकी कोई गल्ती नही थी।

बुजुर्ग पारम्परिक चिकित्सक की इन बातो ने स्थिति साफ कर दी थी। मुझे यह आभास हो गया था कि असंख्य रोगियो की रक्षा के लिये सोनपाठा जैसी वनस्पतियो की रक्षा जरुरी है। इसके गलत व्यापार को रोकने की जरुरत है चाहे इसके लिये कठोर से कठोर कदम क्यो न उठाने पडे। मैने सोनपाठा पर लिखे लेखो को अपने एक उडीया मित्र को भेजा है। वे इसका उडीया मे अनुवाद कर देंगे और उडीसा मे प्रकाशित करवा देंगे। मुझे उम्मीद है कि इससे कुछ जागरुकता अवश्य आयेगी।

रात को लौटते समय हमे लम्बी सी छडीनुमा कोई चीज सडक पर दिखायी दी। हम सब अनुमान लगाते रहे। फिर सबने मान लिया कि यह किसी वृक्ष की शाखा होगी। हम चलते रहे। पास आने पर ड्रायवर को कुछ शक हुआ। उसने जबरदस्त ब्रेक लगाया। वह साँप था। ऐसा लम्बा साँप मैने अपने जीवन मे पहले कभी नही देखा था। वह किसी गाडी के नीचे आकर घायल हो चुका था। हम कुछ देर रुके रहे। ड्रायवर ने कौतुहलवश नीचे उतरकर उसे पास से देखना चाहा। वह कुछ आगे ही बढा था कि साँप उस पर झपटा। अब भला साँप को क्या पता कि उसे कुचलने वाले हम नही थे। ड्रायवर बाल-बाल बचा। हमने गाडी पीछे मोडी और पास के गाँव मे इसकी खबर दी।

गाँव के कुछ मनचले युवक नशे मे धुत ताश खेल रहे थे। वे हम पर खूब हँसे और बोले कि गाडी निकाल दो उसके ऊपर से। पर गाँव के सरपंच ने कुछ बैगाओ को बुलाया और फिर हम सब उस दिशा मे चल पडे। उनके चेहरे के हाव-भाव से यह साफ था कि उन्होने भी ऐसा साँप पहले पहल देखा था। एक बुजुर्ग ने बताया कि उन्होने इसके बारे मे पुरानी कथाओ मे सुना था। साँप को एक डंडे से उठाकर किनारे कर दिया गया। कुछ पत्थर रख दिये गये। सरपंच ने हमे रात रुककर सुबह इस साँप के अंतिम संस्कार मे भाग लेने का अनुरोध किया। हमारे लिये रुकना सम्भव नही था। उन्होने हमे और हमने उन्हे धन्यवाद दिया।

मुझे मालूम है कि आज उस साँप का विधि-विधान से अंतिम संस्कार हुआ होगा। शायद भोज भी हुआ हो पर मेरी इच्छा थी कि हम उस घायल साँप की जान बचाने के लिये कुछ करते। शायद मै विधिवत प्रशिक्षण प्राप्त साँप विशेषज्ञ होता तो यह कर पाता। रात भर नीन्द नही आयी। बस यही सोचता रहा कि काश मेरा ज्ञान उस असहाय जीव के लिये कुछ कर पाता। (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

© सर्वाधिकार सुरक्षित

Wednesday, July 15, 2009

रीठा की घटती संख्या, सरल प्रयोग और ग्रामीणो की शपथ

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-46
- पंकज अवधिया

रीठा की घटती संख्या, सरल प्रयोग और ग्रामीणो की शपथ


“हमारे यहाँ पीढीयो से मिठाई का कारोबार है। मिठाई वाले के घर मे रीठा का होना जरुरी है। बताशे तो रीठा के बिना बनाये ही नही जा सकते। यह मैल को साफ करता है। मैने यह धन्धा छोड दिया है। अब खेती पर ही पूरा ध्यान है। पहले रीठा के बहुत से वृक्ष जंगल और गाँव मे थे पर अब इसका उपयोग कम होने से केवल यही वृक्ष बचा है, वह भी आँधी-तूफान की मार से आधे से टूट गया है।“ एक ग्रामीण अधेड मुझे जंगली क्षेत्र का एकमात्र रीठा वृक्ष दिखाते हुये यह कह रहे थे। उन्हे भी आश्चर्य हो रहा था कि कहाँ शहरी बाबू इतनी दूर उनके घर मे आ गये, वह भी बिन बताये। मुझे रीठा की तस्वीरे लेती देख भीड एकत्र हो गयी। इस बीच रीठा के फल ले आये गये और जब तक मै अपना काम खत्म करता तब तक कई हाथ पानी मे रीठा को मलकर झाग बना चुके थे। वे चाहते थे कि मै झागयुक्त हाथो की तस्वीरे लूँ। मैने उन्हे निराश नही किया। भीड मे कुछ बच्चे भी थे जिन्हे रीठा के बारे मे ज्यादा कुछ मालूम नही था। वे बाल धोने के साबुन का प्रयोग करते थे पर यह उन्हे नही मालूम था कि उस साबुन मे उपस्थित रीठा उनके घर के पिछवाडे मे ही उग रहा है।

रीठा की माला अक्सर लोगो के गलो मे दिख जाती है। मान्यता है कि यह माला बुरी नजर से बचाती है। छत्तीसगढी गीतो मे रीठा का जिक्र बार-बार आता है। आज छत्तीसगढ मे रीठा के वृक्ष तेजी से कम होते जा रहे है। रायपुर के मिठाई निर्माता काफी हद तक दूसरे प्रदेशो से मंगाये गये रीठा पर निर्भर है। जब मैने पारम्परिक चिकित्सको से इस बारे मे पूछा तो उन्होने दो टूक कहा कि जंगल के लकडी माफिया को जो लकडी मिली उसे काट लेते है। उनके औषधीय महत्व से उन्हे कुछ लेना-देना नही है। मैने रीठा से सम्बन्धित पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान पर काफी कुछ लिखा है।

“क्या अब यह इकलौता वृक्ष बचा रहेगा?” मैने इस वृक्ष के मालिक से पूछा। उन्होने कहा कि बिल्कुल बचा रहेगा, अब शहर के लोग इतनी दूर से आकर तस्वीरे ले रहे है तो इसे बचाना ही होगा। अब तो अगले साल से मै इसे फैलाऊँगा भी। मुझे यह सुनकर तसल्ली हुयी। मैने साथ चल रहे पारम्परिक चिकित्सको से कहा कि इन्हे रीठा के कुछ असाधारण प्रयोग बता दे ताकि यह रीठा साल दर साल पूरे गाँव की मदद कर सके। पारम्परिक चिकित्सको ने दस आम रोगो मे रीठा के सरल प्रयोगो के विषय़ मे बता दिया। भीड ने हमे घेर लिया। उन्हे लगा कि हम उनके सारे रोगो की चिकित्सा कर सकते है।

गाँव मे बहुत से लोगो के पैरो मे सडन वाला रोग दिखा। वे कहने लगे कि उन्होने रायपुर जाकर हजारो फूँक दिये है पर कुछ समय तक दबा रहने के बाद यह रोग फिर उभर जाता है। यह सडन रोग इतना भयावह था कि दूर से तेज बदबू आ रही थी। यह खेतो मे लगातार काम करने की वजह से नही हुआ था। पानी से हुये जख्म को तो साधारण देशी नुस्खो से ठीक किया जा सकता है। साथ मे पारम्परिक चिकित्सक थे पर भीड मुझे ज्यादा बडा जानकार मान रही थी। हमने कोने मे जाकर इस बारे मे विचार-विमर्श करने का मन बनाया।

रायपुर के प्रसिद्ध होम्योपैथ डाँ बी.आर.गुहा के साथ अनुभव लेते वक्त मैने सैकडो ऐसे रोगियो को देखा था। गुहा जी कहते थे कि इन्हे एक दवा से ठीक किया जा सकता है पर ऐसा करने से रोग दूसरे रुप मे कही और से निकल जायेगा। दूसरा रास्ता है आराम से सही तरीके से रोग का जड से इलाज। पर दूसरे रास्ते के लिये रोगी तैयार नही होते थे। उन्हे जरा भी धैर्य नही होता था। एक-दो दिन मे लाभ नही दिखने पर वे दूसरे डाक्टर के पास चले जाते थे। गुहा जी सिद्धांतवादी थे। चाहे कुछ भी हो जाये वे दूसरा रास्ता ही चुनते थे। बाद मे देश भर के पारम्परिक चिकित्सको को भी मैने इस रोग की चिकित्सा करते देखा। ज्यादातर पारम्परिक चिकित्सक त्वचा रोगो के लिये बाहरी उपचार के साथ आँतरिक उपचार की पैरवी करते है। बल्कि आँतरिक उपचार को अधिक महत्व देते है। वे कहते है कि पहले रोगी से विस्तार से पूछ लो कि उसका खान-पान क्या है? यदि गौर किया जाये तो इस खान-पान मे ही ऐसी भोज्य सामग्री मिल जायेगी जो रोग को बनाये रखने मे सक्षम है। इस भोज्य सामग्री पर रोक लगा कर रोगी को काफी आराम पहुँचाया जा सकता है। फिर रोगी को रोगानुसार भोजन सामग्री सुझा दी जाये ताकि औषधीय मिश्रणो का लाभ अधिक से अधिक हो। पारम्परिक चिकित्सको के पास भी तुरंत आराम पहुँचाने वाली वनस्पतियाँ होती है पर वे इनका प्रयोग कम ही करते है।

इसी आधार पर इस जंगल यात्रा के दौरान मैने साथ चल रहे पारम्परिक चिकित्सको से चर्चा की। वे नयी पीढी के पारम्परिक चिकित्सक थे। वे चाहते थे कि रीठा और हर्रा के हरे फलो के लेप से रोगी को तुरंत आराम पहुँचाया जाये। काफी चर्चा के बाद मैने उनकी बाते स्वीकार कर ली और हमने तय किया कि रोगियो को वनस्पतियो के विषय मे बिना बताये हम लेप का बाहरी उपयोग करेंगे और फिर उनके खान-पान मे सुधार का सुझाव देंगे। रोगियो की कतार लग गयी। लेप तैयार हो गया तो प्रयोग भी आरम्भ हो गया। बीस से अधिक रोगियो का उपचार किया गया। लेप लगाने के बाद वे मेरे पास आते और मै उनके खान-पान मे गडबडी की पडताल करता। तीन घंटे इसी सब मे व्यतीत हो गये। जब हम अपना काम पूरा करके गाडी की ओर बढे तो लोगो ने संकोच से पूछा कि पैसा नही लेंगे? मै तो पैसे लेने से रहा। पारम्परिक चिकित्सको ने भी मना कर दिया। हाँ, उन्होने ग्रामीणो से शपथ लेने को कहा कि वे रीठा का प्रसार करेंगे। ग्रामीणो ने एक स्वर मे इसे स्वीकार कर लिया।

तीन घंटे के इस विलम्ब से दिन भर का सारा कार्यक्रम गडबडा गया। जहाँ कही भी हम जडी-बूटी की बात करते है वहाँ रोगियो की लम्बी कतार लग जाती है। लो-प्रोफाइल चलने मे ही भलाई है पर ज्ञान की झलक तो लोगो को मिल ही जाती है। इतने सारे लोगो का दुख-दर्द देखकर इंकार करते भी नही बनता। आजकल ग्रामीणो के खान-पान मे पारम्परिक भोज्य सामग्रियाँ कम हो गयी है। यही उनमे बढते रोगो का कारण भी है। जब उन्हे आस-पास उग रही वनस्पतियो के साधारण प्रयोग बताये जाते है तो उन्हे इस पर विश्वास नही होता है। पर जब वे इन्हे आजमाते है तो उन्हे स्थायी लाभ होता है। मसलन, वात रोगो के लिये उपयोगी चरोटा भाजी खेतो और मेडो मे बिखरी पडी है। पहले इसे चाव से खाया जाता था पर आज की पीढी जहरीली रसायनयुक्त सब्जियाँ खरीदकर खाती है। चरोटा का नाम सुनते ही वे नाक-भौ सिकोड लेते है। पारम्परिक चिकित्सक अपने अनुभव से बताते है कि साल के कुछ महिनो तक साग के रुप मे इसका नियमित प्रयोग साल भर वात रोगो से सुरक्षा प्रदान करता है।

मुझे लगता है गाँवो मे बाहर से स्वास्थ्य सुविधा पहुँचाने की बजाय गाँव मे ही उपस्थित वनस्पतियो के साधारण पर प्रभावी प्रयोगो के विषय मे जागरुकता लानी चाहिये। अभी कुछ दशक पहले तक इन वनस्पतियो का महत्व ग्रामीण भारत अच्छे से समझता था पर अचानक ही सब कुछ बदल गया और इसकी बहुत बडी कीमत उन्हे चुकानी पड रही है। (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

© सर्वाधिकार सुरक्षित

साँपो के डर के कारण विलुप्त होती गरुड जडी और इसे बचाने की मुहिम

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-45
- पंकज अवधिया

साँपो के डर के कारण विलुप्त होती गरुड जडी और इसे बचाने की मुहिम


यदि आपको पता चले कि पूरे जंगल से जो वनस्पति लुप्त हो चुकी है वह पास के गाँव के एक घर मे सुरक्षित है तो आप तुरंत ही उस ओर चल पडेंगे। मैने भी ऐसा ही किया। जिस वनस्पति के बारे मे ऐसा कहा जा रहा था वह आयुर्वेद के दृष्टिकोण से भी अति महत्वपूर्ण है। प्रसिद्ध दशमूल योग इस वनस्पति के बिना अधूरा है। यह वनस्पति है सोनपाठा। मेरे देखते ही देखते एक दशक के अन्दर इसकी संख्या मे अप्रत्याशित कमी आयी है। अभी भी बडी मात्रा मे इसकी जड का एकत्रण किया जाता है। आप समझ सकते है कि जड के एकत्रण के बाद वनस्पति की क्या हालत होती होगी?पारम्परिक चिकित्सक तो जड का थोडा सा भाग ही एकत्र करते है और फिर वनस्पति के कटे हुय्रे भाग मे जडी-बूटियो का घोल और मिट्टी लगा देते है ताकि इस चोट से वनस्पति जल्द से जल्द उबर जाये पर जब व्यापारियो के गुर्गे यह काम करते है तो उन्हे केवल जड और उसके माध्यम से आने वाला पैसा दिखता है। यदि उन्हे जड का शीर्ष चाहिये होगा तो भी वे पूरी जड उखाडेंगे और इस तरह उस वनस्पति का अस्तित्व समाप्त कर देगे। सोनपाठा का अस्तित्व केवल इसी एकत्रण से खतरे मे नही है। इसके नये उपयोगो ने संकट पैदा कर दिया।

गाँव मे पहुँचते ही हमने पूछना शुरु किया। लोग जानते थे कि सोनपाठा किस घर मे लगा है। हम एक घर मे घुस गये। वह किसी बैगा का घर था। साथ मे आये पारम्परिक चिकित्सक बैगा से मिलने चले गये जबकि मै आँगन मे रुक गया। तभी मेरी नजर तुलसी चौरा पर पडी। तुलसी की जगह एक वृक्ष लगा हुआ था। यह सोनपाठा ही था। बैगा नही था पर उसकी बूढी पत्नी थी। उन्होने बताया कि उडीसा के घने जंगलो से लाकर इस वनस्पति को रोपा गया है। इसकी रोज पूजा की जाती है। आँगन मे इसके सूखे हुये फूल बिखरे हुये थे। बैगा की पत्नी ने बताया कि एक-एक फूल अपने औषधीय महत्व के लिये महंगे मे बिकता है। वृक्ष पर फल लगे हुये थे। मैने फल तोडने की अनुमति चाही तो उन्होने साफ इंकार कर दिया। उन्होने कहा कि पहले पूजा की जाये उसके बाद ही इसे तोडा जाये। साथ चल रहे पारम्परिक चिकित्सक नारियल और अगरबत्ती लेने चल गये।

अचानक बैगा की पत्नी उठी और अन्दर से ढेर सारे फल लेकर आ गयी। मैने कहा कि जब फल थे तो फिर पारम्परिक चिकित्सको को नारियल लेने क्यो भेजा? उन्होने विनम्रता से जवाब दिया कि इस फल के लिये जबरदस्त मारामारी है। यदि वे इन्हे देख लेते तो किसी भी बहाने से ले जाते। हमे एक और लम्बे साल की प्रतीक्षा करनी पडती। मैने इस वनस्पति के सभी भागो की तस्वीरे ली और साथ ही बैगा की पत्नी का साक्षात्कार लिया।

सोनपाठा को स्थानीय लोग गरुण या गरुड के नाम से जानते है। वैसे इस नाम की बीस से अधिक वनस्पतियाँ देहातो मे मिल जाती है। इसे सर्प विष प्रतिषेधक माना जाता है। सर्प दंश मे जितना इसका उपयोग नही होता उससे अधिक इसके फलो को घर मे रखा जाता है, इस विश्वास के चलते कि इससे सर्प घर मे नही आयेंगे। बैगा की पत्नी ने अपनी झोपडी की छत मे इसे रखा था। कुछ-कुछ साँप के फन के तरह दिखता है यह फल। मैने अपने लेखो मे पहले यह बार-बार लिखा है कि घरो को सर्पो से मुक्त रखने के लिये फिनायल और कैरोसीन का सरल प्रयोग किया जा सकता है। इसके लिये वनस्पतियो को नष्ट करने की आवश्यकत्ता नही है। पर पीढीयो से गरुण के बारे मे जो बाते प्रचारित जी जा रही है उन बातो ने ग्रामीण और शहरी समाज मे गहरी जडे जमा ली है। आज इसके बढते बाजार ने इस वनस्पति के सभी पौध भागो को सर्प भगाने वाला घोषित कर दिया है। जबकि यह सत्य से कोसो दूर है।

सडक के किनारे जडी-बूटी बेचने वालो के पास या फिर देहाती मेलो मे इस वनस्पति की जड से तैयार छोटे-छोटे साँप बिकते देखे जा सकते है। यह दावा किया जाता है कि इस जड से बने सर्प को घर मे रखने से असली साँप नही आते है। पता नही असली साँपो को इसकी खबर है या नही?

बैगा की पत्नी ने बताया कि दवा के रुप मे प्रयोग के लिये फूल कम बिकते है, ज्यादातर लोग तो बुरी नजर से बचने के लिये इस फूल को ले जाते है और अपने घरो मे बन्द कर देते है। पता नही वे बुरी नजर से बच पाते है या नही पर उनके इस काम से इस वनस्पति के विस्तार के द्वार बन्द हो जाते है। फूल से फल बनते और फिर बीज नयी पीढी को जन्म देते। पर बडी मात्रा मे फल और फूल के एकत्रण से इसका अस्तित्व समाप्ति की ओर है। यह विडम्बना ही है कि सरकारी स्तर पर इस जानलेवा व्यापार को रोकने की कोई पहल नही की जा रही है। समाज मे वैज्ञानिक चेतना जगाने का जिम्मा लिये अरबो रुपये वसूलती सामाजिक संस्थाए निष्क्रिय है। अखबार भी मौन है। कुछ अखबार तो हर बार व्यापारियो के कहने पर इस फल से सर्प के न आने की अफवाह उडा देते है और फिर फलो की बिक्री शुरु हो जाती है। कोई यह नही सोचता कि इससे जंगल मे इस वनस्पति की प्राकृतिक आबादी पर कितना गहरा असर पड रहा है। इस बार कुछ अखबारो ने मेरी मुहिम का साथ देने का मन बनाया है। देखते है कि कब तक अति सम्पन्न बाजार के सामने यह मुहिम टिक पाती है। अखबारो के माध्यम से आम जनता से यह अनुरोध किया जा रहा है कि वे इस फल को न खरीदे और पर्यावरण की रक्षा मे अपना अहम योगदान दे। फल नही बिकेंगे तो अपने आप व्यापारी इसमे रुचि लेना छोड देंगे। व्यापारी नही खरीदेंगे तो जंगल से इसका एकत्रण नही होगा।

देश के बहुत से हिस्सो मे उपलब्ध सरकारी दस्तावेज बताते है कि सोनपाठा के व्यापक रोपण की पहल की जा रही है ताकि दशमूल योग के अवयव की आपूर्ति होती रहे। पर ये सरकारी स्तर के रोपण कितने जमीन पर है और कितने कागज पर, यह यकीन से कह पाना मुश्किल है। पारम्परिक चिकित्सक ऐसे रोपणो से खुश नही है। आमतौर पर किसी भी खाली जमीन पर ऐसे रोपण कर दिये जाते है। जंगलो मे जाकर यह देखने की कोशिश नही की जाती है कि कैसी परिस्थितियो मे यह उगता है? किन वनस्पतियो के साथ उगता है? सरकारी रोपण से वृक्ष तो तैयार हो जाते है पर उनके औषधीय गुणो मे कमी रहती है। सारा प्रयास बेकार जाता है। पारम्परिक चिकित्सक यह भी कहते है कि इन वृक्षो को तैयार होने मे दशको लगेंगे तब तक इस धरती मे माँ प्रकृति द्वारा भेंट किये गये वृक्ष ही मानव सेवा करेंगे। उन्हे किसी भी हालत मे नष्ट होने से बचाना है।

व्यापारी मेरी इस चिंता पर हँसते है। वे कहते है कि अभी बाजार मे जितना सोनपाठा है उतना तो इस धरती मे मौजूद वृक्षो से नही आ सकता। इतनी मात्रा के लिये मंगल और चाँद मे भी सोनपाठा लगाना होगा। व्यापारी की बाते साफ इशारा करती है कि सोनपाठा मे मिलावट की जा रही है। बहुत बार ऐसी मिलावटे अप्रत्यक्ष रुप से मुख्य वनस्पति की संख्या को कम होने से बचाती है पर इस मिलावट से जन-स्वास्थ्य के लिये बडा खतरा उत्पन्न हो जाता है। साथ ही जिन वनस्पतियो की मिलावट की जाती है उनके अस्तित्व पर भी खतरा उत्पन्न हो सकता है।

इस जंगल यात्रा के दौरान एक बुजुर्ग पारम्परिक चिकित्सक मिले। वे इस वनस्पति को बढा रहे है। पैसे कमाने के लिये नही बल्कि लोगो को स्वस्थ्य बनाने के लिये। मैने उनके घर मे उग रहे कुछ पौधो को देखा। वे मेरी मदद चाहते है ताकि हर बीज नये पौधो को जन्म दे सके। मै अपनी सेवाए देने के लिये तत्पर हूँ। उम्मीद है कि आने वाले सालो मे हम अधिक से अधिक संख्या मे सोनपाठा उगा पायेंगे। (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

© सर्वाधिकार सुरक्षित

Tuesday, July 14, 2009

मानव लिंग की तरह दिखने वाले नशीले और जहरीले कुकुरमुत्ते की तांत्रिक और औषधीय महिमा

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-44
- पंकज अवधिया

मानव लिंग की तरह दिखने वाले नशीले और जहरीले कुकुरमुत्ते की तांत्रिक और औषधीय महिमा

इस बार मानसून मे देरी के कारण सूखे जंगलो मे जाने का मन नही कर रहा था। मधुमेह की रपट से तंग आकर मैने जंगल यात्रा का मन बनाया। सुबह साढे पाँच बजे सोने के बाद तीन घंटो मे ही उठ गया और जंगल की राह पकड ली। आज सुबह से हल्की वर्षा हो रही थी। काफी दूरी चलने के बाद कुकुरमुत्तो को देखकर मैने गाडी रोकी और फिर दल-बल सहित जंगल मे घुस गया। लगता था कि रात को भी बारिश हुयी थी। मिट्टी घँस रही थी पर जंगल मे चलना मुश्किल नही था। कुछ दूर चलने के बाद हमे इतने सारे कुकुरमुत्ते मिले कि दिल खुश हो गया। मैने कैमरा निकाला और हल्की बारिश के बीच तस्वीरे लेना आरम्भ किया।

साथ चल रहे पारम्परिक चिकित्सको ने बताया कि जितने भी खाने योग्य कुकुरमुत्ते थे, वे सब एकत्र कर लिये गये है। अब तक तो आस-पास के लोग उनकी सब्जी बनाकर चट भी कर गये होंगे। अब जो कुकुरमुत्ते हमे दिखायी दे रहे थे वे आम लोगो के किसी काम के नही थे। पर पारम्परिक चिकित्सको के लिये ये बडे काम के थे। वे ध्यान से जाँच-परख कर रहे थे और फिर पूरी तरह आश्वस्त होने के बाद बडे ही जतन से अपने थैले मे रख रहे थे। मैने इस लेखमाला मे पहले लिखा है कि कुकुरमुत्ते की तस्वीरे ऊपर से लेने से काम नही चलता है। सभी ओर से इनकी तस्वीरे लेनी पडती है ताकि हजारो मील दूर बैठे मशरुम विशेषज्ञ जब इन तस्वीरो को देखे तो इनकी सही पहचान कर पाये। केवल छतरी की ऊपरी तस्वीरे लेकर मैने पहले बहुत गल्तियाँ की है। इस जंगल यात्रा के दौरान मुझे पारम्परिक चिकित्सको ने जहरीले और उपयोगी कुकुरमुत्तो की पहचान सीखायी। मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि वैज्ञानिको के विपरीत वे केवल छतरी का मुआयना करके ही सही पहचान कर रहे थे।

डायबीटीज के इलाज मे कुकुरमुत्ते का सीधा प्रयोग कम ही किया जाता है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि हमारे देश मे कुकुरमुत्तो के विष्य़ मे समृद्ध पारम्परिक ज्ञान है। मैने अपनी मधुमेह की लम्बी-चौडी रपट मे इस पारम्परिक ज्ञान के विषय मे विस्तार से लिखा है। पारम्परिक चिकित्सक साल के तीन महिने तक केवल कुकुरमुत्तो और इनसे तैयार व्यंजनो पर मधुमेह रोगी को आश्रित रहने को कहते है। मधुमेह की जटिल अवस्था मे तो अन्य औषधीयो के साथ साल भर कुकुरमुत्तो पर आधारित मिश्रण दिये जाते है। पारम्परिक चिकित्सक बरसात मे एकत्र किये गये कुकुरमुत्तो को साल भर सुरक्षित रखते है। कुकुरमुत्तो का प्रयोग पारम्परिक चिकित्सक अपनी निगरानी मे करते है। आप रपट के कुछ अंशो को इस कडी के माध्यम से देख सकते है।

कुकुरमुत्तो के बीच घूमते हुये अचानक मेरी नजर कुछ ऐसे कुकुरमुत्तो पर पडी जो कि हू-बहू मानव लिंग की तरह दिख रहे थे। एक बार तो मुझे विश्वास ही नही हुआ। ध्यान से देखा तो लगा मानो दसो छोटे-बडे मानव लिंग जंगल की धरती पर बिखरे पडे है। मैने उन्हे छूने के लिये जैसे ही हाथ बढाया पारम्परिक चिकित्सको ने रोक दिया। ये जहरीले थे। उन्होने पास से तेन्दु और पलाश की पत्तियाँ तोडी और फिर उनकी सहायता से इन्हे जमीन से अलग किया। मेरा कैमरा तो जैसे रुकने को तैयार नही था। तस्वीरे ही लिये जा रहा था। यह दुर्लभ था। इसलिये नही कि मैने इसे पहली बार देखा था बल्कि पारम्परिक चिकित्सको ने भी इसे सालो बाद देखा था। वे अपने दिन को शुभ मान रहे थे। सम्भवत: जिस वर्ष देर से वर्षा होती है उस वर्ष ये उगते हो।

मुझे बताया गया कि यह कुकुरमुत्ता बहुत अधिक नशा करता है। होशो-हवास उडा देता है। बहुत सूक्षम मात्रा मे तांत्रिक अपनी तंत्र क्रिया के प्रदर्शन से थोडा पहले इसे खा लेते है। उनकी आँखे लाल हो जाती है। वे अंट-शंट बकने लगते है। भाव-भंगिमाए बनाने लगते है। दूसरे लोको की बात करने लगते है। तांत्रिक की यह स्थिति दर्शको को आतंकित कर देती है। उन्हे साधारण से जादू पर भी विश्वास होने लगता है। तांत्रिक इस नशे की काट भी जानते है। हालत बिगडने पर झट से काट का सेवन कर लिया जाता है। यह सब इतना आसान नही है। सही मायने मे तांत्रिक अपनी जान से खेलता है। जरा सी भी मात्रा अधिक नही हुयी कि उसकी तत्काल मौत हो सकती है। यही कारण है कि नयी पीढी के तांत्रिक इस तरह का जोखिम नही उठाते है।

पारम्परिक चिकित्सक दवा के रुप मे इसका प्रयोग करते है। वे कहते है कि याददाश्त खो चुके रोगियो पर इसका सकारात्मक प्रभाव पडता है। किसी गहरे सदमे से रोगी जब खाना-पीना छोड देता है और धीरे-धीरे मौत की ओर बढता जाता है तब भी इसका प्रयोग किया जाता है। रोगी यदि इसे खाना नही चाहे तो दूसरी वनस्पतियो के साथ इसका लेप तलवो पर लगाया जाता है। यह प्रक्रिया तब तक दोहरायी जाती है जब तक रोगी प्रतिक्रिया नही देने लगता है। साथ चल रहे पारम्परिक चिकित्सक सिर खुजाकर कहते है कि मानव लिंग की तरह दिखने वाले इस कुकुरमुत्ते का प्रयोग लिंग से सम्बन्धित रोगो की चिकित्सा मे भी होना चाहिये। मानव अंगो की आकृतियो वाले पौध भागो के इस तरह के प्रयोग पीढीयो से होते आये है। पर इन्हे कैसे प्रयोग किया जाये, ये उन्हे नही मालूम है। जहरीला होने के कारण वे किसी पर इसका प्रयोग भी नही करना चाहते है।

जंगल से वापस लौटने के बाद जब मैने अपने डेटाबेस को खंगाला तो मुझे 1994 मे सरगुजा के पारम्परिक चिकित्सको की बात याद आयी। वे इस तरह के कुकुरमुत्ते के विषय मे बताया करते थे। मैने उन्हे देखा नही था पर फिर भी उस बारे मे विस्तार से जानकारी एकत्र करके डेटाबेस मे डाल दी थी। सरगुजा के पारम्परिक चिकित्सक इस प्रजाति का प्रयोग कामशक्तिवर्धक के रुप मे करते थे। वनस्पतियो क्रे साथ इसका प्रयोग होता था।

पारम्परिक चिकित्सक जंगल मे कुकुरमुत्तो की भूमिका को जानते है। उन्हे इस बात का अहसास है कि जंगल की सफाई मे उनकी अहम भूमिका है। यही कारण है कि उन्होने थोडी मात्रा मे ही कुकुरमुत्तो को एकत्र किया। बारिश होते ही नाना प्रकार के कुकुरमुत्ते निकल जायेंगे। तब एक बार फिर जंगल की यात्रा करनी होगी। पारम्परिक चिकित्सको ने अगली बार जंगल के भीतर तक कीचड से होते हुये जाने की तैयारी कर आने को कहा है। मुझे उम्मीद है कि अगली जंगल यात्रा मे नयी प्रजातियाँ मिल सकेंगी। (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

© सर्वाधिकार सुरक्षित

Friday, July 10, 2009

जाने किसे झेलना होगा मुम्बई मे कृत्रिम वर्षा के प्रयोग का अभिशाप?

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-43
- पंकज अवधिया

जाने किसे झेलना होगा मुम्बई मे कृत्रिम वर्षा के प्रयोग का अभिशाप?


कौन-कौन से वृक्ष वर्षा कराते है? इस प्रश्न का जवाब मै सालो से खोज रहा हूँ पर जवाब के रुप मे जिन वृक्षो की सूची मुझे मिल रही है वे जंगल मे खोजे नही मिल रहे है। कुछ हफ्तो पहले मुझे पारम्परिक चिकित्सक एक ऊँची पहाडी पर लेकर गये और एक बहुत ऊँचा वृक्ष दिखाया। वे बोले, ये कैम का वृक्ष है। इस जंगल मे यह एकमात्र वृक्ष है। यह पानी बरसाता है। आप जिस भी जंगल मे इसे अधिक संख्या मे पायेंगे वहाँ आपको अच्छी वर्षा वाले आँकडे मिलेंगे। पहले हमारे जंगलो मे भी यह बडी संख्या मे था पर आधुनिक मानव समाज की लालची निगाहो से यह नही बच पाया। स्वयम जंगल विभाग ने तीन बार इस जंगल को लकडी के लिये काटा है। यह वृक्ष पहाडी पर था इसलिये बच गया। “देखिये यह कितना मोटा और ऊँचा है।“ यदि आज हम इसका पौधा लगाये तो कई दशक लगेंगे इस आकार का वृक्ष तैयार होने मे। पर आज इसका जंगल लगाने से कई दशको के बाद पानी की समस्या नही रहेगी।

पारम्परिक चिकित्सको की बात सुनकर मुझे उडीसा के नियमगिरि की याद आ गयी। यहाँ भी बडी संख्या मे कैम के वृक्ष थे। इन्हे स्थानीय भाषा मे कदम कहा जाता है। यह कृष्ण-कन्हैया वाला कदम नही है। नियमगिरि पर्वत अपनी अच्छी वर्षा के कारण नाना प्रकार की वनस्पतियो और वन्य जीवो को आश्रय दिये हुये था। यहाँ से कई नदियाँ निकलती है जो असंख्य लोगो की प्यास बुझाती है और फिर भी इनका पानी कम नही होता है। इन नदियो पर मैदानी भागो मे बडे-बडे बाँध बने हुये है। असंख्य किसान इन नदियो के सहारे है और ये नदियाँ कैम जैसे बरसात लाने वाले वृक्षो पर निर्भर है। केवल कैम ही सक्रिय भूमिका नही निभाता है। कैम के साथ नियमगिरि मे साल के जंगल है। महुआ के साथ बडे पुराने पीपल है। इन सब का मिश्रण बादलो को आकर्षित करता है।

जंगल मे मै लगातार जा रहा हूँ। बरसात मे रोज देर दोपहर जंगल मे पानी बरसता ही है। पानी की बौछारे देर तक साथ चलती रहती है पर शहर के पास आते ही रुठ कर वही रुक जाती है। कितना भी मनाने की कोशिश करो, वे आगे नही बढती है। मुझे याद आता है अपना छात्र जीवन जब मै छुटियो मे जगदलपुर चला जाया करता था। सुबह से जडी-बूटी एकत्र करता था और स्थानीय मार्गदर्शको के साथ घूमता रहता था। पर शाम होते ही हमे लौटना पडता था। रोज शाम को बारिश जो हो जाती थी। यह सिलसिला पूरी गर्मी चलता था। अल सुबह गर्मियो मे चादर ओढने की जरुरत पडती थी। आज मेरा मन उस शहर मे जाने को नही करता है। जंगल तेजी से विकास की भेंट चढ गये। एक विशेष प्रकार का जंगल अभी भी बढ रहा है और वह है कांक्रीट जंगल। अब तो साल भर शहर को ठंडा रखना होता है। एसी की जरुरत साल भर होती है। यह जरुरत बढने ही वाली है क्योकि वहाँ बडी-बडी भठ्ठियाँ लगने वाली है लोहे को गलाने के लिये। पता नही तब कितना और गर्म होगा यह शहर?

आज पूरा देश उस समाचार पर नजर गडाये हुये है जिसमे “क्लाउड सीडींग” यानि कृत्रिम वर्षा की बात की जा रही है। इस बार सम्भावित सूखे को देखते हुये मुम्बई मे नयी तकनीक से वर्षा करायी जायेगी। मीडिया चीख-चीख कर एक तरफा यानि “क्लाउड सीडींग” के पक्ष मे बाते कर रहा है। तस्वीर के दूसरे पहलू को देखने कोई तैयार नही है। मै भी मौसम विशेषज्ञ नही हूँ इसलिये मैने अपने कुछ वैज्ञानिक मित्रो से इस बारे मे पूछा तो वे बोले कि यह तकनीक तो पूरी दुनिया मे अपनायी जा रही है। इस बात की बहुत सम्भावना है कि वर्षा होगी। पर इस वर्षा की कीमत किसी न किसी को चुकानी ही पडेगी। कही आस-पास पड रहा सूखा और तीव्र हो जायेगा। फिर सिल्वर आयोडाइड के प्रयोग से भी पर्यावरण विशेषकर वनस्पतियो पर असर पडेगा। मित्रो ने पूछा कि जहाँ ऐसे प्रयोग हो रहे है वहाँ आस-पास जैव-विविधता वाला क्षेत्र तो नही है। मैने उनसे कहा कि पश्चिम घाट तो जैव-विविधता वाला क्षेत्र है। मित्रो ने कहा कि ऐसे मे इस तकनीक का प्रयोग सम्भल कर अपने विवेक का इस्तमाल करके किया जाना चाहिये।

“क्लाउड सीडींग” पर जब मैने वैज्ञानिक साहित्यो को खंगाला तो इसके पक्ष और विपक्ष मे बहुत सी बाते जानने को मिली। यह आभास हुआ कि सब कुछ सीधा-सीधा नही है। दुनिया के बहुत से देशो मे इस पर प्रतिबन्ध भी लगता रहा है। वैज्ञानिक दस्तावेज बताते है कि थाईलैंड मे इस तकनीक के लम्बे समय तक प्रयोग ने सूखे की बुरी स्थिति को जन्म दिया है। तकनीकी विषय होने के कारण मीडिया मे इसके नकारात्मक पहलुओ के विषय मे कम ही कहा जाता है। यह देशी नही बल्कि विदेशी मीडिया के साथ भी समस्या है।

“क्लाउड सीडींग” के लिये सरकार करोडो (या अरबो) रुपये पानी की तरह बहायेगी, इस बात की परवाह किये बिना कि यह तकनीक असफल भी हो सकती है। विदर्भ मे ऐसे प्रयोग पहले किये गये है। सन्योग से कुछ वर्षो पहले जब यह प्रयोग किया जा रहा था तब मै वही था। आशातीत सफलता नही मिली थी पर इस बात को सामने नही आने दिया गया। ऐसे मे मै आधुनिक “क्लाउड सीडींग” की स्थान पर पारम्परिक “क्लाउड सीडींग” के पक्ष मे रहना पसन्द करुंगा। माँ प्रकृति सदियो से “क्लाउड सीडींग” कर रही है। जंगलो मे उन्होने ऐसी व्यवस्था बना रखी है कि बिना मेहनत के सदियो से मनुष्यो को पानी मिल रहा है। माँ प्रकृति की इस “क्लाउड सीडींग” मे पक्षपात नही है। सबको बराबर पानी मिलता है। साथ ही इस “क्लाउड सीडींग” मे सिल्वर आयोडाइड जैसे विषाक्त रसायनो का भी प्रयोग नही होता है। फिर क्यो नही नयी जानलेवा तकनीक की जगह माँ प्रकृति की “क्लाउड सीडींग” के यंत्रो को फिर से सुधारा जाता? सरकारे क्यो नही भिड कर जंगल को बचाती और उनका विस्तार करती है? क्यो नदियो को जन्मने वाले नियमगिरि मे बाक्साइट खनन की छूट देकर प्राकृतिक “क्लाउड सीडींग” स्त्रोत को सदा के लिये विनाश के गर्त मे ढकेला जा रहा है? आज योजनाकार जैट्रोफा (रतनजोत) जैसी अधिक जल-माँग वाली बायोडीजल फसल के रोपण मे रुचि दिखाते है और खरबो पानी की तरह बहाने के बाद नतीजा सिफर ही रहता है। क्यो नही इतने पैसे कैम, साल, महुआ आदि पर खर्च किये जाते? जाने कब इन प्रश्नो के उत्तर मिलेंगे?

कुछ समय पूर्व डिस्कवरी चैनल पर एक कार्यक्रम मे बताया जा रहा था कि जब तेजी से बढते हुये एक समुदी तूफान को खत्म करने के लिये बादलो पर रसायनो का छिडकाव किया गया तो तूफान वहाँ तो टल गया पर उसने दिशा बदलकर दूसरे स्थानो पर जबरदस्त कहर बरसाया। प्रकृति की व्यवस्था की नकल इतनी सरल नही है। अब देखिये मुम्बई की “क्लाउड सीडींग” की कितनी बडी कीमत हमे चुकानी पडती है? (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

© सर्वाधिकार सुरक्षित

Thursday, July 9, 2009

किंग खान की सी शैतानी हँसी हँसने वाले भूत का पर्दाफाश

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-42
- पंकज अवधिया

किंग खान की सी शैतानी हँसी हँसने वाले भूत का पर्दाफाश


वैसे ही सावन के लगते ही भूतो के आगमन की सूचना मिलती रहती है। सूचना मिलते ही वहाँ जाना होता है और फिर वैज्ञानिक आधार पर सच का खुलासा करना होता है। जब आम लोगो को यह विश्वास हो जाता है कि यह भूत मन का भूत था तभी वापसी होती है। बरसात के दिनो मे बहुत से भू-भागो को दूर से देखा जा सकता है पर पानी भरा होने के कारण वहाँ जाया नही जा सकता है। मन के भूत ऐसे ही स्थानो मे रहते है। हमे जोखिम उठाकर वहाँ जाना होता है तभी उनका अस्तित्व समाप्त होता है। ज्यादातर मामलो मे तो यह प्राकृतिक घटना होती है। जबकि कुछ ऐसे मामले भी होते है जिसमे भूत प्रचारक निर्जन स्थानो मे डेरा डाले रहते है और सारे प्रपंचो के माध्यम से हमे वहाँ आने से रोकते है। कहते है कि उधर देखने मात्र से ही अन्धे हो जायेंगे। कदम बढाया तो भस्म हो जायेंगे। पर फिर भी उस ओर बढते है तो नाना प्रकार की आवाजे निकाली जाती है। टीवी पर भूत वाले धारावाहिक देख-देख कर इन आवाजो की इतनी आदत पड गयी है कि अब ये नही डराती। कुछ और बढने पर जलते कोयले के टुकडे फेके जाते है। यह तो सरासर अपराध है। हम तेज आवाज मे भूत प्रचारक को हडकाते है कि यदि हमे कोयला लगा तो उसकी खैर नही। फिर कोयले आने रुक जाते है। चूँकि हम अकेले होते है और आम लोग दूर ही रहते है, भूत प्रचारक अंतिम विकल्प मे रुप मे अपनी गरीबी का बहाना करते है और फिर अचानक अमीर होकर ढेर से रुपये निकालकर समझौते का आफर देते है।

कुछ दिनो पहले पास के एक निर्जन स्थान से शैतानी हँसी सुनायी देने की खबर आयी तो मुझे लगा कि यह भी ऐसा ही मामला होगा पर वहाँ पहुँचने पर स्थिति दूसरी ही नजर आयी। क्षेत्र मे हल्ला था और अफवाह का बाजार गर्म था कि पूजा-पाठ न होने के कारण देवता नाराज है और भाँति-भाँति की आवाज निकालकर भय उत्पन्न कर रहे है। रात को शौच के लिये खेतो की ओर जाते हुये लोगो ने ये आवाजे सुनी थी और उल्टे पैर वापस लौट आये थे। हँसी एकदम शैतानी हँसी थी। कुछ लोगो ने ऐसी हँसी जीवन मे पहली बार सुनी थी।जबकि कुछ ने धार्मिक धारावाहिको मे ऐसी हँसी सुनी थी। यह सब सुनकर हमे पक्का यकीन हो गया कि किसी भूत प्रचारक का यह काम है। निश्चित ही अब जल्दी ही कोई तांत्रिक गाँव मे आयेगा और इस हँसी के आधार पर ग्राम शांति के लिये पूजा-पाठ करवायेगा। हो सकता है तीन-चार अबलाए भी इनके चंगुल मे फँस जाये और उन्हे ही इन करतूतो के लिये उत्तरदायी मान लिया जाये। अबलाए इसलिये कहा क्योकि जिनकी रक्षा कोई नही कर पाता वे ही जादू-टोना करने वाली ठहरा दी जाती है।

हमे बताया गया कि हँसी रात को ही सुनायी देती है। सो, देर रात जंगल से लौटते हुये हमने इस क्षेत्र की ओर गाडी मोड ली। साथ मे जंगल क्षेत्र से आया एक वनवासी भी था जिसे शहर के अपने रिश्तेदार से मिलना था। हम निकटम गाँव पहुँचे तो सन्नाटा बिखरा हुआ था। हमने पान वाले से इस बारे मे पूछा तो उसने झट से कहा कि सिने अभिनेता शाहरुख खान ने जिस अन्दाज मे क-क-किरण का कहा था और फिर लम्बी हँसी निकाली थी, उसी अन्दाज मे पास के नाले से यह आवाज आती है। ड्रायवर ने तुरंत उसे मजाक न करने की सलाह दी पर साथ चल रहे वनवासी और मुझे लगा कि जैसे हमने भूत को जान लिया है। फिर भी हमने नाले तक जाकर उसे देखने की इच्छा दिखायी।

हमारे साथ कोई जाने को तैयार नही हुआ। हमने बडी वाली जंगल टार्च निकाली ओर उस ओर बढ चले। यदि हमारा शक सही था तो ज्यादा पास जाना खतरनाक था। जलते कोयले का डर नही था बल्कि जान का खतरा था। जो आवाज आ रही थी वह हाइना यानि लकडबघ्घा की थी।

नाले के उस पार हमे दो चमकती हुयी आँखे दिखायी दी। वो हमे ही घूर रही थी। आवाज तेज हो गयी थी। वह लकडबघ्घा ही था। मुझे याद आ रहा था कि इसके कुल वजन का दस प्रतिशत वजन ह्र्दय का होता है। यह ह्रदय लम्बी दूरी तक शिकार का पीछा करने मे मदद करता है। यदि यह हमारे पीछे लग जाता तो हम पैदल ज्यादा नही भाग पाते। नाला सूखा था इसलिये पलक झपकते ही वह पास आ सकता था। हमने वापस आकर रेवडा यानि लकडबघ्घा के बारे मे पूछताछ की तो पता चला कि एक रेवडा कुछ दिन से आस-पास घूम रहा है। जंगल से दूरी के कारण वर्तमान पीढी ने न ही रेवडा को कभी देखा और न ही इसकी भयानक हँसी सुनी। लकडबघ्घे की हँसी का जिक्र आधुनिक साहित्यकार करते रहते है पर उनमे से शायद ही किसी ने असल जिन्दगी मे इसे सुना होगा। आप नीचे दिये जा रहे यू-ट्यूब के वीडियो देखेंगे तो आपको हँसी का असली रुप दिखायी देगा। अभी ये भले आपको हँसाये पर कल्पना करिये कि यदि आप सुनसान मे अकेले जा रहे हो और यह हँसी सुनायी दे और आस-पास कोई न दिखे, तब आपकी हालत पतली हो जायेगी।






अब इसका रुदन भी सुन लीजिये।




है न भयावह? वैसे बीबीसी के हवाले से छपी एक खबर मे यह बताया गया था कि वरिष्ठता के आधार पर अलग-अलग आवृत्ति की आवाजे ये वन्यजीव निकालते है। इन आवाजो को काफी दूर से सुना जा सकता है। हमने गाँव वालो को असलियत बतायी तो वे काफी देर तक हँसते रहे। पान वाले ने आवाज की नकल दोहरायी तो ठहाको का जोर बढ गया। मन के भूत के पनपने से पहले ही उसका पर्दाफाश हो गया। मैने गाँव वालो से कहा कि आप क्षेत्र मे इस बारे मे ज्यादा से ज्यादा लोगो को बताये ताकि मन का यह भूत फिर से सर न उठाये। मेरे मन मे यह विचार आया कि वन्य-जीवो की आवाजो की एक रिकार्डिंग हमेशा अपने साथ रखूँ ताकि ऐसे मौके पर उन्हे सुनाकर लोगो की जिज्ञासा शांत कर सकूँ। (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

© सर्वाधिकार सुरक्षित

Wednesday, July 8, 2009

धनी रोगियो से घिरते पारम्परिक चिकित्सक और शार्ट-कट उपचार की बाध्यता

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-41
- पंकज अवधिया

धनी रोगियो से घिरते पारम्परिक चिकित्सक और शार्ट-कट उपचार की बाध्यता


“बडे होकर क्या बनोगे?” एक प्रसिद्ध पारम्परिक चिकित्सक के तीन पोतो के सामने मैने यह प्रश्न रखा तो वे तुरंत बोल पडे कि हम तो बाबा का काम करेंगे। बाबा मतलब पारम्परिक चिकित्सक। यह जवाब किसी भी पारम्परिक चिकित्सक को प्रसन्न कर सकता है। मुझे याद आता है कि जब 1990 के आस-पास मैने वानस्पतिक सर्वेक्षण का कार्य शुरु किया तब पारम्परिक चिकित्सक अपने ज्ञान के भविष्य को लेकर बहुत चिंतित थे। उस पारम्परिक चिकित्सको को कोई सम्मान नही मिलता था। यह कार्य पैसे कमाने के लिये नही था इसलिये बच्चो का कैरियर नही बन सकता था। फिर गाँव के लोग ही पारम्परिक चिकित्सको के पास आते थे। पारम्परिक चिकित्सको को डर था कि कही बच्चे उनके ज्ञान को बेच न दे। पर आज हालात वैसे नही है।

इस जंगल यात्रा के दौरान मै दो ऐसे पारम्परिक चिकित्सको से मिला जिन्हे दम मारने की फुरसत नही है। एक पारम्परिक चिकित्सक किसी रोगी को देखने पास के शहर गये थे। सुदूर गाँव मे उनके घर के सामने दसो गाडियाँ खडी थी। ये गाडियाँ उन मरीजो की थी जो पारम्परिक चिकित्सक के आने का इंतजार कर रहे थे। हमे घर से काफी दूर गाडी खडी करनी पडी। पार्किंग की समस्या जो थी। इतनी भीड तो शहरी डाक्टरो के दवाखानो के सामने भी कम ही दिखती है। हम भी कतार मे लग गये।

पास मे एक बूढी माँ बैठी हुयी थी। पता चला कि वे पारम्परिक चिकित्सक की माँ थी। मैने उनसे बात करने का अवसर नही गँवाया। उनके पति यानि पारम्परिक चिकित्सक के पिता क्षेत्र के जाने-माने पारम्परिक चिकित्सक थे। उन्होने राज परिवारो को भी अपनी सेवाए दी थी। उस समय सारी दवाए जंगल की जडी-बूटियो से बनती थी। वे लगभग सारे रोगो की चिकित्सा करते थे। उस समय क्षेत्र मे बहुत जंगल थे और जंगली जानवर दिन मे गाँव मे आ जाते थे।

बुजुर्ग पारम्परिक चिकित्सक के सौ से ज्यादा चेले थे पर वे अपना सारा ज्ञान अपने बेटे को देना चाहते थे। पर बेटा इसके लिये तैयार नही था। उसने सिर्फ तीस रोगो के बारे मे ज्ञान अर्जित किया। शेष ज्ञान बुजुर्ग ने अपनी पत्नी को दे दिया। जैसे-जैसे पत्नी की आयु बढी उस ज्ञान को व्यवहार मे न लाने के कारण वे सब भूलती गयी। इस तरह महत्वपूर्ण पारम्परिक ज्ञान समाप्त हो गया। अब तो बुजुर्ग पारम्परिक चिकित्सक हमारे बीच नही है पर उनके अधेड बेटे ने तीस रोगो के लिये मोर्चा खोल रखा है। इन्ही से मिलने हम आये थे।

मेरी उनसे दर्जनो बार मुलाकात हो चुकी है। वे इतनी भीड के बावजूद खुद होकर पैसे नही माँगते है। कोई पैसे देने की जिद करता है तो उसे घर के मन्दिर मे अर्पित करने की बात करते है। यह पैसा दवाओ के लिये खर्च होता है। आधुनिक शिक्षा प्राप्त कर चुके उनके बच्चे बेरोजगार है। वे अपना पिता को अच्छा व्यवसायी नही मानते है। उन्हे लगता है कि यदि थोडे भी पैसे लिये जाये तो कुबेर का खजाना हाथ लग सकता है। बचपन से जिन्होने जिस काम को हेय दृष्टि से देखा था अब वे इस काम को अपनाना चाहते है। निस्वार्थ सेवा के लिये नही बल्कि इससे धानार्जन करने के लिये। जिस पारम्परिक चिकित्सक की चर्चा मै यहाँ कर रहा हूँ उनके तीनो बेटे सिर्फ सात रोगो की चिकित्सा का ज्ञान सीखना चाहते है। वह भी शार्ट कट मे। मैने जब उनसे बातचीत की तो उनकी रुचि महंगे मोबाइल, बडी कारो और आलीशान घर मे दिखी, पारम्परिक ज्ञान पर उनकी पकड सतही थी। ये शुभ लक्षण नही है। पारम्परिक चिकित्सक भी इस बात को जानते है पर उन्हे इस बात की तसल्ली है कि कम से कम उनके बच्चे इसमे रुचि तो ले रहे है।

1000 जीबी से अधिक आकार की मधुमेह की जो वैज्ञानिक रपट मै तैयार कर रहा हूँ उसमे मैने विस्तार से पारम्परिक चिकित्सा विधियो का वर्णन किया है। उदाहरण के लिये मधुमेह की जटिल अवस्था मे पारम्परिक चिकित्सक अपने दिमाग मे 200 दिनो की कार्ययोजना बनाते है। यानि 200 दिनो तक रोगी को कौन-कौन सा उपचार दिया जाना है। मैने पहले लिखा है कि जब पारम्परिक चिकित्सको के इस ज्ञान को कागजो पर लिखने का प्रयास किया जाता है तो 200 दिनो की केवल एक कार्य योजना को लिखने मे हजारो पन्ने रंग जाते है। पारम्परिक चिकित्सक ऐसी दस से बारह कार्ययोजनाए मन मे रखते है। रोग की अवस्था के अनुसार अलग-अलग कार्ययोजनाओ को लागू करते रहते है। यह बडा ही अद्भुत तरीका है चिकित्सा का। पर मधुमेह की चिकित्सा के लिये 200 दिनो तक पूरे नियम कायदो से कोई भी चिकित्सा करवाने को तैयार नही होता है। पारम्परिक चिकित्सको पर दबाव होता है कि वे कोई ऐसा मिश्रण दे जिससे तुरंत असर दिखे। यदि असर नही दिखा तो रोगी तुरंत दूसरे पारम्परिक चिकित्सको के पास चला जायेगा। ऐसे मे या तो पारम्परिक चिकित्सक हाथ जोडकर साफ मना कर देते है या फिर पारम्परिक विधियो को ताक मे रखकर प्रभावी मिश्रण देने का मन बना लेते है। पारम्परिक चिकित्सको की नयी पीढी इसी तात्कालिक लाभ वाले मिश्रणो को जानना चाहती है। ऐसे मिश्रण कुल ज्ञान रुपी सागर की कुछ बून्दो के समान है। मुझे डर है कि यह परम्परा दिव्य ज्ञान को सदा के लिये समाप्त कर देगी।

जंगल विभाग के एक बैरियर मे हमे रोक लिया गया और कहा गया कि गाडी की जाँच होगी। हमे कोई परेशानी नही थी। जाँच के बाद आश्वस्त होकर उन्होने हमे हरी झंडी दिखा दी पर हम कहाँ जाने वाले थे। हम सालो से जंगल मे घूम रहे थे पर कभी ऐसी चेकिंग नही हुयी थी। हमे बताया गया कि इस क्षेत्र मे लगातार हर गाडी की चेकिंग होती है। क्यो? जवाब चौकाने वाला था। हमे बताया गया कि शहर से छोटी गाडियाँ बडी संख्या मे आती है और दुर्लभ जडी-बूटियो को खोदकर ले जाती है। शहरी लोग किसी पारम्परिक चिकित्सक के गाँव के आस-पास की सारी जडी-बूटियो के नमूने ले जाते है। उन्हे लगता है कि इस तरह उन्होने सारा ज्ञान प्राप्त कर लिया है। पर यह उनका भ्रम ही है। शहरियो का यह कार्य पारम्परिक चिकित्सको के लिये परेशानी पैदा करता है। उन्हे वनस्पतियो के लिये काफी दूरी तय करनी पडती है।

बहुत से पारम्परिक चिकित्सको ने राजधानी मे घर ले लिया है, बहुत से हवाई यात्रा के दौरान मिल जाते है, रेल की उच्च श्रेणियो मे भी वे दिख जाते है। दुनिया भर से आ रहे सन्देश कहते है कि ऐसा केवल छत्तीसगढ के पारम्परिक चिकित्सको के साथ होता है क्योकि उनके बारे मे काफी कुछ लिखा जा रहा है। हाल ही मे राजस्थान के पारम्परिक चिकित्सको के एक दल ने मुझसे सम्पर्क किया कि वे छत्तीसगढ आकर यहाँ के पारम्परिक चिकित्सको से कुछ सीखना चाहते है। उन्हे लगता था कि उनके क्षेत्र मे उतनी महत्वपूर्ण जडी-बूटियाँ नही है जितनी कि छत्तीसगढ मे है। मैने उन्हे समझाया कि हम सौभाग्यशाली है कि भारत मे जहाँ भी खडे हो जाइये आपको चारो ओर जडी-बूटियो का खजाना बिखरा मिलेगा। आपका छत्तीसगढ मे स्वागत है पर आप अपने क्षेत्र के पारम्परिक ज्ञान की भी कद्र करे। (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

© सर्वाधिकार सुरक्षित

Tuesday, July 7, 2009

मिट्टी के फल, सर्प विष का भोग और मणि के ऊपर उगता जामुन

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-40
- पंकज अवधिया

मिट्टी के फल, सर्प विष का भोग और मणि के ऊपर उगता जामुन


“आपको हमारे साथ जंगल चलना ही है तो आज डोंगर के उस पार चलते है जहाँ वृक्षो पर मिट्टी के फल लटके होंगे।“पारम्परिक चिकित्सक की बात सुनकर अचरज हुआ। भला वृक्षो मे मिट्टी के फल कैसे फलेंगे? मै तैयार हो गया। गाडी किनारे पर खडा करके चाबी ड्रायवर के हवाले की और पारम्परिक चिकित्सक के पीछे-पीछे चल पडा। हम जिस डोंगर की ओर बढ रहे थे वह वृक्ष विहीन था। केवल शीर्ष पर एक चिरईजाम यानि जामुन का वृक्ष लगा हुआ था। पारम्परिक चिकित्सक ने बताया कि पीढीयो से लोग यह मानते है कि शीर्ष पर स्थित इस वृक्ष के नीचे दो मणियाँ है। इसी मान्यता के कारण इसकी पूजा की जाती है। अब सब तो इतनी ऊँचाई पर नही पहुँच पाते है इसलिये नीचे से ही पूजा हो जाती है। इस वृक्ष ने बहुत से तूफान झेले है पर फिर भी बिना किसी परेशानी के उग रहा है। हमे यह आश्चर्य होता है कि इस पथरीले डोंगर मे इसे पानी कहाँ से मिलता होगा?

मणि वाली मान्यता ने दूर-दूर से धनी लोगो को सदा ही आकर्षित किया है। धनी पैसे लुटाने की तैयारी से आते है और वृक्ष का सौदा करने लगते है। वृक्ष को हटाने के बाद ही तो मणि निकलेगी। स्थानीय लोग इस काम के लिये तैयार नही होते है। बाहरी मजदूर आते है तो सारी बाते पता चलने पर वे वापस लौट जाते है। अब धनी खुद तो शीर्ष पर जाकर यह काम नही कर सकते है।

पारम्परिक चिकित्सक ने बताया कि मणि की बात से ज्यादा उन्हे इस जामुन के पेड के औषधीय गुणो मे विश्वास है। ज्यादातर नदी या दूसरे जलस्त्रोतो के पास जामुन प्राकृतिक रुप से उगता है। आप कुल्लु और सलिहा जैसे वृक्षो जो कि पथरीली जमीन पसन्द करते है, के साथ जामुन को कम ही पायेंगे। ऐसे जामुन के फल मे विशेष औषधीय गुण होते है। हम समर्थ व्यक्तियो को शीर्ष पर भेजकर अपने आप गिरे फलो को एकत्र करवा लेते है। फलो का गूदा और गुठली निकालकर फेक देते है और केवल पतले छिलके को रख लेते है। इस छिलके को नीम की छाँव मे सुखाकर साल भर प्रयोग के लिये रख लिया जाता है। हम नाना प्रकार के औषधीय मिश्रणो मे इस छिलके को डालते है। केवल छिलके भी औषधि की तरह देते है। हमारे साथ मजबूरी यह है कि ऐसा एक ही वृक्ष है और साल मे कुछ फल ही मिल पाते है। हमने इस वृक्ष को फैलाने की बहुत कोशिश की पर सफल नही हो पाये। बहुत से फल वही पडे रह जाते है पर उस पथरीली जमीन मे उग कर नये पौधे नही बन पाते है। पारम्परिक चिकित्सक ने कहा कि आपको आज छिलके का स्वाद चखने का अवसर मिलेगा। मै मन ही मन बडा प्रसन्न हुआ।

काफी दूर चलने के बाद हम डोंगर के दूसरी ओर पहुँचे। सुनसान क्षेत्र था। नाना प्रकार की चिडियो की आवाज आती थी। टूटे हुये भिम्भौरे साफ संकेत दे रहे थे कि वहाँ भालू आते थे। किसी मरे हुये जानवर की बदबू भी आ रही थी। मुझे बताया गया कि किसी माँसाहारी ने ताजा शिकार कल रात या आज सुबह किया होगा। बहुत से साँप भी दिखे जो कि उमस से बैचैन होकर बिलो से बाहर आ गये थे। शायद और भी बहुत से जीव हो जो हमे देख रहे हो पर किसी को हमारी परवाह नही थी। हम एक वृक्ष के पास रुके। मैने उसकी पहचान बबूल की एक जाति के रुप मे की। पारम्परिक चिकित्सक ने बताया कि यह गौहर का वृक्ष है। यह मेरे लिये नया नाम था। मैने अब तक इस वृक्ष के दसो स्थानीय नाम सुने थे पर यह एकदम नया था। खैर, नाम मे क्या रखा है। मैने सिर उठाया तो सचमुच मुझे ढेरो मिट्टी के फल दिखायी दिये। नियम से तो इस वृक्ष मे फल्लियाँ लगी होनी चाहिये थी पर हर शाखा मे मिट्टी की गोल-गोल आकृति लटक रही थी। कहने को तो ये फल कहे जा सकते थे पर वास्तव मे ये फल नही थे।

कुछ वर्षो पहले मैने पहली बार इन तथकथित मिट्टी के फलो को देखा था। उस समय मै दुर्ग जिले के पारम्परिक चिकित्सको के साथ था। उन्होने बताया था कि यह मिट्टी का ढेला वृक्षो की शाखाओ से बन्धा रहता है। आम लोग समझते है कि ये किसी कीडे ने बनाया होगा पर जब इन्हे तोडा जाता है तो इनके अन्दर से कुछ नही निकलता है। न ही कीडे और न ही उनके अंडे। पारम्परिक चिकित्सक इन्हे एकत्र करते थे और पानी मे उबालकर काढा बनाते थे। इस काढे का बाहरी और आँतरिक उपयोग वात रोगो की चिकित्सा मे किया जाता था। मैने प्राचीन भारतीय ग्रंथो और आधुनिक वैज्ञानिक साहित्यो को खंगाल डाला पर कुछ भी जानकारी नही मिली।

उस समय मैने तस्वीरे खीची और दुनिया भर के वैज्ञानिक मित्रो को भेजी। विश्व खाद्य संगठन मे काम करने वाले पौध-रोग विशेषज्ञ मित्रो ने आशंका जाहिर की कि यह मिट्टी न होकर वृक्ष द्वारा किसी रोग की प्रतिक्रिया मे बनायी गयी संरचना है। उन्होने विस्तार से ली गयी तस्वीरे माँगी। मैने फिर से उस स्थान का दौरा किया और सारी तस्वीरे लेकर लौटा। उन्होने तुरंत पुष्टि कर दी कि यह यूरोमाइक्लेडियम नामक कवक की करामात है। उन्हे यह जानकर घोर आश्चर्य हो रहा था कि इसका औषधीय उपयोग है। उन्होने बताया कि दुनिया भर की अकेसिया प्रजाति मे इसका आक्रमण होता है। पर कही भी इसका प्रयोग औषधि के रुप मे नही होता है। मैने मित्रो को धन्यवाद दिया है। यह मेरे लिये बडी ही उपयोगी जानकारी थी। बाद मे अपने सर्वेक्षणो के दौरान मैने परसा सहित बहुत से जंगली वृक्षो मे ऐसी संरचनाए देखी। अलग-अलग क्षेत्र के पारम्परिक चिकित्सक अलग-अलग विधियो से इनका प्रयोग करते है।

इस जंगल यात्रा के दौरान इस संरचना को गौहर के वृक्ष पर देखकर पुरानी यादे ताजा हो गयी। मैने पारम्परिक चिकित्सक को यूरोमाइक्लेडियम के बारे मे बताना चाहा पर फिर यह सोचकर रुक गया कि उन्हे भला इससे क्या मतलब? मैने इन संरचनाओ को एकत्र करने मे मदद की और जल्दी ही हम वापस लौट आये। वापस आकर पारम्परिक चिकित्सक ने संरचनाओ को तोडा और फिर चूर्ण को धूप मे सुखाया। अब साल भर वे स्त्री रोगो की चिकित्सा मे इसका प्रयोग करेंगे। वायदे के अनुसार उन्होने मुझे विशेष जामुन के फलो के छिलके खिलाये और कहा कि इससे आपकी स्मरण शक्ति बढेगी। मैने उनका आभार व्यक्त किया।

22 जुलाई को उन्होने अपने घर आमंत्रित किया है। उस दिन उनके चेले बडी संख्या मे उपस्थित होंगे और विषैले सर्पो का जहर निकाला जायेगा। इस जहर की पूजा की जायेगी और फिर चेले को इसे भात के साथ मिलाकर खिलाया जायेगा। यह सच है कि यदि आपके मुँह मे छाले न हो और पाचन तंत्र के मे किसी तरह की चोट न हो तो मुँह के रास्ते भात के साथ जहर खाने से यह नुकसान नही करता है। मैने “अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग” नामक लेखमाला मे लिखा है कि कैसे गणेश नामक सर्प विशेषज्ञ अपने चेलो को विशेष दिन भात मे मिला कोबरा का जहर खिलाते है। सर्प विशेषज्ञ हो या पारम्परिक चिकित्सक, विष का सेवन करके वे कुछ सिद्ध नही करना चाहते है। वे तो बस अपनी परम्परा निभाते है।

मैने देखा है कि आजकल के गुटखा खाने वाले मुँह जो कि अन्दर के कटे-फटे होते है गुरु से मिले जहर युक्त भात को मजे से खा जाते है। उनपर बुरा असर नही होता है। यदि किसी को जहर चढता है तो जडी-बूटियो से स्थिति को सम्भाल लिया जाता है। मुझे याद आता है कुछ वर्षो पहले मैने जहर को इस रुप मे ग्रहण किया था। जीभ कटी हुयी थी। जहर ने असर दिखाया और गर्मी लगने लगी। सिर घूमने लगा। मुझे बहुत से कन्दो को चबाने को कहा गया और ढेर सा घी पिलाया गया। काफी देर के बाद स्थिति सम्भली। मुझे बस यही डर था कि कही मेरे दिमाग रुपी हार्ड डिस्क मे दर्ज बाते कही गडमड न हो जाये पर शुक्र है, ऐसा हुआ नही।

मैने पारम्परिक चिकित्सक को 22 जुलाई को आने का आश्वासन दिया। मैने शहर से कुछ मँगाने के बारे मे पूछा तो उन्होने पाँच आम के पौधे लाने को कहा जिसे मैने सहर्ष स्वीकार लिया। अब बेसब्री से उस दिन का इंतजार है। (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

© सर्वाधिकार सुरक्षित

ज़टिल रोगो की अंतिम अवस्था मे डुढुम और वनस्पतियो का पारम्परिक प्रयोग

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-39
- पंकज अवधिया

ज़टिल रोगो की अंतिम अवस्था मे डुढुम और वनस्पतियो का पारम्परिक प्रयोग


हम जंगल के लिये निकले ही थे कि एक फोन आ गया।“आप तुरंत चले आइये, तालाब की सफाई के दौरान जो अनोखी मछली निकली थी वह फिर से मिल गयी है। यह बहुत महत्वपूर्ण है। जल्दी आये, नही तो वह हाथो-हाथ बिक जायेगी। तालाब के बाहर चार-पाँच सौ रुपये नकद देकर लोग इसे ले जाने को तैयार है।“ मैने गाडी मोडी और चल पडा उस ओर। राजधानी के धोबी तालाब मे इन दिनो सफाई चल रही है। अवैध कब्जो की मार से यह तालाब पूरी तरह खत्म हो चुका था। इसमे मानव बस्तियाँ बस गयी थी और शेष भाग मे जलीय खरपतवारो का आधिपत्य हो गया था। अब जब इसकी सफाई चल रही है तो न केवल नाना प्रकार की जलीय वनस्पतियाँ मिल रही है बल्कि मछलियाँ और बडे जलीय खरप्तवारो पर घोसला बनाकर रहने वाले पंछी भी मिल रहे है। यहाँ यदि जीव-विज्ञान के शोधकर्ता डेरा लगाकर बैठ जाये तो इतनी नयी जानकारियाँ मिल जायेंगी कि वे इस पर दर्जनो शोध-पत्र प्रकाशित कर सकते है। पर अफसोस यहाँ अभी तक कोई नही पहुँच पाया है।

तालाब की तीन चौथाई सफाई हो चुकी है। मै हर चार दिन मे वहाँ जाने की कोशिश करता हूँ। पिछली बार मुझे इस मछली मे बारे मे बताया गया था। मेरे पहुँचने से पहले वह बिक गयी थी। इतने सारे मोबाइल होने के बावजूद किसी ने उसकी तस्वीर नही खीची थी। इस बार मै मौका नही चूकना चाहता था।

मै जब तालाब पहुँचा तो मछली फिर से बेची जा चुकी थी। इस बार यह मछली साढे पाँच सौ मे बिकी। यह मेरा सौभाग्य था कि इस बार इसकी तस्वीर ले ली गयी थी। मुझे बताया गया कि इस मछली का सामने का हिस्सा सर्प की तरह है। इसे देखने से सर्प का भ्रम हो जाता है। जब तक इस इसकी मछली जैसी पूँछ न देखो इसके सर्प होने का भ्रम बना रहता है। आमतौर पर यह जाल मे नही फँसती है। जब कभी गल्ती से फँस जाती तो हाथो हाथ बिक जाती है। तस्वीर देखने से साफ पता चल रहा था कि इसकी संरचना इसे साधारण जाल मे फँसने नही देती है।

मुझे याद आता है कि विद्यार्थी जीवन मे जब गाँव जाना होता था तब मछली पकडने के लिये गरी डालकर नदी मे बैठे बच्चो को कभी-कभार यह मिल जाती थी। नये लोग घबराकर इसे छोड देते थे। रुके पानी मे यह मुश्किल से मिलती है जबकि बहती नदी-नालो मे ये अधिक संख्या मे होती है। रायपुर शहर के मध्य तालाब मे इसका मिलना दुर्लभ घटना थी। मेरे लिये भी और मछुआरो के लिये भी।

जंगल यात्रा के दौरान नाना प्रकार की मछलियो के बारे मे रोचक जानकारियाँ मिलती ही रहती है पर शाकाहारी होने के कारण उतने ध्यान से मै इन्हे एकत्र नही कर पाता हूँ जितने ध्यान से इन्हे खाने वाले इन जानकारियो मे रुचि लेते है। मेरे पिछले ड्रायवर का मछली पकडना पुश्तैनी व्यवसाय था। उसके पिता उसके लिये एक से बढकर एक मछली लेकर आते थे। जब दिन के अंत मे मै उसे कुछ पैसे देना चाहता तो वह तुरंत बाजार जाकर मछली ले आता था। उसके साथ के कारण मैने मछलियो के विषय मे बहुत सी जानकारियाँ एकत्र की। पारम्परिक चिकित्सा मे मछलियो का प्रयोग होता है और इस विषय मे पारम्परिक चिकित्सको के पास ज्ञान का भंडार है।

मुझे आशा थी कि देश भर मे मछलियो पर इतने बडे-बडे शोध संस्थान होने के कारण मछलियो के औषधीय गुणो पर विस्तार से लिखा गया होगा पर सन्दर्भ साहित्यो मे इस विषय मे बहुत कम जानकारी मिलती है। कुछ शोधकर्ताओ ने यह लिखकर छोड दिया है कि फलाँ प्रजाति फलाँ रोग मे काम आती है पर इसकी प्रयोग विधि और प्रयोग के समय बरती जाने वाले सावधानियो के विषय मे कुछ भी नही लिखा। इस कमी ने मुझे प्रेरित किया कि मै मछलियो के विषय मे जितना सम्भव हो उतनी जानकारी एकत्र करुंगा। एक दशक से भी अधिक समय से मछलियो पर लिखने के कारण इस पर इतने अधिक सन्दर्भ दस्तावेज उपलब्ध हो गये है कि अब देशी-विदेशी संस्थानो मे शोधरत वैज्ञानिक मुझे “मछली विशेषज्ञ” भी मानने लगे है। पर मै इसे स्वीकार नही करता क्योकि बिना मछली खाये भला कैसा मछली विशेषज्ञ?

क्षय रोग की वह अवस्था जब मुँह से खून आने लगता है आम लोग डुढुम नामक मछली को खिचडी के साथ खाने की सलाह देते है। इससे लाभ तो होता ही होगा पर पारम्परिक चिकित्सक इस विषय मे अधिक जानकारी रखते है। वे भी डुढुम का ही प्रयोग करते है पर वनस्पतियो के साथ। खिचडी के स्थान पर औषधीय धान का प्रयोग किया जाता है। औषधीय धान को पकाते समय उसमे नाना प्रकार की औषधीयाँ डाली जाती है और पकाने के बाद पर परोसने से पहले भी वनस्पतियो का सत्व मिलाया जाता है। वे बताते है कि केवल डुढुम का प्रयोग सभी रोगियो को लाभ नही पहुँचाता है। इसलिये रोगी की दशा और जीवनी शक्ति के आधार पर नाना प्रकार की वनस्पतियो को मिलाया जाता है। इनमे से ज्यादातर वनस्पतियाँ डुढुम के औषधीय गुणो को बढाने का कार्य करती है।

आमतौर पर रोग की इस जटिल अवस्था मे रोगी के लिये 75 दिनो का उपचार निर्धारित किया जाता है। इन 75 दिनो मे 55 दिनो तक डुढुम रोगी के नियमित भोजन का हिस्सा रहती है। किसी भी दिन डुढुम को अकेले नही खिलाया जाता है। पहले दिन डुढुम को दो वनस्पतियो के साथ दिया जाता है, दूसरे दिन दो और वनस्पतियाँ जोड दी जाती है, तीसरे दिन दो और, इस तरह यह क्रम 15 दिनो तक चलता है। उसके बाद रोगी की दशा की समीक्षा की जाती है। इस आधार पर आगे के लिये डुढुम और अन्य वनस्पतियो का मिश्रण सुझाया जाता है।

देश भर मे डुढुम को अलग-अलग नामो से जाना जाता है। यह हमारा सौभाग्य है कि आज भी ऐसे पारम्परिक चिकित्सक हमारे बीच है जो डुढुम का प्रयोग क्षय रोगो की चिकित्सा मे सफलतापूर्वक कर रहे है। उन्होने समय के साथ अपने उपचार मे कुछ परिवर्तन किये है। औषधीय धान अब मुश्किल से मिलते है। साथ ही लम्बे समय तक डुढुम की प्राप्ति भी एक समस्या है। डुढुम के साथ प्रयोग होने वाली वनस्पतियाँ बहुतायत मे है पर फिर भी पारम्परिक चिकित्सक उपचार की मूल विधियो को कम ही अपनाते है। मुझे लगता है कि इस पारम्परिक उपचार विधि को फिर से पुनरजीवित करने की आवश्यक्ता है।

रायपुर के तालाब से पकडी गयी मछली डुढुम ही थी पर तस्वीर से यह साफ लगता था कि वह स्वस्थ्य नही है। प्रदूषित तालाब मे शायद उसे सही पोषण नही मिला होगा। चूँकि यह धोबी तालाब था इसलिये डिटरजेंट इसके पानी मे काफी मात्रा मे घुला हुआ था। बाद मे जब मैने यह तस्वीर पारम्परिक चिकित्सको को दिखायी तो उन्होने इस बात की पुष्टि की कि यह खाने योग्य नही है। जब उन्होने सुना कि किसी ने साढे पाँच सौ मे एक मछली खरीदी है तो वे बोले पडे कि इतने पैसे देकर वह कई बीमारियो को अपने घर ले गया है, अनजाने मे ही।

इस लेख को लिखने से पहले मै अपने डेटाबेस मे उन नुस्खो की गिनती कर रहा था जिनमे किसी न किसी रुप मे डुढुम को डाला जाता है। आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि कुल नुस्खो की संख्या नौ हजार तीन सौ दस निकली। मुझे विश्वास है कि डुढुम पर आधारित हजारो नुस्खे आज भी दस्तावेजीकरण की बाट जोह रहे होंगे। इन नुस्खो से सम्बन्धित ज्ञान को विलुप्त होने से हमे ही बचाना होगा। (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

© सर्वाधिकार सुरक्षित

Monday, July 6, 2009

हुंर्रा यदि लकडबघ्घा है, भेडिया नही तो रेवडा क्या है?

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-38
- पंकज अवधिया

हुंर्रा यदि लकडबघ्घा है, भेडिया नही तो रेवडा क्या है?


बरसात के दिनो मे जब रात मे हमारी गाडी किसी गाँव से गुजरती है तो कुत्ते भौकने लगते है और दूर तक दौडाते है पर इस बार कुछ गाँवो मे ऐसा नही हुआ। मैने इस बात पर गौर किया और जानबूझकर गाडी रुकवायी ताकि कुत्तो ने अगर हमे न देखा हो तो देख ले। पर सारे कुत्ते गायब थे। ऐसा बहुत से गाँवो मे हुआ तब हमने रुककर गाँव वालो से इस बारे मे पूछना चाहा। हमे इस बात का आभास था कि यह अटपटा प्रश्न होगा और गाँव वाले भला क्या सोचेंगे इस बारे मे पर प्रश्न पूछते ही वे बोल पडे कि आजकल इस इलाके मे रेवडा (या लेवडा) घूम रहा है। बाँध के पार उसे कुछ लोगो ने पानी पीते देखा था। उन लोगो ने उसे भगाने की भी कोशिश की थी पर वह अपने स्थान से टस से मस नही हुआ। उसकी हिम्मत देखकर उन लोगो की हिम्मत टूट गयी और वे वापस आ गये। अभी तक किसी मनुष्य़ या मवेशी पर रेवडे के आक्रमण की सूचना नही दर्ज की गयी है पर गाँव के कुत्ते एकाएक गायब हो रहे है। सारा शक रेवडे पर ही है और यह शक गलत भी नही है। गाँव वालो ने एक ही रेवडा देखा है पर हो सकता है कि दूसरे और भी इस प्रजाति के जीव गाँव के आस-पास हो। जिन गाँवो की बात मै कर रहा हूँ वो छत्तीसगढ की राजधानी से मात्र कुछ किमी की दूरी पर है।

घटारानी क्षेत्र मे मैने हुंर्रा के तांडव के बारे मे पहले लिखा है। वही हुंर्रा जिसे वन विभाग ने लकडबघ्घा घोषित किया था और जिसने दस से अधिक ग्रामीणो पर प्राणघातक हमला किया था। अंत मे उसने जमाही गाँव के अवधराम यादव पर आक्रमण किया था जिन्होने उस हुंर्रा को मार डाला था। घायलो से जब मैने बातचीत की तो उन्होने इसे हुंर्रा बताया था। जब मैने अपने डेटाबेस से उन्हे तस्वीरे दिखायी तो उन्होने लकडबघ्घा पर हाथ रखा। अंग्रेजी मे इसे हाइना (Hyaena hyaena) कहा जाता है। आपने डिस्कवरी जैसे चैनलो पर हाइना को देखा होगा और उसकी हँसी सुनी होगी। उसके जबडे बहुत मजबूत होते है। लकडबघ्घा हिन्दी शब्द है और हुंर्रा छत्तीसगढी। हाल ही मे मै दुर्ग जिले के गाँवो मे गया तो मुझे हुंर्रा शब्द भेडिये के लिये सुनने को मिला। हुंर्रा या होंर्रा की पहचान उन्होने सियार से आकार मे बडे जंगली जानवर के रुप मे की। जब मैने भेडिये की तस्वीरे उन्हे दिखायी तो उन्होने झट से इसकी पुष्टि कर दी। मैने बचपन से अपने पिताजी से होंर्रा शब्द भेडिये के लिये सुना था। एक बार जब वे साइकिल से गाँव से लौट रहे थे तो उनका सामना इस जानवर से हुआ था। वह रास्ते मे खडा था। उसने पिताजी के लिये रास्ता नही छोडा। उसकी ढिठाई देखक