Sunday, August 30, 2009

जहरीली पिचकारी चलाते कीडे, पौरुष शक्ति बढाने वाले अनोखे कन्द और बरसाती नाले

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-62
- पंकज अवधिया

जहरीली पिचकारी चलाते कीडे, पौरुष शक्ति बढाने वाले अनोखे कन्द और बरसाती नाले


“अरे, पुल से पानी थोडा ही तो ऊपर है। गाडी आराम से निकल जायेगी। और फिर हम भी साथ है। पानी मे बही तो तुरंत सम्भाल लेंगे। देखिये न पीछे कितनी लम्बी कतार लग गयी है। अब आगे बढिए भी। हमारे दो सौ हमे दे दीजिये।“ सामने बरसाती नाला था जो लबालब भरा था। पुल दिख नही रहा था और फिर भी स्थानीय लोग हमारी गाडी को पार कराने अमादा थे। साथ चल रहे पारम्परिक चिकित्सको और सहायको ने हौसला दिया और मैने गाडी आगे बढा दी। आधा पुल तो पार हो गया पर उसके बाद गढ्ढे ही गढ्ढे थे। शायद पानी की तेज धार ने पुल को काट दिया था। ऐसे फँसे कि गाडी पूरा जोर लगाने के बाद भी टस से मस नही हुयी। फिर पानी का एक रेला आया और उसने गाडी को अपने साथ ले जाने की कोशिश की। सबने आखिरी जोर लगाने की कोशिश की और फिर ले देकर गाडी ने पुल पार कर लिया। हमारी जान मे जान आयी। मैने कान पकडे कि अब दोबारा ऐसा जोखिम नही उठायेंगे। इस जोखिम से एक लाभ हुआ। सामने हरा-भरा जंगल था जो हमारा ही इंतजार कर रहा था।

साथी जंगल मे बिखर गये और मै तस्वीरे लेने लगा। पारम्परिक चिकित्सक लौटे तो उनके हाथो मे चार प्रकार की जंगली हल्दी थी। जंगली हल्दी आजकल मुश्किल से मिलती है और फिर एक साथ चार प्रकारो का मिलना हमारे लिये शुभ संकेत था। हल्दी छोडकर पारम्परिक चिकित्सक फिर जंगल मे ओझल हो गये। मै अकेले ही निकल पडा। मुझे बहुत से कीट ऐसे दिखायी दिये जिन्हे मै पहली बार देख रहा था। मै उन्हे मित्र के रुप मे देख रहा था पर वे मुझे मित्र मानने को तैयार नही थे। उनमे से एक ने पिचकारी मारी और मै तेज धार से मुश्किल से बचा। यह पिचकारी जहरीले रसायन की थी। यह रसायन मेरी त्वचा को बुरी तरह से जला देता। पर मै बच गया। जब उसका जहर भरा पिटारा चुक गया तो मैने आराम से उसकी ढेरो तस्वीरे ली।

पिछले कुछ दिन बहुत तेजी से बीते। आपने इस लेखमाला मे पहले पढा है कि मै कृषि से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान पर शोध दस्तावेज तैयार कर रहा हूँ। मैने अगस्त मे प्रतिदिन 14 से 16 घंटे इसमे लगाने का मन बनाया था। जुलाई के अंत से ही यह काम शुरु हो गया था। अगस्त के प्रथम सप्ताह से ऐसी व्यस्तता बढी कि सारे काम किनारे हो गये। जंगल का भ्रमण रुक गया। जीवन-व्यापन के लिये सलाहकार का काम भी अटक गया। बस केवल दस्तावेजीकरण ही दस्तावेजीकरण। लम्बे समय तक कम्प्यूटर मे बैठना इस बार कुछ ज्यादा ही भारी लगा। जब पूरी तरह से थक गया तो जंगल की सुध ली। जंगल से लौटकर फिर काम मे लग गया। नियमित सलाह लेने वाले मेरे लगातार इंकार से कुछ चिंतित थे। मेरा सचिव उन्हे दिसम्बर के बाद का समय दे रहा था। धान मे कीट प्रबन्धन के पारम्परिक कृषि ज्ञान के आठ हजार दस्तावेज पूरे ही हुये थे कि मुम्बई से एक सज्जन का सन्देश आ गया।

उन्होने अपने फार्म हाउस मे औषधीय वनस्पतियाँ लगायी थी। वे मुझे अपना फार्म दिखाकर सलाह लेना चाहते थे। शुल्क देने को तैयार थे और मेरी यात्रा का व्यय भी। सचिव ने जब व्यस्तता बतायी तो उन्होने समय बचाने के लिये हवाई यात्रा का सुझाव दिया। मुझे इस बारे मे बताया गया। उनकी जिद पर मुझसे बात करवायी गयी। उन्होने जब हवाई यात्रा का खुलासा किया तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना नही रहा। उनके पास निजी विमान था और वे उसे भेजकर मुझे बुलवाना चाहते थे। निजी विमान से आने का निमंत्रण नया नही था पर फार्म हाउस देखने के लिये कोई शाही सवारी भेजे तो कुछ अचरज अवश्य होता है। घर-परिवार मे प्राइवेट जेट से बुलाये जाने की खबर फैली तो सबने कहा कि शान से जाओ। पर मेरा मन दस्तावेजीकरण मे उलझा हुआ था। काफी सोच-विचार करने के बाद सितम्बर मे इस शाही सवारी से जाने की योजना बनायी है। वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये उनसे आरम्भिक बातचीत हो गयी है। वे इस चर्चा से संतुष्ट है। इन सब गतिविधियो ने मुझे जंगल डायरी लेखन से एकदम अलग कर दिया है। कल सुबह फिर से जंगल की ओर जाना है। इसलिये आज रात मैने इस लेखमाला को आगे बढाने का निर्णय ले लिया है। यह लेखमाला रुक-रुक कर आगे बढेगी क्योकि आने वाले महिने व्यस्तता भरे है।

चलिये अब उस जंगल की ओर लौटे जहाँ तक हम बरसाती नाले को जैसे-तैसे पार कर पहुँचे थे। इस बार जब पारम्परिक चिकित्सक लौटे तो उनके हाथो मे कन्द थे। उन्होने कन्दो को धोया और फिर हमे खाने को दिया। कन्द बिल्कुल भी स्वादिष्ट नही थे। उनमे काफी चिपचिपापन था। इन्हे पौष्टिक़ बताया गया। सो हमने चाव से खाया। उसके बाद जब हम घर से लाया गया खाना खाने बैठे तो पारम्परिक चिकित्सको ने बडे अचरज वाली बात बतायी। उन्होने कहा कि ये कन्द शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढाते है। इसके अवयव शरीर मे रच बस जाते है। इतने ज्यादा कि कई दिनो तक वीर्य का स्वाद मीठा बना रहता है। यह तो बडी ही उबकाई लाने वाली बात लगी। हमारा ड्रायवर तो खाना आधा छोडकर उठ गया और पास की झाडी मे जाकर उल्टियाँ करने लगा। पारम्परिक चिकित्सको ने गलत समय पर इस खुलासे के लिये क्षमा माँगी। मुझे भी अटपटा लगा। पर उसी पल मुझे सन्दर्भ साहित्यो मे पढी गयी बाते याद आ गयी। साथ ही इंटरनेट मे विचरने वाले अनसुलझे प्रश्न याद आ गये।

चिकित्सा विज्ञान से जुडे सन्दर्भ साहित्य बताते है कि वीर्य का स्वाद मनुष्य के भोजन पर निर्भर करता है। कैफीन का अधिक सेवन करने वालो के वीर्य का स्वाद कडवा को जाता है। खाद्य सामग्रियाँ वीर्य का स्वाद चरपरा और तीखा भी बना देती है। आम लोगो को इन तथ्यो से कोई वास्ता भले न हो पर चिकित्सा विज्ञान के शोधकर्ताओ ने इस पर काफी अध्ययन किया है। मैने वीर्य को मीठा बनाने वाली वनस्पति के बारे मे विस्तार से पहली बार सुना था। मन मे यह जिज्ञासा जागी कि पारम्परिक चिकित्सको ने भला यह कैसे जाना?

आपने बाटेनिकल डाट काम पर मेरे शोध दस्तावेज पढे है तो आप जानते ही होंगे कि बहुत से पारम्परिक चिकित्सक औषधीय बीजो को बोने से पहले मानव वीर्य से उपचारित करते है। क्यो करते है? क्योकि यह उनकी परम्परा है। इसकी वैज्ञानिक व्याख्या शायद ही किसी ने की हो पर मैने प्रयोगशाला परिस्थितियो मे उनके इस परम्परागत प्रयोग को दोहरा कर उसके सकारात्मक प्रभाव का अध्ययन किया है। पारम्परिक चिकित्सको ने देखा कि जब वे विशेष कन्द मूलो को खाने के बाद वीर्य का प्रयोग बीजोपचार के लिये करते है तो उनमे चीटी जैसे बहुत से कीट टूट पडते है। इससे उन्होने इस बात की पुष्टि की कि विशेष कन्द मूलो का सेवन वीर्य को मीठा बना दे रहा है। मै अचरज भरे मन से पारम्परिक चिकित्सको की बाते सुन रहा था और उनके गहरे ज्ञान से अभिभूत हो रहा था।

भोजन के बाद हमने आगे की राह पकडी। कुछ दूर गये ही थे कि एक और बरसाती नाला सामने था। उसे पार करवाने वाला कोई नही था। बडी गाडियाँ अपने जोखिम पर निकल रही थी। हमने वापसी की राह पकडी। वापस गये तो पहले वाले नाले मे पानी का स्तर बढ चुका था। शायद ऊपरी भाग मे वर्षा हुयी थी जिसके कारण यह जल स्तर बढा था। हम फँस गये। शाम होने लगी। मोबाइल महाश्य टावर खोज-खोज कर थक चुके थे। देर रात तक वहाँ रुकना था। शाम तक जंगल मे घूमते रहे और फिर रात होते ही गाडी के पास आ गये। आग जलायी और फिर पानी के उतरने का इंतजार करने लगे। खाना हमारे पास नही था। वे ही कन्द थे जिन्हे हमे खाना था।

बाते चलती रही। मै बीच-बीच मे अपनी जंगल टार्च से आस-पास देख लेता था कि कही कोई जंगली जानवार भी जडी-बूटियो की बात सुनने न आ गया हो। कुछ आँखे चमकती थी पर पारम्परिक चिकित्सक बिना विलम्ब उन्हे छोटे जानवर की आँखे कह देते थे। करीब दस बजे मैने पानी का स्तर देखने के लिये रोशनी उस ओर फेंकी तो सडक पर पडे लम्बे साँप ने ध्यान खीचा। कोबरा जैसा ही था पर उससे बहुत अधिक लम्बा। वह अपनी मस्ती मे चला जा रहा था। मै नही डरा पर पारम्परिक चिकित्सको ने कहा कि डरो क्योकि यह अहिराज है यानि किंग कोबरा। यह हमे नुकसान नही पहुँचायेगा पर चूँकि यह साँपो का राजा है इसलिये हमे इसका सम्मान करना चाहिये। इससे डरना चाहिये। किंग कोबरा को देखकर मै धन्य हुआ। ऐसा मंत्रमुग्ध हुआ कि तस्वीर लेना ही भूल गया।

रात दो के आस-पास कुछ ट्रके उस ओर दिखायी दी। एक वैन भी थी। जल स्तर कम होने लगा था। ट्रक निकली और फिर वैन। उसके बाद हमने भी हिम्मत दिखायी और पुल पार कर लिया। बरसाती दिनो मे इतनी देर रात जंगल से गुजरना बडा ही रोमांचक अनुभव रहा। इस बीच मोबाइल ने टावर खोज लिया। घर पर बात हुयी और सारी चिंताए दूर हुयी। रात को लगातार चलने की बजाय हमने सुबह पाँच बजे एक गाँव मे रुकने की योजना बनायी। चाय की तलब लग रही थी। एक टपरेनुमा होटल के मालिक को जगाया और उससे आलू-पोहा और लाल चाय बनाने को कहा। वह भला आदमी था। उसने तैयारी शुरु कर दी।

बाते चलती रही। गाँव जागने लगा। तभी हमने बाहर डोंगी उठाये कुछ लोगो को जाते देखा। मछुआरे होंगे, मैने कयास लगाया। होटल वाले ने कहा कि नही किसान है। फसल देखने जा रहे है। मैने सोचा कि शायद मैने गलत सुन लिया है। जब उसने वही बात दोहरायी तो विश्वास करना ही पडा। बाद मे खुलासा हुआ कि यहाँ जलधान की खेती होती है। डूबान क्षेत्र मे किसान सूखे खेतो मे धान छिडक देते है। पानी गिरता है तो उनके खेत डूबने लगते है। जैसे-जैसे जल का स्तर बढता है, धान के पौधे भी बढते जाते है और फिर फसल पकने पर नाव मे बैठकर कटाई होती है। यह सब सुनकर हमने नाश्ता करके आराम करने की बजाय किसानो के साथ इस अनोखे धान को देखने की योजना बनायी। कुछ ही देर मे हम भी डोंगी उठाने मे किसानो की मदद कर रहे थे। (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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Monday, August 3, 2009

दस्तावेजीकरण की राह तकता भारतीय कृषि से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-61
- पंकज अवधिया
दस्तावेजीकरण की राह तकता भारतीय कृषि से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान


रात गहरा रही थी। एक स्थान पर आग जलाकर हम लोग खुले मे बैठे थे। आस-पास कुछ दूरी तक खेत थे और फिर उसके बाद जंगल शुरु होते थे। रात उन बुजुर्ग किसानो के साथ गुजारनी थी जो जंगली सुअरो से अपनी फसल की रक्षा के लिये खेतो पर पहरा दे रहे थे। हमारी गाडी पास ही खडी थी। गाडी मे सोने की बजाय मैने मचान पर बैठना उचित समझा। फिर जब नीचे आग जल गयी तो हम सब नीचे आकर बैठ गये। बुजुर्ग किसानो से पारम्परिक कृषि की बात होने लगी। उन दिनो की बात जब कृषि जंगलो पर निर्भर थी। बुजुर्ग किसान तब पारम्परिक धान की खेती करते थे। इनमे से बहुत से औषधीय धान भी थे। औषधीय धान पास के नगर मे रहने वाले राज परिवार के लिये उगाया जाता था। राजा के पारम्परिक चिकित्सक यानि राजवैद्य अपनी निगरानी मे इन्हे उगवाते और फिर शाही गाडियो मे लदवाकर नगर ले जाते। उस समय औषधीय धान की खेती किसान और पारम्परिक चिकित्सक मिलकर करते थे।

कृषि की शुरुआत से लेकर फसल की कटाई तक जंगल से एकत्र की गयी वनस्पतियाँ अहम भूमिका निभाती थी। पारम्परिक चिकित्सक जंगल से इन वनस्पतियो को लाते और उनके सत्व तैयार किये जाते। इन सत्वो से जमीन को सींचा जाता। उसके बाद बीजो को उपचारित किया जाता और फिर पूरी फसल के दौरान कई बार इसका छिडकाव किया जाता। यह कृषि उस समय दूसरे किसानो द्वारा की जा रही खेती से एकदम भिन्न थी। बुजुर्ग किसान बताते है कि इस कृषि से उपज कम होती थी पर गुणवत्ता विशेषकर औषधीय गुण चरम पर होते थे। राज परिवार इन्हे नियमित भोजन मे प्रयोग करता था। दूर देश से आने वाले मित्रो और मेहमानो को भी इसे बतौर उपहार दिया जाता था।

मैने बुजुर्गो किसानो से कृषि मे उपयोग होने वाली वनस्पतियो के विषय मे पूछना शुरु किया तो उन्होने दसो वनस्पतियो के नाम बताये। यह भी बताया कि कब उन्हे एकत्र करना है और कैसे सत्व बनाना है? उन्होने कहा कि बहुत सी वनस्पतियाँ अब जंगल मे खोजे नही मिलती है। जडी-बूटियो के व्यापारियो ने जंगल के जंगल साफ कर दिये है। राज परिवार को धान देने से पहले कुछ मात्रा मे वे इसे अपने परिवार के लिये भी रख लेते थे। बुजुर्ग किसान अपने मजबूत काले बालो और अपनी अच्छी सेहत का राज उस समय खाये गये औषधीय धान को देते है और फिर आहे भरकर कहते है कि काश, हमे अभी भी वैसा ही अन्न खाने को मिलता तो परिजन बार-बार बीमार नही पडते। आज बुजुर्ग किसानो के पास पडा यह पारम्परिक ज्ञान रुपी खजाना उनके किसी काम का नही है। वे अब इसे भूलते जा रहे है। कभी ही इसकी चर्चा की जाती है। जब मैने इसमे रुचि दिखायी तो सारी रात वे बिना थके इसके विषय मे बताते रहे।

जब मैने युवा किसानो के साथ औषधीय और सगन्ध फसलो की व्यवसायिक खेती आरम्भ की तो यह पारम्परिक ज्ञान मेरे बहुत काम आया। कृषि से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान (Traditional Agricultural Knowedge) के दस्तावेजीकरण के लिये हमारे देश मे पानी की तरह पैसे बहाये गये। गुजरात से लेकर मध्य प्रदेश तक की संस्थाओ ने अरबो हजम किये पर सही मायने मे किसी ने दस्तावेजीकरण नही किया। जमीन पर अधिक समय बिताने की बजाय महानगरो मे महंगे सम्मेलन आयोजित करने मे सारे पैसे लगा दिये गये। इसका यह दुष्परिणाम हुआ कि बहुत सा पारम्परिक ज्ञान बुजुर्ग किसानो के साथ समाप्त हो गया। कृषि की शिक्षा के दौरान मैने इस ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे बहुत रुचि ली पर इस ज्ञान को कहाँ और कैसे संरक्षित करुँ, यह किसी ने नही बताया। अपने गुरुजनो को इस विषय मे बताया तो उन्होने बिना विलम्ब इस ज्ञान को अपना बताकर शोध-पत्र प्रकाशित करवा लिये। किसी ने गुजरात की एक संस्था से सम्पर्क करने को कहा पर जब मैने वहाँ जनता की गाढी कमायी का खुल्लमखुल्ला दुरुपयोग देखा तो मन नही हुआ कि दस्तावेज उन्हे सौपूँ। सारा ज्ञान मेरे पास सुरक्षित रखा रहा। पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान पर अधिक ध्यान देने के कारण मै इस पर कार्य को आगे नही बढा पाया।

कुछ दिनो पहले गुजरात की उसी संस्था की वेबसाइट पर यह जानकारी पढी कि उन्होने 90,000 से अधिक पारम्परिक तकनीको के विषय मे जानकारी एकत्र की है तो मुझे लगा कि अपने पास संरक्षित ज्ञान को मै भी दस्तावेज की तरह प्रस्तुत करुँ। जब मैने पारम्परिक तकनीको को सूचीबद्ध करना शुरु किया तो केवल कीट नियंत्रण की पारम्परिक कृषि तकनीक ही संख्या मे डेढ लाख से अधिक निकली। मुझे पता नही कि उस संस्था ने इतनी तकनीको की जानकारियाँ जुटाने के लिये कितने करोड फूँके पर मै अपने बारे मे यह कह सकता हूँ कि मैने जो भी खर्चा अपनी जेब से खर्चा। अब मै इस ज्ञान को मूल रुप मे सीजीबीडी डेटाबेस के माध्यम से दस्तावेज के रुप मे प्रकाशित करने की योजना बना रहा हूँ।

अपनी हाल की जंगल यात्रा के दौरान जब भी मैने ऐसे किसानो को ढूढने की कोशिश की जो कि पूरी तरह से पारम्परिक कृषि को अपना रहे है तो मुझे असफलता ही हाथ लगी। छोटे से छोटा किसान भी बिना यूरिया के फसल नही उगा रहा है। पारम्परिक कृषि पारम्परिक चिकित्सको के पास कुछ हद तक बची हुयी है। वह भी कितने दिनो तक इसे बचा पायेंगे, कहा नही जा सकता है। अपनी कृषि की शिक्षा के दौरान मै ऐसे संस्थान या विभाग की परिकल्प्ना किया करता था जो छात्रो को देश की पारम्परिक कृषि के विषय मे बताता। छात्र अपने नये विचारो से इस कृषि के ज्ञान को समृद्ध करते और फिर नयी पीढी की खेती के लिये उसका प्रयोग होता। आज हमारे देश मे तो सरकारी कृषि संस्थान विदेशी एजेंडे पर काम कर रहे है। सारे शोध कार्य विदेशो मे प्रस्तुत किये जा रहे है और हमारे किसान आत्महत्या कर रहे है। मुझे नही लगता कि वे पारम्परिक कृषि ज्ञान की कभी सुध लेंगे। हाँ, विदेशो मे बैठे उनके आका यदि उनसे ऐसा करने को कहेंगे और इसके लिये फंड देंगे तो वे डेढ टाँग से तैयार हो जायेंगे। ऐसे मे निजी प्रयास ही कुछ राहत पहुँचा सकते है पर निजी प्रयास करने वालो को धन और सम्मान की लालसा त्यागनी होगी। मैने इस दिशा मे प्रयास आरम्भ किये है, उम्मीद है और लोग भी जुडेंगे। (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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रोगो को हरने वाली राखियाँ बन्धवाये इस रक्षाबन्धन मे

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-60
- पंकज अवधिया

रोगो को हरने वाली राखियाँ बन्धवाये इस रक्षाबन्धन मे


पारम्परिक चिकित्सको के साथ इस जंगल यात्रा के दौरान जब एक गाँव मे एक और जानकार को साथ लेने के लिये रुके तो पता चला कि वे बीमार है। तेज ज्वर से तडप रहे है। दवाए उन्हे दी जा रही थी पर फिर भी ज्वर कम नही हो रहा था। वे लगभग बेसुध थे और ज्वर बढने पर प्रलाप भी करते थे। साथ चल रहे पारम्परिक चिकित्सको ने खेतो का रुख किया। क्लिंग नामक एक खरप्तवार को चुना और फिर उसकी जडे खोदने लगे। ताजी जड को नीले धागे मे पिरोया और फिर उसे रोगी की कलाई मे बाँध दिया। मुझे बताया गया कि अब ज्वर कम होने लगेगा। रोगी के परिजनो को हिदायत दी गयी कि जैसे जी ज्वर कम हो नीले धागे की सहायता से बन्धी जड कलाई से निकाल ले और फिर नीले की जगह लाल धागा बाँध दे। जब ज्वर पूरी तरह से चला जाय तो काले धागे का प्रयोग करे। ज्वर उतरने के चौबीस घंटो के बाद इस जड को या तो पास की नदी मे प्रवाहित कर दे या पुराने पीपल के नीचे गाड दे। इन तमाम निर्देशो के बाद हमने आगे की राह पकडी। शाम को जब लौटे तो रोगी की हालत काफी सुधरी हुयी थी। गाँव के बहुत से लोग जमा थे। वे पारम्परिक चिकित्सको का ही इंतजार कर रहे थे। बहुत से किसानो ने बताया कि क्लिंग को वे कचरे के रुप मे देखते आये है। पहली बार उन्होने इसके जीवनदायिनी गुणो के बारे मे जाना है।

मुझे याद आता है टीबी का एक रोगी जिसे आधुनिक चिकित्सको ने साफ कह दिया था कि अब बचने की कोई उम्मीद नही है। वह रोगी घर के एक कोने ने पडा रहता था। कोई उसके पास नही जाता था। वह मौत का इंतजार कर रहा था और मौत थी कि आती ही नही थी। पारम्परिक चिकित्सको को जब यह पता चला तो वे भाग कर आ गये। वे अंतिम समय तक प्रयास करते रहते है। वे कभी भी हथियार नही डालते। आधुनिक चिकित्सा के महारथियो को भी पारम्परिक चिकित्सको की यह जीवटता भाती है इसलिये भले ही वे अपने रोगियो को मुम्बई, दिल्ली भेजे पर जब उनके परिवार मे संकट आता है तो पारम्परिक चिकित्सको का रुख करते है। टीबी के उस रोगी को पारम्परिक चिकित्सको ने मछलियो और वनस्पतियो की सहायता से फिर से चंगा कर दिया। पर लम्बे संघर्ष ने रोगी की जीवनी शक्ति को कम कर दिया था। पारम्परिक चिकित्सको ने उसे अनोखा उपाय बताया।

अपने साथ जंगल ले जाकर उन्होने ग्यारह तरह की जडो की पहचान करवायी। रोगी को रोज मुँह अन्धेरे जंगल जाना होता। वह विशेष जड एकत्र करता और फिर दिन भर उसे काले धागे की सहायता से कलाई मे बाँधे रहता। दूसरे दिन दूसरी जड का इसी तरह प्रयोग करता। ग्यारह दिनो तक ग्यारह अलग-अलग जडो के अनोखे प्रयोग से उसे लाभ हुआ। पारम्परिक चिकित्सको का कहना था कि वैसे ही रोगी ने इतनी अधिक औषधीयो का सेवन कर लिया है इसलिये और अधिक औषधीयो के सेवन की बजाय यह जरुरी है कि ऐसे अनोखे उपाय अपनाये जाये। यहाँ एक बात स्पष्ट करना चाहूँगा कि अलग-अलग रंगो के धागो के प्रयोग के पीछे वैज्ञानिक कारण है। अपने शोध दस्तावेजो मे मैने इस विषय़ मे विस्तार से लिखा है। यदि आप जानना चाहे तो उन आलेखो को पढे।

मेरे मित्र मुझे आमतौर पर विवाह के दिन आमंत्रित करने की बजाय विवाह के पाँच दिन पहले आमंत्रित करना पसन्द करते है। वे एडी-चोटी का जोर लगा देते है। मुझे जाना ही होता है। पर मै खाली हाथ तो जा नही सकता। मेरे पास नीले धागो मे गुथी ताजी जड होती है। इस जड को सलीके से वर की कलाई मे बाँध देता हूँ। अब पाँच दिनो तक वर को इसे पहने रहना होता है। ज्यादातर मित्र समझते है कि इसके प्रयोग से उनकी कामशक्ति बढेगी। बहुत से मित्र तो ऐसा दावा भी करते है पर यह अधूरा सच है। मुझे पारम्परिक चिकित्सको से इस अनूठे प्रयोग का पता चला। वे जब भी किसी बीमार पडने वाले व्यक्ति से मिलते है तो इस जड को बिना विलम्ब कलाई मे बाँध देते है। इससे शरीर का बिगडा हुआ संतुलन सही रुप मे आ जाता है और व्यक्ति बीमार पडने से बच जाता है। ऐसी जडो को पारम्परिक चिकित्सक विवाह समरोहो मे भी प्रयोग करते है। वे वर और वधू दोनो के लिये जडो का प्रयोग सुझाते है। उनका कहना है कि वर-वधू के लिये ये दिन बहुत महत्वपूर्ण है। ये जरुरी है कि इन दिनो मे वे प्रसन्न रहे और रोगो से बचे रहे। यह पारम्परिक ज्ञान कारगर है और बहुत अधिक उपयोगी है। आज के समय मे इसका और भी अधिक महत्व है। मैने स्वाइन फ्लू के लिये जो उपाय सुझाये थे उनमे जडो का ऐसा अनूठा प्रयोग भी शामिल था।

अपने वर्षो के अनुभव से मैने जडो और दूसरे वानस्पतिक भागो के हजारो प्रयोगो के विषय मे जानकारियाँ एकत्र की है। बहुत से ऐसे प्रयोगो को आधुनिक विज्ञान की कसौटी मे भी कसा गया है। भारत ही नही बल्कि दुनिया के दूसरे भागो मे भी पारम्परिक चिकित्सक ऐसे प्रयोग सदियो से करते आ रहे है। मै इन प्रयोगो को नयी पीढी के बीच लोकप्रिय करना चाहता हूँ ताकि वे स्वस्थ रह सके। मै इस पारम्परिक ज्ञान के उपयोग से ऐसी राखियाँ बनाने के पक्ष मे हूँ जो भाईयो को रोगो से और आज की दुनिया के मानसिक तनावो से मुक्त रख सके। देश भर मे पारम्परिक चिकित्सको के मार्गदर्शन मे ऐसी राखियाँ बने और भाईयो की कलाईयो मे सजे।

इस वर्ष के रक्षाबन्धन मे तो ऐसी राखियो की उम्मीद करना सही नही है पर मुझे विश्वास है कि आने वाले वर्षो मे इस ओर आम लोगो का ध्यान जायेगा। मै आपको आश्वस्त करना चाहता हूँ कि हर वर्ष जिस तरह पारम्परिक चिकित्सक और दूसरे लोग रक्षाबन्धन के दिन मेरे पास आते है वैसे ही आप आयेंगे तो ऐसे रक्षाबन्धनो से आपका भी स्वागत किया जायेगा। हम इस परम्परा को वर्ष मे कई बार अपनाते है और लाभांवित होते है।

ज्यादातर पारम्परिक चिकित्सक जनहित मे इस पारम्परिक ज्ञान को सार्वजनिक करने के पक्ष मे है पर वे इसके गलत व्यवसायिक उपयोग के भय से भी प्रभावित है। उन्होने “रुद्राक्ष माफिया” को फलते-फूलते और उनके हाथो गरीबो को लुटते देखा है। उन्होने यह भी देखा है कि प्राचीन भारतीय योग कैसे कुछ लोगो की बपौती बन गया है और कैसे इस पारम्परिक ज्ञान से छदम बाबा लोग अरबो कमा रहे है। उन्हे लगता है कि पारम्परिक ज्ञान को सार्वजनिक करते ही कही चैनल वाले बाबाओ की गिद्ध दृष्टि उन पर न गड जाये। उनका डर गलत नही है। मै अपने लेखो मे बार-बार लिखता हूँ कि जब आयुर्वेद पर हर भारतीय का बराबर हक है तो क्यो कुछ कम्पनियाँ और बाबा इस पर अपना वर्चस्व कायम किये हुये है? आयुर्वेद से देश को खरबो की आमदनी होती है और दुनिया भर मे इसका बाजार है तो फिर भारतीयो को इसका लाभ मुफ्त मे मिलना चाहिये। ठीक उसी तरह जैसे पेट्रोल से कमाने वाले अरब देश अपने नागरिको को हिस्सा देते है। क्यो भारतीय पारम्परिक ज्ञान से बने शीतोप्लादि और मधुमेहहर चूर्ण जैसे उत्पाद मनमानी कीमत पर बिकते है जबकि वे हमारे ही जंगल से हमारे ही पारम्परिक ज्ञान के आधार पर बने है। किसने चन्द लोगो को इससे लाभ कमाने का आधिकार दिया है? इस पर खुलकर चर्चा होनी चाहिये।

कल की जंगल यात्रा मुझे राखियो के लिये करनी पडेगी। इस बार जो मित्र और परिजन आने वाले है वे ऐसी रखियाँ चाहते है जो उन्हे कम से कम एक दिन मानसिक तनाव से दूर रख सके और चैन की नीन्द सुला सके। उन्हे निराश करने का मेरा मन बिल्कुल नही है। (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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Sunday, August 2, 2009

बीज यात्रा, पारम्परिक चिकित्सक और रक्षा के साथ बीजबन्धन का प्रस्ताव

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-59
- पंकज अवधिया

बीज यात्रा, पारम्परिक चिकित्सक और रक्षा के साथ बीजबन्धन का प्रस्ताव


सुबह देर से उठा तो थकान हावी थी। अपने कमरे तक पहुँचा तो एक पैकेट पडा हुआ था। मैने उसके बारे मे पूछताछ की तो बताया गया कि अम्बिकापुर से आये किसी व्यक्ति ने यह पैकेट दिया है। मैने पैकेट खोला तो उसमे एक अंकुरित हो रहा बीज था। यह बीज था अंकोल का। सारी थकान पल मे दूर हो गयी और इस नन्हे बीज से सारा अतीत याद आ गया। लगभग एक दशक पहले जब मै सरगुजा क्षेत्र मे वानस्पतिक सर्वेक्षण कर रहा था तब वहाँ के पारम्परिक चिकित्सको से एक अघोषित समझौता हुआ था। यह समझौता था बीजो के आदान-प्रदान का। हम जिस भी वनस्पति पर चर्चा करते उसके बीज आपस मे बाँट लेते और उपयुक्त स्थान पर उसे रोप देते। उस बीज से नये पौधे निकलते और जब कालांतर मे उसमे फल लगते तो पहले बीज को वापस उसी पारम्परिक चिकित्सक को दे देते जिससे मूल बीज को प्राप्त किया था। बीज को पारम्परिक चिकित्सक फिर किसी को दे देते थे। इस तरह यह क्रम चलता रहता था।

मैने बस्तर से एकत्र किया गया अंकोल का बीज सरगुजा के एक युवा पारम्परिक चिकित्सक को दिया तो वह गदगद हो गया। उसने उस बीज को अपने घर मे लगाया और जब बीज से बने वृक्ष मे सबसे पहले फल आये तो बिना देरी एक बीज भेंट करने रायपुर चला आया। यही बीज मेरे पास पैकेट के अन्दर पडा था। उसने अंकुरित होता बीज दिया था यानि इशारा साफ था। मुझे जल्दी ही इसे किसी दूसरे पारम्परिक चिकित्सक को दे देना था ताकि वह इस परम्परा को आगे बढाये।

पैकेट लेकर मै बाहर आया तो इंतजार करता वह पारम्परिक चिकित्सक दिख गया और गले मिलकर हम पुरानी यादो मे खो गये। पारम्परिक चिकित्सक ने अंकोल के वृक्ष का हाल बताया। उसकी योजना थी कि वह इसका खूब प्रचार-प्रसार करे। बीजो के माध्यम से पूरे सरगुजा मे फैलाये पर उसे इस बात का भी आभास था कि एक ही प्रजाति की बजाय विभिन्न प्रजातियो के मिश्रण का फैलाव ज्यादा जरुरी है। पारम्परिक चिकित्सक ने मुझे अंकोल का तेल भी भेंट मे दिया। मैने अपने शोध दस्तावेजो मे लिखा है कि किसी भी तरह की चोट मे यह तेल रामबाण की तरह काम करता है। इस तेल के इतने सारे प्रयोग है कि हर घर मे इसे होना ही चाहिये, हल्दी की तरह। पर इस तेल को प्राप्त करना टेढी खीर है।

देश के अलग-अलग क्षेत्र के पारम्परिक चिकित्सक अलग-अलग विधियो से तेल बनाते है। अलग-अलग विधियो से बनाये गये तेल के गुण भी अलग-अलग होते है। सरगुजा से आये इस पारम्परिक चिकित्सक ने जो तेल मुझे दिया उसमे कुसुम के तेल की गन्ध भी थी जबकि मैदानी क्षेत्रो के पारम्परिक चिकित्सक जब अंकोल का तेल देते है तो उसमे तिल के तेल की गन्ध भी होती है। हमारे प्राचीन ग्रंथ अंकोल के तेल के विषय मे जानकारी देते तो है पर इसके अलग-अलग प्रकारो के विषय मे कुछ नही बताते।

पिछले सप्ताह ही मैने अंकोल के ढेरो बीज एकत्रित किये थे एक देवस्थल से। अगले कुछ दिनो मे गाँव-गाँव घूमकर इन्हे पारम्परिक चिकित्सको के बीच बाँटने की योजना है। गाँव के आम लोगो ने यदि रुचि दिखायी तो उन्हे भी बीज देने है पर पूरी तरह आश्वस्त होने के बाद। पारम्परिक चिकित्सक तो अंकोल के बीजो को हाथो-हाथ ले लेते है और बिना देरी उसे लगा देते है पर आम लोग इसके औषधीय गुणो को जानने के बाद भी सुस्ती दिखाते है। बीज ले लेते है और फिर उसे घर मे एक किनारे पर रख देते है। इस तरह बीज खराब हो जाता है। अगली बार जाओ तो कह देते है कि बीज लगाया था पर उगा ही नही। इस रवैये को देखते हुये पारम्परिक चिकित्सको ने मजेदार रास्ता अपनाया है।

वे युवाओ को बीज देकर कहते है कि इसकी पूजा करने के बाद रोपने से वशीकरण की शक्ति आ जाती है। या फिर ऐसी शक्ति आ जाती है कि आप किसी को मोह सके। बस, इतना सुनते ही युवा पूरे मन से उसे रोप देते है। उसकी सेवा करते है और यह भी समझने लगते है कि उनमे यह शक्ति आ गयी है। मेरी जंगल यात्रा के दौरान पारम्परिक चिकित्सको ने ऐसे बहुत से युवाओ से मुझे मिलवाया है जो दुर्लभ प्रजातियो के संरक्षण मे अपनी अप्रत्यक्ष पर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे है। ऐसे युवाओ को कालांतर मे वृक्षो के बडे होने होने पर पारम्परिक चिकित्सक औषधीय उपयोगो के विषय मे बता देते है जिससे युवा न केवल अपना और परिवार का भला कर पाते है बल्कि आस-पास के लोगो को भी रोगो से मुक्ति दिलवा देते है।

क्या बीजो से मोहनी या वशीकरण शक्ति की कपोल-कल्पित बाते जोडना अन्ध-विश्वास को बढावा देना नही है? पारम्परिक चिकित्सक ऐसा नही मानते है। उनका कहना है कि येन-केन-प्रकारेण कैसे भी युवाओ को इस दिशा मे आगे लाना है। आप सीधी भाषा मे लाख समझाये वे प्रेरित नही होते है। वे नवागाँव के उजडते जंगल का उदाहरण देते है जहाँ के ग्रामीण युवाओ को जब यह बताया गया कि यहाँ मोहनी बूटियाँ है तो वे जी-जान से इसे बचाने मे लग गये। ऐसी व्यवस्था की कि कोई बाहरी आदमी अन्दर जा ही नही पाये। मुझे पारम्परिक चिकित्सको का यह तरीका गलत नही लगता पर मै अपने रास्ते चलना पसन्द करता हूँ। ग्रामीणो युवाओ की तरह मुझे शहर के आम लोगो को वृक्ष लगाने के लिये प्रेरित करने मे कठिनाई होती है। प्रदूषण से बचने के लिये वृक्ष लगाने मे रुचि कम ही ली जाती है पर जब बताया जाता है कि डायबीटीज या ब्लड प्रेशर मे यह उपयोगी है तो बीजो के लिये वे टूट पडते है।

बचपन से ही हर बार रक्षाबन्धन के समय यह ध्यान आता है कि यदि बहने भाईयो को राखी के साथ-साथ औषधीय वनस्पतियो के बीज भी दे और यह वचन ले कि बहन की तरह ही वे बीजो की भी रक्षा करेंगे आजीवन तो इस देश की पर्यावरण से जुडी ज्यादतर समस्याओ का समाधान निकल आयेगा। नाना प्रकार के बीज सरकार की ओर से नि:शुल्क उपलब्ध कराये जाने चाहिये ताकि बहने भाईयो की स्वास्थ्य समस्याओ के आधार पर बीज भेंट कर सके। यदि भाई को मधुमेह है तो कठपीपल के बीज, श्वाँस की बीमारी हो तो डूमर के बीज और ऐसे ही असंख्य विकल्प प्रस्तुत किये जा सकते है। मै अपने लेखो के माध्यम से वर्षो से यह प्रस्ताव समाज के सामने रख रहा हूँ, इस उम्मीद मे कि एक दिन तो समाज इसे मानकर पर्यावरण के प्रति अपनी सजगता का परिचय देगा। (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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अच्छे स्वास्थ्य के लिये मच्छरो का प्रयोग, रेडियो साक्षात्कार और अंतरराष्ट्रीय दबाव

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-58
- पंकज अवधिया

अच्छे स्वास्थ्य के लिये मच्छरो का प्रयोग, रेडियो साक्षात्कार और अंतरराष्ट्रीय दबाव


“हाँ तो बताइये कैसे बनता है मच्छरो का काढा? क्या किलो भर मच्छरो की जरुरत होती है या टन भर? कैसे पीते है इस काढे को?” कनाडा के सीबीसी रेडियो के सम्पादक मार्क विंकलर ने तो जैसे प्रश्नो की बौछार ही कर दी। पिछले सप्ताह वे अपने किसी रेडियो कार्यक्रम के लिये मेरा साक्षात्कार ले रहे थे। दरअसल उन्होने मेरा एक शोध आलेख पढ लिया था जो मच्छरो के सम्भावित उपयोग के बारे मे था। यह शोध पत्र है तो दिलचस्प पर वर्ष 2003 मे प्रकाशित होने के बाद विज्ञान जगत ने इसमे अधिक रुचि नही दिखायी। इस पर आगे काम नही हुये और न ही मुझसे मार्क की तरह किसी ने विस्तार से पूछा। बाटेनिकल डाट काम ने यह अवश्य बताया कि यह आलेख उन आलेखो मे से है जिन्हे सबसे ज्यादा यानि हजारो मे हिट्स मिलती रही है। ये तो कनाडा के मार्क थे जिन्हे मन हुआ कि इस शोध के बारे मे वे मुझसे विस्तार से पूछे।

एक घंटे के साक्षात्कार से पहले उन्होने बता दिया था कि कुछ भी लाइव नही है इसलिये आराम से बात की जाये। शुरु मे वे ऐसे ही आराम से बात करते रहे पर धीरे-धीरे उनके प्रश्न जटिल होते गये। बीस मिनट बाद ही मुझे आभास हो गया कि यह सब केवल साक्षात्कार के लिये नही पूछा जा रहा है। इसके पीछे सब कुछ जानने की मंशा भी है और जरुर इसे वैज्ञानिको के लिये तैयार किया जा रहा है। यह आभास होते ही मैने ठान लिया कि पूछने दो उन्हे जो पूछना है, अब तो वे खेत की पूछेंगे तो मै खलिहान की बताऊँगा। हुआ भी ऐसा। मार्क इतना चिढ गये कि खीझने लगे। और फिर उन्हे धन्यवाद कहकर साक्षात्कार खत्म करना पडा। उन्होने यह भी नही बताया कि इसे कब प्रसारित किया जायेगा?

मच्छरो और मलेरिया से सभी परेशान है। छत्तीसगढ के आम लोग भी। पर जैसा मै अक्सर लिखता हूँ दुनिया मे प्रयोगधर्मी दिमागो की कमी नही है। इसी प्रयोगधर्मिता के चलते राज्य के पारम्परिक चिकित्सको ने हर नयी वनस्पति और कीट के साथ प्रयोग किये है और उनके कुछ न कुछ उपयोग ढूँढ निकाले है। जहाँ एक ओर लेंटाना नामक वनस्पति को वैज्ञानिक जैव-विविधता के लिये खतरा मानकर रसायनो से इसे नष्ट करने का अनुमोदन कर रहे है वही पारम्परिक चिकित्सको ने इस विदेशी पौधे के औषधीय गुण विकसित कर लिये है। आम ग्रामीण भी पीछे नही है। मैने अपने शोध दस्तावेजो मे पहले लिखा है कि कैसे तिल्दा क्षेत्र के ग्रामीण मुँह मे छाले होने पर लेंटाना की दातून करते है। दातून के रुप मे लेंटाना का प्रयोग और इसके फायदे के विषय मे उस देश के लोग भी नही जानते जहाँ से यह आया है। इसी तरह सैकडो किस्म के कीडो के औषधीय उपयोग पारम्परिक चिकित्सको ने विकसित किये है। इनमे बहुत से ऐसे कीडे है जो कि फसलो को नुकसान पहुँचाते है। मसलन धान मे आक्रमण करने वाले माहो कीट के दसो औषधीय उपयोग है। पारम्परिक चिकित्सक न केवल सीधे ही इस कीडे का उपयोग करते है बल्कि इसे औषधीय मिश्रणो मे वनस्पतियो के साथ भी प्रयोग करते है। मैने विस्तार से इस पारम्परिक ज्ञान का दस्तावेजीकरण किया है।

होम्योपैथी का छात्र होने के नाते औषधीय कीटो और मकौडो मे मेरी विशेष रुचि रही है। बहुत सी होम्योपैथी दवाए इनसे बनती है और जबरदस्त असर भी करती है। अपने वानस्पतिक सर्वेक्षणो के दौरान एक बार मैने देखा कि विभिन्न वनस्पतियो को औषधीय गुणो से समृद्ध करने के लिये पारम्परिक चिकित्सक जडी-बूटियो का जो घोल बना रहे है उसमे वे मच्छरो को भी डाल रहे है। यह मेरे लिये नयी जानकारी थी। मैने पूरी प्रक्रिया का दस्तावेजीकरण किया और फिर जब दूसरे पारम्परिक चिकित्सको से इस विषय पर चर्चा की तो उनसे काफी कुछ जानने को मिला। मच्छरो का ऐसा उपयोग आधुनिक साहित्यो मे दर्ज नही है। कुछ बुजुर्ग पारम्परिक चिकित्सको से जब मैने ऐसे पारम्परिक नुस्खो के विषय़ मे जानकारी प्राप्त की जिनमे तीन सौ से अधिक औषधीयो का प्रयोग किया जाता है तब मुझे मच्छरो का नाम भी सूची मे मिला। क्या मच्छर इंसानो की औषधीयो मे प्रयोग हो रहे है? मैने इन नुस्खो को न केवल तैयार होते देखा बल्कि रोगियो पर प्रयोग के बाद नुस्खो से होने वाले लाभो के विषय मे विस्तार से अध्ययन किया। मच्छारो के उपयोग के इसी ज्ञान पर मैने सतही शोध आलेख लिखा था। इसमे सम्भावित उपयोगो पर भी चर्चा की थी। इसमे पारम्परिक चिकित्सको को ही महत्व दिया गया था आखिर वे ही असली हीरो है, मै तो मात्र उनके ज्ञान के बारे मे लिख रहा हूँ।

कनाडा के मार्क को एक घंटे की साक्षात्कार मे सब कुछ चाहिये था। वे प्रयोग विधि से लेकर गुप्त नुस्खो के बारे मे जानना चाहते थे। मै कैसे देश के पारम्परिक ज्ञान के बारे मे सब कुछ बता देता? मैने उनसे कहा कि आप राष्ट्रीय जैव-विविधता बोर्ड द्वारा तय किये गये मापदंडो के हिसाब से चले और उनसे अनुमति लेने के बाद मेरा साक्षात्कार ले। अच्छा तो यही होगा कि आप पारम्परिक चिकित्सको का साक्षात्कार ले। मार्क यह सब अनसुना करते गये और ग्वांटेनामो बे का कैदी समझकर मुझसे सवाल करते रहे।

पिछले सप्ताह जर्मनी से आये एक सन्देश ने भी मुझे काफी उद्वेलित किया। यह सन्देश दुनिया के जाने माने वैज्ञानिक का था जो नोबल पुरुस्कार प्राप्त कर चुके है। उन्होने मेरे कार्यो की जम कर तारीफ की और फिर बताया कि वे भी पारम्परिक ज्ञान का दस्तावेजीकरण कर रहे है। उन्होने औषधीय कीटो और डायबीटीज पर वैसे ही काम किया है जैसे मै कर रहा हूँ। उन्होने “जोर” डालकर कहा कि आप जितना काम कर रहे हो उसकी महत्ता तभी होगी जब आप उसे अंतरराष्ट्रीय विज्ञान पत्रिकाओ मे प्रकाशित करेंगे। मुझे मालूम है कि पत्रिकाओ का खर्च बहुत अधिक है और आप वहन नही कर सकते है। मेरे विश्वविद्यालय ने इन पत्रिकाओ को पैसे दिये है। यदि आप चाहे तो मेरे साथ मिलकर अपने शोध कार्यो का प्रकाशन करे ताकि बिना पैसे के सब कुछ हो जाये। हाँ, आपको सब कुछ पूरे विस्तार से बताना होगा। इस नोबल वैज्ञानिक की “चाल” समझकर मै दंग रह गया।

मैने उन्हे विनम्रतापूर्वक लिखा कि मैने पहले सौ से अधिक शोध पत्र दुनिया भर की शोध पत्रिकाओ मे प्रकाशित करवाये है। मैने पाया है कि ये शोध पत्रिकाए सम्पादन के नाम पर महत्वपूर्ण जानकारियो को उडा देती है और फिर उन जानकारियो का अन्यत्र प्रयोग हो जाता है। मैने बहुत बार इसकी शिकायत की और नतीजा सिफर रहा। फिर पत्रिकाए पारम्परिक चिकित्सको का नाम नही प्रकाशित करती है। सारा श्रेय वैज्ञानिको को दे दिया जाता है। यह मुझे पसन्द नही है। मैने उनसे यह भी कहा कि मेरे शोध-दस्तावेज विस्तार से है। अब 1000 जीबी से अधिक मधुमेह की रपट और 200 जीबी से अधिक औषधीय धान की रपट को मूल रुप मे बिना छेडछाड के प्रकाशित करने का माद्दा किस पत्रिका मे है? यदि इसे सिकोडा गया तो इसकी मूल भावना खत्म हो जायेगी।

जर्मन वैज्ञानिक महोदय ने जवाब मिलने पर भी पीछा नही छोडा है। वे लगातार ई-मेल भेज रहे है। हाल के ई-मेल साफ जता रहे है कि उन्हे कूट भाषा मे लिखी जा रही मधुमेह की रपट के बारे मे सब कुछ जानना है, और उस रपट मे अपना नाम भी जुडवाना है। डाक्टरेट की मानद उपाधि से लेकर विदेश मे घर तक के आफर दे रहे है ये सज्जन। मै इन्हे अनदेखा कर रहा हूँ। मेरे मित्र इसे जीवन का स्वर्णिम अवसर बता रहे है।

मच्छरो के उपयोगो मे भी इन जर्मन वैज्ञानिक की रुचि है। वे कनाडा के रेडियो कार्यक्रम की बात भी जानते है। कैसे? ये उन्होने नही बताया। मुझे अब समझ आने लगा है रेडियो साक्षात्कार क राज। पता नही, आगे और कितने अंतरराष्ट्रीय दबाव झेलने होंगे? शुक्र है कि मेरे पास अपना हिन्दी ब्लाग है जिसके माध्यम से मै अपने देशवासियो से सीधे जुड सकता हूँ और इन दबावो के विषय मे बता सकता हूँ। (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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