Wednesday, September 9, 2009

तंग पिंजरो मे अघोषित आजीवन कारावास भुगतते वन्य प्राणी और उनसे जुडी बाते

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-65
- पंकज अवधिया

तंग पिंजरो मे अघोषित आजीवन कारावास भुगतते वन्य प्राणी और उनसे जुडी बाते


कल्पना करिये कि आप रोजमर्रा के कामकाज मे लगे है। अचानक ही दूसरे ग्रह के लोग आये और आपको उठा ले। तंग कमरे मे आपको रखे और फिर अगले दिन आपके शहर से सैकडो किलोमीटर दूर ऐसी जगह पर छोड दे जहाँ आप कभी गये ही नही है। फिर आपको उस जगह पर रहने के लिये मजबूर करे। आपको सब कुछ शुरु से शुरु करना होगा। पता नही ऐसे माहौल मे आप अपने अस्तित्व को कायम रख पायेंगे भी कि नही। आप इसे सीधे-सीधे अन्याय कहेंगे। खैर, आप निश्चिंत रहे क्योकि आप इंसान है और यह आपके साथ शायद ही हो पर ऐसा व्यव्हार वन्य प्राणियो के साथ अक्सर होता है। उन्हे दूसरे ग्रहो के लोग इधर से उधर नही करते बल्कि हम-आप जैसे लोग ही करते है। हाल ही मे मै एक पारम्परिक सर्प विशेषज्ञ से यह चर्चा कर रहा था।

ऊपर से जंगल भले ही शांत लगे पर भीतर भारी संघर्ष चलता रहता है। यह संघर्ष अस्तित्व के लिये होता है। जंगल मे असंख्य खतरे होते है और कडा संघर्ष ही अधिक समय तक जीने देता है। जिस स्थान पर वन्य प्राणी जन्मते है उसके आस-पास से वे परिचित रहते है। वही वे बडे होते है और जीवन के लिये संघर्ष करते है। इन प्राणियो के इलाके बँटे होते है और इलाको के लिये इनमे जबरस्त संघर्ष होता है। मैने पिछले लेखो मे लिखा है कि कैसे पारम्परिक सर्प विशेषज्ञ श्री गणेश के चेले जंगल से नाना प्रकार के साँप पकडकर लाते है और फिर पंचमी के दिन उन्हे दूसरे जंगलो मे छोड दिया जाता है। छोडने से पहले उनकी पूजा की जाती है और सर्प उत्सव मनाया जाता है। जंगल मे सर्प को वापस छोडना निश्चित ही साँपो के प्रति उनकी जिम्मेदारी को दर्शाता है। मै इस परम्परा का प्रशंसक रहा हूँ पर एक ही प्रश्न मुझे लम्बे समय से कचोटता रहा है कि साँपो को वापस उसी स्थान पर क्यो नही छोडा जाता? क्यो नये जंगल मे छोडा जाता है, जहाँ उन्हे जीवन के लिये संघर्ष एक बार फिर से आरम्भ करना होता है? इसका जवाब किसी के पास नही होता है। ज्यादातर लोग इस बारे मे सोचना ही नही चाहते पर वे लोग जो जंगलो मे रहते है वे इस बलात स्थान परिवर्तन को सही नही मानते है।

हाल की जंगल यात्रा के दौरान मैने यह बात श्री गणेश के सामने रखी। गम्भीरतापूर्वक मेरी बाते सुनने के बाद उन्होने मेरे प्रश्न को सही ठहराया। वे दशको से ऐसा कर रहे है। उन्होने बताया कि एक साल के अंतराल मे जब वे वापस उसी स्थान पर जाते है जहाँ उन्होने साँपो को छोडा था तो बहुत बार वे वहाँ नही मिलते है। कई बार वे एक बडे कुनबे के रुप मे मिलते है। उनकी संख्या बढ चुकी होती है। उन्होने मुझे आश्वासन दिया कि अपने चेलो के सामने वे यह बात रखेंगे और सम्भव हुआ तो अगले साल से सारे साँप उसी स्थान पर वापस छोडे जायेंगे जहाँ से इन्हे एकत्र किया गया था।

बलात स्थान परिवर्तन तेन्दुओ के साथ भी किया जाता है। यदि किसी क्षेत्र मे किसी तेन्दुए ने उत्पात मचाया और ग्रामीणो ने शिकायत की तो वन विभाग तेन्दुओ को पकड लेता है फिर दूसरे स्थान पर छोड देता है। मेरे वन अधिकारी मित्र इसे मानव अपराधियो को जिलाबदर करने के उदाहरण से समझाते है। पर यह जरुरी नही कि जिलाबदर किया गया अपराधी दूसरे जिले मे अपराध करे ही ना। फिर तेन्दुए अपराधी नही है। मनुष्य ने उनका निवास स्थान उजाडा है न कि तेन्दुए ने यह किया है। तेन्दुए के पास जंगल नही है और न ही भोजन। ऐसे मे वह मानव आबादी की तरफ क्यो नही आयेगा? दूसरे स्थान पर छोडे गये तेन्दुए कुछ समय तक तो जंगल की खाक छानते है। यदि वहाँ पहले से तेन्दुए है तो इलाके की लडाई होती है। और फिर थक-हारकर वे फिर से आस-पास के गाँवो का रुख करते है। फिर शिकायत होती है और तेन्दुए को पकडकर चिडियाघर मे बन्द कर दिया जाता है आजीवन कारावास की अघोषित सजा सुनाकर।

अपनी मस्ती से जंगल मे जीने वले तेन्दुओ और दूसरे बडे प्राणियो को तंग पिंजरो मे क्यो रखा जाता है? यह बात मुझे कभी समझ मे नही आयी। फन्दे से घायल हुये वन्य प्राणियो को तंग पिंजरो मे रखकर आसानी से दवा दी जा सकती है, भोजन दिया जा सकता है पर ताउम्र उन्हे ऐसे स्थान पर रखना भला कहाँ की इंसानियत है? शहरो मे आम लोगो को काटते आवारा कुत्तो के पक्ष मे आवाज उठाने वाले और सर्कस मे जीवो पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले लोग क्यो तंग पिंजरो मे बन्द वन्य प्राणियो को देखकर मुँह मोड लेते है, यह बात समझ से परे है। मैने देखा है कि वन्य प्राणी खाना-पीना भूलकर पिंजरे को तोडने की जुगत मे रहते है। हाल मे रायपुर के पास स्थित एक चिडियाघर से एक भालू पिन्जरा तोडकर भाग गया। वन विभाग के लोग नहा-धोकर उसके पीछे लगे रहे। पर उसकी किस्मत अच्छी थी जो वह वापस जंगलो मे भाग गया।

कुछ दिनो पहले एक समाचार ने मन को खिन्न कर दिया। मरवाही क्षेत्र मे एक बैजर देखा गया। इसे दुर्लभ बताया गया। समाचार के अनुसार, वन विभाग को जब इसका पता चला तो उसने गाँव मे फन्दा लगाया और उसे पकड लिया। अब इसे चिडियाघर मे रखा जायेगा। यह समाचार साधारण समाचार लग सकता है पर कोई यह बताये कि इसमे उस बैजर का क्या कसूर है? वह मजे से जंगल मे घूम रहा था। उसकी बुरी किस्मत जो मनुष्यो की नजर उस पर पड गयी। बैजर का परिवार होगा जो उसका इंतजार करता होगा। उसका अपना जीवन होगा। ऐसे मे उसे फन्दा लगाकर पकडना और फिर चिडियाघर मे तंग पिंजरे मे बन्द कर देना, क्या अमानवीय कदम नही है? उस समाचार के अनुसार, अब चिडियाघर मे उसके प्रजनन के प्रयास किये जायेंगे। कृत्रिम परिस्थितियो मे प्रजनन टेढी खीर है। राज्य मे जंगली मैना को पिंजरे मे बन्दकर प्रजनन कराने के नाम पर लाखो रुपये फूँके जा चुके है पर नतीजा सिफर ही रहा है। क्यो नही बैजर के लिये फन्दा लगाने की बजाय उस पर नजर रखी जाती? आस-पास के लोगो को उसके महत्व के विषय मे बताया जाता? जिस भी पर्यावरणप्रेमी ने यह समाचार पढा उसने तीखी प्रतिक्रिया दी। कुछ स्थानीय नेताओ ने भी स्थानीय अखबारो के माध्यम से अपना विरोध दर्ज कराया। पता नही, जंगल के अधिकारिक रखवाले किस नीति के तहत वन्य प्राणियो के साथ ऐसा सौतेला व्यव्हार करते है?

देश मे वन प्रबन्धन के ढेरो छोटे-बडे संस्थान है। इन पर जनता की गाढी कमायी का अरबो रुपया व्यय होता है। ये बडी-बडी बाते करते है पर जमीनी स्तर पर वन प्रबन्धन के नाम पर इनका योगदान नही दिखता। उल्टे ये वनवासियो के पारम्परिक वन प्रबन्धन से सीखकर शोध-पत्र छापते है और फिर उस पर इतराते है। आज जब मनुष्यो और वन्य प्राणियो मे टकराव निर्णायक मोड की ओर आ रहा है, ऐसे विकट समय मे राष्ट्रीय चर्चा के माध्यम से सार्थक वन्य प्राणी प्रबन्धन नीतियाँ बनाने और उन्हे अमलीजामा पहनाने की जरुरत है। (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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Monday, September 7, 2009

अहिराज, चिंगराज व भृंगराज से परिचय और साँपो से जुडी कुछ अनोखी बाते

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-64
- पंकज अवधिया

अहिराज, चिंगराज व भृंगराज से परिचय और साँपो से जुडी कुछ अनोखी बाते


कुछ लोगो को एक स्थान पर खडा देखकर मैने गाडी रोकी। पास जाने पर पता चला कि किसी के घर मे एक साँप घुस गया था। अभी ही उसे मारा गया था। सामने साँप पडा था। उसका सिर कुचला हुआ था पर उसमे जान थी। उसका शरीर हरकते कर रहा था। इसे चूहा खाने वाला साँप बताया जा रहा था। यह नुकसानदायक नही है-ऐसा भी लोग कह रहे थे पर उसे देखने से मन मे भय उत्पन्न हो जाता था। बडा ही लम्बा साँप था। मुझे सर्प-विज्ञान का वह नियम याद आ गया कि जितना बडा साँप उतना कम जहर। पर यह सभी मामलो मे सही नही है। आधुनिक सन्दर्भ ग्रंथ बताते है कि लम्बे साँप भी जहरीले हो सकते है।

जिन्होने इस साँप को मारा था वे महुए के नशे मे धुत थे। मेरा कैमरा देखकर जोश से भर गये। उन्होने साँप को अपने गले मे डालना चाहा पर उसमे जान थी। वह जमीन मे गिर गया। गाँव के बुजुर्ग उसे जलाने की तैयारी कर रहे थे। भीड मे से किसी ने कहा कि पहले इसे पूरा मार तो दो। क्यो आधा मारकर तडपने देते हो? यह आवाज भीड मे ही खो गयी। साँप तडपता रहा। उसके सिर पर जोर का वार हुआ था। सिर पिचका हुआ था। मेरे साथ चल रहे पारम्परिक चिकित्सक ने कहा कि इसे पानी मे छोड दिया जाये तो यह बच सकता है। भीड मे कोई उसे बचाने को तैयार नही था। लोगो ने कहा कि हम जमीन पर सोते है और साँप का सम्मान करते है पर इतने बडे साँप को हम बार-बार खदेड नही सकते है। लोगो का यह भी कहना था कि यदि आप ले जाना चाहे तो इसे गाँव से दूर ले जा सकते है। घायल साँप को देखकर उसे गाडी मे ले जाने की हमारी हिम्मत नही हो रही थी। उसे इस अवस्था मे दुश्मन और दोस्त मे अंतर करना शायद ही मालूम हो। मोबाइल करके पास के ग्रामीण सर्प विशेषज्ञ को बुलाया गया। उसने साँप की जाँच की और कहा कि बहुत देर हो चुकी है।

इस जंगल यात्रा मे ध्यान तो बरसात मे उगने वाली जडी-बूटियो पर था पर साँप के विषय मे भी अनूठी जानकारियाँ मिलती रही। एक स्थान पर हमे बताया गया कि पास के एक नाले मे बाढ के पानी के साथ अजगर बहकर आया है। गाडी से उस ओर गये पर सफलता हाथ नही लगी। फिर सूचना मिली कि घर मे बनायी गयी एक डबरी मे अजगर ने सियार को निगल लिया है। वह घर पास मे ही था पर एक उफनते नाले के कारण वहाँ नही जा सके।

साँपो पर चर्चा के दौरान मुझे अहिराज के अलावा चिंगराज और भृंगराज साँपो के बारे मे जानने मिला। इन दोनो साँपो का विस्तार से वर्णन ग्रामीणो ने किया। बताया कि दोनो विकट जहर से युक्त है। भृंगराज नाम की वनस्पति मै जानता हूँ पर इस नाम का साँप आश्चर्य का विषय रहा। जंगल की खाक छानने पर ये साँप दिखते है। ग्रामीण साथ चलने को तैयार दिखे पर मैने पूरी योजना के साथ सुबह से जाने की योजना बनायी। फिर इस कार्यक्रम को दशहरे तक टाल दिया। जंगल मे साँपो को खोजने के लिये थोडा सूखा मौसम चाहिये-ऐसा ग्रामीणो ने कहा।

बातो ही बातो मे कुछ ऐसे साँपो की बात पता चली जो कि जंगल मे लोगो का पीछा करते है। यह डराने वाली बात थी। वे गलत नही कह रहे थे। राज्य के अखबार ऐसे साँपो के जंगलो मे होने की खबरे विशेषज्ञो के हवाले से प्रकाशित करते रहते है। मुझे हरजंगतिया नामक साँप के विषय मे भी बताया गया कि जो एक पेड से दूसरे पेड तक छलाँग (?) लगाते हुये चलते है। चिंगराज, भृंगराज, हरजंगतिया जैसे स्थानीय नाम वैज्ञानिक साहित्यो मे नही मिलते है। जब तक इन्हे मै देख न लूँ ग्रामीणो की बातो के आधार पर हवा मे तीर मारना बेकार है।

दशहरे के बाद की यात्रा मे मुझे कौआ अर्थात महुये के फल की खली रखने को कहा गया है। यह खली और माचिस अभियान दल के हर सदस्य के पास होगी। यदि किसी साँप ने परेशान किया तो इसे बिना देर जलाया जायेगा ताकि इसकी गन्ध से वे दूर हो जाये। एक सदस्य पर संकट आते ही दूसरे सदस्य वहाँ पहुँचेंगे और यह प्रक्रिया दोहरायेंगे। वैसे विकल्प के रुप मे मिट्टी का तेल या टायर भी जलाया जा सकता है पर सबसे अच्छा उपाय यही है आपातकालीन परिस्थितियो मे। पर क्या साँप हमारे पीछे पडेंगे? यदि हाँ, तो जोखिम क्यो उठाया जाय? क्यो व्यर्थ ही उन्हे छेडा जाय? इस पर काफी देर तक हम चर्चा करते रहे।

राज्य मे पैरी नदी पर सिकासार बाँध है। अवकाश के दिन काफी लोग यहाँ पहुँचते है। क्षेत्रीय फिल्मो की शूटिंग भी होती है। मै अक्सर इस बाँध को पारकर उस पार के जंगल मे चला जाता हूँ जहाँ विविधता अब भी चरम पर है। हाल की जंगल यात्रा के दौरान श्री गणेश नामक एक पारम्परिक सर्प विशेषज्ञ मेरे साथ थे। मैने अपने लेखो मे उनके बारे मे विस्तार से लिखा है। उन्होने हजारो जाने बचायी है। उनके सैकडो चेले है। इस जंगल यात्रा के दौरान मैने उन्हे साथ ले लिया। वे बता रहे थे कि पिछले सप्ताह एक सत्रह-अठ्ठारह साल के युवक को पैरावट मे एक जहरीले सर्प ने काट लिया था। शहर ले जाते-जाते देर हो गयी। सरकारी अस्पताल ने हाथ खडे कर दिये। वापस गाँव मे श्री गणेश के पास उसे लाया गया। घंटो की अथक मेहनत से उन्होने उस युवक को बचा लिया। पर उनकी अपनी हालत बिगड गयी। मुँह मे छाले हो गये जो अभी तक उन्हे तकलीफ पहुँचा रहे थे। उनका खाना-पीना बन्द हो गया था। उन्हे इस बात का अहसास हो रहा था कि साँप बहुत जहरीला था।

मैने अपने ज्ञान के आधार पर उन्हे कुछ वनस्पतियाँ बतायी और फिर जंगल मे गाडी रोककर उन्हे चबाने के लिये कुछ जडे दी। कुछ घंटो मे छालो पर असर दिखने लगा। वे बडे प्रसन्न हुये। मै उन्हे गुरु मानता हूँ पर उल्टे वे मुझे अपना गुरु मानते है। वे चाहे जो कहे पर मै जानता हूँ कि मुझे उनके जैसा बनने के लिये कई जन्म लेने होंगे।

चलिये सिकासार बाँध पर लौटते है। जिन स्थानो मे फिल्मो की शूटिंग होती है वहाँ इस बार खाली-खाली सा लगा। मैने वहाँ के एक कर्मचारी से इस बारे मे पूछा तो उसने कहा कि पिछले कुछ दिनो से वहाँ साँप दिख रहे है। इसलिये लोग डर से नही जा रहे है। कुछ देर बाद मैने यही बात श्री गणेश को बतायी तो उन्होने सिर पकड लिया और कहा कि मुझसे बडी गल्ती हो गयी। उन्होने खुलासा किया कि पंचमी के दिन उनके चेलो ने उन्हे जो साँप भेंट मे दिये थे उन्हे सिकासार के इसी इलाके मे छोडा गया था। “मेरे सगे-सम्बन्धी (यानि वे साँप) ऐसा कर रहे है तो उसके लिये मै जिम्मेदार हूँ।“ ऐसा कहकर वे उस ओर चल पडे। उन्होने उसी स्थान पर बैठकर मंत्र पढे इस उम्मीद मे कि शायद कोई साँप आ जाये। उनकी योजना उन्हे फिर से पकडकर पर्यटको से दूर छोडने की थी। पर घंटो मे इंतजार के बाद भी यह सम्भव नही हो पाया।

हर साल वनोपज के संग्रह के लिये वनवासी जंगल मे आग लगाते है। योजनाकार यह कहकर किनारा कर लेते है कि यह दशको से चला आ रहा है और इससे जंगल को नुकसान नही होता है। बल्कि कुछ मामलो मे फायदा ही होता है। पर जमीनी हकीकत कुछ और ही है। इस आग से बहुत से जीवो पर संकट खडा हो जाता है। साँप उनमे से एक है। ग्रामीण सर्प विशेषज्ञ बताते है कि इस आग ने जंगलो से बहुत से दुर्लभ साँपो को खत्म कर दिया है। हर साल आग का दायरा बढता जा रहा है और साँपो पर खतरा भी। (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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Tuesday, September 1, 2009

पानी मे डूबे गाँवो का अनकहा दर्द, स्त्री रोगो के लिये उपयोगी वनस्पतियाँ और सलिहा

मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-63
- पंकज अवधिया

पानी मे डूबे गाँवो का अनकहा दर्द, स्त्री रोगो के लिये उपयोगी वनस्पतियाँ और सलिहा


दूर-दूर तक पानी ही पानी था। मै अपलक इस मनोहारी दृश्य को निहार रहा था। दूर पानी के बीच पहाडो के शीर्ष दिख रहे थे जो सघन वनस्पतियो से ढके हुये थे। तभी पास खडे व्यक्ति ने कहा कि साहब, आप जो सामने पानी देख रहे है उसमे 52 गाँव डूबे हुये है। मै चौक पडा। दिख तो कुछ भी नही रहा था पर उस व्यक्ति की बाते सुनकर परिकल्प्ना से बने दृश्य सामने आ गये। मै छत्तीसगढ के गंगरेल बाँध के पीछे वाले हिस्से के जंगलो मे खडा था। यह बाँध कई दशक पहले महानदी पर बनाया गया था। आज यह बाँध जाने कितने लोगो की प्यास बुझा रहे है और कितने ही खेतो को पानी दे रहा है। बाँध की इस उपलब्धि के सामने 52 डूबे हुये गाँबो का दुख कम दिखता है पर घर से बिछडने का दुख वही जानता है जिस पर यह गुजरती है।

कुछ समय पहले मै घने जंगल मे औषधीय बेलो के चित्र ले रहा था। पास ही उफनती पैरी नदी थी। मै वर्षो से यहाँ आ रहा हूँ। हर बार मुझे कुछ नया मिल ही जाता है। मुझे इस क्षेत्र से मोह हो गया है पर मै चाहकर भी प्रेम नही करना चाहता। यह प्रेम स्थायी नही होगा। यह वह क्षेत्र है जो निकट भविष्य़ मे पानी के भीतर समा जायेगा। यहाँ भी एक बाँध बनने जा रहा है। यह बाँध नयी राजधानी की प्यास बुझायेगा। मुआवजा बाँटा जा रहा है। डूबान क्षेत्र का बोर्ड लगा दिया गया है। वहाँ से निवासी पूरी तरह से इस बाँध निर्माण के प्रति जागरुक है। पर यहाँ असंख्य ऐसे भी निवासी है जिन्हे इसके बारे मे नही बताया गया है और शायद बताया भी नही जायेगा। जिस दिन यह क्षेत्र डूबेगा पानी के साथ ये निवासी भी काल के गाल मे समा जायेंगे। मै असंख्य जीव-जंतुओ की बात कर रहा हूँ जो हमारी तरह ही इस धरती के निवासी है। बाँध बनाना यदि जरुरी हो तो बनाये जाये पर विस्थापितो मे केवल मनुष्य ही नही शामिल किये जाये। वनस्पतियो और उन पर आश्रित असंख्य जीवो के पुनरस्थापन की भी योजना हो।

गंगरेल के पानी से आधे डूबे एक गाँव मे मुझे एक ऐसे व्यक्ति मिले जिनके नाते रिश्तेदार इस आधे डूबे गाँव को उसके हाल मे छोडकर शहरो मे बस गये। बुजुर्ग व्यक्ति अब अपनी बूढी पत्नी के साथ दूसरे गाँव वालो के साथ रहते है। उनकी कोई संतान नही है। उन्होने बताया कि 52 गाँव और डूबे क्षेत्र मे घने जंगल थे। जब पानी भरना शुरु हुआ तो गाँव वाले अपने मवेशियो के साथ सुरक्षित जगहो पर आ गये पर वनस्पतियो और दूसरे प्राणी देखते ही देखते पानी मे समा गये। उन्होने दो बाघो को पानी मे समाते देखा था। उस समय यह क्षेत्र बाघो और दूसरे खूँखार जीवो के लिये प्रसिद्ध था। आज जंगली जानवरो के नाम पर इस क्षेत्र मे भालू अधिक संख्या मे है। पहाडियो के ऊपर जिन गाँवो वालो ने शरण ली, भालुओ ने भी वही ठिकाना बना लिया।

अपनी गाडी गाँव मे ही खडी कर मै स्थानीय लोगो के साथ जंगल मे काफी देर तक तस्वीरे लेता रहा। यह क्षेत्र जैव-विविधता से पूर्ण लगा। जडी-बूटियो के व्यापारी शायद यहाँ तक नही पहुँचे है इसीलिये दूसरे स्थानो मे दुर्लभ हो चुकी बहुत सी वनस्पतियाँ यहाँ मजे से उग रही थी। इन वनस्पतियो के बचे होने के दूसरे कारण भी है। आजकल दैनिक मजदूरी इतनी अधिक हो गयी है कि व्यापारी अधिक महंगी जडी-बूटियो के लिये ही वनवासियो को जंगलो मे भेजते है। इससे कम कीमत वाली जडी-बूटियाँ बच जाती है। एक अनोखी बात यह भी बता चली कि इस क्षेत्र मे पारम्परिक चिकित्सक कम है। इससे आम लोगो मे वनस्पतियो के औषधीय उपयोग के विषय़ मे कम जानकारी है। ज्यादातर लोग खेती करते है और मछली पकडते है। बहुत से लोग मजदूरी के लिये आस-पास के गाँवो मे चले जाते है।

यह सौभाग्य की बात थी कि हमारे साथ दूसरे क्षेत्र के एक पारम्परिक चिकित्सक थे। वे भी इस क्षेत्र की जैव-विविधता से मुग्ध थे। वे अपनी आवश्यकत्ता की जडी-बूटियाँ एकत्र कर रहे थे। उन्होने चट्टानो के बीच हमे एक अनोखी वनस्पति दिखायी और बताया कि इस वनस्पति से स्त्री रोगो की चिकित्सा की जाती है। औषधीय चावल को पकाकर कुछ समय तक इस वनस्पति की चौडी पत्तियो मे रखा जाता है और फिर रोगियो को दिया जाता है। उन्होने दावा किया कि बहुत से रोगो की आरम्भिक अवस्था मे यह सरल प्रयोग लाभ पहुँचाता है। जिन्हे किसी तरह का रोग नही हो ऐसी महिलाओ को भी इन पत्तियो का ऐसा प्रयोग करना चाहिये। मैने उस वनस्पति की तस्वीरे खीची और उसकी वैज्ञानिक पहचान का प्रयास करने लगा। इसी उधेडबुन मे मुझे उडीसा के नियमगिरि क्षेत्र के पारम्परिक चिकित्सको की बाते याद आने लगी। वे भी स्त्री रोगो के लिये इसी वनस्पति का प्रयोग करते है पर रोगो की पुरानी अवस्था मे वे एक-एक करके बारह तक वनस्पतियाँ बढाते जाते है। रोग की बढी हुयी अवस्था मे बारह अलग-अलग किस्म की वनस्पतियो मे गरम भात परोसा जाता है और फिर एक-एक कौर के रुप मे रोगी को खाने को दिया जाता है।

साथ चल रहे एक बुजुर्ग व्यक्ति कुछ लंगडाकर चल रहे थे। घुटने मे समस्या थी। उन्हे नही मालूम था कि उनके मर्ज का इलाज उन्ही के जंगलो मे था। मैने सलिहा नामक पेड की पहचान बतायी और उससे गोन्द एकत्र करने की विधि बतायी। फिर गोन्द के आँतरिक प्रयोग की विधि विस्तार से समझायी। उन्हे यह भी बताना नही भूला कि कितनी अवधि के बाद दोबारा गोन्द एकत्र किया जाये ताकि पेड बेमौत न मारे जाये। पेड को धार्मिक आस्था से जोडते हुये उनसे अनुरोध किया कि यदि स्थिति सुधरे तो हर सोमवार को पाँच विशेष वनस्पतियो के सत्व से इस पेड को सींच कर धन्यवाद दे दीजियेगा। दरअसल ये सत्व सलिहा को साल दर साल तक सुरक्षित रखेंगे। बुजुर्ग सहर्ष तैयार हो गये और बोल पडे कि पेड को सोमवार को धन्यवाद देने आना है और आपको? मैने कहा कि आपको लाभ हो तो यह विधि मूल रुप मे बिना शुल्क लिये दूसरो को बताइयेगा, मेरा धन्यवाद हो जायेगा।

जंगल मे अपनी विद्वता झाडने के लाभ भी है और नुकसान भी। लाभ यह कि लोगो से आत्मीय सम्बन्ध बन जाते है और नुकसान यह कि बहुत बार ऐसे ज्ञान को जानकर साथ चल रहे लोग आपको विद्वान मानकर मौन धारण कर लेते है और जानकर भी कुछ नही बोलते है इस गलताहमी मे कि ये तो सब जानते है। पर किसी को स्वास्थ्य सम्बन्धी तकलीफ मे देखकर मन रुक नही पाता है।

इस लेखमाला के पिछले लेख मे जलधान पर बात अटकी थी। इन दोनो जंगल यात्राओ के दौरान औषधीय धान पर ढेरो जानकारियाँ मिली। आने वाले लेखो मे मै इस पर लिखने की कोशिश करुंगा। (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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