अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -103
अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -103 - पंकज अवधिया “एकाध भूत-प्रेत दिखा दो, अर्जुन। इतनी दूर से आया हूँ और फिर तुम तो बैगा भी हो।“ यूँ ही मजाक मे मैने साथ चल रहे अर्जुन बैगा से कहा। आँखो मे लगा काला चश्मा बता रहा था कि अभी-अभी उसका आपरेशन हुआ है मोतियाबिन्द का। मजे से वह मेरे साथ पास के खेत जाने के लिये चल रहा था। “अब मैने भूत-प्रेत का काम छोड दिया है। हाँ, जडी-बूटी का काम करता हूँ। वैसे भी अब बिजली आ जाने से भूत-प्रेत दिखते नही है। दिखते भी है तो पकड मे नही आते है। इसलिये मैने यह काम छोड दिया है। बस अब अपनी खेती की देखभाल करता हूँ।“ इस भूतपूर्व भूत-प्रेत विशेषज्ञ से बात करना दिलचस्प लग रहा था। छत्तीसगढ की राजधानी से सटे एक गाँव मे अर्जुन बैगा जवानी मे अपनी तंत्र विद्या के लिये पूरे क्षेत्र मे जाना जाता था। बिगडे गाँवो को सुधारने का जिम्मा उसी का था। उसकी प्रसिद्धि मुझे उस तक खीच लायी थी। रायपुर के आस-पास के गाँवो मे जमीन के भाव आसमान छू रहे है। अर्जुन ने बताया कि उसके पास ढाई एकड है और एक एकड के लिये लोग प...