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बंदरों के अधखाये फल की तलाश में खतरों भरी जंगल यात्रा

वर्ष २०११ की मेरी रोमांचक जंगल यात्राएं-१ - पंकज अवधिया बंदरों के अधखाये फल की तलाश में खतरों भरी जंगल यात्रा "आप यदि बंदरों द्वारा आधे खाए गए ये विशेष फल कहीं से ले आयें तो रोगी की मदद हो सकती है|" कई तरह के पुराने रोगों के कारण मृतप्राय रोगी की चिकित्सा कर रहे पारम्परिक चिकित्सक ने उसके परिजनों से यह बात कही| यह एक कठिन कार्य था| इसीलिये पारम्परिक चिकित्सकों ने हाथ खड़े कर दिए और परिजनों से ही फल की व्यवस्था करने को कहा| पिछले दिनों मैंने मैदानी भाग के जंगल में घूमने का मन बनाया और रास्ते में मिलने वाले पारम्परिक चिकित्सकों से मिलने की भी योजना बनाई| सबसे पहले जिन पारम्परिक चिकित्सक से मुलाक़ात हुयी वहीं इस रोगी और उसके परिजनों से मुलाक़ात हो गयी| बिना विलम्ब मैंने कहा कि मैं जंगल जा रहा हूँ| आप शाम तक प्रतीक्षा करें| यदि मुझे ऐसे फल मिले तो मैं अवश्य एकत्र कर लूंगा| उस दिन की जंगल यात्रा का मुख्य उद्देश्य तेजी से खत्म हो रहे गिन्धोल वृक्षों की जंगल में उपस्थिति का पता लगाना था| पर अब उद्देश्य बदल गया था| हम आ...

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -86

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -86 - पंकज अवधिया बस्तर के ग्राम मधोता के नन्हे चरवाहे ने जब एक जंगली जानवर को अपने पशुओ के आस-पास घूमते देखा तो उसने उसे जंगली कुत्ता समझ पत्थर मारकर भगाने की कोशिश की। इससे जंगली जानवर क्रोधित हो गया और उसने बिना देर उस पर आक्रमण कर घायल कर दिया। यह जंगली कुत्ता नही बल्कि तेन्दुआ था। इसके बाद जो भी दिखा उस पर इसने आक्रमण किया और चार ग्रामीण घायल हो गये। यह खबर आग की तरह फैली और कुछ ही देर लाठियो से लैस ग्रामीणो ने तेन्दुए को घेर लिया और उसे पीट-पीट कर मारा डाला। खून का बदला खून। इतना ही नही तेन्दुए के मरने के बाद इसके अंगो को लूटने की होड मँच गयी। किसी ने बीर नख की तलाश मे इसका पेट चीर डाला तो किसी ने दांत और नाखून निकाल लिये। जब तक वन-अधिकारी पहुँचे तब तक इसका एक-एक रोम ग्रामीणो ने निकालकर अपने पास सुरक्षित रख लिया था- यह दिल दहला देने वाला समाचार आज ही मै दैनिक नवभारत मे पड रहा था। ऐसी खबरे छत्तीसगढ मे नयी नही है। हम लगातार तेन्दुओ के मारे जाने की खबरे पढते रहते है। कभी कोई ...

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -81

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -81 - पंकज अवधिया मध्य रात्रि अचानक अजीब सी आवाज से मेरी नीन्द खुल गयी। चारो ओर घुप्प अन्धेरा था। मै उठ बैठा। आवाज ऊपर से आ रही थी। सिर उठाया तो कुछ दिखा नही। कुछ देर बैठने के बाद मुझे याद आया कि यह मेरा घर नही था। मै तो घास-फूस से बनी एक झोपडी मे सो रहा था। यह बुधराम की झोपडी थी। कुछ दूरी पर वह सोया हुआ था। रात का सन्नाटा था। जंगली जानवरो को दूर रखने के लिये जलायी गयी आग ठंडी हो चुकी थी। झोपडी के बाहर गाडी थी जिसमे ड्रायवर सो रहा था। यह मेरी ही जिद थी झोपडी के अन्दर सोने की। नही तो ड्रायवर तो पास के शहर के किसी लाज मे ठहरने की जिद करके थक चुका था। बुधराम के लिये ऐसी जगह पर सोना रोज की बात थी। पर मेरे लिये यह अजीब अनुभव था। झोपडी गाँव के बाहर थी और आस-पास खेत थे। कुछ दूर पर जंगल था। जंगली जानवर अक्सर गाँव मे आ जाया करते थे पर डरने की कोई बात नही है, ऐसा कहकर बुधराम ने मुझे आश्वस्त करने की कोशिश की थी। जंगल के देवता पर उसे बहुत विश्वास था। वे अकारण की किसी को सजा नही देते, उसने य...

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -79

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -79 - पंकज अवधिया पिछले दिनो दूर कस्बे से कुछ रिश्तेदारो का आना हुआ। उनकी गाडी सुबह-सुबह आयी। यह मेरे सोने जाने का समय था। उनसे मुलाकात नही हो पायी। उन दिनो मधुमेह की वैज्ञानिक रपट पर जोर-शोर से काम चल रहा था। कुछ घंटो की नीन्द के बाद मै फिर से कम्प्यूटर पर पिल पडा। वही ब्रश किया, फिर नाश्ता और भोजन भी वही आ गया। रिश्तेदार एक सप्ताह तक रुकने वाले थे। इसलिये सोचा कि उनसे कल मिल लूंगा। घर के बाकी सदस्य आवभगत मे लगे रहे। रपट का फेर ऐसा रहा कि मै 22 घंटे से अधिक इसी मे फँसा रह गया। अब रिश्तेदारो से रहा नही गया। मेरी मामी ने कमरे मे प्रवेश किया। उनके हाथ मे एक कपडा था। मैने उठकर अभिवादन किया तो उन्होने चुप रहने का इशारा किया। उन्होने कपडे को सात बार सिर पर घुमाया और फिर जैसे आयी थी वैसे ही चली गयी। मुझे यह सब अटपटा लगा। मैने काम समेटना ही उचित समझा। तभी बाहर किसी चीज के जलने की बास आयी। मै बाहर भागा तो देखा कि मामी उसी कपडे को जला रही थी। घर वालो की तरफ देखा तो उन्होने शांत रहने क...

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -68

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -68 - पंकज अवधिया मित्र के दादाजी नब्बे साल के हो गये। उनके जन्मदिन के अवसर पर पूजा-पाठ रखा गया। उनके पारिवारिक गुरु आये। मुझे भी इस कार्यक्रम मे आमंत्रित किया गया। मुझे बताया गया था कि पूजा-पाठ के बाद भी उसी स्थान मे बैठे रहना है। लोग उठ कर जाये तो उन्हे जाने दिया जाये। अंत मे जो “अपने” लोग बचेंगे उनके सामने गुरु जी एक तोहफा देंगे। वे हिमालय से लम्बी साधना के बाद इस तोहफे को लाये है। मुझे यह जानकर अच्छा लगा कि मै भी मित्र के “अपनो” मे शामिल था। कार्यक्रम वाले दिन मै जानबूझकर कुछ देर से पहुँचा ताकि ज्यादा देर न बैठना पडे। मित्र मेरे पास आ गया। गुरु जी पर मेरी नजर पडी तो चेहरा जाना-पहचाना लगा। मै किसी निष्कर्ष तक पहुँचता उससे पहले मित्र बोल पडा कि अरे, ये फलाँ बाबा है जो रोज टीवी पर आते है। ओह, तभी यह चेहरा जाना-पहचाना लगा-मै बुदबुदाया। पर टीवी मे तो वे चमत्कारिक पुरुष लगते है। यहाँ सामने ऐसा लग रहा था जैसे किसी साधारण पुरुष को देख रहा हूँ। जो चीज उन्हे असाधारण बना रही थी वह थ...