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अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -60

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -60 - पंकज अवधिया आज दुनिया भर मे जलवायु परिवर्तन (क्लाइमेट चेंज) की चर्चाए हो रही है। वैज्ञानिक रोज ऐसे उदाहरण प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहे है जिससे आम लोगो को विश्वास हो जाये कि हाँ, सचमुच जलवायु परिवर्तन हो रहा है। जलवायु परिवर्तन (क्लाइमेट चेंज) हो रहा है, ये सभी महसूस करते है। यह अभी कुछ वर्षो से नही बल्कि बहुत पहले से हो रहा है क्योकि लम्बे समय से मनुष्य अपनी गतिविधियो से माँ प्रकृति को नुकसान पहुँचा रहा है। यह अलग बात है कि अचानक से शोर हुआ है जलवायु परिवर्तन (क्लाइमेट चेंज) पर और यदि यह कुछ समय का शोर है तो जल्दी ही यह थम जायेगा और नये नारो के साथ हमारे वैज्ञानिक सामने आ जायेंगे। यदि जलवायु परिवर्तन (क्लाइमेट चेंज) पर सचमुच काम करना है तो एक लम्बे समय के लिये योजना बनानी होगी और जमीनी स्तर पर काम करना होगा। जलवायु परिवर्तन (क्लाइमेट चेंज) से हमारे देश की पारम्परिक चिकित्सा भी अछूती नही है। कैसे जलवायु परिवर्तन (क्लाइमेट चेंज) हमारी पारम्परिक चिकित्सा को प्रभावित कर रहा ...

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -59

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -59 - पंकज अवधिया इस दुनिया मे शायद ही कोई ऐसा हो जो सदा जवान नही रहना चाहता है। बुढापे से मुक्ति सभी चाहते है। हमारे प्राचीन चिकित्सा ग्रंथ ऐसे बहुत सारे उपायो का वर्णन करते है जो हमारा कायाकल्प कर सकते है। पर इन उपायो को उसी स्वरुप मे अपनाना हर किसी के लिये सम्भव नही हो पाता। देश भर मे बहुत से विशेषज्ञ लगातार ऐसे उपायो की खोज मे है। वे निरंतर प्रयोग कर रहे है और परिणामो को अपने तक सीमित रख रहे है। अपने छात्र जीवन मे मै भी ऐसे ही एक प्रयोग का हिस्सा बना था। दस जवानो और दस बुजुर्गो का चयन एक जडी-बूटी विशेषज्ञ ने किया था। हमे उनके आश्रम एक महिने तक रहना था। वे जो कहे उसे मानना था। बुजुर्गो को जवान बनाया जाना था और हम जवानो को आजीवन जवानी कायम रखने के योग्य बनाया जाना था। सब कुछ एक महिने मे ही हो जाना था। वनस्पतियो मे सदा से रुचि थी इसलिये मैने इस प्रयोग मे शामिल होने मे जरा भी देर नही की। नियत तिथि को हम आश्रम पहुँच गये। हफ्ते भर तो पेट और शरीर की सफाई होती रही। फिर हमे पास के एक...

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -58

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -58 - पंकज अवधिया जंगली पौधो मे आपस मे गजब की प्रतिस्पर्धा होती है। यह प्रतिस्पर्धा अंकुरण से ही शुरु हो जाती है। एक ही स्थान मे आस-पास उग रहे पौधो मे नमी, प्रकाश और भोजन के लिये प्रतियोगिता होती है। प्रभावी रहने के लिये पौधे कई तरह के रसायन छोडते है। ये रसायन दूसरे पौधो की बढवार को रोकते है। कभी-कभी उनकी जान भी ले लेते है। विज्ञान की जिस शाखा मे इस रासायनिक प्रतिस्पर्धा के विषय मे शोध होते है उसे एलिलोपैथी के नाम से जाना जाता है। आपने देखा होगा कि किसी स्थान पर एक तरह के पौधे बहुतायत मे होते है तो दूसरे स्थानो पर वे अच्छे से नही उग पाते है। मिट्टी और दूसरे कारक पौधो को इस रासायनिक प्रतिस्पर्धा मे मदद करते है। पौधो को यह ज्ञान रहता है कि कौन से दूसरे पौधे नुकसानदायक है और कौन से लाभकारक है। उनके रसायन मित्र पौधो को नुकसान नही पहुँचाते है बल्कि कई बार उनकी मदद भी करते है। मैने इस विषय मे विस्तार से काम किया है। मेरे पचास से अधिक शोध पत्र और दस हजार से अधिक शोध आलेख केवल एलिलोपैथी...

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -57

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -57 - पंकज अवधिया कैसर की चिकित्सा मे माहिर एक पारम्परिक चिकित्सक के साथ पास की एक पहाडी मे जाने की योजना थी। मैने कुछ बूटियाँ उन्हे भेंट स्वरुप दी थी। इसके बदले वे एक विशेष बूटी मुझे भेट स्वरुप देना चाहते थे। बूटी डोंगर (छोटा पहाड) पर थी। सुबह-सुबह हमे चढाई शुरु करनी थी और फिर दोपहर तक नीचे आ जाना था। रायपुर से कुछ घंटो का सफर तय करके अल सुबह ही पारम्परिक चिकित्सक के पास पहुँचने की योजना थी पर उस दिन सुबह-सुबह एक प्रशासनिक अधिकारी का फोन आ गया। उन्होने कहा कि उनकी माता को हिपेटाइटिस सी है और वे दिल्ली मे है। आपको सुबह वाली फ्लाइट से दिल्ली जाना है। टिकट हो जायेगी। मैने उनसे कहा कि मै चिकित्सक नही हूँ। मै केवल पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान का दस्तावेजीकरण कर रहा हूँ। इस पर वे बिफर पडे और पैसो की बात करने लगे। फिर उन्होने और भी कई तरीको से धौंस जमायी। वे मुझे दिल्ली भेज कर एक बडे चिकित्सा संस्थान के चिकित्सको से मेरी चर्चा करवाना चाहते थे। मुझे मालूम है कि मेरी बात वहाँ के चिकित्सक ...

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -56

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -56 - पंकज अवधिया ‘बघवा हावे जंगल मा’- घने जंगल से गुजरते हुये एक छोटे से गाँव मे रुककर यूँ ही मैने गाँव वालो से पूछ लिया। यह छत्तीसगढ-उडीसा की सीमा पर बसा गाँव था जहाँ पहुँचने के लिये हमे बडी मशक्कत करनी पडी। सडक नही थी। जंगल से होते हुये हम लोग वहाँ पहुँचे थे। जंगल इतना घना था कि शायद अकेला होता तो बीच से नही गुजरता, दिन मे भी। यह परसो अर्थात रविवार की बात है। मुझे पक्का यकीन था कि इस जंगल मे अब भी खूंखार जानवर होंगे। मै औषधीय धान और पारम्परिक फसलो पर जानकारी एकत्र करने गया था पर ऐसे दौरो मे बहुत सी दूसरी जानकारियाँ भी मिल जाती है। बाघ तो अब नही मिलते (या कहे दिखते) पर इस क्षेत्र मे बून्दी बाघ अक्सर दिख जाता है। तेन्दुए को बून्दी बाघ कहा जाता है। गाँव के एक बुजुर्ग किसान शोभाराम से मैने देर तक बात की। मैने फिर पूछा, बघवा हावे जंगल मा। उन्होने पास की पहाडी की ओर इशारा किया और कहा कि वहाँ रहता है। क्या गाँव मे आता है? हाँ, कभी-कभी जब गाँव बिगड जाता है। और पाप बहुत बढ जाता है। अभ...

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -55

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -55 - पंकज अवधिया पहाडो की गोद मे बसे एक सुदूर गाँव की ओर जाते वक्त उबड-खाबड सडक से हटकर मेरा ध्यान बाहर जंगलो मे लगा था। सडक देखने की सारी मशक्कत ड्रायवर के जिम्मे थी। एक छोटे से गाँव को पार करते समय अंतिम छोर पर एक महंगी विदेशी कार देखकर मन खटका। गाडी रुकवाई। गाँव के लोगो ने बताया कि ये ओझा का घर है और यहाँ दूर-दूर से लोग झाड-फूँक करवाने आते है। उत्सुकता जागी और हम लोग ओझा के घर तक पहुँच गये। ड्रायवर को पता था कि उसे क्या करना है। अन्दर जाकर उसने अपना नाम मरीज के रुप मे बता दिया और इस तरह हमे बाहर बैठे लोगो के बीच बैठने का लाइसेंस मिल गया। विदेशी कार मे एक परिवार आया था। माता-पिता और एक किशोर। पिता बैचैनी से बाहर मोबाइल का सिग्नल तलाशते घूम रहे थे। माता किशोर के पास बैठकर नसीहते दे रही थी। बीच-बीच मे हाथ जोडकर प्रार्थना भी करने लगती थी। इंतजार मे बैठे बाकी मरीज जैसे अपना मर्ज भूल गये थे। वे शहरी मेहमानो को देख रहे थे। मुझे देखकर इन शहरियो को लगा कि चलो कोई और भी है शहर से। किश...

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -54

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -54 - पंकज अवधिया हथियारो से लैस डकैतो ने पास के एक शहर मे किसी बडे आदमी के घर के सभी सदस्यो को बन्धक बना लिया था। आस-पास राजा की फौज मौजूद थी पर वह थोडा भी आगे बढती तो डकैत आक्रामक हो जाते। हमारे दादाजी को बुलाया गया। वे राजवैद्य थे। अब ऐसी विकट स्थिति मे राजवैद्य की भला क्या जरुरत। सैन्य अधिकारियो ने विचार-विमर्श किया। उन्हे रात होने का इंतजार करने के लिये कहा गया। ठंड के दिन थे। आम लोग लकडी जलाकर ठंड से बचने की कोशिश करते थे। शाम को माहौल मे धुए की गन्ध बिखरी रहती थी। इसी समय राजवैद्य ने हवा की दिशा जाँची और फिर कंडे मे कुछ जडी-बूटियाँ डाली। जडी-बूटियाँ जलने लगी और धुआँ उस घर के अन्दर जाने लगा जहाँ डकैत और बन्धक थे। थोडी ही देर मे राजवैद्य ने सैनिको को घोडो को चाबुक मारने को कहा। घोडे हिनहिनाये। बाहर थोडी सी अफरातफरी मची पर अन्दर से कोई प्रतिक्रिया नही आयी। सैनिक राजवैद्य का इशारा पाते ही घर के अन्दर घुस पडे। अन्दर देखा तो सभी बेहोशी जैसी स्थिति मे थे। घुँए ने कमाल दिखाया था।...

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -53

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -53 - पंकज अवधिया पिछले कुछ महिनो से आफ्रीकी देश तंजानिया से आ रही खबरे मन को विचलित किये हुये है। वहाँ एल्बीनिज्म रोग से प्रभावित लोगो को चुन-चुन कर मारा जा रहा है। मारने का ढंग बडा ही घिनौना है। रात को सोते हुये अचानक ही इन पर अज्ञात लोग आक्रमण करते है और फिर शरीर का कोई हिस्सा काट कर ले जाते है। प्रभावित लोग तक जब तक मदद पहुँचे तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। आपको यह जानकर आश्चर्य और दुख होगा कि शरीर के काटे गये हिस्सो को अमीर लोग बडी कीमत देकर खरीद लेते है। अमीर इसे लेकर ओझाओ के पास जाते है जहाँ उन्हे ताजे खून को पिलाया जाता है। आपके मन मे चीनी बाजार की बात आ रही होगी जहाँ बाघ के लिंग का सूप केवल इसलिये पीया जाता है ऊँचे दाम देकर कि इससे मर्दाना शक्ति बढती है। इस गलतफहमी ने न जाने कितने बाघो को मौत के घाट उतार दिया है। पर यहाँ हम मनुष्यो के खून की बात कर रहे है। ओझाओ ने यह बात फैला रखी है कि इस खून को पीने से अमीरी बढती है, धन की प्राप्ति होती है। कल मैने रात को बीबीसी पर इसके विषय मे एक और समाचार सुना तो मुझे...

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -52

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -52 - पंकज अवधिया मुम्बई के एक सज्जन को कही से खबर लगी कि मै मधुमेह पर पिछले चौदह सालो से एक रपट लिख रहा हूँ तो वे अपने बीमार पिता को लेकर बिना किसी सूचना के घर पर आ धमके। उनके पिता को मधुमेह था और उन्हे देखकर लगता था कि रोग बढी हुयी अवस्था मे था। उन्होने मुझसे चिकित्सा करने को कहा। मैने उन्हे बताया कि मै चिकित्सक नही हूँ, महज पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान का दस्तावेजीकरण करता हूँ। इस पर वे किसी अनुभवी पारम्परिक चिकित्सक के पास ले चलने की जिद करने लगे। उनकी हालत देखकर मना करते नही बना। उनके लडके ने बताया कि हालत बहुत बुरी है। आनन-फानन मे गाडी की व्यवस्था की गयी और फिर सैकडो किलोमीटर का लम्बा सफर आरम्भ हुआ। पारम्परिक चिकित्सक के पास मोबाइल नही होता है इसलिये इस बात की चिंता थी कि कही हमारा जाना व्यर्थ न हो जाये। पर हमारी मेहनत बेकार नही गयी और जब हम पहुँचे तो पारम्परिक चिकित्सक ने बाहर आकर हमारा स्वागत किया। रोगी की जाँच करने के बाद उन्होने चिकित्सा करने की हामी भर दी। पर यह शर्त रखी कि उन्हे रुकना होगा। कब तक? जब तक ...

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -51

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -51 - पंकज अवधिया यूँ तो लगातार ऐसे दावे सामने आते रहते है कि संजीवनी बूटी खोज ली गयी है पर वास्तव मे क्या रामायण काल मे प्रयोग की गयी संजीवनी बूटी अब भी धरती पर है? क्या यह एक वनस्पति है या वनस्पतियो का मिश्रण? आम लोगो मे इस विषय पर चर्चा होती रहती है। विद्वान भी इसमे सिर खपाते रहते है। हरेक दावे को परखे बिना ही विद्वान उसका विरोध शुरु कर देते है। यदि वे विरोध न करे तो किस काम के विद्वान। वनस्पतियो मे रुचि होने के कारण मै भी इस वनस्पति को तलाशता रहा। विद्वानो ने कह दिया कि आप छत्तीसगढ मे इसे न खोजे क्योकि रामायण काल मे दूसरी जगह से इसे लाने की बात लिखी है। आपको यह मध्य भारत मे नही मिलेगी। और यदि गल्ती से मिल भी गयी तो विद्वान इसे मान्यता नही देंगे। इन सब बातो की परवाह किये बगैर मैने खोज जारी रखी। विद्वान की मान्यता की चिंता नही थी। बस यही तमन्ना थी कि ऐसी वनस्पति को प्राप्त कर मै इससे लोगो का जीवन बचा सकूँ। कुछ वर्षो पहले एक पारम्परिक चिकित्सक के सामने एक बेबस खडे विदेशी पुरुष को देखा। उसे कैसर था और आधुनिक चिकित...

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -50

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -50 - पंकज अवधिया यदि मै आपसे सवाल करुँ कि आप कौन-सा चावल खाते है तो आपमे से ज्यादातर लोग कहेंगे बासमती, यदि आप शहरी इलाको से होंगे तो। यदि आप ग्रामीण इलाको से होंगे तो आप अधिक उपज देने वाली नयी किस्मो के नाम गिनाने शुरु कर देंगे। आपमे से बहुत कम पारम्परिक किस्मो की बात कहेंगे। धान की पारम्परिक किस्मे तेजी से खत्म होती जा रही है। हमारी नयी पीढी इनके नाम पुस्तको मे ही पढ पायेगी- ऐसा प्रतीत होता है। मै अपने सर्वेक्षणो के दौरान युवाओ से जब इनके विषय मे पूछता हूँ तो वे बगले झाँकने लगते है। ज्यादातर बुजुर्ग भी बहुत कम जानकारी दे पाते है औषधीय धान के विषय मे। बीज मिल पाना तो दूर की बात है। यह मेरा सौभाग्य है कि मै पिछले डेढ दशक से इसमे अपनी रुचि बनाये हुये हूँ। इसका परिणाम यह हुआ कि मुझे दसो किस्म के औषधीय धान के विषय मे न केवल जानने को मिला बल्कि उनके औषधीय उपयोगो को परखने का भी अवसर मिला। औषधीय धान से सम्बन्धित जानकारियो को मैने अपने तक सीमित नही रखा। सैकडो लेखो के माध्यम से मैने इसके विषय मे दुनिया को बताया, इस उम्मी...

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -49

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -49 - पंकज अवधिया पिछले सोमवार को पारम्परिक चिकित्सको के साथ घने वनो मे घूमता रहा। दिन मे जंगली जानवर से मुलाकात होने की सम्भावना कम ही रहती है। साथ चल रहे लोग बताते रहे कि यहाँ भालू बहुत है, यह तेन्दुए का रास्ता है आदि-आदि। पर इनसे मुलाकात नही हुयी। मैने पहले भी लिखा है कि मै इनसे मिलना पसन्द नही करता। मेरा ध्यान वनस्पतियो पर रहता है। शाम तक घने जंगल को पैदल पार करते हुये हम दूसरे छोर तक पहुँच गये। वहाँ गाडी बुलवा ली थी। रात को जब फिर उसी रास्ते से गाडी मे बैठकर निकले तो आश्चर्य का ठिकाना नही रहा। पहले लोमडियो, फिर वनबिलाव, भालुओ को देखा और दो बार तेंदुआ दिखायी पडा। जंगली सुअर भी दिखायी पडे। हमारे साथ सफर कर रहे एक नये व्यक्ति ने हमे कुछ और ही समझ लिया था। हर जानवर को देखकर वह कहता रहा, साहब, इसका सींग मिल जायेगा मर्दाना शक्ति बढाने के लिये, इसकी पूँछ के बाल मिल जायेंगे भूत भगाने के लिये, इसके सिर की हड्डी मिल जायेगी वशीकरण के लिये, इसके दाँत दिलवा दूँ क्या, आपको नजर नही लगेगी आदि-आदि। मैने उसे शांत करते हुये कहा...

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -48

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -48 - पंकज अवधिया हमारे एक फिल्मकार मित्र है जो जंगलो मे मोर को देखते ही ग़ाडी रुकवा देते है। तस्वीरे उतारने के लिये नही बल्कि उसकी आवाज सुनने के लिये। साथ मे चल रहा कोई स्थानीय व्यक्ति यदि आवाज लगाकर मोर को आवाज लगाने के लिये उकसाता है तो वे उसे घूरकर ऐसे देखते है कि उसकी आवाज निकलनी बन्द हो जाती है। मोर की आवाज सुनने के लिये वे घंटो गुजार देते है। कई बार तो उनको गाडी मे ही छोडकर हम लोग पैदल जंगल मे चले जाते है। एक बार मोर बोले तो वे अगली बार का इंतजार करते है। तीन बार उसकी आवाज सुनते ही उस स्थान से तेजी से दूर चले जाते है। तेजी का कारण होता है कि कही चौथी आवाज न सुनायी पड जाये। मै उनके इस मोर प्रेम से काफी समय से अभिभूत था। छत्तीसगढ के बारनवापारा अभ्यारण्य मे जहाँ पर्यटको की निगाहे तेन्दुए और बायसन को खोजती रहती है वहाँ हमे मोर के पास घंटो डटा देखकर दूसरे पर्यटक हमारा मजाक बनाते रहते है। अभ्यारण्य का गाइड भी सिर फोडते बैठा रहता है। फिल्मकार मित्र कैमरा साथ लिये होते है पर मोर की तस्वीरे नही उतारते है। बस आवाज सुन...

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -47

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -47 - पंकज अवधिया ढेरो आधुनिक यंत्रो के बावजूद आज का मौसम विभाग मौसम की सही भविष्य़वाणी नही कर पाता है और आम लोगो के मजाक का शिकार होता रहता है। मैने इस लेखमाला मे पहले लिखा है कि कैसे आज भी ग्रामीण भारत अपने पारम्परिक ज्ञान के आधार पर सटीक भविष्यवाणी करता है। इसी क्रम मे मुझे याद आता है कि बचपन मे गाँव के बडे-बुजुर्ग प्रवासी पक्षियो की हलचल को देखकर वर्षा की भविष्यवाणी किया करते थे। वे बाजो के चिल्लाने से भी वर्षा के होने और न होने का अनुमान लगाते थे। हमारे गाँव मे जंगली कबूतर बडी संख्या मे है। लोग इन्हे छेडते नही है और इनकी सुविधा के लिये काली मटकी लटका देते है ताकि वे इसमे अंडे दे सके। बचपन मे पहले दादाजी को और फिर पिताजी को ऐसी मटकी लटकाते मैने देखा है। बचपन मे यह भी सुना था कि जितने तरह के पक्षी गाँव मे रहेंगे उतना ही कम फसलो को नुकसान होगा। बाद मे यही बात कृषि की शिक्षा के दौरान देशी-विदेशी किताबो मे पढी। बचपन से लेकर अब तक देखते ही देखते पक्षियो की विविधता मे कमी दिखने लगी है। वे संख्या मे भी कम होने लगे है।...

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -46

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -46 - पंकज अवधिया अन्ध-विश्वास के खिलाफ जंग पर आधारित यह लेखमाला देश भर मे विभिन्न पत्र-पत्रिकाओ के माध्यम से छप रही है। मै खेती-किसानी पर नियमित लिखता हूँ इसलिये कोटा से प्रकाशित होने वाली पाक्षिक पत्रिका कृषि अमृत मे भी इसका नियमित प्रकाशन हो रहा है। ग्रामीण भारत से आ रहे पत्र इस बात का आभास करा रहे है कि इस लेखमाला को मन लगाकर पढा जा रहा है। गुजरात के एक स्कूल से पत्र आया है कि वे हर सप्ताह छात्रो के बीच इस लेखमाला पर आधारित परिचर्चा करवा रहे है। पाठक के पत्रो मे शुभकामनाओ के साथ ढेरो प्रश्न आ रहे है। प्रश्न विस्तार से है। वे मुझसे लिखित उत्तर चाहते है ताकि अपने क्षेत्र मे इसे बतौर सबूत दिखाकर वे अन्ध-विश्वास के खिलाफ लडाई लड सके। उनके प्रश्नो के जवाब मै इंटरनेट पर प्रकाशित हो रही इस लेखमाला मे दे रहा हूँ। पत्र-पत्रिकाए एक-एक करके लेखो को प्रकाशित कर रही है। ऐसे मे नये लेख पाठको तक पहुँचने मे एक-दो साल लग जायेंगे। कल ही राजस्थान से एक विचित्र प्रश्न प्राप्त हुआ। यह किसी तांत्रिक के दावे पर आधारित है। पाठक इस पर...

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -45

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -45 - पंकज अवधिया कुछ वर्षो पहले एक हर्बल कम्पनी मे बतौर सलाहकार सप्ताह मे एक बार जाना होता था। वहाँ एच.आर. नाम से एक मैनेजर थे। उनका पूरा नाम उस कम्पनी मे शायद ही कोई जानता हो। सभी उन्हे एच.आर. कहते थे। मै भी उन्हे इसी नाम से जानता था। एक बार मैने बातो ही बातो मे उनसे पूरा नाम पूछा तो वे टाल गये। उनके टालने के ढंग मे कुछ रहस्य था इसलिये मै समय-समय पर पूछता रहा। इस कम्पनी का काम खत्म होने के आखिरी दिन एच. आर. मुझे छोडने एयरपोर्ट आये। वही प्रश्न मेरे मन मे था। पता नही वो कैसे ताड गये और बोले, सर बडा ही अटपटा नाम है। गाँव से हूँ और वही से यह नाम मिला है। एच. आर. मतलब हगरु राम। इतना बोलने के बाद वे यह सोच कर बचाव की मुद्रा मे आ गये कि मै अब जमकर मजाक उडाऊँगा। पर मुझे हँसी नही आयी। हाँ, बचपन के बहुत से ऐसे मित्रो की याद आ गयी जिनके साथ गाँव मे मै खेला करता था। ये अटपटे नाम वाले सहपाठी थे। ये अटपटे नाम हम लोगो ने नही रखे थे बल्कि उनके आपने पालको ने रखे थे। ऐसे सहपाठियो को बचपन मे बहुत अपमान सहना होता था पर वे कुछ कर नह...

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -44

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -44 - पंकज अवधिया तो आजकल आप गठिया के लिये क्या उपाय कर रहे है? क्या पर्याप्त जल का सेवन जारी है? योग कैसा चल रहा है? मैने एक साथ कई प्रश्न अपने मित्र के पिताजी से कर दिये। वे काफी दिनो से गठिया के मरीज है। उन्हे जो भी नया उपाय मिलता है बिना देर किये उसे आजमा लेते है। चाहे इसके लिये कितने भी पैसे खर्चने पडे। उन्होने जवाब दिया कि जब से यह चमत्कारी अंगूठी मिली है तब से सभी उपाय बन्द है। अब इसी अंगूठी से गठिया जड से ठीक हो जायेगा। मैने सोचा कि किसी ने रत्नो वाली अंगूठी थमा दी होगी और मोटी रकम वसूल ली होगी पर जब उन्होने अपना हाथ बढाया तो बडी सस्ती सी अंगूठी दिखायी दी जिस पर मटमैली प्लेटनुमा वस्तु लगी हुयी थी। अरे अंकल, ऐसे तो कुछ समझ नही आ रहा है। जरा विस्तार से बताये। मैने कहा। उन्होने बताया कि एक देहाती मेले से यह अंगूठी लाये है ग्यारह हजार रुपये देकर। इसमे डायनोसोर की हड्डी लगी है। मुझसे रहा नही गया। मैने पूछा, डायनोसोर? वह भी इस जमाने मे? क्या अंकल आप भी मजाक करते है? डायनोसोर की हड्डी किसे मिल गयी जो इतनी सारी अं...