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अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -15

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -15 - पंकज अवधिया छोटी-सी पहाडी के नीचे बसे एक गाँव के पास हर्रा के पेड को देखकर मै रुक गया। पेड फलो से लदे हुये थे। मै तस्वीरे उतारने लगा। मेरा ड्रायवर और सहयात्री दो ग्रामीण गाडी से उतरकर आस-पास वनस्पतियो को खोजने लगे। दूर खेतो मे किसान अपने परिवार सहित काम कर रहे थे। हर्रा के बाद मै पास के महुआ पेड मे उग रहे आर्किड की तस्वीरे उतारने मे जुट गया। अचानक ‘ भाग साहब भाग ’ की आवाज से मेरा ध्यान टूटा। पीछे देखा तो तीनो लोग हडबडी मे गाडी की ओर भाग रहे थे। गाडी याने टाटा इंडिका। वे जल्दीबाजी मे गाडी के अन्दर घुस गये। लगातार मुझे आवाज लगाते रहे। उनकी आवाज मे डर था। फिर जब उन्हे कार सुरक्षित नही जान पडी तो वे पास के घरो की ओर दौडने लगे। उन्होने पीछे मुडकर देखना बन्द कर दिया था। घरो के दरवाजे खुलवाये और फिर अन्दर गायब हो गये। वहाँ से फिर आवाजे आने लगी, ‘ भाग साहब भाग ’ । मैने पहले समझा कि तेन्दुआ या भालू आ गया होगा। पर आस-पास कुछ दिखा नही। दिन मे उनके आने की सम्भावना कम थी क्योकि वे दिन मे ऐसे घने जंगलो मे रहना अ...

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -14

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -14 - पंकज अवधिया “ जैसे ही हम टीकावन (तिलक) के लिये लडकी वालो के घर पहुँचे तो एक अजीब सी महिला पर नजर पडी। उसने रस्म अदायगी के दौरान मेरा एक बाल तोड लिया। मेरी समझ मे कुछ नही आया। मुझे अपना बाल उसी समय वापस ले लेना चाहिये था। उस महिला ने बाल को अन्य बालो के साथ गूँथा और एक पुतली (गुडिया) तैयार कर ली। अब वह जो गुडिया को करती उसका सीधा असर मुझ पर होता। वह पेट पर वार करती तो मेरे पेट मे असहनीय दर्द होता है। वह उसे पटक देती तो मै भी उससे कोसो दूर अपने स्थान पर गिर जाता था। “ किशोर कुमार के सदाबहार गीतो के बीच मुझे कार की पिछली सीट से मेरे एक ग्रामीण सहायक की बाते सुनायी पड रही थी। इस उम्मीद मे कि मै सामने वाली सीट पर बैठा हल्की नीन्द मे होऊँगा, वह अपने साथी और ड्रायवर से बतियाये जा रहा था। इस सहायक की पहली शादी सफल नही हुयी थी। शायद वह इसी का किस्सा सुना रहा था। बालो से पुतली बनाने और फिर उसके माध्यम से किसी पर वश करने की बात से मुझे बचपन मे पढी फैंटम की एक कहानी याद आ गयी। हम लोग हिन्दी मे फैटम को पढते थे ...

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -13

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -13 - पंकज अवधिया जैसे ही सर्प-दंश से पीडित कोई व्यक्ति गणेश के पास पहुँचता है वह तुरंत ही अपने चार-पाँच चेलो को बुला लेता है। यदि जहरीले सर्प का दंश है तो वे बिना विलम्ब मुँह मे धी और जडी-बूटियो का लेप लगाकर जहर खीचना आरम्भ करते है। मुँह से जहर खीचते जाते है और बगल मे थूकते जाते है। उसके शिष्य भी इस प्रक्रिया को दोहराते है। जल्दी ही मरीज ठीक होकर काम मे लग जाता है। गणेश ने अब तक सैकडो जाने बचायी है और उसके जीवन मे उसके गाँव मे एक भी व्यक्ति आज तक सर्प दंश से नही मरा है। दूर-दूर से उसके पास मरीज आते है। एंटी-वेनम के लिये कुछ घंटो की शर्त है पर गणेश का कहना है कि मरीज मे जीवन का अंश रहना चाहिये फिर वह उसे बचा सकता है। यदि मरीज खाने-पीने की स्थिति मे होता है तो उसे जडी-बूटियो से ठीक किया जाता है पर यदि मरणासन्न स्थिति मे हो तो फिर मुँह से जहर खीचने के अलावा कोई विकल्प नही होता। उसने अपने जीवन मे 25 से अधिक विषैली जातियो का विष निकाला है। मरीज की जान बचाने की उसकी फीस है एक नारियल और सवा रुपये। हाँ, आप...

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -13

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -13 - पंकज अवधिया जैसे ही सर्प-दंश से पीडित कोई व्यक्ति गणेश के पास पहुँचता है वह तुरंत ही अपने चार-पाँच चेलो को बुला लेता है। यदि जहरीले सर्प का दंश है तो वे बिना विलम्ब मुँह मे धी और जडी-बूटियो का लेप लगाकर जहर खीचना आरम्भ करते है। मुँह से जहर खीचते जाते है और बगल मे थूकते जाते है। उसके शिष्य भी इस प्रक्रिया को दोहराते है। जल्दी ही मरीज ठीक होकर काम मे लग जाता है। गणेश ने अब तक सैकडो जाने बचायी है और उसके जीवन मे उसके गाँव मे एक भी व्यक्ति आज तक सर्प दंश से नही मरा है। दूर-दूर से उसके पास मरीज आते है। एंटी-वेनम के लिये कुछ घंटो की शर्त है पर गणेश का कहना है कि मरीज मे जीवन का अंश रहना चाहिये फिर वह उसे बचा सकता है। यदि मरीज खाने-पीने की स्थिति मे होता है तो उसे जडी-बूटियो से ठीक किया जाता है पर यदि मरणासन्न स्थिति मे हो तो फिर मुँह से जहर खीचने के अलावा कोई विकल्प नही होता। उसने अपने जीवन मे 25 से अधिक विषैली जातियो का विष निकाला है। मरीज की जाने बचाने की उसकी फीस है एक नारियल और सवा रुपये। हाँ,...