मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-65
- पंकज अवधिया
तंग पिंजरो मे अघोषित आजीवन कारावास भुगतते वन्य प्राणी और उनसे जुडी बाते
कल्पना करिये कि आप रोजमर्रा के कामकाज मे लगे है। अचानक ही दूसरे ग्रह के लोग आये और आपको उठा ले। तंग कमरे मे आपको रखे और फिर अगले दिन आपके शहर से सैकडो किलोमीटर दूर ऐसी जगह पर छोड दे जहाँ आप कभी गये ही नही है। फिर आपको उस जगह पर रहने के लिये मजबूर करे। आपको सब कुछ शुरु से शुरु करना होगा। पता नही ऐसे माहौल मे आप अपने अस्तित्व को कायम रख पायेंगे भी कि नही। आप इसे सीधे-सीधे अन्याय कहेंगे। खैर, आप निश्चिंत रहे क्योकि आप इंसान है और यह आपके साथ शायद ही हो पर ऐसा व्यव्हार वन्य प्राणियो के साथ अक्सर होता है। उन्हे दूसरे ग्रहो के लोग इधर से उधर नही करते बल्कि हम-आप जैसे लोग ही करते है। हाल ही मे मै एक पारम्परिक सर्प विशेषज्ञ से यह चर्चा कर रहा था।
ऊपर से जंगल भले ही शांत लगे पर भीतर भारी संघर्ष चलता रहता है। यह संघर्ष अस्तित्व के लिये होता है। जंगल मे असंख्य खतरे होते है और कडा संघर्ष ही अधिक समय तक जीने देता है। जिस स्थान पर वन्य प्राणी जन्मते है उसके आस-पास से वे परिचित रहते है। वही वे बडे होते है और जीवन के लिये संघर्ष करते है। इन प्राणियो के इलाके बँटे होते है और इलाको के लिये इनमे जबरस्त संघर्ष होता है। मैने पिछले लेखो मे लिखा है कि कैसे पारम्परिक सर्प विशेषज्ञ श्री गणेश के चेले जंगल से नाना प्रकार के साँप पकडकर लाते है और फिर पंचमी के दिन उन्हे दूसरे जंगलो मे छोड दिया जाता है। छोडने से पहले उनकी पूजा की जाती है और सर्प उत्सव मनाया जाता है। जंगल मे सर्प को वापस छोडना निश्चित ही साँपो के प्रति उनकी जिम्मेदारी को दर्शाता है। मै इस परम्परा का प्रशंसक रहा हूँ पर एक ही प्रश्न मुझे लम्बे समय से कचोटता रहा है कि साँपो को वापस उसी स्थान पर क्यो नही छोडा जाता? क्यो नये जंगल मे छोडा जाता है, जहाँ उन्हे जीवन के लिये संघर्ष एक बार फिर से आरम्भ करना होता है? इसका जवाब किसी के पास नही होता है। ज्यादातर लोग इस बारे मे सोचना ही नही चाहते पर वे लोग जो जंगलो मे रहते है वे इस बलात स्थान परिवर्तन को सही नही मानते है।
हाल की जंगल यात्रा के दौरान मैने यह बात श्री गणेश के सामने रखी। गम्भीरतापूर्वक मेरी बाते सुनने के बाद उन्होने मेरे प्रश्न को सही ठहराया। वे दशको से ऐसा कर रहे है। उन्होने बताया कि एक साल के अंतराल मे जब वे वापस उसी स्थान पर जाते है जहाँ उन्होने साँपो को छोडा था तो बहुत बार वे वहाँ नही मिलते है। कई बार वे एक बडे कुनबे के रुप मे मिलते है। उनकी संख्या बढ चुकी होती है। उन्होने मुझे आश्वासन दिया कि अपने चेलो के सामने वे यह बात रखेंगे और सम्भव हुआ तो अगले साल से सारे साँप उसी स्थान पर वापस छोडे जायेंगे जहाँ से इन्हे एकत्र किया गया था।
बलात स्थान परिवर्तन तेन्दुओ के साथ भी किया जाता है। यदि किसी क्षेत्र मे किसी तेन्दुए ने उत्पात मचाया और ग्रामीणो ने शिकायत की तो वन विभाग तेन्दुओ को पकड लेता है फिर दूसरे स्थान पर छोड देता है। मेरे वन अधिकारी मित्र इसे मानव अपराधियो को जिलाबदर करने के उदाहरण से समझाते है। पर यह जरुरी नही कि जिलाबदर किया गया अपराधी दूसरे जिले मे अपराध करे ही ना। फिर तेन्दुए अपराधी नही है। मनुष्य ने उनका निवास स्थान उजाडा है न कि तेन्दुए ने यह किया है। तेन्दुए के पास जंगल नही है और न ही भोजन। ऐसे मे वह मानव आबादी की तरफ क्यो नही आयेगा? दूसरे स्थान पर छोडे गये तेन्दुए कुछ समय तक तो जंगल की खाक छानते है। यदि वहाँ पहले से तेन्दुए है तो इलाके की लडाई होती है। और फिर थक-हारकर वे फिर से आस-पास के गाँवो का रुख करते है। फिर शिकायत होती है और तेन्दुए को पकडकर चिडियाघर मे बन्द कर दिया जाता है आजीवन कारावास की अघोषित सजा सुनाकर।
अपनी मस्ती से जंगल मे जीने वले तेन्दुओ और दूसरे बडे प्राणियो को तंग पिंजरो मे क्यो रखा जाता है? यह बात मुझे कभी समझ मे नही आयी। फन्दे से घायल हुये वन्य प्राणियो को तंग पिंजरो मे रखकर आसानी से दवा दी जा सकती है, भोजन दिया जा सकता है पर ताउम्र उन्हे ऐसे स्थान पर रखना भला कहाँ की इंसानियत है? शहरो मे आम लोगो को काटते आवारा कुत्तो के पक्ष मे आवाज उठाने वाले और सर्कस मे जीवो पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले लोग क्यो तंग पिंजरो मे बन्द वन्य प्राणियो को देखकर मुँह मोड लेते है, यह बात समझ से परे है। मैने देखा है कि वन्य प्राणी खाना-पीना भूलकर पिंजरे को तोडने की जुगत मे रहते है। हाल मे रायपुर के पास स्थित एक चिडियाघर से एक भालू पिन्जरा तोडकर भाग गया। वन विभाग के लोग नहा-धोकर उसके पीछे लगे रहे। पर उसकी किस्मत अच्छी थी जो वह वापस जंगलो मे भाग गया।
कुछ दिनो पहले एक समाचार ने मन को खिन्न कर दिया। मरवाही क्षेत्र मे एक बैजर देखा गया। इसे दुर्लभ बताया गया। समाचार के अनुसार, वन विभाग को जब इसका पता चला तो उसने गाँव मे फन्दा लगाया और उसे पकड लिया। अब इसे चिडियाघर मे रखा जायेगा। यह समाचार साधारण समाचार लग सकता है पर कोई यह बताये कि इसमे उस बैजर का क्या कसूर है? वह मजे से जंगल मे घूम रहा था। उसकी बुरी किस्मत जो मनुष्यो की नजर उस पर पड गयी। बैजर का परिवार होगा जो उसका इंतजार करता होगा। उसका अपना जीवन होगा। ऐसे मे उसे फन्दा लगाकर पकडना और फिर चिडियाघर मे तंग पिंजरे मे बन्द कर देना, क्या अमानवीय कदम नही है? उस समाचार के अनुसार, अब चिडियाघर मे उसके प्रजनन के प्रयास किये जायेंगे। कृत्रिम परिस्थितियो मे प्रजनन टेढी खीर है। राज्य मे जंगली मैना को पिंजरे मे बन्दकर प्रजनन कराने के नाम पर लाखो रुपये फूँके जा चुके है पर नतीजा सिफर ही रहा है। क्यो नही बैजर के लिये फन्दा लगाने की बजाय उस पर नजर रखी जाती? आस-पास के लोगो को उसके महत्व के विषय मे बताया जाता? जिस भी पर्यावरणप्रेमी ने यह समाचार पढा उसने तीखी प्रतिक्रिया दी। कुछ स्थानीय नेताओ ने भी स्थानीय अखबारो के माध्यम से अपना विरोध दर्ज कराया। पता नही, जंगल के अधिकारिक रखवाले किस नीति के तहत वन्य प्राणियो के साथ ऐसा सौतेला व्यव्हार करते है?
देश मे वन प्रबन्धन के ढेरो छोटे-बडे संस्थान है। इन पर जनता की गाढी कमायी का अरबो रुपया व्यय होता है। ये बडी-बडी बाते करते है पर जमीनी स्तर पर वन प्रबन्धन के नाम पर इनका योगदान नही दिखता। उल्टे ये वनवासियो के पारम्परिक वन प्रबन्धन से सीखकर शोध-पत्र छापते है और फिर उस पर इतराते है। आज जब मनुष्यो और वन्य प्राणियो मे टकराव निर्णायक मोड की ओर आ रहा है, ऐसे विकट समय मे राष्ट्रीय चर्चा के माध्यम से सार्थक वन्य प्राणी प्रबन्धन नीतियाँ बनाने और उन्हे अमलीजामा पहनाने की जरुरत है। (क्रमश:)
(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)
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Wednesday, September 9, 2009
Monday, September 7, 2009
अहिराज, चिंगराज व भृंगराज से परिचय और साँपो से जुडी कुछ अनोखी बाते
मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-64
- पंकज अवधिया
अहिराज, चिंगराज व भृंगराज से परिचय और साँपो से जुडी कुछ अनोखी बाते
कुछ लोगो को एक स्थान पर खडा देखकर मैने गाडी रोकी। पास जाने पर पता चला कि किसी के घर मे एक साँप घुस गया था। अभी ही उसे मारा गया था। सामने साँप पडा था। उसका सिर कुचला हुआ था पर उसमे जान थी। उसका शरीर हरकते कर रहा था। इसे चूहा खाने वाला साँप बताया जा रहा था। यह नुकसानदायक नही है-ऐसा भी लोग कह रहे थे पर उसे देखने से मन मे भय उत्पन्न हो जाता था। बडा ही लम्बा साँप था। मुझे सर्प-विज्ञान का वह नियम याद आ गया कि जितना बडा साँप उतना कम जहर। पर यह सभी मामलो मे सही नही है। आधुनिक सन्दर्भ ग्रंथ बताते है कि लम्बे साँप भी जहरीले हो सकते है।
जिन्होने इस साँप को मारा था वे महुए के नशे मे धुत थे। मेरा कैमरा देखकर जोश से भर गये। उन्होने साँप को अपने गले मे डालना चाहा पर उसमे जान थी। वह जमीन मे गिर गया। गाँव के बुजुर्ग उसे जलाने की तैयारी कर रहे थे। भीड मे से किसी ने कहा कि पहले इसे पूरा मार तो दो। क्यो आधा मारकर तडपने देते हो? यह आवाज भीड मे ही खो गयी। साँप तडपता रहा। उसके सिर पर जोर का वार हुआ था। सिर पिचका हुआ था। मेरे साथ चल रहे पारम्परिक चिकित्सक ने कहा कि इसे पानी मे छोड दिया जाये तो यह बच सकता है। भीड मे कोई उसे बचाने को तैयार नही था। लोगो ने कहा कि हम जमीन पर सोते है और साँप का सम्मान करते है पर इतने बडे साँप को हम बार-बार खदेड नही सकते है। लोगो का यह भी कहना था कि यदि आप ले जाना चाहे तो इसे गाँव से दूर ले जा सकते है। घायल साँप को देखकर उसे गाडी मे ले जाने की हमारी हिम्मत नही हो रही थी। उसे इस अवस्था मे दुश्मन और दोस्त मे अंतर करना शायद ही मालूम हो। मोबाइल करके पास के ग्रामीण सर्प विशेषज्ञ को बुलाया गया। उसने साँप की जाँच की और कहा कि बहुत देर हो चुकी है।
इस जंगल यात्रा मे ध्यान तो बरसात मे उगने वाली जडी-बूटियो पर था पर साँप के विषय मे भी अनूठी जानकारियाँ मिलती रही। एक स्थान पर हमे बताया गया कि पास के एक नाले मे बाढ के पानी के साथ अजगर बहकर आया है। गाडी से उस ओर गये पर सफलता हाथ नही लगी। फिर सूचना मिली कि घर मे बनायी गयी एक डबरी मे अजगर ने सियार को निगल लिया है। वह घर पास मे ही था पर एक उफनते नाले के कारण वहाँ नही जा सके।
साँपो पर चर्चा के दौरान मुझे अहिराज के अलावा चिंगराज और भृंगराज साँपो के बारे मे जानने मिला। इन दोनो साँपो का विस्तार से वर्णन ग्रामीणो ने किया। बताया कि दोनो विकट जहर से युक्त है। भृंगराज नाम की वनस्पति मै जानता हूँ पर इस नाम का साँप आश्चर्य का विषय रहा। जंगल की खाक छानने पर ये साँप दिखते है। ग्रामीण साथ चलने को तैयार दिखे पर मैने पूरी योजना के साथ सुबह से जाने की योजना बनायी। फिर इस कार्यक्रम को दशहरे तक टाल दिया। जंगल मे साँपो को खोजने के लिये थोडा सूखा मौसम चाहिये-ऐसा ग्रामीणो ने कहा।
बातो ही बातो मे कुछ ऐसे साँपो की बात पता चली जो कि जंगल मे लोगो का पीछा करते है। यह डराने वाली बात थी। वे गलत नही कह रहे थे। राज्य के अखबार ऐसे साँपो के जंगलो मे होने की खबरे विशेषज्ञो के हवाले से प्रकाशित करते रहते है। मुझे हरजंगतिया नामक साँप के विषय मे भी बताया गया कि जो एक पेड से दूसरे पेड तक छलाँग (?) लगाते हुये चलते है। चिंगराज, भृंगराज, हरजंगतिया जैसे स्थानीय नाम वैज्ञानिक साहित्यो मे नही मिलते है। जब तक इन्हे मै देख न लूँ ग्रामीणो की बातो के आधार पर हवा मे तीर मारना बेकार है।
दशहरे के बाद की यात्रा मे मुझे कौआ अर्थात महुये के फल की खली रखने को कहा गया है। यह खली और माचिस अभियान दल के हर सदस्य के पास होगी। यदि किसी साँप ने परेशान किया तो इसे बिना देर जलाया जायेगा ताकि इसकी गन्ध से वे दूर हो जाये। एक सदस्य पर संकट आते ही दूसरे सदस्य वहाँ पहुँचेंगे और यह प्रक्रिया दोहरायेंगे। वैसे विकल्प के रुप मे मिट्टी का तेल या टायर भी जलाया जा सकता है पर सबसे अच्छा उपाय यही है आपातकालीन परिस्थितियो मे। पर क्या साँप हमारे पीछे पडेंगे? यदि हाँ, तो जोखिम क्यो उठाया जाय? क्यो व्यर्थ ही उन्हे छेडा जाय? इस पर काफी देर तक हम चर्चा करते रहे।
राज्य मे पैरी नदी पर सिकासार बाँध है। अवकाश के दिन काफी लोग यहाँ पहुँचते है। क्षेत्रीय फिल्मो की शूटिंग भी होती है। मै अक्सर इस बाँध को पारकर उस पार के जंगल मे चला जाता हूँ जहाँ विविधता अब भी चरम पर है। हाल की जंगल यात्रा के दौरान श्री गणेश नामक एक पारम्परिक सर्प विशेषज्ञ मेरे साथ थे। मैने अपने लेखो मे उनके बारे मे विस्तार से लिखा है। उन्होने हजारो जाने बचायी है। उनके सैकडो चेले है। इस जंगल यात्रा के दौरान मैने उन्हे साथ ले लिया। वे बता रहे थे कि पिछले सप्ताह एक सत्रह-अठ्ठारह साल के युवक को पैरावट मे एक जहरीले सर्प ने काट लिया था। शहर ले जाते-जाते देर हो गयी। सरकारी अस्पताल ने हाथ खडे कर दिये। वापस गाँव मे श्री गणेश के पास उसे लाया गया। घंटो की अथक मेहनत से उन्होने उस युवक को बचा लिया। पर उनकी अपनी हालत बिगड गयी। मुँह मे छाले हो गये जो अभी तक उन्हे तकलीफ पहुँचा रहे थे। उनका खाना-पीना बन्द हो गया था। उन्हे इस बात का अहसास हो रहा था कि साँप बहुत जहरीला था।
मैने अपने ज्ञान के आधार पर उन्हे कुछ वनस्पतियाँ बतायी और फिर जंगल मे गाडी रोककर उन्हे चबाने के लिये कुछ जडे दी। कुछ घंटो मे छालो पर असर दिखने लगा। वे बडे प्रसन्न हुये। मै उन्हे गुरु मानता हूँ पर उल्टे वे मुझे अपना गुरु मानते है। वे चाहे जो कहे पर मै जानता हूँ कि मुझे उनके जैसा बनने के लिये कई जन्म लेने होंगे।
चलिये सिकासार बाँध पर लौटते है। जिन स्थानो मे फिल्मो की शूटिंग होती है वहाँ इस बार खाली-खाली सा लगा। मैने वहाँ के एक कर्मचारी से इस बारे मे पूछा तो उसने कहा कि पिछले कुछ दिनो से वहाँ साँप दिख रहे है। इसलिये लोग डर से नही जा रहे है। कुछ देर बाद मैने यही बात श्री गणेश को बतायी तो उन्होने सिर पकड लिया और कहा कि मुझसे बडी गल्ती हो गयी। उन्होने खुलासा किया कि पंचमी के दिन उनके चेलो ने उन्हे जो साँप भेंट मे दिये थे उन्हे सिकासार के इसी इलाके मे छोडा गया था। “मेरे सगे-सम्बन्धी (यानि वे साँप) ऐसा कर रहे है तो उसके लिये मै जिम्मेदार हूँ।“ ऐसा कहकर वे उस ओर चल पडे। उन्होने उसी स्थान पर बैठकर मंत्र पढे इस उम्मीद मे कि शायद कोई साँप आ जाये। उनकी योजना उन्हे फिर से पकडकर पर्यटको से दूर छोडने की थी। पर घंटो मे इंतजार के बाद भी यह सम्भव नही हो पाया।
हर साल वनोपज के संग्रह के लिये वनवासी जंगल मे आग लगाते है। योजनाकार यह कहकर किनारा कर लेते है कि यह दशको से चला आ रहा है और इससे जंगल को नुकसान नही होता है। बल्कि कुछ मामलो मे फायदा ही होता है। पर जमीनी हकीकत कुछ और ही है। इस आग से बहुत से जीवो पर संकट खडा हो जाता है। साँप उनमे से एक है। ग्रामीण सर्प विशेषज्ञ बताते है कि इस आग ने जंगलो से बहुत से दुर्लभ साँपो को खत्म कर दिया है। हर साल आग का दायरा बढता जा रहा है और साँपो पर खतरा भी। (क्रमश:)
(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)
© सर्वाधिकार सुरक्षित
- पंकज अवधिया
अहिराज, चिंगराज व भृंगराज से परिचय और साँपो से जुडी कुछ अनोखी बाते
कुछ लोगो को एक स्थान पर खडा देखकर मैने गाडी रोकी। पास जाने पर पता चला कि किसी के घर मे एक साँप घुस गया था। अभी ही उसे मारा गया था। सामने साँप पडा था। उसका सिर कुचला हुआ था पर उसमे जान थी। उसका शरीर हरकते कर रहा था। इसे चूहा खाने वाला साँप बताया जा रहा था। यह नुकसानदायक नही है-ऐसा भी लोग कह रहे थे पर उसे देखने से मन मे भय उत्पन्न हो जाता था। बडा ही लम्बा साँप था। मुझे सर्प-विज्ञान का वह नियम याद आ गया कि जितना बडा साँप उतना कम जहर। पर यह सभी मामलो मे सही नही है। आधुनिक सन्दर्भ ग्रंथ बताते है कि लम्बे साँप भी जहरीले हो सकते है।
जिन्होने इस साँप को मारा था वे महुए के नशे मे धुत थे। मेरा कैमरा देखकर जोश से भर गये। उन्होने साँप को अपने गले मे डालना चाहा पर उसमे जान थी। वह जमीन मे गिर गया। गाँव के बुजुर्ग उसे जलाने की तैयारी कर रहे थे। भीड मे से किसी ने कहा कि पहले इसे पूरा मार तो दो। क्यो आधा मारकर तडपने देते हो? यह आवाज भीड मे ही खो गयी। साँप तडपता रहा। उसके सिर पर जोर का वार हुआ था। सिर पिचका हुआ था। मेरे साथ चल रहे पारम्परिक चिकित्सक ने कहा कि इसे पानी मे छोड दिया जाये तो यह बच सकता है। भीड मे कोई उसे बचाने को तैयार नही था। लोगो ने कहा कि हम जमीन पर सोते है और साँप का सम्मान करते है पर इतने बडे साँप को हम बार-बार खदेड नही सकते है। लोगो का यह भी कहना था कि यदि आप ले जाना चाहे तो इसे गाँव से दूर ले जा सकते है। घायल साँप को देखकर उसे गाडी मे ले जाने की हमारी हिम्मत नही हो रही थी। उसे इस अवस्था मे दुश्मन और दोस्त मे अंतर करना शायद ही मालूम हो। मोबाइल करके पास के ग्रामीण सर्प विशेषज्ञ को बुलाया गया। उसने साँप की जाँच की और कहा कि बहुत देर हो चुकी है।
इस जंगल यात्रा मे ध्यान तो बरसात मे उगने वाली जडी-बूटियो पर था पर साँप के विषय मे भी अनूठी जानकारियाँ मिलती रही। एक स्थान पर हमे बताया गया कि पास के एक नाले मे बाढ के पानी के साथ अजगर बहकर आया है। गाडी से उस ओर गये पर सफलता हाथ नही लगी। फिर सूचना मिली कि घर मे बनायी गयी एक डबरी मे अजगर ने सियार को निगल लिया है। वह घर पास मे ही था पर एक उफनते नाले के कारण वहाँ नही जा सके।
साँपो पर चर्चा के दौरान मुझे अहिराज के अलावा चिंगराज और भृंगराज साँपो के बारे मे जानने मिला। इन दोनो साँपो का विस्तार से वर्णन ग्रामीणो ने किया। बताया कि दोनो विकट जहर से युक्त है। भृंगराज नाम की वनस्पति मै जानता हूँ पर इस नाम का साँप आश्चर्य का विषय रहा। जंगल की खाक छानने पर ये साँप दिखते है। ग्रामीण साथ चलने को तैयार दिखे पर मैने पूरी योजना के साथ सुबह से जाने की योजना बनायी। फिर इस कार्यक्रम को दशहरे तक टाल दिया। जंगल मे साँपो को खोजने के लिये थोडा सूखा मौसम चाहिये-ऐसा ग्रामीणो ने कहा।
बातो ही बातो मे कुछ ऐसे साँपो की बात पता चली जो कि जंगल मे लोगो का पीछा करते है। यह डराने वाली बात थी। वे गलत नही कह रहे थे। राज्य के अखबार ऐसे साँपो के जंगलो मे होने की खबरे विशेषज्ञो के हवाले से प्रकाशित करते रहते है। मुझे हरजंगतिया नामक साँप के विषय मे भी बताया गया कि जो एक पेड से दूसरे पेड तक छलाँग (?) लगाते हुये चलते है। चिंगराज, भृंगराज, हरजंगतिया जैसे स्थानीय नाम वैज्ञानिक साहित्यो मे नही मिलते है। जब तक इन्हे मै देख न लूँ ग्रामीणो की बातो के आधार पर हवा मे तीर मारना बेकार है।
दशहरे के बाद की यात्रा मे मुझे कौआ अर्थात महुये के फल की खली रखने को कहा गया है। यह खली और माचिस अभियान दल के हर सदस्य के पास होगी। यदि किसी साँप ने परेशान किया तो इसे बिना देर जलाया जायेगा ताकि इसकी गन्ध से वे दूर हो जाये। एक सदस्य पर संकट आते ही दूसरे सदस्य वहाँ पहुँचेंगे और यह प्रक्रिया दोहरायेंगे। वैसे विकल्प के रुप मे मिट्टी का तेल या टायर भी जलाया जा सकता है पर सबसे अच्छा उपाय यही है आपातकालीन परिस्थितियो मे। पर क्या साँप हमारे पीछे पडेंगे? यदि हाँ, तो जोखिम क्यो उठाया जाय? क्यो व्यर्थ ही उन्हे छेडा जाय? इस पर काफी देर तक हम चर्चा करते रहे।
राज्य मे पैरी नदी पर सिकासार बाँध है। अवकाश के दिन काफी लोग यहाँ पहुँचते है। क्षेत्रीय फिल्मो की शूटिंग भी होती है। मै अक्सर इस बाँध को पारकर उस पार के जंगल मे चला जाता हूँ जहाँ विविधता अब भी चरम पर है। हाल की जंगल यात्रा के दौरान श्री गणेश नामक एक पारम्परिक सर्प विशेषज्ञ मेरे साथ थे। मैने अपने लेखो मे उनके बारे मे विस्तार से लिखा है। उन्होने हजारो जाने बचायी है। उनके सैकडो चेले है। इस जंगल यात्रा के दौरान मैने उन्हे साथ ले लिया। वे बता रहे थे कि पिछले सप्ताह एक सत्रह-अठ्ठारह साल के युवक को पैरावट मे एक जहरीले सर्प ने काट लिया था। शहर ले जाते-जाते देर हो गयी। सरकारी अस्पताल ने हाथ खडे कर दिये। वापस गाँव मे श्री गणेश के पास उसे लाया गया। घंटो की अथक मेहनत से उन्होने उस युवक को बचा लिया। पर उनकी अपनी हालत बिगड गयी। मुँह मे छाले हो गये जो अभी तक उन्हे तकलीफ पहुँचा रहे थे। उनका खाना-पीना बन्द हो गया था। उन्हे इस बात का अहसास हो रहा था कि साँप बहुत जहरीला था।
मैने अपने ज्ञान के आधार पर उन्हे कुछ वनस्पतियाँ बतायी और फिर जंगल मे गाडी रोककर उन्हे चबाने के लिये कुछ जडे दी। कुछ घंटो मे छालो पर असर दिखने लगा। वे बडे प्रसन्न हुये। मै उन्हे गुरु मानता हूँ पर उल्टे वे मुझे अपना गुरु मानते है। वे चाहे जो कहे पर मै जानता हूँ कि मुझे उनके जैसा बनने के लिये कई जन्म लेने होंगे।
चलिये सिकासार बाँध पर लौटते है। जिन स्थानो मे फिल्मो की शूटिंग होती है वहाँ इस बार खाली-खाली सा लगा। मैने वहाँ के एक कर्मचारी से इस बारे मे पूछा तो उसने कहा कि पिछले कुछ दिनो से वहाँ साँप दिख रहे है। इसलिये लोग डर से नही जा रहे है। कुछ देर बाद मैने यही बात श्री गणेश को बतायी तो उन्होने सिर पकड लिया और कहा कि मुझसे बडी गल्ती हो गयी। उन्होने खुलासा किया कि पंचमी के दिन उनके चेलो ने उन्हे जो साँप भेंट मे दिये थे उन्हे सिकासार के इसी इलाके मे छोडा गया था। “मेरे सगे-सम्बन्धी (यानि वे साँप) ऐसा कर रहे है तो उसके लिये मै जिम्मेदार हूँ।“ ऐसा कहकर वे उस ओर चल पडे। उन्होने उसी स्थान पर बैठकर मंत्र पढे इस उम्मीद मे कि शायद कोई साँप आ जाये। उनकी योजना उन्हे फिर से पकडकर पर्यटको से दूर छोडने की थी। पर घंटो मे इंतजार के बाद भी यह सम्भव नही हो पाया।
हर साल वनोपज के संग्रह के लिये वनवासी जंगल मे आग लगाते है। योजनाकार यह कहकर किनारा कर लेते है कि यह दशको से चला आ रहा है और इससे जंगल को नुकसान नही होता है। बल्कि कुछ मामलो मे फायदा ही होता है। पर जमीनी हकीकत कुछ और ही है। इस आग से बहुत से जीवो पर संकट खडा हो जाता है। साँप उनमे से एक है। ग्रामीण सर्प विशेषज्ञ बताते है कि इस आग ने जंगलो से बहुत से दुर्लभ साँपो को खत्म कर दिया है। हर साल आग का दायरा बढता जा रहा है और साँपो पर खतरा भी। (क्रमश:)
(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)
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Tuesday, September 1, 2009
पानी मे डूबे गाँवो का अनकहा दर्द, स्त्री रोगो के लिये उपयोगी वनस्पतियाँ और सलिहा
मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-63
- पंकज अवधिया
पानी मे डूबे गाँवो का अनकहा दर्द, स्त्री रोगो के लिये उपयोगी वनस्पतियाँ और सलिहा
दूर-दूर तक पानी ही पानी था। मै अपलक इस मनोहारी दृश्य को निहार रहा था। दूर पानी के बीच पहाडो के शीर्ष दिख रहे थे जो सघन वनस्पतियो से ढके हुये थे। तभी पास खडे व्यक्ति ने कहा कि साहब, आप जो सामने पानी देख रहे है उसमे 52 गाँव डूबे हुये है। मै चौक पडा। दिख तो कुछ भी नही रहा था पर उस व्यक्ति की बाते सुनकर परिकल्प्ना से बने दृश्य सामने आ गये। मै छत्तीसगढ के गंगरेल बाँध के पीछे वाले हिस्से के जंगलो मे खडा था। यह बाँध कई दशक पहले महानदी पर बनाया गया था। आज यह बाँध जाने कितने लोगो की प्यास बुझा रहे है और कितने ही खेतो को पानी दे रहा है। बाँध की इस उपलब्धि के सामने 52 डूबे हुये गाँबो का दुख कम दिखता है पर घर से बिछडने का दुख वही जानता है जिस पर यह गुजरती है।
कुछ समय पहले मै घने जंगल मे औषधीय बेलो के चित्र ले रहा था। पास ही उफनती पैरी नदी थी। मै वर्षो से यहाँ आ रहा हूँ। हर बार मुझे कुछ नया मिल ही जाता है। मुझे इस क्षेत्र से मोह हो गया है पर मै चाहकर भी प्रेम नही करना चाहता। यह प्रेम स्थायी नही होगा। यह वह क्षेत्र है जो निकट भविष्य़ मे पानी के भीतर समा जायेगा। यहाँ भी एक बाँध बनने जा रहा है। यह बाँध नयी राजधानी की प्यास बुझायेगा। मुआवजा बाँटा जा रहा है। डूबान क्षेत्र का बोर्ड लगा दिया गया है। वहाँ से निवासी पूरी तरह से इस बाँध निर्माण के प्रति जागरुक है। पर यहाँ असंख्य ऐसे भी निवासी है जिन्हे इसके बारे मे नही बताया गया है और शायद बताया भी नही जायेगा। जिस दिन यह क्षेत्र डूबेगा पानी के साथ ये निवासी भी काल के गाल मे समा जायेंगे। मै असंख्य जीव-जंतुओ की बात कर रहा हूँ जो हमारी तरह ही इस धरती के निवासी है। बाँध बनाना यदि जरुरी हो तो बनाये जाये पर विस्थापितो मे केवल मनुष्य ही नही शामिल किये जाये। वनस्पतियो और उन पर आश्रित असंख्य जीवो के पुनरस्थापन की भी योजना हो।
गंगरेल के पानी से आधे डूबे एक गाँव मे मुझे एक ऐसे व्यक्ति मिले जिनके नाते रिश्तेदार इस आधे डूबे गाँव को उसके हाल मे छोडकर शहरो मे बस गये। बुजुर्ग व्यक्ति अब अपनी बूढी पत्नी के साथ दूसरे गाँव वालो के साथ रहते है। उनकी कोई संतान नही है। उन्होने बताया कि 52 गाँव और डूबे क्षेत्र मे घने जंगल थे। जब पानी भरना शुरु हुआ तो गाँव वाले अपने मवेशियो के साथ सुरक्षित जगहो पर आ गये पर वनस्पतियो और दूसरे प्राणी देखते ही देखते पानी मे समा गये। उन्होने दो बाघो को पानी मे समाते देखा था। उस समय यह क्षेत्र बाघो और दूसरे खूँखार जीवो के लिये प्रसिद्ध था। आज जंगली जानवरो के नाम पर इस क्षेत्र मे भालू अधिक संख्या मे है। पहाडियो के ऊपर जिन गाँवो वालो ने शरण ली, भालुओ ने भी वही ठिकाना बना लिया।
अपनी गाडी गाँव मे ही खडी कर मै स्थानीय लोगो के साथ जंगल मे काफी देर तक तस्वीरे लेता रहा। यह क्षेत्र जैव-विविधता से पूर्ण लगा। जडी-बूटियो के व्यापारी शायद यहाँ तक नही पहुँचे है इसीलिये दूसरे स्थानो मे दुर्लभ हो चुकी बहुत सी वनस्पतियाँ यहाँ मजे से उग रही थी। इन वनस्पतियो के बचे होने के दूसरे कारण भी है। आजकल दैनिक मजदूरी इतनी अधिक हो गयी है कि व्यापारी अधिक महंगी जडी-बूटियो के लिये ही वनवासियो को जंगलो मे भेजते है। इससे कम कीमत वाली जडी-बूटियाँ बच जाती है। एक अनोखी बात यह भी बता चली कि इस क्षेत्र मे पारम्परिक चिकित्सक कम है। इससे आम लोगो मे वनस्पतियो के औषधीय उपयोग के विषय़ मे कम जानकारी है। ज्यादातर लोग खेती करते है और मछली पकडते है। बहुत से लोग मजदूरी के लिये आस-पास के गाँवो मे चले जाते है।
यह सौभाग्य की बात थी कि हमारे साथ दूसरे क्षेत्र के एक पारम्परिक चिकित्सक थे। वे भी इस क्षेत्र की जैव-विविधता से मुग्ध थे। वे अपनी आवश्यकत्ता की जडी-बूटियाँ एकत्र कर रहे थे। उन्होने चट्टानो के बीच हमे एक अनोखी वनस्पति दिखायी और बताया कि इस वनस्पति से स्त्री रोगो की चिकित्सा की जाती है। औषधीय चावल को पकाकर कुछ समय तक इस वनस्पति की चौडी पत्तियो मे रखा जाता है और फिर रोगियो को दिया जाता है। उन्होने दावा किया कि बहुत से रोगो की आरम्भिक अवस्था मे यह सरल प्रयोग लाभ पहुँचाता है। जिन्हे किसी तरह का रोग नही हो ऐसी महिलाओ को भी इन पत्तियो का ऐसा प्रयोग करना चाहिये। मैने उस वनस्पति की तस्वीरे खीची और उसकी वैज्ञानिक पहचान का प्रयास करने लगा। इसी उधेडबुन मे मुझे उडीसा के नियमगिरि क्षेत्र के पारम्परिक चिकित्सको की बाते याद आने लगी। वे भी स्त्री रोगो के लिये इसी वनस्पति का प्रयोग करते है पर रोगो की पुरानी अवस्था मे वे एक-एक करके बारह तक वनस्पतियाँ बढाते जाते है। रोग की बढी हुयी अवस्था मे बारह अलग-अलग किस्म की वनस्पतियो मे गरम भात परोसा जाता है और फिर एक-एक कौर के रुप मे रोगी को खाने को दिया जाता है।
साथ चल रहे एक बुजुर्ग व्यक्ति कुछ लंगडाकर चल रहे थे। घुटने मे समस्या थी। उन्हे नही मालूम था कि उनके मर्ज का इलाज उन्ही के जंगलो मे था। मैने सलिहा नामक पेड की पहचान बतायी और उससे गोन्द एकत्र करने की विधि बतायी। फिर गोन्द के आँतरिक प्रयोग की विधि विस्तार से समझायी। उन्हे यह भी बताना नही भूला कि कितनी अवधि के बाद दोबारा गोन्द एकत्र किया जाये ताकि पेड बेमौत न मारे जाये। पेड को धार्मिक आस्था से जोडते हुये उनसे अनुरोध किया कि यदि स्थिति सुधरे तो हर सोमवार को पाँच विशेष वनस्पतियो के सत्व से इस पेड को सींच कर धन्यवाद दे दीजियेगा। दरअसल ये सत्व सलिहा को साल दर साल तक सुरक्षित रखेंगे। बुजुर्ग सहर्ष तैयार हो गये और बोल पडे कि पेड को सोमवार को धन्यवाद देने आना है और आपको? मैने कहा कि आपको लाभ हो तो यह विधि मूल रुप मे बिना शुल्क लिये दूसरो को बताइयेगा, मेरा धन्यवाद हो जायेगा।
जंगल मे अपनी विद्वता झाडने के लाभ भी है और नुकसान भी। लाभ यह कि लोगो से आत्मीय सम्बन्ध बन जाते है और नुकसान यह कि बहुत बार ऐसे ज्ञान को जानकर साथ चल रहे लोग आपको विद्वान मानकर मौन धारण कर लेते है और जानकर भी कुछ नही बोलते है इस गलताहमी मे कि ये तो सब जानते है। पर किसी को स्वास्थ्य सम्बन्धी तकलीफ मे देखकर मन रुक नही पाता है।
इस लेखमाला के पिछले लेख मे जलधान पर बात अटकी थी। इन दोनो जंगल यात्राओ के दौरान औषधीय धान पर ढेरो जानकारियाँ मिली। आने वाले लेखो मे मै इस पर लिखने की कोशिश करुंगा। (क्रमश:)
(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)
© सर्वाधिकार सुरक्षित
- पंकज अवधिया
पानी मे डूबे गाँवो का अनकहा दर्द, स्त्री रोगो के लिये उपयोगी वनस्पतियाँ और सलिहा
दूर-दूर तक पानी ही पानी था। मै अपलक इस मनोहारी दृश्य को निहार रहा था। दूर पानी के बीच पहाडो के शीर्ष दिख रहे थे जो सघन वनस्पतियो से ढके हुये थे। तभी पास खडे व्यक्ति ने कहा कि साहब, आप जो सामने पानी देख रहे है उसमे 52 गाँव डूबे हुये है। मै चौक पडा। दिख तो कुछ भी नही रहा था पर उस व्यक्ति की बाते सुनकर परिकल्प्ना से बने दृश्य सामने आ गये। मै छत्तीसगढ के गंगरेल बाँध के पीछे वाले हिस्से के जंगलो मे खडा था। यह बाँध कई दशक पहले महानदी पर बनाया गया था। आज यह बाँध जाने कितने लोगो की प्यास बुझा रहे है और कितने ही खेतो को पानी दे रहा है। बाँध की इस उपलब्धि के सामने 52 डूबे हुये गाँबो का दुख कम दिखता है पर घर से बिछडने का दुख वही जानता है जिस पर यह गुजरती है।
कुछ समय पहले मै घने जंगल मे औषधीय बेलो के चित्र ले रहा था। पास ही उफनती पैरी नदी थी। मै वर्षो से यहाँ आ रहा हूँ। हर बार मुझे कुछ नया मिल ही जाता है। मुझे इस क्षेत्र से मोह हो गया है पर मै चाहकर भी प्रेम नही करना चाहता। यह प्रेम स्थायी नही होगा। यह वह क्षेत्र है जो निकट भविष्य़ मे पानी के भीतर समा जायेगा। यहाँ भी एक बाँध बनने जा रहा है। यह बाँध नयी राजधानी की प्यास बुझायेगा। मुआवजा बाँटा जा रहा है। डूबान क्षेत्र का बोर्ड लगा दिया गया है। वहाँ से निवासी पूरी तरह से इस बाँध निर्माण के प्रति जागरुक है। पर यहाँ असंख्य ऐसे भी निवासी है जिन्हे इसके बारे मे नही बताया गया है और शायद बताया भी नही जायेगा। जिस दिन यह क्षेत्र डूबेगा पानी के साथ ये निवासी भी काल के गाल मे समा जायेंगे। मै असंख्य जीव-जंतुओ की बात कर रहा हूँ जो हमारी तरह ही इस धरती के निवासी है। बाँध बनाना यदि जरुरी हो तो बनाये जाये पर विस्थापितो मे केवल मनुष्य ही नही शामिल किये जाये। वनस्पतियो और उन पर आश्रित असंख्य जीवो के पुनरस्थापन की भी योजना हो।
गंगरेल के पानी से आधे डूबे एक गाँव मे मुझे एक ऐसे व्यक्ति मिले जिनके नाते रिश्तेदार इस आधे डूबे गाँव को उसके हाल मे छोडकर शहरो मे बस गये। बुजुर्ग व्यक्ति अब अपनी बूढी पत्नी के साथ दूसरे गाँव वालो के साथ रहते है। उनकी कोई संतान नही है। उन्होने बताया कि 52 गाँव और डूबे क्षेत्र मे घने जंगल थे। जब पानी भरना शुरु हुआ तो गाँव वाले अपने मवेशियो के साथ सुरक्षित जगहो पर आ गये पर वनस्पतियो और दूसरे प्राणी देखते ही देखते पानी मे समा गये। उन्होने दो बाघो को पानी मे समाते देखा था। उस समय यह क्षेत्र बाघो और दूसरे खूँखार जीवो के लिये प्रसिद्ध था। आज जंगली जानवरो के नाम पर इस क्षेत्र मे भालू अधिक संख्या मे है। पहाडियो के ऊपर जिन गाँवो वालो ने शरण ली, भालुओ ने भी वही ठिकाना बना लिया।
अपनी गाडी गाँव मे ही खडी कर मै स्थानीय लोगो के साथ जंगल मे काफी देर तक तस्वीरे लेता रहा। यह क्षेत्र जैव-विविधता से पूर्ण लगा। जडी-बूटियो के व्यापारी शायद यहाँ तक नही पहुँचे है इसीलिये दूसरे स्थानो मे दुर्लभ हो चुकी बहुत सी वनस्पतियाँ यहाँ मजे से उग रही थी। इन वनस्पतियो के बचे होने के दूसरे कारण भी है। आजकल दैनिक मजदूरी इतनी अधिक हो गयी है कि व्यापारी अधिक महंगी जडी-बूटियो के लिये ही वनवासियो को जंगलो मे भेजते है। इससे कम कीमत वाली जडी-बूटियाँ बच जाती है। एक अनोखी बात यह भी बता चली कि इस क्षेत्र मे पारम्परिक चिकित्सक कम है। इससे आम लोगो मे वनस्पतियो के औषधीय उपयोग के विषय़ मे कम जानकारी है। ज्यादातर लोग खेती करते है और मछली पकडते है। बहुत से लोग मजदूरी के लिये आस-पास के गाँवो मे चले जाते है।
यह सौभाग्य की बात थी कि हमारे साथ दूसरे क्षेत्र के एक पारम्परिक चिकित्सक थे। वे भी इस क्षेत्र की जैव-विविधता से मुग्ध थे। वे अपनी आवश्यकत्ता की जडी-बूटियाँ एकत्र कर रहे थे। उन्होने चट्टानो के बीच हमे एक अनोखी वनस्पति दिखायी और बताया कि इस वनस्पति से स्त्री रोगो की चिकित्सा की जाती है। औषधीय चावल को पकाकर कुछ समय तक इस वनस्पति की चौडी पत्तियो मे रखा जाता है और फिर रोगियो को दिया जाता है। उन्होने दावा किया कि बहुत से रोगो की आरम्भिक अवस्था मे यह सरल प्रयोग लाभ पहुँचाता है। जिन्हे किसी तरह का रोग नही हो ऐसी महिलाओ को भी इन पत्तियो का ऐसा प्रयोग करना चाहिये। मैने उस वनस्पति की तस्वीरे खीची और उसकी वैज्ञानिक पहचान का प्रयास करने लगा। इसी उधेडबुन मे मुझे उडीसा के नियमगिरि क्षेत्र के पारम्परिक चिकित्सको की बाते याद आने लगी। वे भी स्त्री रोगो के लिये इसी वनस्पति का प्रयोग करते है पर रोगो की पुरानी अवस्था मे वे एक-एक करके बारह तक वनस्पतियाँ बढाते जाते है। रोग की बढी हुयी अवस्था मे बारह अलग-अलग किस्म की वनस्पतियो मे गरम भात परोसा जाता है और फिर एक-एक कौर के रुप मे रोगी को खाने को दिया जाता है।
साथ चल रहे एक बुजुर्ग व्यक्ति कुछ लंगडाकर चल रहे थे। घुटने मे समस्या थी। उन्हे नही मालूम था कि उनके मर्ज का इलाज उन्ही के जंगलो मे था। मैने सलिहा नामक पेड की पहचान बतायी और उससे गोन्द एकत्र करने की विधि बतायी। फिर गोन्द के आँतरिक प्रयोग की विधि विस्तार से समझायी। उन्हे यह भी बताना नही भूला कि कितनी अवधि के बाद दोबारा गोन्द एकत्र किया जाये ताकि पेड बेमौत न मारे जाये। पेड को धार्मिक आस्था से जोडते हुये उनसे अनुरोध किया कि यदि स्थिति सुधरे तो हर सोमवार को पाँच विशेष वनस्पतियो के सत्व से इस पेड को सींच कर धन्यवाद दे दीजियेगा। दरअसल ये सत्व सलिहा को साल दर साल तक सुरक्षित रखेंगे। बुजुर्ग सहर्ष तैयार हो गये और बोल पडे कि पेड को सोमवार को धन्यवाद देने आना है और आपको? मैने कहा कि आपको लाभ हो तो यह विधि मूल रुप मे बिना शुल्क लिये दूसरो को बताइयेगा, मेरा धन्यवाद हो जायेगा।
जंगल मे अपनी विद्वता झाडने के लाभ भी है और नुकसान भी। लाभ यह कि लोगो से आत्मीय सम्बन्ध बन जाते है और नुकसान यह कि बहुत बार ऐसे ज्ञान को जानकर साथ चल रहे लोग आपको विद्वान मानकर मौन धारण कर लेते है और जानकर भी कुछ नही बोलते है इस गलताहमी मे कि ये तो सब जानते है। पर किसी को स्वास्थ्य सम्बन्धी तकलीफ मे देखकर मन रुक नही पाता है।
इस लेखमाला के पिछले लेख मे जलधान पर बात अटकी थी। इन दोनो जंगल यात्राओ के दौरान औषधीय धान पर ढेरो जानकारियाँ मिली। आने वाले लेखो मे मै इस पर लिखने की कोशिश करुंगा। (क्रमश:)
(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)
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Sunday, August 30, 2009
जहरीली पिचकारी चलाते कीडे, पौरुष शक्ति बढाने वाले अनोखे कन्द और बरसाती नाले
मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-62
- पंकज अवधिया
जहरीली पिचकारी चलाते कीडे, पौरुष शक्ति बढाने वाले अनोखे कन्द और बरसाती नाले
“अरे, पुल से पानी थोडा ही तो ऊपर है। गाडी आराम से निकल जायेगी। और फिर हम भी साथ है। पानी मे बही तो तुरंत सम्भाल लेंगे। देखिये न पीछे कितनी लम्बी कतार लग गयी है। अब आगे बढिए भी। हमारे दो सौ हमे दे दीजिये।“ सामने बरसाती नाला था जो लबालब भरा था। पुल दिख नही रहा था और फिर भी स्थानीय लोग हमारी गाडी को पार कराने अमादा थे। साथ चल रहे पारम्परिक चिकित्सको और सहायको ने हौसला दिया और मैने गाडी आगे बढा दी। आधा पुल तो पार हो गया पर उसके बाद गढ्ढे ही गढ्ढे थे। शायद पानी की तेज धार ने पुल को काट दिया था। ऐसे फँसे कि गाडी पूरा जोर लगाने के बाद भी टस से मस नही हुयी। फिर पानी का एक रेला आया और उसने गाडी को अपने साथ ले जाने की कोशिश की। सबने आखिरी जोर लगाने की कोशिश की और फिर ले देकर गाडी ने पुल पार कर लिया। हमारी जान मे जान आयी। मैने कान पकडे कि अब दोबारा ऐसा जोखिम नही उठायेंगे। इस जोखिम से एक लाभ हुआ। सामने हरा-भरा जंगल था जो हमारा ही इंतजार कर रहा था।
साथी जंगल मे बिखर गये और मै तस्वीरे लेने लगा। पारम्परिक चिकित्सक लौटे तो उनके हाथो मे चार प्रकार की जंगली हल्दी थी। जंगली हल्दी आजकल मुश्किल से मिलती है और फिर एक साथ चार प्रकारो का मिलना हमारे लिये शुभ संकेत था। हल्दी छोडकर पारम्परिक चिकित्सक फिर जंगल मे ओझल हो गये। मै अकेले ही निकल पडा। मुझे बहुत से कीट ऐसे दिखायी दिये जिन्हे मै पहली बार देख रहा था। मै उन्हे मित्र के रुप मे देख रहा था पर वे मुझे मित्र मानने को तैयार नही थे। उनमे से एक ने पिचकारी मारी और मै तेज धार से मुश्किल से बचा। यह पिचकारी जहरीले रसायन की थी। यह रसायन मेरी त्वचा को बुरी तरह से जला देता। पर मै बच गया। जब उसका जहर भरा पिटारा चुक गया तो मैने आराम से उसकी ढेरो तस्वीरे ली।
पिछले कुछ दिन बहुत तेजी से बीते। आपने इस लेखमाला मे पहले पढा है कि मै कृषि से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान पर शोध दस्तावेज तैयार कर रहा हूँ। मैने अगस्त मे प्रतिदिन 14 से 16 घंटे इसमे लगाने का मन बनाया था। जुलाई के अंत से ही यह काम शुरु हो गया था। अगस्त के प्रथम सप्ताह से ऐसी व्यस्तता बढी कि सारे काम किनारे हो गये। जंगल का भ्रमण रुक गया। जीवन-व्यापन के लिये सलाहकार का काम भी अटक गया। बस केवल दस्तावेजीकरण ही दस्तावेजीकरण। लम्बे समय तक कम्प्यूटर मे बैठना इस बार कुछ ज्यादा ही भारी लगा। जब पूरी तरह से थक गया तो जंगल की सुध ली। जंगल से लौटकर फिर काम मे लग गया। नियमित सलाह लेने वाले मेरे लगातार इंकार से कुछ चिंतित थे। मेरा सचिव उन्हे दिसम्बर के बाद का समय दे रहा था। धान मे कीट प्रबन्धन के पारम्परिक कृषि ज्ञान के आठ हजार दस्तावेज पूरे ही हुये थे कि मुम्बई से एक सज्जन का सन्देश आ गया।
उन्होने अपने फार्म हाउस मे औषधीय वनस्पतियाँ लगायी थी। वे मुझे अपना फार्म दिखाकर सलाह लेना चाहते थे। शुल्क देने को तैयार थे और मेरी यात्रा का व्यय भी। सचिव ने जब व्यस्तता बतायी तो उन्होने समय बचाने के लिये हवाई यात्रा का सुझाव दिया। मुझे इस बारे मे बताया गया। उनकी जिद पर मुझसे बात करवायी गयी। उन्होने जब हवाई यात्रा का खुलासा किया तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना नही रहा। उनके पास निजी विमान था और वे उसे भेजकर मुझे बुलवाना चाहते थे। निजी विमान से आने का निमंत्रण नया नही था पर फार्म हाउस देखने के लिये कोई शाही सवारी भेजे तो कुछ अचरज अवश्य होता है। घर-परिवार मे प्राइवेट जेट से बुलाये जाने की खबर फैली तो सबने कहा कि शान से जाओ। पर मेरा मन दस्तावेजीकरण मे उलझा हुआ था। काफी सोच-विचार करने के बाद सितम्बर मे इस शाही सवारी से जाने की योजना बनायी है। वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये उनसे आरम्भिक बातचीत हो गयी है। वे इस चर्चा से संतुष्ट है। इन सब गतिविधियो ने मुझे जंगल डायरी लेखन से एकदम अलग कर दिया है। कल सुबह फिर से जंगल की ओर जाना है। इसलिये आज रात मैने इस लेखमाला को आगे बढाने का निर्णय ले लिया है। यह लेखमाला रुक-रुक कर आगे बढेगी क्योकि आने वाले महिने व्यस्तता भरे है।
चलिये अब उस जंगल की ओर लौटे जहाँ तक हम बरसाती नाले को जैसे-तैसे पार कर पहुँचे थे। इस बार जब पारम्परिक चिकित्सक लौटे तो उनके हाथो मे कन्द थे। उन्होने कन्दो को धोया और फिर हमे खाने को दिया। कन्द बिल्कुल भी स्वादिष्ट नही थे। उनमे काफी चिपचिपापन था। इन्हे पौष्टिक़ बताया गया। सो हमने चाव से खाया। उसके बाद जब हम घर से लाया गया खाना खाने बैठे तो पारम्परिक चिकित्सको ने बडे अचरज वाली बात बतायी। उन्होने कहा कि ये कन्द शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढाते है। इसके अवयव शरीर मे रच बस जाते है। इतने ज्यादा कि कई दिनो तक वीर्य का स्वाद मीठा बना रहता है। यह तो बडी ही उबकाई लाने वाली बात लगी। हमारा ड्रायवर तो खाना आधा छोडकर उठ गया और पास की झाडी मे जाकर उल्टियाँ करने लगा। पारम्परिक चिकित्सको ने गलत समय पर इस खुलासे के लिये क्षमा माँगी। मुझे भी अटपटा लगा। पर उसी पल मुझे सन्दर्भ साहित्यो मे पढी गयी बाते याद आ गयी। साथ ही इंटरनेट मे विचरने वाले अनसुलझे प्रश्न याद आ गये।
चिकित्सा विज्ञान से जुडे सन्दर्भ साहित्य बताते है कि वीर्य का स्वाद मनुष्य के भोजन पर निर्भर करता है। कैफीन का अधिक सेवन करने वालो के वीर्य का स्वाद कडवा को जाता है। खाद्य सामग्रियाँ वीर्य का स्वाद चरपरा और तीखा भी बना देती है। आम लोगो को इन तथ्यो से कोई वास्ता भले न हो पर चिकित्सा विज्ञान के शोधकर्ताओ ने इस पर काफी अध्ययन किया है। मैने वीर्य को मीठा बनाने वाली वनस्पति के बारे मे विस्तार से पहली बार सुना था। मन मे यह जिज्ञासा जागी कि पारम्परिक चिकित्सको ने भला यह कैसे जाना?
आपने बाटेनिकल डाट काम पर मेरे शोध दस्तावेज पढे है तो आप जानते ही होंगे कि बहुत से पारम्परिक चिकित्सक औषधीय बीजो को बोने से पहले मानव वीर्य से उपचारित करते है। क्यो करते है? क्योकि यह उनकी परम्परा है। इसकी वैज्ञानिक व्याख्या शायद ही किसी ने की हो पर मैने प्रयोगशाला परिस्थितियो मे उनके इस परम्परागत प्रयोग को दोहरा कर उसके सकारात्मक प्रभाव का अध्ययन किया है। पारम्परिक चिकित्सको ने देखा कि जब वे विशेष कन्द मूलो को खाने के बाद वीर्य का प्रयोग बीजोपचार के लिये करते है तो उनमे चीटी जैसे बहुत से कीट टूट पडते है। इससे उन्होने इस बात की पुष्टि की कि विशेष कन्द मूलो का सेवन वीर्य को मीठा बना दे रहा है। मै अचरज भरे मन से पारम्परिक चिकित्सको की बाते सुन रहा था और उनके गहरे ज्ञान से अभिभूत हो रहा था।
भोजन के बाद हमने आगे की राह पकडी। कुछ दूर गये ही थे कि एक और बरसाती नाला सामने था। उसे पार करवाने वाला कोई नही था। बडी गाडियाँ अपने जोखिम पर निकल रही थी। हमने वापसी की राह पकडी। वापस गये तो पहले वाले नाले मे पानी का स्तर बढ चुका था। शायद ऊपरी भाग मे वर्षा हुयी थी जिसके कारण यह जल स्तर बढा था। हम फँस गये। शाम होने लगी। मोबाइल महाश्य टावर खोज-खोज कर थक चुके थे। देर रात तक वहाँ रुकना था। शाम तक जंगल मे घूमते रहे और फिर रात होते ही गाडी के पास आ गये। आग जलायी और फिर पानी के उतरने का इंतजार करने लगे। खाना हमारे पास नही था। वे ही कन्द थे जिन्हे हमे खाना था।
बाते चलती रही। मै बीच-बीच मे अपनी जंगल टार्च से आस-पास देख लेता था कि कही कोई जंगली जानवार भी जडी-बूटियो की बात सुनने न आ गया हो। कुछ आँखे चमकती थी पर पारम्परिक चिकित्सक बिना विलम्ब उन्हे छोटे जानवर की आँखे कह देते थे। करीब दस बजे मैने पानी का स्तर देखने के लिये रोशनी उस ओर फेंकी तो सडक पर पडे लम्बे साँप ने ध्यान खीचा। कोबरा जैसा ही था पर उससे बहुत अधिक लम्बा। वह अपनी मस्ती मे चला जा रहा था। मै नही डरा पर पारम्परिक चिकित्सको ने कहा कि डरो क्योकि यह अहिराज है यानि किंग कोबरा। यह हमे नुकसान नही पहुँचायेगा पर चूँकि यह साँपो का राजा है इसलिये हमे इसका सम्मान करना चाहिये। इससे डरना चाहिये। किंग कोबरा को देखकर मै धन्य हुआ। ऐसा मंत्रमुग्ध हुआ कि तस्वीर लेना ही भूल गया।
रात दो के आस-पास कुछ ट्रके उस ओर दिखायी दी। एक वैन भी थी। जल स्तर कम होने लगा था। ट्रक निकली और फिर वैन। उसके बाद हमने भी हिम्मत दिखायी और पुल पार कर लिया। बरसाती दिनो मे इतनी देर रात जंगल से गुजरना बडा ही रोमांचक अनुभव रहा। इस बीच मोबाइल ने टावर खोज लिया। घर पर बात हुयी और सारी चिंताए दूर हुयी। रात को लगातार चलने की बजाय हमने सुबह पाँच बजे एक गाँव मे रुकने की योजना बनायी। चाय की तलब लग रही थी। एक टपरेनुमा होटल के मालिक को जगाया और उससे आलू-पोहा और लाल चाय बनाने को कहा। वह भला आदमी था। उसने तैयारी शुरु कर दी।
बाते चलती रही। गाँव जागने लगा। तभी हमने बाहर डोंगी उठाये कुछ लोगो को जाते देखा। मछुआरे होंगे, मैने कयास लगाया। होटल वाले ने कहा कि नही किसान है। फसल देखने जा रहे है। मैने सोचा कि शायद मैने गलत सुन लिया है। जब उसने वही बात दोहरायी तो विश्वास करना ही पडा। बाद मे खुलासा हुआ कि यहाँ जलधान की खेती होती है। डूबान क्षेत्र मे किसान सूखे खेतो मे धान छिडक देते है। पानी गिरता है तो उनके खेत डूबने लगते है। जैसे-जैसे जल का स्तर बढता है, धान के पौधे भी बढते जाते है और फिर फसल पकने पर नाव मे बैठकर कटाई होती है। यह सब सुनकर हमने नाश्ता करके आराम करने की बजाय किसानो के साथ इस अनोखे धान को देखने की योजना बनायी। कुछ ही देर मे हम भी डोंगी उठाने मे किसानो की मदद कर रहे थे। (क्रमश:)
(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)
© सर्वाधिकार सुरक्षित
- पंकज अवधिया
जहरीली पिचकारी चलाते कीडे, पौरुष शक्ति बढाने वाले अनोखे कन्द और बरसाती नाले
“अरे, पुल से पानी थोडा ही तो ऊपर है। गाडी आराम से निकल जायेगी। और फिर हम भी साथ है। पानी मे बही तो तुरंत सम्भाल लेंगे। देखिये न पीछे कितनी लम्बी कतार लग गयी है। अब आगे बढिए भी। हमारे दो सौ हमे दे दीजिये।“ सामने बरसाती नाला था जो लबालब भरा था। पुल दिख नही रहा था और फिर भी स्थानीय लोग हमारी गाडी को पार कराने अमादा थे। साथ चल रहे पारम्परिक चिकित्सको और सहायको ने हौसला दिया और मैने गाडी आगे बढा दी। आधा पुल तो पार हो गया पर उसके बाद गढ्ढे ही गढ्ढे थे। शायद पानी की तेज धार ने पुल को काट दिया था। ऐसे फँसे कि गाडी पूरा जोर लगाने के बाद भी टस से मस नही हुयी। फिर पानी का एक रेला आया और उसने गाडी को अपने साथ ले जाने की कोशिश की। सबने आखिरी जोर लगाने की कोशिश की और फिर ले देकर गाडी ने पुल पार कर लिया। हमारी जान मे जान आयी। मैने कान पकडे कि अब दोबारा ऐसा जोखिम नही उठायेंगे। इस जोखिम से एक लाभ हुआ। सामने हरा-भरा जंगल था जो हमारा ही इंतजार कर रहा था।
साथी जंगल मे बिखर गये और मै तस्वीरे लेने लगा। पारम्परिक चिकित्सक लौटे तो उनके हाथो मे चार प्रकार की जंगली हल्दी थी। जंगली हल्दी आजकल मुश्किल से मिलती है और फिर एक साथ चार प्रकारो का मिलना हमारे लिये शुभ संकेत था। हल्दी छोडकर पारम्परिक चिकित्सक फिर जंगल मे ओझल हो गये। मै अकेले ही निकल पडा। मुझे बहुत से कीट ऐसे दिखायी दिये जिन्हे मै पहली बार देख रहा था। मै उन्हे मित्र के रुप मे देख रहा था पर वे मुझे मित्र मानने को तैयार नही थे। उनमे से एक ने पिचकारी मारी और मै तेज धार से मुश्किल से बचा। यह पिचकारी जहरीले रसायन की थी। यह रसायन मेरी त्वचा को बुरी तरह से जला देता। पर मै बच गया। जब उसका जहर भरा पिटारा चुक गया तो मैने आराम से उसकी ढेरो तस्वीरे ली।
पिछले कुछ दिन बहुत तेजी से बीते। आपने इस लेखमाला मे पहले पढा है कि मै कृषि से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान पर शोध दस्तावेज तैयार कर रहा हूँ। मैने अगस्त मे प्रतिदिन 14 से 16 घंटे इसमे लगाने का मन बनाया था। जुलाई के अंत से ही यह काम शुरु हो गया था। अगस्त के प्रथम सप्ताह से ऐसी व्यस्तता बढी कि सारे काम किनारे हो गये। जंगल का भ्रमण रुक गया। जीवन-व्यापन के लिये सलाहकार का काम भी अटक गया। बस केवल दस्तावेजीकरण ही दस्तावेजीकरण। लम्बे समय तक कम्प्यूटर मे बैठना इस बार कुछ ज्यादा ही भारी लगा। जब पूरी तरह से थक गया तो जंगल की सुध ली। जंगल से लौटकर फिर काम मे लग गया। नियमित सलाह लेने वाले मेरे लगातार इंकार से कुछ चिंतित थे। मेरा सचिव उन्हे दिसम्बर के बाद का समय दे रहा था। धान मे कीट प्रबन्धन के पारम्परिक कृषि ज्ञान के आठ हजार दस्तावेज पूरे ही हुये थे कि मुम्बई से एक सज्जन का सन्देश आ गया।
उन्होने अपने फार्म हाउस मे औषधीय वनस्पतियाँ लगायी थी। वे मुझे अपना फार्म दिखाकर सलाह लेना चाहते थे। शुल्क देने को तैयार थे और मेरी यात्रा का व्यय भी। सचिव ने जब व्यस्तता बतायी तो उन्होने समय बचाने के लिये हवाई यात्रा का सुझाव दिया। मुझे इस बारे मे बताया गया। उनकी जिद पर मुझसे बात करवायी गयी। उन्होने जब हवाई यात्रा का खुलासा किया तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना नही रहा। उनके पास निजी विमान था और वे उसे भेजकर मुझे बुलवाना चाहते थे। निजी विमान से आने का निमंत्रण नया नही था पर फार्म हाउस देखने के लिये कोई शाही सवारी भेजे तो कुछ अचरज अवश्य होता है। घर-परिवार मे प्राइवेट जेट से बुलाये जाने की खबर फैली तो सबने कहा कि शान से जाओ। पर मेरा मन दस्तावेजीकरण मे उलझा हुआ था। काफी सोच-विचार करने के बाद सितम्बर मे इस शाही सवारी से जाने की योजना बनायी है। वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये उनसे आरम्भिक बातचीत हो गयी है। वे इस चर्चा से संतुष्ट है। इन सब गतिविधियो ने मुझे जंगल डायरी लेखन से एकदम अलग कर दिया है। कल सुबह फिर से जंगल की ओर जाना है। इसलिये आज रात मैने इस लेखमाला को आगे बढाने का निर्णय ले लिया है। यह लेखमाला रुक-रुक कर आगे बढेगी क्योकि आने वाले महिने व्यस्तता भरे है।
चलिये अब उस जंगल की ओर लौटे जहाँ तक हम बरसाती नाले को जैसे-तैसे पार कर पहुँचे थे। इस बार जब पारम्परिक चिकित्सक लौटे तो उनके हाथो मे कन्द थे। उन्होने कन्दो को धोया और फिर हमे खाने को दिया। कन्द बिल्कुल भी स्वादिष्ट नही थे। उनमे काफी चिपचिपापन था। इन्हे पौष्टिक़ बताया गया। सो हमने चाव से खाया। उसके बाद जब हम घर से लाया गया खाना खाने बैठे तो पारम्परिक चिकित्सको ने बडे अचरज वाली बात बतायी। उन्होने कहा कि ये कन्द शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढाते है। इसके अवयव शरीर मे रच बस जाते है। इतने ज्यादा कि कई दिनो तक वीर्य का स्वाद मीठा बना रहता है। यह तो बडी ही उबकाई लाने वाली बात लगी। हमारा ड्रायवर तो खाना आधा छोडकर उठ गया और पास की झाडी मे जाकर उल्टियाँ करने लगा। पारम्परिक चिकित्सको ने गलत समय पर इस खुलासे के लिये क्षमा माँगी। मुझे भी अटपटा लगा। पर उसी पल मुझे सन्दर्भ साहित्यो मे पढी गयी बाते याद आ गयी। साथ ही इंटरनेट मे विचरने वाले अनसुलझे प्रश्न याद आ गये।
चिकित्सा विज्ञान से जुडे सन्दर्भ साहित्य बताते है कि वीर्य का स्वाद मनुष्य के भोजन पर निर्भर करता है। कैफीन का अधिक सेवन करने वालो के वीर्य का स्वाद कडवा को जाता है। खाद्य सामग्रियाँ वीर्य का स्वाद चरपरा और तीखा भी बना देती है। आम लोगो को इन तथ्यो से कोई वास्ता भले न हो पर चिकित्सा विज्ञान के शोधकर्ताओ ने इस पर काफी अध्ययन किया है। मैने वीर्य को मीठा बनाने वाली वनस्पति के बारे मे विस्तार से पहली बार सुना था। मन मे यह जिज्ञासा जागी कि पारम्परिक चिकित्सको ने भला यह कैसे जाना?
आपने बाटेनिकल डाट काम पर मेरे शोध दस्तावेज पढे है तो आप जानते ही होंगे कि बहुत से पारम्परिक चिकित्सक औषधीय बीजो को बोने से पहले मानव वीर्य से उपचारित करते है। क्यो करते है? क्योकि यह उनकी परम्परा है। इसकी वैज्ञानिक व्याख्या शायद ही किसी ने की हो पर मैने प्रयोगशाला परिस्थितियो मे उनके इस परम्परागत प्रयोग को दोहरा कर उसके सकारात्मक प्रभाव का अध्ययन किया है। पारम्परिक चिकित्सको ने देखा कि जब वे विशेष कन्द मूलो को खाने के बाद वीर्य का प्रयोग बीजोपचार के लिये करते है तो उनमे चीटी जैसे बहुत से कीट टूट पडते है। इससे उन्होने इस बात की पुष्टि की कि विशेष कन्द मूलो का सेवन वीर्य को मीठा बना दे रहा है। मै अचरज भरे मन से पारम्परिक चिकित्सको की बाते सुन रहा था और उनके गहरे ज्ञान से अभिभूत हो रहा था।
भोजन के बाद हमने आगे की राह पकडी। कुछ दूर गये ही थे कि एक और बरसाती नाला सामने था। उसे पार करवाने वाला कोई नही था। बडी गाडियाँ अपने जोखिम पर निकल रही थी। हमने वापसी की राह पकडी। वापस गये तो पहले वाले नाले मे पानी का स्तर बढ चुका था। शायद ऊपरी भाग मे वर्षा हुयी थी जिसके कारण यह जल स्तर बढा था। हम फँस गये। शाम होने लगी। मोबाइल महाश्य टावर खोज-खोज कर थक चुके थे। देर रात तक वहाँ रुकना था। शाम तक जंगल मे घूमते रहे और फिर रात होते ही गाडी के पास आ गये। आग जलायी और फिर पानी के उतरने का इंतजार करने लगे। खाना हमारे पास नही था। वे ही कन्द थे जिन्हे हमे खाना था।
बाते चलती रही। मै बीच-बीच मे अपनी जंगल टार्च से आस-पास देख लेता था कि कही कोई जंगली जानवार भी जडी-बूटियो की बात सुनने न आ गया हो। कुछ आँखे चमकती थी पर पारम्परिक चिकित्सक बिना विलम्ब उन्हे छोटे जानवर की आँखे कह देते थे। करीब दस बजे मैने पानी का स्तर देखने के लिये रोशनी उस ओर फेंकी तो सडक पर पडे लम्बे साँप ने ध्यान खीचा। कोबरा जैसा ही था पर उससे बहुत अधिक लम्बा। वह अपनी मस्ती मे चला जा रहा था। मै नही डरा पर पारम्परिक चिकित्सको ने कहा कि डरो क्योकि यह अहिराज है यानि किंग कोबरा। यह हमे नुकसान नही पहुँचायेगा पर चूँकि यह साँपो का राजा है इसलिये हमे इसका सम्मान करना चाहिये। इससे डरना चाहिये। किंग कोबरा को देखकर मै धन्य हुआ। ऐसा मंत्रमुग्ध हुआ कि तस्वीर लेना ही भूल गया।
रात दो के आस-पास कुछ ट्रके उस ओर दिखायी दी। एक वैन भी थी। जल स्तर कम होने लगा था। ट्रक निकली और फिर वैन। उसके बाद हमने भी हिम्मत दिखायी और पुल पार कर लिया। बरसाती दिनो मे इतनी देर रात जंगल से गुजरना बडा ही रोमांचक अनुभव रहा। इस बीच मोबाइल ने टावर खोज लिया। घर पर बात हुयी और सारी चिंताए दूर हुयी। रात को लगातार चलने की बजाय हमने सुबह पाँच बजे एक गाँव मे रुकने की योजना बनायी। चाय की तलब लग रही थी। एक टपरेनुमा होटल के मालिक को जगाया और उससे आलू-पोहा और लाल चाय बनाने को कहा। वह भला आदमी था। उसने तैयारी शुरु कर दी।
बाते चलती रही। गाँव जागने लगा। तभी हमने बाहर डोंगी उठाये कुछ लोगो को जाते देखा। मछुआरे होंगे, मैने कयास लगाया। होटल वाले ने कहा कि नही किसान है। फसल देखने जा रहे है। मैने सोचा कि शायद मैने गलत सुन लिया है। जब उसने वही बात दोहरायी तो विश्वास करना ही पडा। बाद मे खुलासा हुआ कि यहाँ जलधान की खेती होती है। डूबान क्षेत्र मे किसान सूखे खेतो मे धान छिडक देते है। पानी गिरता है तो उनके खेत डूबने लगते है। जैसे-जैसे जल का स्तर बढता है, धान के पौधे भी बढते जाते है और फिर फसल पकने पर नाव मे बैठकर कटाई होती है। यह सब सुनकर हमने नाश्ता करके आराम करने की बजाय किसानो के साथ इस अनोखे धान को देखने की योजना बनायी। कुछ ही देर मे हम भी डोंगी उठाने मे किसानो की मदद कर रहे थे। (क्रमश:)
(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)
© सर्वाधिकार सुरक्षित
Monday, August 3, 2009
दस्तावेजीकरण की राह तकता भारतीय कृषि से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान
मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-61
- पंकज अवधिया
दस्तावेजीकरण की राह तकता भारतीय कृषि से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान
रात गहरा रही थी। एक स्थान पर आग जलाकर हम लोग खुले मे बैठे थे। आस-पास कुछ दूरी तक खेत थे और फिर उसके बाद जंगल शुरु होते थे। रात उन बुजुर्ग किसानो के साथ गुजारनी थी जो जंगली सुअरो से अपनी फसल की रक्षा के लिये खेतो पर पहरा दे रहे थे। हमारी गाडी पास ही खडी थी। गाडी मे सोने की बजाय मैने मचान पर बैठना उचित समझा। फिर जब नीचे आग जल गयी तो हम सब नीचे आकर बैठ गये। बुजुर्ग किसानो से पारम्परिक कृषि की बात होने लगी। उन दिनो की बात जब कृषि जंगलो पर निर्भर थी। बुजुर्ग किसान तब पारम्परिक धान की खेती करते थे। इनमे से बहुत से औषधीय धान भी थे। औषधीय धान पास के नगर मे रहने वाले राज परिवार के लिये उगाया जाता था। राजा के पारम्परिक चिकित्सक यानि राजवैद्य अपनी निगरानी मे इन्हे उगवाते और फिर शाही गाडियो मे लदवाकर नगर ले जाते। उस समय औषधीय धान की खेती किसान और पारम्परिक चिकित्सक मिलकर करते थे।
कृषि की शुरुआत से लेकर फसल की कटाई तक जंगल से एकत्र की गयी वनस्पतियाँ अहम भूमिका निभाती थी। पारम्परिक चिकित्सक जंगल से इन वनस्पतियो को लाते और उनके सत्व तैयार किये जाते। इन सत्वो से जमीन को सींचा जाता। उसके बाद बीजो को उपचारित किया जाता और फिर पूरी फसल के दौरान कई बार इसका छिडकाव किया जाता। यह कृषि उस समय दूसरे किसानो द्वारा की जा रही खेती से एकदम भिन्न थी। बुजुर्ग किसान बताते है कि इस कृषि से उपज कम होती थी पर गुणवत्ता विशेषकर औषधीय गुण चरम पर होते थे। राज परिवार इन्हे नियमित भोजन मे प्रयोग करता था। दूर देश से आने वाले मित्रो और मेहमानो को भी इसे बतौर उपहार दिया जाता था।
मैने बुजुर्गो किसानो से कृषि मे उपयोग होने वाली वनस्पतियो के विषय मे पूछना शुरु किया तो उन्होने दसो वनस्पतियो के नाम बताये। यह भी बताया कि कब उन्हे एकत्र करना है और कैसे सत्व बनाना है? उन्होने कहा कि बहुत सी वनस्पतियाँ अब जंगल मे खोजे नही मिलती है। जडी-बूटियो के व्यापारियो ने जंगल के जंगल साफ कर दिये है। राज परिवार को धान देने से पहले कुछ मात्रा मे वे इसे अपने परिवार के लिये भी रख लेते थे। बुजुर्ग किसान अपने मजबूत काले बालो और अपनी अच्छी सेहत का राज उस समय खाये गये औषधीय धान को देते है और फिर आहे भरकर कहते है कि काश, हमे अभी भी वैसा ही अन्न खाने को मिलता तो परिजन बार-बार बीमार नही पडते। आज बुजुर्ग किसानो के पास पडा यह पारम्परिक ज्ञान रुपी खजाना उनके किसी काम का नही है। वे अब इसे भूलते जा रहे है। कभी ही इसकी चर्चा की जाती है। जब मैने इसमे रुचि दिखायी तो सारी रात वे बिना थके इसके विषय मे बताते रहे।
जब मैने युवा किसानो के साथ औषधीय और सगन्ध फसलो की व्यवसायिक खेती आरम्भ की तो यह पारम्परिक ज्ञान मेरे बहुत काम आया। कृषि से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान (Traditional Agricultural Knowedge) के दस्तावेजीकरण के लिये हमारे देश मे पानी की तरह पैसे बहाये गये। गुजरात से लेकर मध्य प्रदेश तक की संस्थाओ ने अरबो हजम किये पर सही मायने मे किसी ने दस्तावेजीकरण नही किया। जमीन पर अधिक समय बिताने की बजाय महानगरो मे महंगे सम्मेलन आयोजित करने मे सारे पैसे लगा दिये गये। इसका यह दुष्परिणाम हुआ कि बहुत सा पारम्परिक ज्ञान बुजुर्ग किसानो के साथ समाप्त हो गया। कृषि की शिक्षा के दौरान मैने इस ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे बहुत रुचि ली पर इस ज्ञान को कहाँ और कैसे संरक्षित करुँ, यह किसी ने नही बताया। अपने गुरुजनो को इस विषय मे बताया तो उन्होने बिना विलम्ब इस ज्ञान को अपना बताकर शोध-पत्र प्रकाशित करवा लिये। किसी ने गुजरात की एक संस्था से सम्पर्क करने को कहा पर जब मैने वहाँ जनता की गाढी कमायी का खुल्लमखुल्ला दुरुपयोग देखा तो मन नही हुआ कि दस्तावेज उन्हे सौपूँ। सारा ज्ञान मेरे पास सुरक्षित रखा रहा। पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान पर अधिक ध्यान देने के कारण मै इस पर कार्य को आगे नही बढा पाया।
कुछ दिनो पहले गुजरात की उसी संस्था की वेबसाइट पर यह जानकारी पढी कि उन्होने 90,000 से अधिक पारम्परिक तकनीको के विषय मे जानकारी एकत्र की है तो मुझे लगा कि अपने पास संरक्षित ज्ञान को मै भी दस्तावेज की तरह प्रस्तुत करुँ। जब मैने पारम्परिक तकनीको को सूचीबद्ध करना शुरु किया तो केवल कीट नियंत्रण की पारम्परिक कृषि तकनीक ही संख्या मे डेढ लाख से अधिक निकली। मुझे पता नही कि उस संस्था ने इतनी तकनीको की जानकारियाँ जुटाने के लिये कितने करोड फूँके पर मै अपने बारे मे यह कह सकता हूँ कि मैने जो भी खर्चा अपनी जेब से खर्चा। अब मै इस ज्ञान को मूल रुप मे सीजीबीडी डेटाबेस के माध्यम से दस्तावेज के रुप मे प्रकाशित करने की योजना बना रहा हूँ।
अपनी हाल की जंगल यात्रा के दौरान जब भी मैने ऐसे किसानो को ढूढने की कोशिश की जो कि पूरी तरह से पारम्परिक कृषि को अपना रहे है तो मुझे असफलता ही हाथ लगी। छोटे से छोटा किसान भी बिना यूरिया के फसल नही उगा रहा है। पारम्परिक कृषि पारम्परिक चिकित्सको के पास कुछ हद तक बची हुयी है। वह भी कितने दिनो तक इसे बचा पायेंगे, कहा नही जा सकता है। अपनी कृषि की शिक्षा के दौरान मै ऐसे संस्थान या विभाग की परिकल्प्ना किया करता था जो छात्रो को देश की पारम्परिक कृषि के विषय मे बताता। छात्र अपने नये विचारो से इस कृषि के ज्ञान को समृद्ध करते और फिर नयी पीढी की खेती के लिये उसका प्रयोग होता। आज हमारे देश मे तो सरकारी कृषि संस्थान विदेशी एजेंडे पर काम कर रहे है। सारे शोध कार्य विदेशो मे प्रस्तुत किये जा रहे है और हमारे किसान आत्महत्या कर रहे है। मुझे नही लगता कि वे पारम्परिक कृषि ज्ञान की कभी सुध लेंगे। हाँ, विदेशो मे बैठे उनके आका यदि उनसे ऐसा करने को कहेंगे और इसके लिये फंड देंगे तो वे डेढ टाँग से तैयार हो जायेंगे। ऐसे मे निजी प्रयास ही कुछ राहत पहुँचा सकते है पर निजी प्रयास करने वालो को धन और सम्मान की लालसा त्यागनी होगी। मैने इस दिशा मे प्रयास आरम्भ किये है, उम्मीद है और लोग भी जुडेंगे। (क्रमश:)
(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)
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- पंकज अवधिया
दस्तावेजीकरण की राह तकता भारतीय कृषि से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान
रात गहरा रही थी। एक स्थान पर आग जलाकर हम लोग खुले मे बैठे थे। आस-पास कुछ दूरी तक खेत थे और फिर उसके बाद जंगल शुरु होते थे। रात उन बुजुर्ग किसानो के साथ गुजारनी थी जो जंगली सुअरो से अपनी फसल की रक्षा के लिये खेतो पर पहरा दे रहे थे। हमारी गाडी पास ही खडी थी। गाडी मे सोने की बजाय मैने मचान पर बैठना उचित समझा। फिर जब नीचे आग जल गयी तो हम सब नीचे आकर बैठ गये। बुजुर्ग किसानो से पारम्परिक कृषि की बात होने लगी। उन दिनो की बात जब कृषि जंगलो पर निर्भर थी। बुजुर्ग किसान तब पारम्परिक धान की खेती करते थे। इनमे से बहुत से औषधीय धान भी थे। औषधीय धान पास के नगर मे रहने वाले राज परिवार के लिये उगाया जाता था। राजा के पारम्परिक चिकित्सक यानि राजवैद्य अपनी निगरानी मे इन्हे उगवाते और फिर शाही गाडियो मे लदवाकर नगर ले जाते। उस समय औषधीय धान की खेती किसान और पारम्परिक चिकित्सक मिलकर करते थे।
कृषि की शुरुआत से लेकर फसल की कटाई तक जंगल से एकत्र की गयी वनस्पतियाँ अहम भूमिका निभाती थी। पारम्परिक चिकित्सक जंगल से इन वनस्पतियो को लाते और उनके सत्व तैयार किये जाते। इन सत्वो से जमीन को सींचा जाता। उसके बाद बीजो को उपचारित किया जाता और फिर पूरी फसल के दौरान कई बार इसका छिडकाव किया जाता। यह कृषि उस समय दूसरे किसानो द्वारा की जा रही खेती से एकदम भिन्न थी। बुजुर्ग किसान बताते है कि इस कृषि से उपज कम होती थी पर गुणवत्ता विशेषकर औषधीय गुण चरम पर होते थे। राज परिवार इन्हे नियमित भोजन मे प्रयोग करता था। दूर देश से आने वाले मित्रो और मेहमानो को भी इसे बतौर उपहार दिया जाता था।
मैने बुजुर्गो किसानो से कृषि मे उपयोग होने वाली वनस्पतियो के विषय मे पूछना शुरु किया तो उन्होने दसो वनस्पतियो के नाम बताये। यह भी बताया कि कब उन्हे एकत्र करना है और कैसे सत्व बनाना है? उन्होने कहा कि बहुत सी वनस्पतियाँ अब जंगल मे खोजे नही मिलती है। जडी-बूटियो के व्यापारियो ने जंगल के जंगल साफ कर दिये है। राज परिवार को धान देने से पहले कुछ मात्रा मे वे इसे अपने परिवार के लिये भी रख लेते थे। बुजुर्ग किसान अपने मजबूत काले बालो और अपनी अच्छी सेहत का राज उस समय खाये गये औषधीय धान को देते है और फिर आहे भरकर कहते है कि काश, हमे अभी भी वैसा ही अन्न खाने को मिलता तो परिजन बार-बार बीमार नही पडते। आज बुजुर्ग किसानो के पास पडा यह पारम्परिक ज्ञान रुपी खजाना उनके किसी काम का नही है। वे अब इसे भूलते जा रहे है। कभी ही इसकी चर्चा की जाती है। जब मैने इसमे रुचि दिखायी तो सारी रात वे बिना थके इसके विषय मे बताते रहे।
जब मैने युवा किसानो के साथ औषधीय और सगन्ध फसलो की व्यवसायिक खेती आरम्भ की तो यह पारम्परिक ज्ञान मेरे बहुत काम आया। कृषि से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान (Traditional Agricultural Knowedge) के दस्तावेजीकरण के लिये हमारे देश मे पानी की तरह पैसे बहाये गये। गुजरात से लेकर मध्य प्रदेश तक की संस्थाओ ने अरबो हजम किये पर सही मायने मे किसी ने दस्तावेजीकरण नही किया। जमीन पर अधिक समय बिताने की बजाय महानगरो मे महंगे सम्मेलन आयोजित करने मे सारे पैसे लगा दिये गये। इसका यह दुष्परिणाम हुआ कि बहुत सा पारम्परिक ज्ञान बुजुर्ग किसानो के साथ समाप्त हो गया। कृषि की शिक्षा के दौरान मैने इस ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे बहुत रुचि ली पर इस ज्ञान को कहाँ और कैसे संरक्षित करुँ, यह किसी ने नही बताया। अपने गुरुजनो को इस विषय मे बताया तो उन्होने बिना विलम्ब इस ज्ञान को अपना बताकर शोध-पत्र प्रकाशित करवा लिये। किसी ने गुजरात की एक संस्था से सम्पर्क करने को कहा पर जब मैने वहाँ जनता की गाढी कमायी का खुल्लमखुल्ला दुरुपयोग देखा तो मन नही हुआ कि दस्तावेज उन्हे सौपूँ। सारा ज्ञान मेरे पास सुरक्षित रखा रहा। पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान पर अधिक ध्यान देने के कारण मै इस पर कार्य को आगे नही बढा पाया।
कुछ दिनो पहले गुजरात की उसी संस्था की वेबसाइट पर यह जानकारी पढी कि उन्होने 90,000 से अधिक पारम्परिक तकनीको के विषय मे जानकारी एकत्र की है तो मुझे लगा कि अपने पास संरक्षित ज्ञान को मै भी दस्तावेज की तरह प्रस्तुत करुँ। जब मैने पारम्परिक तकनीको को सूचीबद्ध करना शुरु किया तो केवल कीट नियंत्रण की पारम्परिक कृषि तकनीक ही संख्या मे डेढ लाख से अधिक निकली। मुझे पता नही कि उस संस्था ने इतनी तकनीको की जानकारियाँ जुटाने के लिये कितने करोड फूँके पर मै अपने बारे मे यह कह सकता हूँ कि मैने जो भी खर्चा अपनी जेब से खर्चा। अब मै इस ज्ञान को मूल रुप मे सीजीबीडी डेटाबेस के माध्यम से दस्तावेज के रुप मे प्रकाशित करने की योजना बना रहा हूँ।
अपनी हाल की जंगल यात्रा के दौरान जब भी मैने ऐसे किसानो को ढूढने की कोशिश की जो कि पूरी तरह से पारम्परिक कृषि को अपना रहे है तो मुझे असफलता ही हाथ लगी। छोटे से छोटा किसान भी बिना यूरिया के फसल नही उगा रहा है। पारम्परिक कृषि पारम्परिक चिकित्सको के पास कुछ हद तक बची हुयी है। वह भी कितने दिनो तक इसे बचा पायेंगे, कहा नही जा सकता है। अपनी कृषि की शिक्षा के दौरान मै ऐसे संस्थान या विभाग की परिकल्प्ना किया करता था जो छात्रो को देश की पारम्परिक कृषि के विषय मे बताता। छात्र अपने नये विचारो से इस कृषि के ज्ञान को समृद्ध करते और फिर नयी पीढी की खेती के लिये उसका प्रयोग होता। आज हमारे देश मे तो सरकारी कृषि संस्थान विदेशी एजेंडे पर काम कर रहे है। सारे शोध कार्य विदेशो मे प्रस्तुत किये जा रहे है और हमारे किसान आत्महत्या कर रहे है। मुझे नही लगता कि वे पारम्परिक कृषि ज्ञान की कभी सुध लेंगे। हाँ, विदेशो मे बैठे उनके आका यदि उनसे ऐसा करने को कहेंगे और इसके लिये फंड देंगे तो वे डेढ टाँग से तैयार हो जायेंगे। ऐसे मे निजी प्रयास ही कुछ राहत पहुँचा सकते है पर निजी प्रयास करने वालो को धन और सम्मान की लालसा त्यागनी होगी। मैने इस दिशा मे प्रयास आरम्भ किये है, उम्मीद है और लोग भी जुडेंगे। (क्रमश:)
(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)
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रोगो को हरने वाली राखियाँ बन्धवाये इस रक्षाबन्धन मे
मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-60
- पंकज अवधिया
रोगो को हरने वाली राखियाँ बन्धवाये इस रक्षाबन्धन मे
पारम्परिक चिकित्सको के साथ इस जंगल यात्रा के दौरान जब एक गाँव मे एक और जानकार को साथ लेने के लिये रुके तो पता चला कि वे बीमार है। तेज ज्वर से तडप रहे है। दवाए उन्हे दी जा रही थी पर फिर भी ज्वर कम नही हो रहा था। वे लगभग बेसुध थे और ज्वर बढने पर प्रलाप भी करते थे। साथ चल रहे पारम्परिक चिकित्सको ने खेतो का रुख किया। क्लिंग नामक एक खरप्तवार को चुना और फिर उसकी जडे खोदने लगे। ताजी जड को नीले धागे मे पिरोया और फिर उसे रोगी की कलाई मे बाँध दिया। मुझे बताया गया कि अब ज्वर कम होने लगेगा। रोगी के परिजनो को हिदायत दी गयी कि जैसे जी ज्वर कम हो नीले धागे की सहायता से बन्धी जड कलाई से निकाल ले और फिर नीले की जगह लाल धागा बाँध दे। जब ज्वर पूरी तरह से चला जाय तो काले धागे का प्रयोग करे। ज्वर उतरने के चौबीस घंटो के बाद इस जड को या तो पास की नदी मे प्रवाहित कर दे या पुराने पीपल के नीचे गाड दे। इन तमाम निर्देशो के बाद हमने आगे की राह पकडी। शाम को जब लौटे तो रोगी की हालत काफी सुधरी हुयी थी। गाँव के बहुत से लोग जमा थे। वे पारम्परिक चिकित्सको का ही इंतजार कर रहे थे। बहुत से किसानो ने बताया कि क्लिंग को वे कचरे के रुप मे देखते आये है। पहली बार उन्होने इसके जीवनदायिनी गुणो के बारे मे जाना है।
मुझे याद आता है टीबी का एक रोगी जिसे आधुनिक चिकित्सको ने साफ कह दिया था कि अब बचने की कोई उम्मीद नही है। वह रोगी घर के एक कोने ने पडा रहता था। कोई उसके पास नही जाता था। वह मौत का इंतजार कर रहा था और मौत थी कि आती ही नही थी। पारम्परिक चिकित्सको को जब यह पता चला तो वे भाग कर आ गये। वे अंतिम समय तक प्रयास करते रहते है। वे कभी भी हथियार नही डालते। आधुनिक चिकित्सा के महारथियो को भी पारम्परिक चिकित्सको की यह जीवटता भाती है इसलिये भले ही वे अपने रोगियो को मुम्बई, दिल्ली भेजे पर जब उनके परिवार मे संकट आता है तो पारम्परिक चिकित्सको का रुख करते है। टीबी के उस रोगी को पारम्परिक चिकित्सको ने मछलियो और वनस्पतियो की सहायता से फिर से चंगा कर दिया। पर लम्बे संघर्ष ने रोगी की जीवनी शक्ति को कम कर दिया था। पारम्परिक चिकित्सको ने उसे अनोखा उपाय बताया।
अपने साथ जंगल ले जाकर उन्होने ग्यारह तरह की जडो की पहचान करवायी। रोगी को रोज मुँह अन्धेरे जंगल जाना होता। वह विशेष जड एकत्र करता और फिर दिन भर उसे काले धागे की सहायता से कलाई मे बाँधे रहता। दूसरे दिन दूसरी जड का इसी तरह प्रयोग करता। ग्यारह दिनो तक ग्यारह अलग-अलग जडो के अनोखे प्रयोग से उसे लाभ हुआ। पारम्परिक चिकित्सको का कहना था कि वैसे ही रोगी ने इतनी अधिक औषधीयो का सेवन कर लिया है इसलिये और अधिक औषधीयो के सेवन की बजाय यह जरुरी है कि ऐसे अनोखे उपाय अपनाये जाये। यहाँ एक बात स्पष्ट करना चाहूँगा कि अलग-अलग रंगो के धागो के प्रयोग के पीछे वैज्ञानिक कारण है। अपने शोध दस्तावेजो मे मैने इस विषय़ मे विस्तार से लिखा है। यदि आप जानना चाहे तो उन आलेखो को पढे।
मेरे मित्र मुझे आमतौर पर विवाह के दिन आमंत्रित करने की बजाय विवाह के पाँच दिन पहले आमंत्रित करना पसन्द करते है। वे एडी-चोटी का जोर लगा देते है। मुझे जाना ही होता है। पर मै खाली हाथ तो जा नही सकता। मेरे पास नीले धागो मे गुथी ताजी जड होती है। इस जड को सलीके से वर की कलाई मे बाँध देता हूँ। अब पाँच दिनो तक वर को इसे पहने रहना होता है। ज्यादातर मित्र समझते है कि इसके प्रयोग से उनकी कामशक्ति बढेगी। बहुत से मित्र तो ऐसा दावा भी करते है पर यह अधूरा सच है। मुझे पारम्परिक चिकित्सको से इस अनूठे प्रयोग का पता चला। वे जब भी किसी बीमार पडने वाले व्यक्ति से मिलते है तो इस जड को बिना विलम्ब कलाई मे बाँध देते है। इससे शरीर का बिगडा हुआ संतुलन सही रुप मे आ जाता है और व्यक्ति बीमार पडने से बच जाता है। ऐसी जडो को पारम्परिक चिकित्सक विवाह समरोहो मे भी प्रयोग करते है। वे वर और वधू दोनो के लिये जडो का प्रयोग सुझाते है। उनका कहना है कि वर-वधू के लिये ये दिन बहुत महत्वपूर्ण है। ये जरुरी है कि इन दिनो मे वे प्रसन्न रहे और रोगो से बचे रहे। यह पारम्परिक ज्ञान कारगर है और बहुत अधिक उपयोगी है। आज के समय मे इसका और भी अधिक महत्व है। मैने स्वाइन फ्लू के लिये जो उपाय सुझाये थे उनमे जडो का ऐसा अनूठा प्रयोग भी शामिल था।
अपने वर्षो के अनुभव से मैने जडो और दूसरे वानस्पतिक भागो के हजारो प्रयोगो के विषय मे जानकारियाँ एकत्र की है। बहुत से ऐसे प्रयोगो को आधुनिक विज्ञान की कसौटी मे भी कसा गया है। भारत ही नही बल्कि दुनिया के दूसरे भागो मे भी पारम्परिक चिकित्सक ऐसे प्रयोग सदियो से करते आ रहे है। मै इन प्रयोगो को नयी पीढी के बीच लोकप्रिय करना चाहता हूँ ताकि वे स्वस्थ रह सके। मै इस पारम्परिक ज्ञान के उपयोग से ऐसी राखियाँ बनाने के पक्ष मे हूँ जो भाईयो को रोगो से और आज की दुनिया के मानसिक तनावो से मुक्त रख सके। देश भर मे पारम्परिक चिकित्सको के मार्गदर्शन मे ऐसी राखियाँ बने और भाईयो की कलाईयो मे सजे।
इस वर्ष के रक्षाबन्धन मे तो ऐसी राखियो की उम्मीद करना सही नही है पर मुझे विश्वास है कि आने वाले वर्षो मे इस ओर आम लोगो का ध्यान जायेगा। मै आपको आश्वस्त करना चाहता हूँ कि हर वर्ष जिस तरह पारम्परिक चिकित्सक और दूसरे लोग रक्षाबन्धन के दिन मेरे पास आते है वैसे ही आप आयेंगे तो ऐसे रक्षाबन्धनो से आपका भी स्वागत किया जायेगा। हम इस परम्परा को वर्ष मे कई बार अपनाते है और लाभांवित होते है।
ज्यादातर पारम्परिक चिकित्सक जनहित मे इस पारम्परिक ज्ञान को सार्वजनिक करने के पक्ष मे है पर वे इसके गलत व्यवसायिक उपयोग के भय से भी प्रभावित है। उन्होने “रुद्राक्ष माफिया” को फलते-फूलते और उनके हाथो गरीबो को लुटते देखा है। उन्होने यह भी देखा है कि प्राचीन भारतीय योग कैसे कुछ लोगो की बपौती बन गया है और कैसे इस पारम्परिक ज्ञान से छदम बाबा लोग अरबो कमा रहे है। उन्हे लगता है कि पारम्परिक ज्ञान को सार्वजनिक करते ही कही चैनल वाले बाबाओ की गिद्ध दृष्टि उन पर न गड जाये। उनका डर गलत नही है। मै अपने लेखो मे बार-बार लिखता हूँ कि जब आयुर्वेद पर हर भारतीय का बराबर हक है तो क्यो कुछ कम्पनियाँ और बाबा इस पर अपना वर्चस्व कायम किये हुये है? आयुर्वेद से देश को खरबो की आमदनी होती है और दुनिया भर मे इसका बाजार है तो फिर भारतीयो को इसका लाभ मुफ्त मे मिलना चाहिये। ठीक उसी तरह जैसे पेट्रोल से कमाने वाले अरब देश अपने नागरिको को हिस्सा देते है। क्यो भारतीय पारम्परिक ज्ञान से बने शीतोप्लादि और मधुमेहहर चूर्ण जैसे उत्पाद मनमानी कीमत पर बिकते है जबकि वे हमारे ही जंगल से हमारे ही पारम्परिक ज्ञान के आधार पर बने है। किसने चन्द लोगो को इससे लाभ कमाने का आधिकार दिया है? इस पर खुलकर चर्चा होनी चाहिये।
कल की जंगल यात्रा मुझे राखियो के लिये करनी पडेगी। इस बार जो मित्र और परिजन आने वाले है वे ऐसी रखियाँ चाहते है जो उन्हे कम से कम एक दिन मानसिक तनाव से दूर रख सके और चैन की नीन्द सुला सके। उन्हे निराश करने का मेरा मन बिल्कुल नही है। (क्रमश:)
(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)
© सर्वाधिकार सुरक्षित
- पंकज अवधिया
रोगो को हरने वाली राखियाँ बन्धवाये इस रक्षाबन्धन मे
पारम्परिक चिकित्सको के साथ इस जंगल यात्रा के दौरान जब एक गाँव मे एक और जानकार को साथ लेने के लिये रुके तो पता चला कि वे बीमार है। तेज ज्वर से तडप रहे है। दवाए उन्हे दी जा रही थी पर फिर भी ज्वर कम नही हो रहा था। वे लगभग बेसुध थे और ज्वर बढने पर प्रलाप भी करते थे। साथ चल रहे पारम्परिक चिकित्सको ने खेतो का रुख किया। क्लिंग नामक एक खरप्तवार को चुना और फिर उसकी जडे खोदने लगे। ताजी जड को नीले धागे मे पिरोया और फिर उसे रोगी की कलाई मे बाँध दिया। मुझे बताया गया कि अब ज्वर कम होने लगेगा। रोगी के परिजनो को हिदायत दी गयी कि जैसे जी ज्वर कम हो नीले धागे की सहायता से बन्धी जड कलाई से निकाल ले और फिर नीले की जगह लाल धागा बाँध दे। जब ज्वर पूरी तरह से चला जाय तो काले धागे का प्रयोग करे। ज्वर उतरने के चौबीस घंटो के बाद इस जड को या तो पास की नदी मे प्रवाहित कर दे या पुराने पीपल के नीचे गाड दे। इन तमाम निर्देशो के बाद हमने आगे की राह पकडी। शाम को जब लौटे तो रोगी की हालत काफी सुधरी हुयी थी। गाँव के बहुत से लोग जमा थे। वे पारम्परिक चिकित्सको का ही इंतजार कर रहे थे। बहुत से किसानो ने बताया कि क्लिंग को वे कचरे के रुप मे देखते आये है। पहली बार उन्होने इसके जीवनदायिनी गुणो के बारे मे जाना है।
मुझे याद आता है टीबी का एक रोगी जिसे आधुनिक चिकित्सको ने साफ कह दिया था कि अब बचने की कोई उम्मीद नही है। वह रोगी घर के एक कोने ने पडा रहता था। कोई उसके पास नही जाता था। वह मौत का इंतजार कर रहा था और मौत थी कि आती ही नही थी। पारम्परिक चिकित्सको को जब यह पता चला तो वे भाग कर आ गये। वे अंतिम समय तक प्रयास करते रहते है। वे कभी भी हथियार नही डालते। आधुनिक चिकित्सा के महारथियो को भी पारम्परिक चिकित्सको की यह जीवटता भाती है इसलिये भले ही वे अपने रोगियो को मुम्बई, दिल्ली भेजे पर जब उनके परिवार मे संकट आता है तो पारम्परिक चिकित्सको का रुख करते है। टीबी के उस रोगी को पारम्परिक चिकित्सको ने मछलियो और वनस्पतियो की सहायता से फिर से चंगा कर दिया। पर लम्बे संघर्ष ने रोगी की जीवनी शक्ति को कम कर दिया था। पारम्परिक चिकित्सको ने उसे अनोखा उपाय बताया।
अपने साथ जंगल ले जाकर उन्होने ग्यारह तरह की जडो की पहचान करवायी। रोगी को रोज मुँह अन्धेरे जंगल जाना होता। वह विशेष जड एकत्र करता और फिर दिन भर उसे काले धागे की सहायता से कलाई मे बाँधे रहता। दूसरे दिन दूसरी जड का इसी तरह प्रयोग करता। ग्यारह दिनो तक ग्यारह अलग-अलग जडो के अनोखे प्रयोग से उसे लाभ हुआ। पारम्परिक चिकित्सको का कहना था कि वैसे ही रोगी ने इतनी अधिक औषधीयो का सेवन कर लिया है इसलिये और अधिक औषधीयो के सेवन की बजाय यह जरुरी है कि ऐसे अनोखे उपाय अपनाये जाये। यहाँ एक बात स्पष्ट करना चाहूँगा कि अलग-अलग रंगो के धागो के प्रयोग के पीछे वैज्ञानिक कारण है। अपने शोध दस्तावेजो मे मैने इस विषय़ मे विस्तार से लिखा है। यदि आप जानना चाहे तो उन आलेखो को पढे।
मेरे मित्र मुझे आमतौर पर विवाह के दिन आमंत्रित करने की बजाय विवाह के पाँच दिन पहले आमंत्रित करना पसन्द करते है। वे एडी-चोटी का जोर लगा देते है। मुझे जाना ही होता है। पर मै खाली हाथ तो जा नही सकता। मेरे पास नीले धागो मे गुथी ताजी जड होती है। इस जड को सलीके से वर की कलाई मे बाँध देता हूँ। अब पाँच दिनो तक वर को इसे पहने रहना होता है। ज्यादातर मित्र समझते है कि इसके प्रयोग से उनकी कामशक्ति बढेगी। बहुत से मित्र तो ऐसा दावा भी करते है पर यह अधूरा सच है। मुझे पारम्परिक चिकित्सको से इस अनूठे प्रयोग का पता चला। वे जब भी किसी बीमार पडने वाले व्यक्ति से मिलते है तो इस जड को बिना विलम्ब कलाई मे बाँध देते है। इससे शरीर का बिगडा हुआ संतुलन सही रुप मे आ जाता है और व्यक्ति बीमार पडने से बच जाता है। ऐसी जडो को पारम्परिक चिकित्सक विवाह समरोहो मे भी प्रयोग करते है। वे वर और वधू दोनो के लिये जडो का प्रयोग सुझाते है। उनका कहना है कि वर-वधू के लिये ये दिन बहुत महत्वपूर्ण है। ये जरुरी है कि इन दिनो मे वे प्रसन्न रहे और रोगो से बचे रहे। यह पारम्परिक ज्ञान कारगर है और बहुत अधिक उपयोगी है। आज के समय मे इसका और भी अधिक महत्व है। मैने स्वाइन फ्लू के लिये जो उपाय सुझाये थे उनमे जडो का ऐसा अनूठा प्रयोग भी शामिल था।
अपने वर्षो के अनुभव से मैने जडो और दूसरे वानस्पतिक भागो के हजारो प्रयोगो के विषय मे जानकारियाँ एकत्र की है। बहुत से ऐसे प्रयोगो को आधुनिक विज्ञान की कसौटी मे भी कसा गया है। भारत ही नही बल्कि दुनिया के दूसरे भागो मे भी पारम्परिक चिकित्सक ऐसे प्रयोग सदियो से करते आ रहे है। मै इन प्रयोगो को नयी पीढी के बीच लोकप्रिय करना चाहता हूँ ताकि वे स्वस्थ रह सके। मै इस पारम्परिक ज्ञान के उपयोग से ऐसी राखियाँ बनाने के पक्ष मे हूँ जो भाईयो को रोगो से और आज की दुनिया के मानसिक तनावो से मुक्त रख सके। देश भर मे पारम्परिक चिकित्सको के मार्गदर्शन मे ऐसी राखियाँ बने और भाईयो की कलाईयो मे सजे।
इस वर्ष के रक्षाबन्धन मे तो ऐसी राखियो की उम्मीद करना सही नही है पर मुझे विश्वास है कि आने वाले वर्षो मे इस ओर आम लोगो का ध्यान जायेगा। मै आपको आश्वस्त करना चाहता हूँ कि हर वर्ष जिस तरह पारम्परिक चिकित्सक और दूसरे लोग रक्षाबन्धन के दिन मेरे पास आते है वैसे ही आप आयेंगे तो ऐसे रक्षाबन्धनो से आपका भी स्वागत किया जायेगा। हम इस परम्परा को वर्ष मे कई बार अपनाते है और लाभांवित होते है।
ज्यादातर पारम्परिक चिकित्सक जनहित मे इस पारम्परिक ज्ञान को सार्वजनिक करने के पक्ष मे है पर वे इसके गलत व्यवसायिक उपयोग के भय से भी प्रभावित है। उन्होने “रुद्राक्ष माफिया” को फलते-फूलते और उनके हाथो गरीबो को लुटते देखा है। उन्होने यह भी देखा है कि प्राचीन भारतीय योग कैसे कुछ लोगो की बपौती बन गया है और कैसे इस पारम्परिक ज्ञान से छदम बाबा लोग अरबो कमा रहे है। उन्हे लगता है कि पारम्परिक ज्ञान को सार्वजनिक करते ही कही चैनल वाले बाबाओ की गिद्ध दृष्टि उन पर न गड जाये। उनका डर गलत नही है। मै अपने लेखो मे बार-बार लिखता हूँ कि जब आयुर्वेद पर हर भारतीय का बराबर हक है तो क्यो कुछ कम्पनियाँ और बाबा इस पर अपना वर्चस्व कायम किये हुये है? आयुर्वेद से देश को खरबो की आमदनी होती है और दुनिया भर मे इसका बाजार है तो फिर भारतीयो को इसका लाभ मुफ्त मे मिलना चाहिये। ठीक उसी तरह जैसे पेट्रोल से कमाने वाले अरब देश अपने नागरिको को हिस्सा देते है। क्यो भारतीय पारम्परिक ज्ञान से बने शीतोप्लादि और मधुमेहहर चूर्ण जैसे उत्पाद मनमानी कीमत पर बिकते है जबकि वे हमारे ही जंगल से हमारे ही पारम्परिक ज्ञान के आधार पर बने है। किसने चन्द लोगो को इससे लाभ कमाने का आधिकार दिया है? इस पर खुलकर चर्चा होनी चाहिये।
कल की जंगल यात्रा मुझे राखियो के लिये करनी पडेगी। इस बार जो मित्र और परिजन आने वाले है वे ऐसी रखियाँ चाहते है जो उन्हे कम से कम एक दिन मानसिक तनाव से दूर रख सके और चैन की नीन्द सुला सके। उन्हे निराश करने का मेरा मन बिल्कुल नही है। (क्रमश:)
(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)
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Sunday, August 2, 2009
बीज यात्रा, पारम्परिक चिकित्सक और रक्षा के साथ बीजबन्धन का प्रस्ताव
मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-59
- पंकज अवधिया
बीज यात्रा, पारम्परिक चिकित्सक और रक्षा के साथ बीजबन्धन का प्रस्ताव
सुबह देर से उठा तो थकान हावी थी। अपने कमरे तक पहुँचा तो एक पैकेट पडा हुआ था। मैने उसके बारे मे पूछताछ की तो बताया गया कि अम्बिकापुर से आये किसी व्यक्ति ने यह पैकेट दिया है। मैने पैकेट खोला तो उसमे एक अंकुरित हो रहा बीज था। यह बीज था अंकोल का। सारी थकान पल मे दूर हो गयी और इस नन्हे बीज से सारा अतीत याद आ गया। लगभग एक दशक पहले जब मै सरगुजा क्षेत्र मे वानस्पतिक सर्वेक्षण कर रहा था तब वहाँ के पारम्परिक चिकित्सको से एक अघोषित समझौता हुआ था। यह समझौता था बीजो के आदान-प्रदान का। हम जिस भी वनस्पति पर चर्चा करते उसके बीज आपस मे बाँट लेते और उपयुक्त स्थान पर उसे रोप देते। उस बीज से नये पौधे निकलते और जब कालांतर मे उसमे फल लगते तो पहले बीज को वापस उसी पारम्परिक चिकित्सक को दे देते जिससे मूल बीज को प्राप्त किया था। बीज को पारम्परिक चिकित्सक फिर किसी को दे देते थे। इस तरह यह क्रम चलता रहता था।
मैने बस्तर से एकत्र किया गया अंकोल का बीज सरगुजा के एक युवा पारम्परिक चिकित्सक को दिया तो वह गदगद हो गया। उसने उस बीज को अपने घर मे लगाया और जब बीज से बने वृक्ष मे सबसे पहले फल आये तो बिना देरी एक बीज भेंट करने रायपुर चला आया। यही बीज मेरे पास पैकेट के अन्दर पडा था। उसने अंकुरित होता बीज दिया था यानि इशारा साफ था। मुझे जल्दी ही इसे किसी दूसरे पारम्परिक चिकित्सक को दे देना था ताकि वह इस परम्परा को आगे बढाये।
पैकेट लेकर मै बाहर आया तो इंतजार करता वह पारम्परिक चिकित्सक दिख गया और गले मिलकर हम पुरानी यादो मे खो गये। पारम्परिक चिकित्सक ने अंकोल के वृक्ष का हाल बताया। उसकी योजना थी कि वह इसका खूब प्रचार-प्रसार करे। बीजो के माध्यम से पूरे सरगुजा मे फैलाये पर उसे इस बात का भी आभास था कि एक ही प्रजाति की बजाय विभिन्न प्रजातियो के मिश्रण का फैलाव ज्यादा जरुरी है। पारम्परिक चिकित्सक ने मुझे अंकोल का तेल भी भेंट मे दिया। मैने अपने शोध दस्तावेजो मे लिखा है कि किसी भी तरह की चोट मे यह तेल रामबाण की तरह काम करता है। इस तेल के इतने सारे प्रयोग है कि हर घर मे इसे होना ही चाहिये, हल्दी की तरह। पर इस तेल को प्राप्त करना टेढी खीर है।
देश के अलग-अलग क्षेत्र के पारम्परिक चिकित्सक अलग-अलग विधियो से तेल बनाते है। अलग-अलग विधियो से बनाये गये तेल के गुण भी अलग-अलग होते है। सरगुजा से आये इस पारम्परिक चिकित्सक ने जो तेल मुझे दिया उसमे कुसुम के तेल की गन्ध भी थी जबकि मैदानी क्षेत्रो के पारम्परिक चिकित्सक जब अंकोल का तेल देते है तो उसमे तिल के तेल की गन्ध भी होती है। हमारे प्राचीन ग्रंथ अंकोल के तेल के विषय मे जानकारी देते तो है पर इसके अलग-अलग प्रकारो के विषय मे कुछ नही बताते।
पिछले सप्ताह ही मैने अंकोल के ढेरो बीज एकत्रित किये थे एक देवस्थल से। अगले कुछ दिनो मे गाँव-गाँव घूमकर इन्हे पारम्परिक चिकित्सको के बीच बाँटने की योजना है। गाँव के आम लोगो ने यदि रुचि दिखायी तो उन्हे भी बीज देने है पर पूरी तरह आश्वस्त होने के बाद। पारम्परिक चिकित्सक तो अंकोल के बीजो को हाथो-हाथ ले लेते है और बिना देरी उसे लगा देते है पर आम लोग इसके औषधीय गुणो को जानने के बाद भी सुस्ती दिखाते है। बीज ले लेते है और फिर उसे घर मे एक किनारे पर रख देते है। इस तरह बीज खराब हो जाता है। अगली बार जाओ तो कह देते है कि बीज लगाया था पर उगा ही नही। इस रवैये को देखते हुये पारम्परिक चिकित्सको ने मजेदार रास्ता अपनाया है।
वे युवाओ को बीज देकर कहते है कि इसकी पूजा करने के बाद रोपने से वशीकरण की शक्ति आ जाती है। या फिर ऐसी शक्ति आ जाती है कि आप किसी को मोह सके। बस, इतना सुनते ही युवा पूरे मन से उसे रोप देते है। उसकी सेवा करते है और यह भी समझने लगते है कि उनमे यह शक्ति आ गयी है। मेरी जंगल यात्रा के दौरान पारम्परिक चिकित्सको ने ऐसे बहुत से युवाओ से मुझे मिलवाया है जो दुर्लभ प्रजातियो के संरक्षण मे अपनी अप्रत्यक्ष पर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे है। ऐसे युवाओ को कालांतर मे वृक्षो के बडे होने होने पर पारम्परिक चिकित्सक औषधीय उपयोगो के विषय मे बता देते है जिससे युवा न केवल अपना और परिवार का भला कर पाते है बल्कि आस-पास के लोगो को भी रोगो से मुक्ति दिलवा देते है।
क्या बीजो से मोहनी या वशीकरण शक्ति की कपोल-कल्पित बाते जोडना अन्ध-विश्वास को बढावा देना नही है? पारम्परिक चिकित्सक ऐसा नही मानते है। उनका कहना है कि येन-केन-प्रकारेण कैसे भी युवाओ को इस दिशा मे आगे लाना है। आप सीधी भाषा मे लाख समझाये वे प्रेरित नही होते है। वे नवागाँव के उजडते जंगल का उदाहरण देते है जहाँ के ग्रामीण युवाओ को जब यह बताया गया कि यहाँ मोहनी बूटियाँ है तो वे जी-जान से इसे बचाने मे लग गये। ऐसी व्यवस्था की कि कोई बाहरी आदमी अन्दर जा ही नही पाये। मुझे पारम्परिक चिकित्सको का यह तरीका गलत नही लगता पर मै अपने रास्ते चलना पसन्द करता हूँ। ग्रामीणो युवाओ की तरह मुझे शहर के आम लोगो को वृक्ष लगाने के लिये प्रेरित करने मे कठिनाई होती है। प्रदूषण से बचने के लिये वृक्ष लगाने मे रुचि कम ही ली जाती है पर जब बताया जाता है कि डायबीटीज या ब्लड प्रेशर मे यह उपयोगी है तो बीजो के लिये वे टूट पडते है।
बचपन से ही हर बार रक्षाबन्धन के समय यह ध्यान आता है कि यदि बहने भाईयो को राखी के साथ-साथ औषधीय वनस्पतियो के बीज भी दे और यह वचन ले कि बहन की तरह ही वे बीजो की भी रक्षा करेंगे आजीवन तो इस देश की पर्यावरण से जुडी ज्यादतर समस्याओ का समाधान निकल आयेगा। नाना प्रकार के बीज सरकार की ओर से नि:शुल्क उपलब्ध कराये जाने चाहिये ताकि बहने भाईयो की स्वास्थ्य समस्याओ के आधार पर बीज भेंट कर सके। यदि भाई को मधुमेह है तो कठपीपल के बीज, श्वाँस की बीमारी हो तो डूमर के बीज और ऐसे ही असंख्य विकल्प प्रस्तुत किये जा सकते है। मै अपने लेखो के माध्यम से वर्षो से यह प्रस्ताव समाज के सामने रख रहा हूँ, इस उम्मीद मे कि एक दिन तो समाज इसे मानकर पर्यावरण के प्रति अपनी सजगता का परिचय देगा। (क्रमश:)
(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)
© सर्वाधिकार सुरक्षित
- पंकज अवधिया
बीज यात्रा, पारम्परिक चिकित्सक और रक्षा के साथ बीजबन्धन का प्रस्ताव
सुबह देर से उठा तो थकान हावी थी। अपने कमरे तक पहुँचा तो एक पैकेट पडा हुआ था। मैने उसके बारे मे पूछताछ की तो बताया गया कि अम्बिकापुर से आये किसी व्यक्ति ने यह पैकेट दिया है। मैने पैकेट खोला तो उसमे एक अंकुरित हो रहा बीज था। यह बीज था अंकोल का। सारी थकान पल मे दूर हो गयी और इस नन्हे बीज से सारा अतीत याद आ गया। लगभग एक दशक पहले जब मै सरगुजा क्षेत्र मे वानस्पतिक सर्वेक्षण कर रहा था तब वहाँ के पारम्परिक चिकित्सको से एक अघोषित समझौता हुआ था। यह समझौता था बीजो के आदान-प्रदान का। हम जिस भी वनस्पति पर चर्चा करते उसके बीज आपस मे बाँट लेते और उपयुक्त स्थान पर उसे रोप देते। उस बीज से नये पौधे निकलते और जब कालांतर मे उसमे फल लगते तो पहले बीज को वापस उसी पारम्परिक चिकित्सक को दे देते जिससे मूल बीज को प्राप्त किया था। बीज को पारम्परिक चिकित्सक फिर किसी को दे देते थे। इस तरह यह क्रम चलता रहता था।
मैने बस्तर से एकत्र किया गया अंकोल का बीज सरगुजा के एक युवा पारम्परिक चिकित्सक को दिया तो वह गदगद हो गया। उसने उस बीज को अपने घर मे लगाया और जब बीज से बने वृक्ष मे सबसे पहले फल आये तो बिना देरी एक बीज भेंट करने रायपुर चला आया। यही बीज मेरे पास पैकेट के अन्दर पडा था। उसने अंकुरित होता बीज दिया था यानि इशारा साफ था। मुझे जल्दी ही इसे किसी दूसरे पारम्परिक चिकित्सक को दे देना था ताकि वह इस परम्परा को आगे बढाये।
पैकेट लेकर मै बाहर आया तो इंतजार करता वह पारम्परिक चिकित्सक दिख गया और गले मिलकर हम पुरानी यादो मे खो गये। पारम्परिक चिकित्सक ने अंकोल के वृक्ष का हाल बताया। उसकी योजना थी कि वह इसका खूब प्रचार-प्रसार करे। बीजो के माध्यम से पूरे सरगुजा मे फैलाये पर उसे इस बात का भी आभास था कि एक ही प्रजाति की बजाय विभिन्न प्रजातियो के मिश्रण का फैलाव ज्यादा जरुरी है। पारम्परिक चिकित्सक ने मुझे अंकोल का तेल भी भेंट मे दिया। मैने अपने शोध दस्तावेजो मे लिखा है कि किसी भी तरह की चोट मे यह तेल रामबाण की तरह काम करता है। इस तेल के इतने सारे प्रयोग है कि हर घर मे इसे होना ही चाहिये, हल्दी की तरह। पर इस तेल को प्राप्त करना टेढी खीर है।
देश के अलग-अलग क्षेत्र के पारम्परिक चिकित्सक अलग-अलग विधियो से तेल बनाते है। अलग-अलग विधियो से बनाये गये तेल के गुण भी अलग-अलग होते है। सरगुजा से आये इस पारम्परिक चिकित्सक ने जो तेल मुझे दिया उसमे कुसुम के तेल की गन्ध भी थी जबकि मैदानी क्षेत्रो के पारम्परिक चिकित्सक जब अंकोल का तेल देते है तो उसमे तिल के तेल की गन्ध भी होती है। हमारे प्राचीन ग्रंथ अंकोल के तेल के विषय मे जानकारी देते तो है पर इसके अलग-अलग प्रकारो के विषय मे कुछ नही बताते।
पिछले सप्ताह ही मैने अंकोल के ढेरो बीज एकत्रित किये थे एक देवस्थल से। अगले कुछ दिनो मे गाँव-गाँव घूमकर इन्हे पारम्परिक चिकित्सको के बीच बाँटने की योजना है। गाँव के आम लोगो ने यदि रुचि दिखायी तो उन्हे भी बीज देने है पर पूरी तरह आश्वस्त होने के बाद। पारम्परिक चिकित्सक तो अंकोल के बीजो को हाथो-हाथ ले लेते है और बिना देरी उसे लगा देते है पर आम लोग इसके औषधीय गुणो को जानने के बाद भी सुस्ती दिखाते है। बीज ले लेते है और फिर उसे घर मे एक किनारे पर रख देते है। इस तरह बीज खराब हो जाता है। अगली बार जाओ तो कह देते है कि बीज लगाया था पर उगा ही नही। इस रवैये को देखते हुये पारम्परिक चिकित्सको ने मजेदार रास्ता अपनाया है।
वे युवाओ को बीज देकर कहते है कि इसकी पूजा करने के बाद रोपने से वशीकरण की शक्ति आ जाती है। या फिर ऐसी शक्ति आ जाती है कि आप किसी को मोह सके। बस, इतना सुनते ही युवा पूरे मन से उसे रोप देते है। उसकी सेवा करते है और यह भी समझने लगते है कि उनमे यह शक्ति आ गयी है। मेरी जंगल यात्रा के दौरान पारम्परिक चिकित्सको ने ऐसे बहुत से युवाओ से मुझे मिलवाया है जो दुर्लभ प्रजातियो के संरक्षण मे अपनी अप्रत्यक्ष पर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे है। ऐसे युवाओ को कालांतर मे वृक्षो के बडे होने होने पर पारम्परिक चिकित्सक औषधीय उपयोगो के विषय मे बता देते है जिससे युवा न केवल अपना और परिवार का भला कर पाते है बल्कि आस-पास के लोगो को भी रोगो से मुक्ति दिलवा देते है।
क्या बीजो से मोहनी या वशीकरण शक्ति की कपोल-कल्पित बाते जोडना अन्ध-विश्वास को बढावा देना नही है? पारम्परिक चिकित्सक ऐसा नही मानते है। उनका कहना है कि येन-केन-प्रकारेण कैसे भी युवाओ को इस दिशा मे आगे लाना है। आप सीधी भाषा मे लाख समझाये वे प्रेरित नही होते है। वे नवागाँव के उजडते जंगल का उदाहरण देते है जहाँ के ग्रामीण युवाओ को जब यह बताया गया कि यहाँ मोहनी बूटियाँ है तो वे जी-जान से इसे बचाने मे लग गये। ऐसी व्यवस्था की कि कोई बाहरी आदमी अन्दर जा ही नही पाये। मुझे पारम्परिक चिकित्सको का यह तरीका गलत नही लगता पर मै अपने रास्ते चलना पसन्द करता हूँ। ग्रामीणो युवाओ की तरह मुझे शहर के आम लोगो को वृक्ष लगाने के लिये प्रेरित करने मे कठिनाई होती है। प्रदूषण से बचने के लिये वृक्ष लगाने मे रुचि कम ही ली जाती है पर जब बताया जाता है कि डायबीटीज या ब्लड प्रेशर मे यह उपयोगी है तो बीजो के लिये वे टूट पडते है।
बचपन से ही हर बार रक्षाबन्धन के समय यह ध्यान आता है कि यदि बहने भाईयो को राखी के साथ-साथ औषधीय वनस्पतियो के बीज भी दे और यह वचन ले कि बहन की तरह ही वे बीजो की भी रक्षा करेंगे आजीवन तो इस देश की पर्यावरण से जुडी ज्यादतर समस्याओ का समाधान निकल आयेगा। नाना प्रकार के बीज सरकार की ओर से नि:शुल्क उपलब्ध कराये जाने चाहिये ताकि बहने भाईयो की स्वास्थ्य समस्याओ के आधार पर बीज भेंट कर सके। यदि भाई को मधुमेह है तो कठपीपल के बीज, श्वाँस की बीमारी हो तो डूमर के बीज और ऐसे ही असंख्य विकल्प प्रस्तुत किये जा सकते है। मै अपने लेखो के माध्यम से वर्षो से यह प्रस्ताव समाज के सामने रख रहा हूँ, इस उम्मीद मे कि एक दिन तो समाज इसे मानकर पर्यावरण के प्रति अपनी सजगता का परिचय देगा। (क्रमश:)
(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)
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