Saturday, February 4, 2012

मानसून की पहली वर्षा यानि अमृत वर्षा

मानसून की पहली वर्षा यानि अमृत वर्षा 
        - पंकज अवधिया

मानसून की पहली वर्षा पूरे जंगल में हलचल पैदा कर देती है| छत्तीसगढ़ की पारम्परिक चिकित्सा में मानसून की पहली वर्षा का बहुत अधिक महत्व है| वन्य प्राणी से लेकर छोटे कीट तक सभी प्रकार के जीव बड़ी बेसब्री से इसकी प्रतीक्षा करते हैं|

काले मुंह के बन्दर जिन्हें हनुमान लंगूर भी कहा जाता है पूरी गर्मी विशेष प्रकार की मिट्टी का सेवन करते हैं| इसे वैज्ञानिक भाषा में जियोफैगी कहा जाता है| मिट्टी के आंतरिक प्रयोग से उनकी पाचन क्रिया ठीक रहती है| पक्षी भी इन्ही स्थानों पर आकर मिट्टी खाते हैं| अम्लीय फलों के सेवन के बाद पाचन व्यवस्था के लिए पक्षी मिट्टी का सेवन करते हैं| अधिक गर्मी के कारण विशेष मिट्टी पूरी तरह सूख जाती है और उसमे नमी का अभाव हो जाता है| मानसून की पहली वर्षा इस विशेष मिट्टी को एक बार फिर से समृद्ध कर देती है| पर अधिक वर्षा के कारण ऐसे स्थान पानी में डूब सकते हैं इसलिए पहली वर्षा के तुरंत बाद बंदरों और पक्षियों में मिट्टी खाने की होड़ लगी रहती है| इस होड़ में राज्य के पारम्परिक चिकित्सक भी शामिल हो जाते हैं| ऐसे स्थानों की मिट्टी को त्वचा रोगियों के लिए वरदान माना जाता है| मानसून की पहली वर्षा के दौरान इन स्थानों से एकत्र की गयी मिट्टी के साथ जड़ी-बूटियों को मिलाकर लेप के रूप में बाहरी तौर पर भैंसा दाद से प्रभावित रोगियों पर लगाया जाता है| पारम्परिक चिकित्सक यह दावा करते हैं कि इसका मौसमी प्रयोग इस जटिल रोग को पूरी तरह से ठीक कर देता है| विशेष मिट्टी वाले स्थान बहुत कम ही हैं और इस तरह की मिट्टी की प्राप्ति का अन्य कोई स्त्रोत नहीं है इसलिए बंदरों, पक्षियों और पारम्परिक चिकित्सकों की प्रतीक्षा महत्वपूर्ण हो जाती है|

नर तितलियाँ गर्मियों में बड़ी संख्या में ऐसे स्थानों की तलाश में होती हैं जहां विशेष प्रकार के लवण और नमी की मात्रा अधिक हो| तेज गर्मी में ऐसे स्थान बहुत कम होते हैं इसलिए नर तितिलियाँ हजारों की संख्या में ऐसे स्थानों में एकत्र हो जाती है| इन स्थानों से एकत्र की गयी नमी और लवण को प्रणय उपहार के रूप में मादा तितिलियों को दिया जाता है तभी वे संगम के लिए तैयार होती है| यह नमी और लवण अण्डों के काम आता है और आने वाली  पीढी को स्वस्थ्य बनाता है| इसे वैज्ञानिक बाशा में मड-पडलिंग कहा जाता है| भले ही आधुनिक विज्ञान जगत के लिए यह एक सामान्य सी प्रक्रिया है पर राज्य की पारम्परिक चिकित्सा में इसका बहुत अधिक महत्त्व हैं विशेषकर पहली मानसूनी वर्षा के बाद| पारम्परिक चिकित्सक मीलों तक नर तितलियों का पीछा करते हैं और फिर स्थान विशेष पर बैठकर पहली वर्षा की प्रतीक्षा करते हैं| वर्षा के आरम्भ होते ही जब तितलियाँ वहां से हट जाती है तो उस स्थान की लवण युक्त मिट्टी को एकत्र कर लिया जाता है| इस मिट्टी का प्रयोग साल भर विभिन्न औषधीय मिश्रणों में किया जाता है| इसका आंतरिक प्रयोग पेट के रोगों के लिए वरदान माना जाता है| स्त्री रोगों की चिकित्सा में भी पारम्परिक चिकित्सक इसका प्रयोग करते हैं| वे सहज रूप से यह स्वीकार करते हैं कि उन्होंने तितिलियों से ही इन औषधीय गुणों के बारे में जाना और सीखा| 

लीवर के रोगों से प्रभावित रोगियों के लिए पारम्परिक चिकित्सक मानसून की पहली वर्षा को बहुत अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं| बोदल नामक वनस्पति की पत्तियों के दोने बना लिए जाते हैं और फिर मानसूनी वर्षा का जल उसमे एकत्र कर लिया जाता है| इस जल के सेवन को लीवर रोगों से प्रभावित रोगियों के लिए वरदान माना जाता है विशेषकर उन रोगियों के लिए जिनके लीवर अधिक शराब के सेवन से खराब होने की कगार पर हैं| यह सरल पर प्रभावी प्रयोग प्राचीन ग्रंथो में उल्लेखित नही है पर राज्य की पारम्परिक चिकित्सामे इसका प्रयोग पीढीयों से हो रहा है और पारम्परिक चिकित्सकों के बीच इसकी लोकप्रियता यह बताती है कि यह आज भी प्रभावी है| इस सरल चिकित्सा को अधिक प्रभावी बनाने के लिए बोदल के दोने के अलावा साठ से अधिक प्रकार की वनस्पतियों से तैयार दोनों में रखे मानसूनी जल को आपस में विभिन्न अनुपातों में मिलाकर प्रयोग किया जाता है| मानसून की पहली वर्षा का जल ही इसमें प्रयोग किया जाता है इसलिए साल में विशेष समय पर ही इसका प्रयोग होता है| 

मानसून की पहली वर्षा भालू मूसली के लिए वरदान होती है| यह वनस्पति अपनी सुषुप्तावस्था तोड़कर उगने को बेसब्र हो जाती है| जहां एक ओर वैज्ञानिक साहित्य इस मूसली के पकने पर ही इसके कन्दो के प्रयोग के पक्षधर हैं वही पारम्परिक चिकित्सक जानते हैं कि वृद्धि की अलग-अलग अवस्थाओं में इसमें अलग-अलग प्रकार के औषधीय गुण होते हैं| यह बात वन्य प्राणी भी जानते हैं विशेषकर भालू| पारम्परिक चिकित्सकों की तरह वे भी पहली मानसूनी वर्षा के बाद इस वनस्पति की नई पत्तियों की प्रतीक्षा करते हैं| नई पत्तियों के आते ही सबसे पहले भालू को इजाजत दी जाती है क्योंकि पारम्परिक चिकित्सक अपने अनुभव से जानते हैं, भालू ही भली-भांति जानते हैं कि कौन से स्थान की भालू मूसली औषधीय गुणों से परिपूर्ण हैं| जब भालू भरपेट सेवन कर लेते हैं तब पारम्परिक चिकित्सक बची हुयी वनस्पतियों को एकत्र कर लेते हैं| भालू के लिए इस अवस्था की यह वनस्पति सेक्स पावर हाउस की तरह होती है| पारम्परिक चिकित्सक इस बात को जानते हैं और मनुष्यों में भी इसका प्रयोग इसी उद्देश्य से किया जाता है| पहली मानसूनी वर्षा के बाद होने वाले पारिवारिक समारोहों में पारम्परिक चिकित्सक नव-विवाहितों को बतौर विशेष उपहार इस वनस्पति को देते हैं ताकि वे भी इस पावर हाउस के पावर को महसूस कर सके| यूं तो पूरे वर्षा काल में भालू मूसली जंगल में उगती रहती है पर पहली मानसूनी वर्षा के बाद एकत्र की गयी मूसली का महत्व सबसे अधिक है| इस पर विस्तार से शोध करके इसके वैज्ञानिक कारणों की विवेचना की जा स्काती है|         

तेज दौड़ने में माहिर हिरन भी बड़ी बेसब्री से मानसून की प्रतीक्षा करते हैं| मानसून की पहली वर्षा का जल उन्हें जोड़ों के दर्द से मुक्त करता है और फिर उनके तेज दौड़ने की क्षमता को बरकरार रखता है| पहली मानसूनी वर्षा के बाद उन्हें बड़ी संख्या में अमरफल नामक वृक्ष की कोटरों के आस-पास देखा जा सकता है| वे इसमें एकत्रित वर्षा के जल का सेवन करते हैं| यह जल बहुत अधिक मात्रा में नही होता है इसलिए सभी बड़ी समझदारी से अपना हिस्सा निर्धारित करते हैं| इसे पीने के बाद वे काफी धमा-चौकड़ी मचाते हैं| पारम्परिक चिकित्सक बड़े विस्मय से इस घटना को देखते हैं| शायद इसका सेवन शक्ति को भी बढाता है -ऐसा वे अनुमान लगाते हैं पर पूरे विश्वास से नही कह पातें हैं क्योकि कोटर में भरा जल मनुष्यों के लिए उपयुक्त नही होता है| अमरफल का फल भी उपयोगी नही माना जाता है मनुष्यों के लिए लेकिन पक्षी इसे चाव से खाते हैं|

मानसून की पहली वर्षा घमौरियों के लिए वरदान मानी जाती है पर शहरों में पहली मानसूनी वर्षा के औषधीय गुणों का लाभ उठाना सम्भव नही दिखता है क्योंकि पर्यावरण में फैले प्रदूष्ण से होकर जब जल जमीन पर आता है तो वह विषाक्त हो चुका होता है और वनस्पतियों तक पहुंचकर उन्हें ही दोषयुक्त बना देता है| 





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पंकज अवधिया ने अपनी रपट "इम्पार्टेंस आफ फर्स्ट मानसून रेन्स आन बायोडायवर्सिटी आफ इंडिया विद स्पेशल रिफरेन्स टू छत्तीसगढ़, झारखंड एंड उड़ीसा" में पहली मानसूनी वर्षा के महत्त्व के बारे में विस्तार से लिखा है| अंग्रेज़ी में लिखी गयी यह रपट इंटरनेट पर उपलब्ध है|  



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Tuesday, March 29, 2011

सावधान हो जाइए कि अब जापान का घातक रेडीयेशन आपकी दहलीज तक पहुंच रहा है

सावधान हो जाइए कि अब जापान का घातक रेडीयेशन आपकी दहलीज तक पहुंच रहा है

-पंकज अवधिया

जापान के फुकिशीमा संयंत्र से निकला रेडीयेशन (विकिरण) अब हजारों मील दूर कैलिफोर्निया तक पहुंच चुका है| रूस में इस रेडीयेशन से समुद्र में मछलियों के मरने की खबरें आ रही हैं| कैलिफोर्निया से हाल ही में रायपुर आये मित्र बताते हैं कि ऐसा बताया जा रहा है कि रेडीयेशन बहुत कम मात्रा में वहां पहुंचा है फिर भी हम नजर रखे हुए हैं| इस पर चर्चा कर रहे हैं और जितना सम्भव हो सके बारिश में भीगने से बच रहे हैं| इस बारिश से मुझे हाल ही में छत्तीसगढ़ में हुयी हल्की बारिश की याद आ गयी है| जब रेडीयेशन हजारों मील की दूरी तय कर सकता है तो जरुर यह हमारी दहलीज तक पहुंच चुका होगा और हमे बीमार करने की तैयारी कर रहा होगा| दुनिया भर के देश रेडीयेशन की मात्रा की पल पल में जांच कर रहे हैं| भारत में एक भी खबर ऐसी नही मिलती जिसमे हमारे तथाकथित जागरूक वैज्ञानिकों को ऐसा कुछ करते देखा गया हो| सारा देश या तो दिल्ली में चल रहे अंतहीन राजनीतिक ड्रामे में मशगूल है या फिर क्रिकेट के नशे में डूबा है| पर्यावरण की तो छोडिये दरवाजे पर खडी मौत को इस तरह अनदेखा करना भला कहां की समझदारी है|

जापान में बड़ा ही बुरा हाल है| टोक्यो में पीने के पानी में रेडीयेशन की मात्रा पायी गयी है| छोटे बच्चों को नल का पानी पिलाने से मना कर दिया गया है| आयातित पीने के पानी की मात्रा कम है और सुपरमार्केट में आते ही वह बिक जा रहा है| जापान से ज्यादातर विदेशी पहले ही वापस जा चुके हैं| रेडीयेशन की बढती हुयी मात्रा के कारण उन्होंने ऐसा किया, भले ही कारण कुछ और बताये गए हों| जापान के आम लोग इस हकीकत को जानते हैं| उन्होंने देखा कि कैसे चार्टर विमानों के लिए मारामारी मच गयी और उनके ही देश के अमीर तबके के लोग विदेशियों के साथ भाग निकले|

आज ही समाचार आया है कि फुकिशीमा के पास के समुद्र में रेडीयेशन की मात्रा हजार से अधिक गुना पायी गयी है| जापान में दसों किस्म की सब्जियों और खाद्य पदार्थों के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया गया है| इनमे रेडीयेशन की असुरक्षित मात्रा पायी गयी है| विश्व खाद्य संगठन के वैज्ञानिक जापान पहुंच गए हैं पर उनके लिए कुछ करने को बचा नहीं है| उनका अब तक का विश्लेष्ण यही कहता है कि वर्षों तक वनस्पतियाँ इस खतरे से प्रभावित रहेंगी और खेती चौपट हो जायेगी| रेडीयेशन के सच ने जापान के निर्यात को बुरी तरह प्रभावित किया है| जापान की खाद्य सामग्री कोई नहीं उपयोग करना चाहता है| जापानी सरकार कह रही है कि मछलियों पर रेडीयेशन का असर नहीं है और उन्हें खाया जा सकता है पर इस पर शायद ही कोई विश्वास करे|

जापान को सहनशील और संकट से जल्दी ही उबर जाने वाला देश बताकर उसे दुनिया ने अकेला छोड़ दिया है-ऐसा प्रतीत होता है| दुनिया भर के समाचार माध्यमो से अचानक ही जापान की खबरें गायब हो गयी हैं| बीबीसी का लाइव कवरेज बंद हो गया है| रेडीयेशन पर ज्यादा कुछ नहीं लिखा जा रहा है| जबकि जापान की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है| रेडीयेशन के चलते दुनिया भर की मदद जापान तक नहीं पहुंच पा रही है| शुरुआती दिनों में ही अमेरिका ने अपना युद्धपोत जापान से दूर कर दिया था| तभी लोग समझ गए थे कि स्थिति नियन्त्रण से बाहर है| रेडीयेशन पर यूरोपीय विश्वविद्यालय में शोध कर रहे मेरे मित्र चैट के दौरान बताते हैं कि परमाणु ऊर्जा का अपना एक बड़ा बाजार है| रेडीयेशन की खबरों ने दुनिया भर में हलचल मचा दी| आम लोग परमाणु संयंत्रों को बंद करने की मांग करने लगे| सरकारें दबाव में आ गयी| ऐसे में तो परमाणु ऊर्जा का सारा बाजार चौपट हो जाता| तुरंत ही आवश्यक कदम उठाये गए और नतीजा यह हुआ कि रेडीयेशन की खबरें सुर्ख़ियों से गायब हो गयी| आम लोग मरे तो मरे इससे बाजार वालों को क्या|

" हम जानते हैं कि हम सब एक ताबूत में रख दिए गए हैं ज़िंदा ही|" मेरे जापानी मित्र हताशा से लिखते हैं| भले जापान ऊपर से शांत दिखे पर अंदर ही अंदर क्रोध से आम लोग उबल रहे हैं| उन्हें शिकायत है कि उनसे सच छुपाया जा रहा है| जापान में जब फुकिशीमा संयंत्र के आस-पास बीस किमी के क्षेत्र को खाली करवाया गया तो पश्चिमी वैज्ञानिकों ने पचास किमी को सुरक्षित दूरी बताया| चेर्नोबिल में हुयी परमाणु त्रासदी को एक से सात के स्केल में सात का दर्जा दिया गया| जापानी सरकार ने संकट को पांच पर रखा है यानि चेर्नोबिल से दो बिदु कम पर पश्चिम के वैज्ञानिक पहले ही कह चुके है कि जापान ने सात की सीमा पहले ही पार कर ली थी|

अमेरिका के जेम्स बर्गाढल लिखते हैं कि वहां रेडीयेशन के पहुँचने की खबर से ही सीवीड की मांग बढ़ गयी है| आधुनिक शोध में रेडियोएक्टिव आयोडीन के लिए सीवीड का अधिक उपयोग प्राणरक्षक पाया गया है| अमेरिका में जहाजों के कबाडखाने में काम करने वाले श्रमिकों को पहले ही से सीवीड खाने को कहा जाता रहा है ताकि वे जहाज़ों को तोड़ते समय निकलने वाले रेडीयेशन से बचे रहें| जापान और आस-पास के देशों में समुद्र में उगने वाली यह वनस्पति रेडीयेशन से संक्रमित हो चुकी है और खाने योग्य नहीं रही है|

ऐसी वनस्पतियाँ जिनमे आयोडीन की प्राकृतिक मात्रा अधिक हो रेडियोएक्टिव आयोडीन से बचा सकती हैं| ऐसी भारतीय वनस्पतियों में सिंघाड़े और कमल से मिलने वाले पोखरा का नाम सबसे पहले याद आता है| दोनों ही पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं फिर क्यों इसे अनुमोदित करने में हमारे वैज्ञानिक देर कर रहे हैं, यह समझ से परे हैं|

रेडीयेशन से बचने के आधुनिक साजो-सामान से लैस फुकिशीमा संयंत्र के दो कर्मचारी बुरी स्थिति में अस्पताल में भर्ती किये गये| रेडीयेशन से संक्रमित पानी में उनका पैर चला गया और पानी ने उन्हें जला दिया| वे शायद ही बच पायें| जापान के आम लोग इस घटना को गम्भीरता से लेते हैं| वे तो बिना किसी सुरक्षा के जीने को मजबूर हैं| जाने उनका क्या हाल हो रहा होगा|

बाहर बादल गरज रहे हैं| बारिश होगी-ऐसा लगता है| मेरे लिखने की गति तेज हो रही है| सोचता हूँ कि कैसे भी छत्तीसगढ़ के माध्यम से अपनी बात आम लोगों तक पहुंचा सकूं कि इस रेडीयेशन भरी बारिश से बचें और सतर्क रहें| देर करना उचित नहीं होगा|

(लेखक जैव-विविधता विशेषज्ञ हैं और वनस्पतियों से सम्बन्धित पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान का दस्तावेजीकरण कर रहे हैं|)

सर्वाधिकार सुरक्षित

यह लेख २८ मार्च, २०११ को रायपुर से प्रकाशित होने वाले दैनिक छत्तीसगढ़ में प्रकाशित हो चुका है|



Updated Information and Links on March 17, 2012

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Pouzolzia zeylanica (L.) BENN. -Parthenium hysterophorus (Gajar Ghas or Congress Weed) Allelopathic Interactions: Research Documents (Medicinal Plants of Chhattisgarh, India) from Pankaj Oudhia’s Medicinal Plant Database on use of Alien Invasive species as additional ingredient in Traditional Indigenous Herbal Medicines (Herbal Formulations) for Key Symptom-Backache, must sit up to turn over in bed.
Premna barbata WALL. -Parthenium hysterophorus (Gajar Ghas or Congress Weed) Allelopathic Interactions: Research Documents (Medicinal Plants of Chhattisgarh, India) from Pankaj Oudhia’s Medicinal Plant Database on use of Alien Invasive species as additional ingredient in Traditional Indigenous Herbal Medicines (Herbal Formulations) for Key Symptom-Easily excited; sexual desire.
Premna latifolia ROXB. -Parthenium hysterophorus (Gajar Ghas or Congress Weed) Allelopathic Interactions: Research Documents (Medicinal Plants of Chhattisgarh, India) from Pankaj Oudhia’s Medicinal Plant Database on use of Alien Invasive species as additional ingredient in Traditional Indigenous Herbal Medicines (Herbal Formulations) for Key Symptom-Nocturnal emissions.
Premna tomentosa WILLD. -Parthenium hysterophorus (Gajar Ghas or Congress Weed) Allelopathic Interactions: Research Documents (Medicinal Plants of Chhattisgarh, India) from Pankaj Oudhia’s Medicinal Plant Database on use of Alien Invasive species as additional ingredient in Traditional Indigenous Herbal Medicines (Herbal Formulations) for Key Symptom-Troublesome erections.
Prosopis chilensis (MOLINA) STUNTZE -Parthenium hysterophorus (Gajar Ghas or Congress Weed) Allelopathic Interactions: Research Documents (Medicinal Plants of Chhattisgarh, India) from Pankaj Oudhia’s Medicinal Plant Database on use of Alien Invasive species as additional ingredient in Traditional Indigenous Herbal Medicines (Herbal Formulations) for Key Symptom-Erections wanting (impotency).
Protium serratum (COLEBR.) ENGLER -Parthenium hysterophorus (Gajar Ghas or Congress Weed) Allelopathic Interactions: Research Documents (Medicinal Plants of Chhattisgarh, India) from Pankaj Oudhia’s Medicinal Plant Database on use of Alien Invasive species as additional ingredient in Traditional Indigenous Herbal Medicines (Herbal Formulations) for Key Symptom-Spermatorrhoea.
Prunus ceylanica (WT.) MIQ. -Parthenium hysterophorus (Gajar Ghas or Congress Weed) Allelopathic Interactions: Research Documents (Medicinal Plants of Chhattisgarh, India) from Pankaj Oudhia’s Medicinal Plant Database on use of Alien Invasive species as additional ingredient in Traditional Indigenous Herbal Medicines (Herbal Formulations) for Key Symptom-Gonorrhoea with thin and greenish-yellow discharge.
Prunus persica BATSCH -Parthenium hysterophorus (Gajar Ghas or Congress Weed) Allelopathic Interactions: Research Documents (Medicinal Plants of Chhattisgarh, India) from Pankaj Oudhia’s Medicinal Plant Database on use of Alien Invasive species as additional ingredient in Traditional Indigenous Herbal Medicines (Herbal Formulations) for Key Symptom-Soft sore or chancroid.
Pseudarthria viscida WIGHT & ARN. -Parthenium hysterophorus (Gajar Ghas or Congress Weed) Allelopathic Interactions: Research Documents (Medicinal Plants of Chhattisgarh, India) from Pankaj Oudhia’s Medicinal Plant Database on use of Alien Invasive species as additional ingredient in Traditional Indigenous Herbal Medicines (Herbal Formulations) for Key Symptom-Smegma increased.
Pseudognaphalium luteo-album (L.) HILL. & BURTT -Parthenium hysterophorus (Gajar Ghas or Congress Weed) Allelopathic Interactions: Research Documents (Medicinal Plants of Chhattisgarh, India) from Pankaj Oudhia’s Medicinal Plant Database on use of Alien Invasive species as additional ingredient in Traditional Indigenous Herbal Medicines (Herbal Formulations) for Key Symptom-Bad effects of sexual excesses.
Psidium guajava L. -Parthenium hysterophorus (Gajar Ghas or Congress Weed) Allelopathic Interactions: Research Documents (Medicinal Plants of Chhattisgarh, India) from Pankaj Oudhia’s Medicinal Plant Database on use of Alien Invasive species as additional ingredient in Traditional Indigenous Herbal Medicines (Herbal Formulations) for Key Symptom-Menstruation very irregular.
Psophocarpus tetragonoloba DC. -Parthenium hysterophorus (Gajar Ghas or Congress Weed) Allelopathic Interactions: Research Documents (Medicinal Plants of Chhattisgarh, India) from Pankaj Oudhia’s Medicinal Plant Database on use of Alien Invasive species as additional ingredient in Traditional Indigenous Herbal Medicines (Herbal Formulations) for Key Symptom-Menses too early and too profuse, with weak, faint spells.
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Pteridium aquilinum (L.) KUHN -Parthenium hysterophorus (Gajar Ghas or Congress Weed) Allelopathic Interactions: Research Documents (Medicinal Plants of Chhattisgarh, India) from Pankaj Oudhia’s Medicinal Plant Database on use of Alien Invasive species as additional ingredient in Traditional Indigenous Herbal Medicines (Herbal Formulations) for Key Symptom-Fetid leucorrhoea, tingling the linen yellow, with pain in the uterus, as if bruised.
Pteris biaurita L. -Parthenium hysterophorus (Gajar Ghas or Congress Weed) Allelopathic Interactions: Research Documents (Medicinal Plants of Chhattisgarh, India) from Pankaj Oudhia’s Medicinal Plant Database on use of Alien Invasive species as additional ingredient in Traditional Indigenous Herbal Medicines (Herbal Formulations) for Key Symptom-Morning sickness during pregnancy.
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Pterospermum acerifolium WILLD. -Parthenium hysterophorus (Gajar Ghas or Congress Weed) Allelopathic Interactions: Research Documents (Medicinal Plants of Chhattisgarh, India) from Pankaj Oudhia’s Medicinal Plant Database on use of Alien Invasive species as additional ingredient in Traditional Indigenous Herbal Medicines (Herbal Formulations) for Key Symptom-Chill at 10 or 11 AM.
Pterospermum xylocarpum (GAERTH.) SAMT. & WAGH. -Parthenium hysterophorus (Gajar Ghas or Congress Weed) Allelopathic Interactions: Research Documents (Medicinal Plants of Chhattisgarh, India) from Pankaj Oudhia’s Medicinal Plant Database on use of Alien Invasive species as additional ingredient in Traditional Indigenous Herbal Medicines (Herbal Formulations) for Key Symptom-Chilly, on least movement, from being uncovered.



Sunday, February 27, 2011

कहीं वन्य पशुओं के अवैध व्यापार की राजधानी तो नही बन रहा है रायपुर?

कहीं वन्य पशुओं के अवैध व्यापार की राजधानी तो नही बन रहा है रायपुर?
- पंकज अवधिया


पिछले दिनों सिरपुर मेले में जब मैंने कमर दर्द की शर्तिया दवा के रूप खुलेआम बिक रहे साल खपरी के शल्कों को देखा तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा| साल खपरी यानि पेंगोलिन जिसे आम बोलचाल की भाषा में चीन्टीखोर भी कहा जाता है| छत्तीसगढ़ के वनों में एक ज़माने में ये बड़ी संख्या में थे पर लगातार शिकार होने से इनकी संख्या कम होती जा रही है| इससे जुडा अंध-विश्वास इसकी जान ले रहा है| प्रकृति ने इस जीव को जंगल में दीमकों की आबादी पर नियन्त्रण रखने के लिए बनाया है| इनकी कम संख्या अर्थात दीमकों का अधिक प्रकोप और अधिक दीमक माने जंगलों का सर्वनाश| वैज्ञानिक साहित्य बताते है कि एक पेंगोलिन अपने जीवन में जंगल में प्राकृतिक संतुलन बनाये रखने में जो भूमिका निभाता है वह लाखों रूपये खर्च करके भी मनुष्य नही निभा सकता है| राज्य में शिकारी पिन्गोलिन की कीमत तीन से चार हजार रूपये लगाते हैं| शिकार के तुरंत बाद इसके मांस को खा लिया जाता है और शल्कों को बेच दिया जाता है| न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि दुनिया भर में इन शल्कों की जबर्दस्त मांग है| दावा किया जाता है कि जोड़ों के दर्द में यह उपयोगी है| इसका बाहरी और अंदरुनी प्रयोग होता है| जोड़ों के दर्द की चिकित्सा में महारत रखने वाले पारम्परिक चिकित्सक साल खपरी के इस प्रयोग से खुश नहीं है| वे कहते हैं कि आस-पास सामान्य तौर पर उगने वाली फुडहर नामक वनस्पति के साधारण प्रयोग से जोड़ों के दर्द से मुक्ति पायी जा सकती है फिर साल खपरी को मारने की क्या जरूरत है? साल खपरी के शिकार पर प्रतिबंध है पर मेलों में इसकी खुली बिक्री शिकारियों के बुलंद हौसलों की गवाही देती लगती है|



साल खपरी के शल्कों की तरह बंदर की खोपड़ी की बिक्री भी खुलेआम हो रही है| साप्ताहिक बाजारों और सालाना मेलों में लाल कपड़ों से लिपटी बन्दर की खोपड़ी आसानी से दिख जाती है| ज्यादातर एक या दो ऐसी खोपड़ियां तांत्रिको के पास दिखती है पर जब उनसे बात की जाती है तो दसों की संख्या में खोपड़ी वे उपलब्ध करा देते हैं| वे दावा करते हैं कि यह साधारण खोपड़ी नहीं है बल्कि विशेष गुणों वाले बंदर की खोपड़ी है| जब बन्दर एक शाखा से दूसरी शाखा में जाते हैं तो गलती से कई बार कोई बन्दर गिर जाता है| उस बंदर को तुरंत ही दल से अलग कर दिया जाता है| ऐसे बन्दर की खोपड़ी विशेष तांत्रिक गुणों से भरपूर मानी जाती है| ऐसी एक खोपड़ी पांच सौ से लेकर लाख रूपये तक बेची जाती है| वैज्ञानिक नजरिये से देखा जाए तो यह निरापद अंध-विशवास ही लगता है| जिस बड़ी संख्या में तांत्रिकों के पास खोपड़ियां रहती हैं उससे लगता है कि बंदरों का अवैध शिकार किया जा रहा है| भले ही जंगलों के कम होने से बंदर शहर का रुख करने लगे हैं और आम लोगों के लिए मुसीबत बन रहे हैं पर जंगलों में इनकी विशेष भूमिका है|


वन्य पशुओं के अवैध व्यापार पर नजर रखें वाली ट्रेफिक जैसी अन्तराष्ट्रीय संस्थाएं उल्लू के अंगों की बढती मांग से परेशान हैं| देश के जिन राज्यों से उल्लू क़ी आपूर्ति हो रही है उनमे छत्तीसगढ़ का भी नाम है| काले जादू के लिए साल भर उल्लू पकड़े और मारे जाते हैं| दीपावली के समय इनकी मांग बढ़ जाती है| उल्लू राज्य में खुलेआम नहीं बिकते हैं पर इनके आपूर्तिकर्ताओं को ढूंढना कठिन नही है| उल्लू किसानो के मित्र है और कीट-पतंगों को खाकर फसलों की रक्षा करते हैं| राज्य में नए पर्यटन स्थलों विशेषकर सघन वनों में विकसित हो रहे स्थलों के कारण गाड़ियों की आवाजाही बढी है| वाहनों के शोर से उल्लू जैसे जीव परेशान है| तेज रफ्तार से दौड़ रही गाड़ियों से टकराकर भी उनकी आकाल मृत्यु हो रही है|

बिलासपुर मार्ग में सडक के किनारे जीवित जंगली पक्षियों की बिक्री खुलेआम देखी जा सकती है| ट्रक वाले इनके नियमित ग्राहक होते हैं| ढाबों की भूमिका भी इसमें संदिग्ध है| राज्य में किये गए एक सर्वेक्षण के अनुसार ढाबे चोरी छिपे पच्चीस से अधिक प्रकार की चिड़ियों का मांस परोसते हैं और उसकी तगड़ी कीमत वसूल करते हैं| इनमे से बहुत से पक्षी दुर्लभ पक्षियों की श्रेणी में आते हैं|

राज्य में बहुत से पर्यटन स्थलों में बड़ी गाड़ियों को अक्सर कुछ संदिग्ध से दिखने वाले लोग घेर लेते हैं और बिना किसी खौफ के वन्य जीवों के अंगों की चर्चा शुरू कर देते हैं| हाल ही में कवर्धा के पास मारे गए बाघ के कीमती अंगों को एकत्र करने में मची आपा-धापी और तेंदुए की खाल की लगातार बरामदगी की अखबारी खबरें साफ़ चेताती हैं कि सब कुछ ठीक नहीं है| वन्य पशुओं के अवैध व्यापार में राज्य की राजधानी की विशेष भूमिका है| यदि इस पर अंकुश न लगाया गया तो कहीं यह वन्य पशुओं के अंगों के अवैध व्यापार की राजधानी न बन जाए|

इस अवैध व्यापार पर अंकुश लगाने के लिए जरूरी है कि आम नागरिकों को जागरूक किया जाए| उन्हें प्रोत्साहित किया जाए कि वे शिकारियों की जानकारी सम्बन्धित विभाग तक पहुंचाएं| और साथ ही वन्य पशुओं से जुड़े अंध-विश्वास को भी दूर करना जरूरी है|

(लेखक कृषि वैज्ञानिक हैं और राज्य में पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान का दस्तावेजीकरण कर रहे हैं|)

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Friday, January 28, 2011

बंदरों के अधखाये फल की तलाश में खतरों भरी जंगल यात्रा

वर्ष २०११ की मेरी रोमांचक जंगल यात्राएं-१
- पंकज अवधिया

बंदरों के अधखाये फल की तलाश में खतरों भरी जंगल यात्रा


"आप यदि बंदरों द्वारा आधे खाए गए ये विशेष फल कहीं से ले आयें तो रोगी की मदद हो सकती है|" कई तरह के पुराने रोगों के कारण मृतप्राय रोगी की चिकित्सा कर रहे पारम्परिक चिकित्सक ने उसके परिजनों से यह बात कही| यह एक कठिन कार्य था| इसीलिये पारम्परिक चिकित्सकों ने हाथ खड़े कर दिए और परिजनों से ही फल की व्यवस्था करने को कहा|

पिछले दिनों मैंने मैदानी भाग के जंगल में घूमने का मन बनाया और रास्ते में मिलने वाले पारम्परिक चिकित्सकों से मिलने की भी योजना बनाई| सबसे पहले जिन पारम्परिक चिकित्सक से मुलाक़ात हुयी वहीं इस रोगी और उसके परिजनों से मुलाक़ात हो गयी| बिना विलम्ब मैंने कहा कि मैं जंगल जा रहा हूँ| आप शाम तक प्रतीक्षा करें| यदि मुझे ऐसे फल मिले तो मैं अवश्य एकत्र कर लूंगा| उस दिन की जंगल यात्रा का मुख्य उद्देश्य तेजी से खत्म हो रहे गिन्धोल वृक्षों की जंगल में उपस्थिति का पता लगाना था| पर अब उद्देश्य बदल गया था| हम आगे बढे| साथ में कुछ पारम्परिक चिकित्सक थे|

अपनी गाडी ड्राइवर के सुपुर्द करके हम पैदल ही जंगल में घुस गए| दिन होने के बावजूद मैंने अपनी जंगल टार्च रख ली ताकि यदि किसी जंगली जानवर से मुठभेड हो जाए तो इससे कुछ हद तक आत्मरक्षा की जा सके| इसे कभी आजमाया नहीं गया पर फिर भी मुझे विश्वास है कि संकट में इससे मदद ली जा सकती है| जनवरी के महीने के अंत में जंगल उजाड़ सा था| पत्तियां गिरने को बेताब थी| केवल उन्ही भागों में छोटी हरी वनस्पतियाँ थी जहां नमी थी| जिस अधखाये फलों को लाने की बात कही गयी थी वे मैनफल थे| एक समय में ये बड़ी संख्या में जंगल में मिल जाते थे पर अब लकड़ी माफिया के चलते बाहरी जंगलों में इन्हें खोज पाना टेढ़ी खीर है| घने जंगल में जाना यानि ज्यादा खतरा उठाना|

चूंकि हमें बंदरों द्वारा खाए गए फलों की जरूरत थी इसलिए साथ चल रहे पारम्परिक चिकित्सकों ने सुझाया कि बंदरचुहा नामक स्थान चला जाय जहां कि पीढीयों से यह मान्यता रही है कि दिन भर जंगल के अलग-अलग समूहों के बंदर वहां पानी पीने आते हैं| भरी गर्मी में भी उस स्थान से पानी निकलता रहता है| बंदरचुहा जैसे स्थान भारतीय जंगलों में अक्सर मिल जाते हैं| साल भर नमी रहे के कारण इन स्थानों में बेशकीमती जड़ी-बूटियाँ मिल जाती है| यदि सर्प प्रेमी हैं तो नाना प्रकार के सर्प मिल जाते हैं| बंदरों पर शोध करने वालों को काफी सामग्री मिल जाती है| पर ऐसे स्थानों के अपने खतरे भी रहते हैं| बंदरों का सतत आगमन होते रहने से शिकारी जीव भी यहाँ घात लगाये बैठे रहते हैं| उन्हें पानी के साथ भोजन भी मिल जाता है| छोटी वनस्पतियाँ यहां बहुतायत में होती है इसलिए मेरा मन होता है कि मैं उखडू बैठ जाऊं और पास से विस्तार से तस्वीरे लूं| पर ऐसे स्थानों में खड़े रहना जरुरी है| थोड़ा भी झुकने से शिकारी जीवों को हम बंदर की तरह लगने लगते हैं और वे आक्रमण करने में देर नहीं लगाते हैं| कैमरे को वनस्पतियों के ज्यादा पास ले जाने पर एक खतरा साँपों के आक्रमण का है| उत्तरी छत्तीसगढ़ में एक सर्वेक्षण के दौरान मैं छोटी वनस्पतियों के बीच तस्वीरे ले रहा था कि अचानक ही एक बड़े से सांप ने कैमरे पर आक्रमण कर दिया| मैं बाल-बाल बचा| तभी पारम्परिक चिकित्सकों ने मुझे धक्का देकर हटाया| सांप मी पूँछ मेरे जूते से दब रही थी| वनस्पतियों के कारण सांप दिखाई नहीं दे रहा था|

काफी देर तक चलने के बाद हम बंदरचुहा तक पहुंच गए| इस भाग में जंगल घना था| चार लोगों का समूह होने के बाद भी डर सा लगता था| थोड़ी सी भी आवाज से बरबस ही उधर ही ध्यान खिच जाता था| हमने तेज गंध वाले डियो नहीं लगाए थे इसलिए जंगली कीटों को हममे कम दिलचस्पी थी| फिर भी लम्बी दूरी तय करने के कारण हमारे पसीने की दुर्गन्ध लोकटी कीटों को हमारे आस-पास मंडराने के लिए प्रेरित कर रही थी| कुछ आगे बढे तो जंगली मधुमक्खियों के कुछ सदस्य अनावश्यक ही मुझमें दिलचस्पी लेने लगे| हमने शायद उनके इलाके में घुसने का साहस किया| आने वाले बड़े खतरे को भांपते हुए पारम्परिक चिकित्सकों ने एक बूटी उठायी और मेरे चहरे व हाथ पर मल दिया| ऐसी गंध आयी मानो उल्टी हो जायेगी| इसने सभी कीटों की दिलचस्पी खत्म कर दी|

मैं तस्वीरे लेता रहा और फिर एक बड़ी सी चट्टान की ओट में छुपकर हम बंदरों के आने की प्रतीक्षा करते करते रहे| इस बीच हमारी नजरें मैनफल के वृक्षों को भी तलाशती रही| एक वृक्ष देख लिया गया पर अफ़सोस काफी इन्तजार के बाद भी बंदरों ने उस ओर का रुख नहीं किया| अचानक बंदरों ने अजीब आवाजें निकालनी शुरू कर दी| शिकारी जीवों को उन्होंने देख लिया था और अपने साथियों को आगाह कर रहे थे| शायद हमे भी| हम वापस लौटने का मन बनाने लगे पर हमें डर था कि कहीं शिकारी जानवर उसी दिशा में न हों| पारम्परिक चिकित्सक बंदरों के इशारों को समझने का प्रयास करते रहे और फिर बताया कि ऊपर डोंगर से कोई शिकारी जीव नीचे आ रहा है| हम विपरीत दिशा से आये थे इसलिए उसी दिशा में लौट गए| कुछ दूर जाने पर हमें डोंगर से नीचे उतरता तेंदुआ दिखाई दिया| बंदरों की चेतावनी अब फुल वाल्यूम पर थी| तेंदुए अक्सर इंसानों से दूर रहना पसंद करते हैं पर ऐसा लगता है कि उन्हें अब इंसानों से नफरत हो गयी है| शायद उनकी हरकतों से| इसलिए उनके हमले की घटनाएँ तेजी से बढ़ रही हैं| खैर, उस वक्त हमारी नजरें नही मिली और हम समय रहते निकल आये|

पारम्परिक चिकित्सकों ने एक नाले का जिक्र किया जहां बंदर और मैनफल दोनों मिल सकते हैं| हम पहले गाडी तक पहुंचे और फिर कुछ दूरी उससे ही तय की| एक स्थान पर गाडी रुकी और फिर पैदल ही जंगल में घुस गए| बहुत सारे चिरईजाम यानि जामुन के वृक्ष दिखे| इसका मतलब आस-पास कहीं जल-स्त्रोत था} फिर अर्जुन के वृक्षों ने इस बात की पुष्टि कर दी कि हम नाले के पास हैं| हमें भालुओं द्वारा खोदे गए कंदों और दीमक की बाम्बियों के निशान दिखने लगे| नम स्थानों में उगने वाली जड़ी-बूटियाँ दिखने लगी| फिर जंगली सूअर का मल दिखा और आगे चलने पर बड़े जीवों के होने के निशान| इस बार हमने हिम्मत दिखाई और चलते रहने का मन बनाया| अचानक ही सामने चल रहे व्यक्ति के पैर ठिठक गए| सामने कुत्ते नुमा कोई प्राणी था| बुरे फंसे!!!

कहीं ये सोनकुत्ता तो नहीं था| सोनकुत्ता जिससे बाघ भी घबराता है, फिर हमारी क्या बिसात| ध्यान से देखा गया तो वह देशी कुत्ता था| संभवत: गाँव से कभी जंगल पहुंचे कुत्तों की संतान| जरा भी संस्कार नहीं थे| वह पूर्वजों की तरह जंगली हो गया था| हम पत्थर फेकते रहे और वह हमारी ओर बढ़ता गया| जंगली टार्च पर पकड मजबूत की और दिमाग दौड़ने लगा कि घायल होने पर कैसे शहर तक पहुंचेंगे| पारम्परिक चिकित्सकों के चेहरे पर भी भय दिखने लगा था| वे स्थानीय भाषा में गालियाँ दे रहे थे पर शायद इस श्वान पुत्र को भाषा की समझ नही थी| मौत को सामने खड़ा देखकर हम प्रार्थना कर ही रहे थे कि अचानक ही वह हमसे दूर होने लगा| यह क्षणिक खुशी थी क्योंकि अब हमारे सामने तेंदुआ खड़ा था| हमे काटों तो खून नहीं|

हम बस खड़े रह गए| वृक्षों पर बैठे बंदरों की तेज आवाज से कुछ होश आया| तेंदुआ अब भी खड़ा था पर लगता था कि उसे हममे रूचि नहीं थी| यह खुशफहमी भी हो सकती थी| पर ऐसा नही हुआ| उसने पास की झाड़ियों में घुसना ही ठीक समझा| शायद सही तरीके से हम पर हमला करने के लिए| हम खड़े रहे| फिर नकारात्मक सोच को किनारे किया| तब लगा कि हमे बिना बताये ही शरीर संकट से निपटने के लिए तैयार था| दिमाग कई तरह की योजनायें बना रहा था| ये नकारात्मक सोच थी जिसने इन तैयारियों पर पर्दा डाल दिया था|

बहुत देर तक झाड़ियों में हलचल नहीं हुयी| फिर कुछ दूर पर एक तेज आवाज आयी| हम खड़े रहे| पारम्परिक चिकित्सकों ने एक वृक्ष पर चढ़कर स्थिति का जायजा लिया तो वे खुशी से भर गए| श्वान पुत्र अब दुनिया में नहीं था और तेंदुआ उसे अपने जबड़े में फंसाए दूर जा रहा था| मेरा मन अभिभूत हो गया| लगा कि तेंदुए को निज अतिथि बनाकर रायपुर ले जाऊँ और फिर शहर भर के मॉल दिखा दूं| इसके अलावा तो शहरों में हमारे पास कुछ नहीं है| जंगलों को उजाड़कर यही उपलब्धी तो हमने पायी है| पर सच मानिए वह तेंदुआ हमारे लिए भगवान से कम नहीं था उस समय|

हम उलटे पैर लौट आये| जंगल का वह भाग जड़ी-बूटियों से भरा था| शायद ही कोई जाता हो इसके अंदर| गाडी के पास पहुंचते ही भयग्रस्त ड्रायवर दिखा| कांच चढाकर लाइटें जलाकर बैठा था| उसने बताया कि हमारे जंगल में जाने के कुछ देर बाद तेंदुए महात्मा उसी रास्ते से गए थे यानि हमारे ठीक पीछे| फिर कब हमारे सामने से प्रकट हो गए हमें हवा की नहीं लगी| दिन में तेंदुए की इतनी सक्रियता आश्चर्य का विषय थी|

तभी एक और तेज आवाज ने हमारी चर्चा को विराम दिया| यह आवाज सुखद लगी जब हमने अपनी गाडी की छत को देखा| उस पर एक फल आकर गिरा था| हमने ध्यान ही नहीं दिया हम मैनफल के वृक्ष के ठीक नीचे खड़े थे और पके-अधपके फल साफ़ दिखाई दे रहे थे| आनन-फानन में ढेर सारे फल मिल गए| बंदरों के अलावा पक्षियों ने भी इस पर हाथ आजमाया था| हम सोच रहे थे कि पहले क्यों नहीं दिखा यह| शायद भगवान दर्शन देना चाहते हों या यह भी हो सकता ही कि मेरा ब्लॉग पढ़ रहा तेंदुआ वन्य जीवों पर सतत लेखन के लिए आभार व्यक्त करना चाहता हो कुछ इस तरह से ------ (क्रमश:)

लेखक से सम्पर्क के लिए इस वेबपते पर जाएँ
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Thursday, November 25, 2010

बिना फटी बारूदी सुरंगों का पता लगा सकती है छग की वनस्पतियाँ

बिना फटी बारूदी सुरंगों का पता लगा सकती है छग की वनस्पतियाँ

* सामरिक महत्त्व की वनस्पतियों पर वैज्ञानिक रपट
*भारतीय सेना के लिए मददगार सिद्ध हो सकती है

दुनिया भर में प्रतिवर्ष हजारों जानें बारूदी सुरंगों के कारण जाती है| एक अनुमान के अनुसार दुनिया भर में एक अरब से अधिक बिना फटी बारूदी सुरंगे मौजूद हैं| इन बिना फटी बारूदी सुरंगों का पता लगाने में छत्तीसगढ़ की औषधीय वनस्पतियाँ अहम भूमिका निभा सकती है|

राज्य में औषधीय वनस्पतियों से सम्बंधित पारंपरिक चिकित्सकीय ज्ञान का दस्तावेजीकरण कर रहे वनौषधी विशेषज्ञ पंकज अवधिया ने सनसनीखेज खुलासा करते हुए नवभारत के माध्यम से बताया कि डेनमार्क के वैज्ञानिकों ने थेल क्रेस नामक वनस्पति की एक ऐसी किस्म विकसित की है जिसे प्रभावित स्थान पर उगाने से बारूदी सुरंग वाले स्थान की वनस्पति की पत्तियों का रंग हरे के स्थान पर लाल हो जाता है| ये वनस्पति मिट्टी में होने वाले परिवर्तन के लिए अति संवेदी होती हैं| छत्तीसगढ़ में अब तक पन्द्रह से अधिक ऐसी वनस्पतियों की पहचान की जा चुकी है जो थेल क्रेस की तरह ही अतिसंवेदी है| वन सिलयारी, गुडरिया, गुड्रू आदि स्थानीय नामों से पहचानी जाने वाली वनस्पतियाँ "इंडीकेटर प्लांट" के रूप में आधुनिक सन्दर्भ ग्रंथों में वर्णित हैं| पंकज अवधिया का मानना है कि बिना फटी बारूदी सुरंगों की पहचान में थेल क्रेस की तरह स्थानीय वनस्पतियाँ भी अहम स्थान निभा सकती हैं| इस पर राज्य में शोध किये जाने चाहिए| उन्होंने अपनी वैज्ञानिक रपट "फील्ड गाइड टू वेनेमस क्रीचर्स इन इंडियन फारेस्ट अफेक्टिंग मिलिट्री आपरेशंस विद स्पेशल एम्फेसिस आन छत्तीसगढ़" में सामरिक महत्व की वनस्पतियों के विषय में विस्तार से चर्चा की है| यदि भविष्य में कभी सेना छत्तीसगढ़ के घने जंगलों में अपनी कार्यवाही आरम्भ करे तो यह रपट उसके लिए सहायक सिद्ध हो सकती हैं|

छत्तीसगढ़ के जंगलों में पाए जाने वाले जहरीली पिचकारी छोड़ने वाले ब्लिस्टर बीटल्स से लेकर पनबिच्छू और अंधियारी माछी तक के विषय में इस रपट में जानकारी है| अंधियारी माछी उन लोगों पर अधिक आक्रमण करती है जिनके रक्त में शर्करा की अधिक मात्रा होती है| बाघ और तेंदुए जैसे बड़े जानवर भी इससे बचने के लिए दिन में अंधेरे स्थानों में रहना पसंद करते हैं| तेंदू जैसी सर्वसुलभ वनस्पतियों की सहायता से अंधियारी माछी के विष को समाप्त किया जा सकता है|

इस रपट में उन्होंने मलेरिया से निपटने के लिए उपयोगी वनस्पतियों के विषय में भी विस्तार से लिखा है| आधुनिक विज्ञान भूईंनीम को मलेरिया से बचाव और उपचार के लिए अनुमोदित करता है पर राज्य के पारंपरिक चिकित्सक ऐसी वनस्पतियों की जानकारी रखते हैं जो कई गुना अधिक प्रभावी होती हैं| वे मजाकिया लहेजे में इन वनस्पतियों को "भूईंनीम के ददा" कहते हैं| भिरहा जैसी बहुत से औषधीय वृक्ष हैं जिनका प्रयोग पीढीयों से मच्छरों से निपटने के लिए ग्रामीण और वनीय छत्तीसगढ़ में हो रहा है| इन पारंपरिक नुस्खों में सुधार करके उपयोगी उत्पाद तैयार किये जा सकते हैं जिन्हें सेना घने जंगलो में कैम्पिंग के दौरान इस्तमाल कर सकती है|

यह रपट गोपनीय रखी गयी है और इसे अभी तक प्रकाशित नहीं किया गया है| पंकज अवधिया का मानना है कि लम्बे समय से युद्ध जैसी परिस्थितियाँ झेल रहे छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के लिए सामरिक महत्त्व की वनस्पतियाँ और उनसे जुडा पारंपरिक ज्ञान उपयोगी साबित हो सकता है|

Saturday, August 7, 2010

जीवनरक्षक जंगली मशरूम के अंतरराष्ट्रीय लुटेरे, सेन्हा फुटु और हानिकारक कीटों की बातें

सोमवार की जंगल यात्रा-३

जीवनरक्षक जंगली मशरूम के अंतरराष्ट्रीय लुटेरे, सेन्हा फुटु और हानिकारक कीटों की बातें
- पंकज अवधिया


घने जंगल में एक स्थान पर जब पारंपरिक चिकित्सक मुझे अकेला छोड़कर दूर पहाडी पर स्थिति मंदिर चले गए तो मैंने समय का सदुपयोग करने की ठानी| ड्रायवर भी पारंपरिक चिकित्सकों के साथ हो लिया था| गाडी के पास मैं था और आस-पास घना जंगल| कुछ देर तो खामोशी बड़ी पसंद आयी पर फिर यह खामोशी भी शोर मचाने लगी| जंगल में अकेले रहना बड़ा ही रोचक और कभी-कभी भयावह अनुभव होता है| आप बिना किसी सुरक्षा के खड़े होते हैं| किसी भी पल कुछ भी हो सकता है- बस यही भावना शरीर की सुरक्षा ग्रंथी को सक्रीय कर देती है और आप हाई अलर्ट मोड़ में आ जाते हैं|

मैंने गाडी में बैठे रहने की बजाय आस-पास घूमने का मन बनाया| कुछ अजीब से कीड़ों की तस्वीर खीची| मुझे पनबिच्छू की चिंता थी| पत्तियों के पीछे छुपाकर बैठा यह कीट मजे से दुश्मनो से बचा रहता है| जैसे ही गलती से इसके शरीर पर दुश्मन का कोई भाग लगता है असहनीय दर्द से दुश्मन चीख पड़ता है और दूर हो जाता है| जंगल में तो मैं भी पनबिच्छू के दुश्मनों में से एक था| वह अपने आप किसी को नहीं सताता| मुझे गुडसुकरी नामक वनस्पति पर एक पनबिच्छू दिख ही गया| मैंने दूर से उसकी तस्वीर ली| फ्लैश नहीं चमकाया| मैं वैसे भी फ्लैश के अनावश्यक प्रयोग से बचता हूँ विशेषकर जंगलों में| मुझे बताया गया है कि हिंसक जानवरों से सामना होने पर एक फ्लैश आपकी जान बचा सकता है| पर मुझे इसकी जरूरत कभी नहीं पडी|

घर से गंधविहीन होकर आया था| केवल पसीने की बदबू जंगल में फ़ैल रही थी| यह भी बहुत से कीटों को आकर्षित करती हैं| लोकटी माछी यानि लोकटी मख्खी इनमे से एक है| मैंने पिछले लेखों में लिखा है कि कैसे एक बार इस मख्खी ने मुझे जंगल में सताया था और तब पारंपरिक चिकित्सकों ने चेताया था कि मीठा खाने वालों को यह ज्यादा सताती है| इस बार मैंने महीनो से मीठा नहीं खाया था इसलिए मुझे विश्वास था कि लोकटी मुझमे रूचि नहीं लेंगी| पर अन्धयारी माछी यानि अन्धयारी मख्खी का क्या भरोसा? उसके डर से बाघ जैसे ताकतवर जानवर दिन के समय अँधेरे में रहते हैं फिर अपनी क्या बिसात? पिछले बार जब इस माछी ने काटा था तो सर फ़ुटबाल की तरह सूज गया था हालांकि नुक्सान कुछ नहीं हुआ|

मैं सेन्हा की पत्तियों को खा रहे कीट की तस्वीर ले रहा था कि अचानक ही मेरी नजर इसकी जमीन से बाहर निकली जड़ पर उग रहे मशरूम पर पडी| मशरूम को स्थानीय भाषा में फुटु कहते हैं| मेरी खुशी का ठिकाना नही रहा| शायद यह सेन्हा फुटु था| इसका रंग भी पीला था| मैंने तस्वीर लेनी आरम्भ की और काफी देर तक इसमे लगा रहा| बाद में पारंपरिक चिकित्सकों ने इसकी पुष्टि की| इस जंगली मशरूम की सहायता से लगभग सभी प्रकार के स्त्री रोगों की चिकित्सा की जाती है| पारंपरिक चिकित्सक हर साल इसके उगने की प्रतीक्षा करते हैं और फिर साल भर के लिए इसे एकत्र कर लेते हैं|

कुछ महीनो पहले एक व्यक्ति ने मुझसे मुलाक़ात करके एक हर्बल कंपनी बनाने का प्रस्ताव रखा था| यह कंपनी छत्तीसगढ़ के जंगली मशरूम पर ही केन्द्रित रहने वाली थी| बाद में पता चला कि न्यूजीलैंड में शोधरत एक भारतीय वैज्ञानिक के दिमाग की यह उपज थी| मुझे बताया गया कि सेन्हा फुटु की ही तरह के पांच प्रकार के मशरूमो को जंगलों से एकत्रकर परीक्षण के लिए न्यूजीलैंड भेजना है| कंपनी में मेरी भूमिका यही होती| और फिर मुझे इन मशरूमो पर तैयार किये गए शोध दस्तावेजों की एक प्रति उन्हें देनी होती| उसके बाद नए प्रोजेक्ट में भिड़ना था| वे मुंह माँगी कीमत देने की बात कर रहे थे| इससे मेरा शक बढ़ा| बाद में पता चला कि मशरूम को येन-केन-प्रकारेण न्यूजीलैंड ले जाने की योजना थी जहां इस पर शोध किये जाते और इसे प्रयोगशाला में उगाने की विधि विकसित की जाती| इस पर पेटेंट लिए जाते और फिर चीन में इसे सस्ते में उगाकर दुनिया भर जिसमे भारत भी शामिल है में विदेशी मशरूम बताकर बेचा जाता| इस पूरी प्रक्रिया में छत्तीसगढ़ और पारंपरिक चिकित्सकों का कोई जिक्र नहीं होने वाला था| न ही उन्हें अपनी सम्पदा और पारंपरिक ज्ञान से आर्थिक लाभ होने वाला था| मैं एक बड़ी साजिश का हिस्सा बनने वाला था|

सारा खेल जान लेने के बाद मैंने उनसे दो टूक कहा कि आप राष्ट्रीय जैव-विविधता बोर्ड के नियमो के अनुसार चलेंगे तो मै आपके साथ हूँ| यदि आप गलत राह पकड़ेंगे तो फिर मै आपके साथ नहीं जुड़ सकता| उन्होंने काफी मिन्नतें की| सब्ज-बाग़ दिखाए| प्रलोभन दिए| और कुछ दबाव भी डलवाया पर बात न बनते देखकर बोले कि मशरूम तो हम दूसरे रास्तों से बाहर भेज देंगे आप बस इससे सम्बंधित ज्ञान साझा कर लें| हमने जंगल छान मारा पर यह ज्ञान हमें नहीं मिला| पारंपरिक चिकित्सक बिकने को तैयार नहीं है| बिन ज्ञान के ये मशरूम हमारे लिए बेकार है|

मैंने पूछा, इसमे पारंपरिक चिकित्सको की कितनी हिस्सेदारी रहेगी और क्या आप क़ानून के अनुसार लिखित में सारी प्रक्रियाए अपनाएंगे? वे बगलें झांकने लगे| उन्होंने मुझसे दूरी बना ली|

लम्बे समय से चल रही फाका-मस्ती का अब अंत हो जाएगा, इस उम्मीद में माता-पिता थे| घर में महंगी गाड़ियों में लोग आ रहे थे और परामर्श शुल्क दे रहे थे| माता-पिता को उम्मीद थी कि अब बेटा काम पे लग जाएगा और कम्प्यूटर और जंगल से दूर हो जाएगा| हो सकता है कि शादी भी कर ले पर जब मैंने उन्हें अपना फैसला बताया तो वे मायूस लगे| पर जब फैसले की वजह बतायी तो माँ ने बिना देर किये कहा कि मैंने सही कदम उठाया|

अभी भी अक्सर वे महंगी गाड़ियां जंगलों में दिख जाती हैं| मैं अकेला कब तक संपदा की रक्षा करूँ| जब जिम्मेदार विभागों को ही इसकी परवाह नहीं है तो कोई क्या करे और कितना करे? (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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Friday, August 6, 2010

भुईनीम की कडवाहट, बारूदी सुरंग से घायल भालू और गंदे होते झरने

सोमवार की जंगल यात्रा-२

भुईनीम की कडवाहट, बारूदी सुरंग से घायल भालू और गंदे होते झरने
- पंकज अवधिया

इस सोमवार को यदि कड़वा सोमवार कहा जाय तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी क्योकि सारा दिन कडवो के राजा अर्थात भुईंनीम से मुलाक़ात होती रही| पहले जंगल से पैदल गुजरते वक्त कुछ छोटे पौधे दिख गए| साथ चल रहे पारंपरिक चिकित्सकों से झट से कुछ पत्तियां तोडी और चबाने लगे | उनकी देखा देखी मैंने भी यही किया| कड़वाहट से मुंह भर आया| ऐसी कड़वाहट कि मन परेशान हो उठा| पर यह कडुवाहट हमारा भला ही करने वाली थी| भुईनीम का वर्षा ऋतु में सेवन साल भर रोगों विशेषकर यकृत संबंधी रोगों से सुरक्षा प्रदान करता है| मलेरिया से बचाव और इसकी चिकित्सा दोनों में ही इसका प्रयोग पीढीयों से हो रहा है| हमारे क्षेत्र में यदि आप बरसात में पारंपरिक चिकित्सकों से मिलने चले जाएँ तो वे आपका स्वागत इसकी दो-तीन पत्तियों से करेंगे ही| सोमवार को भी यही हुआ|

मैं दसों पारंपरिक चिकित्सकों से मिला और हर बार मेरा स्वागत भुईनीम से हुआ| इन पत्तियों को लेने से इनकार करना पारंपरिक चिकित्सकों के अपमान के समान है| पहले-पहल तो मैंने पत्तियां लेकर चुपचाप पीछे खड़े ड्रायवर को थमा देनी चाहिए और सामने से उन्हें चबाने का नाटक किया पर पारंपरिक चिकित्सक जान गए और उन्होंने झट से कुछ और पत्तियां थमा दी| मुंह फिर कड़वाहट से भर गया| क्या एक दिन में इतनी पत्तियां खाना ठीक है? पारंपरिक चिकित्सक इसे गलत नहीं मानते हैं| उनके अनुसार कैसे भी पर्याप्त मात्रा में यह वनस्पति शरीर के अन्दर जानी चाहिए| उस समय यह ज्यादा जरुरी है जबकि आप जंगल में हों मच्छरों के बीच|

गनीमत यह रही कि आखिर में जिन पारंपरिक चिकित्सकों से हम मिले उन्होंने पातालकुम्हडा के कन्द खाने को दिए| मुंह का स्वाद बदल गया और साथ ही जान में जान आ गयी|

जंगल में जब हम एक झरने के पास पहुंचे तो कुर्रु के झुरमुट के पास कुछ हलचल हुयी| पारंपरिक चिकित्सक सतर्क हो गए| उनका सतर्क होना बेकार नहीं गया| झुरमुट में भालू था| जंगल में भालू का मिलना मायने आफत| हम बड़े वृक्ष तलाशने लगे पर यह क्या भालू तो बेहद डरा हुआ था| हमसे दूर सरक रहा था| जब उसने भागने की कोशिश की तो हमने उसे पूरी नजर से देखा| आंखों में आंसू आ गए| उसका अगला पैर जख्मी था| हमें कारण मालूम था | यह काम किसी दूसरे हिंसक जानवर का नहीं था बल्कि उन लोगों का था जिहोने पूरे जंगल में यहां-वहां बारूदी सुरंगे बिछा रखी हैं| टिफिन बम से लेकर न जाने क्या-क्या, ऐसे घातक विस्फोटक जो इंसानों और जानवरों में फर्क करने की क्षमता नहीं रखते हैं| पक्ष-विपक्ष की खूब बातें हो रही हैं पर इन बेजुबानो की कोई नहीं सुन रहा है|

मेरे मन में अचानक ही मेडीसीन किट में पडी आर्निका का नाम घूम गया| इसकी एक-दो खुराक से जख्मी भालू को कुछ राहत तो मिल सकती थी पर उस तक इसे पहुंचा पाना मुश्किल था| पारंपरिक चिकित्सकों से खूब दिमाग लड़ाया और फिर आखिर में यह फैसला हुआ कि भालू को पसंद आने वाले कन्द भालू से कुछ दूरी पर रखे जाए और उसमे आर्निका नामक होम्योपैथिक दवा मिलाई जाए| आनन-फानन के यह सब हो भी गया पर भालू मियाँ दूर से ही हमें अविश्वास भरी नज़रों से देखते रहे|

इस बीच जाने कहाँ से बंदरों की टोली आ गयी और कन्द-मूलों पर टूट पडी| जितना खाया नहीं उतना बिखेरा| दवा गलत मरीज तक पहुंच गयी| अब वे दोगुनी शक्ति से उत्पात मचाने वाले थे| आर्निका का असर ही ऐसा होता है| इससे पहले कि वे हमें घेरकर अपनी बढी हुयी शक्ति का राज पूछते हमने उन्हें औरभालू को उनके हाल में छोड़कर आगे बढ़ना ही उचित समझा|

बरसाती झरनों के आस-पास कुकुरमुत्तों की तरह उग आये पर्यटन स्थलों के साथ पहले एक बात अच्छी थी कि रात को वे पूरी तरह खाली हो जाते थे| वास्तव में ये झरने माँ प्रकृति ने वन्य जीवों के लिए बनवाये हैं पर दिन भर पर्यटक वाहनों की आवा-जाही से वन्य जीव चाहकर भी यहाँ पानी पीने नहीं आ पाते| ऐसे में रात का ही समय उनके पास बचता था| अब इन पर्यटन स्थलों पर दुकानदार और मंदिर समिति के लोग रात को रुकने लगे हैं| उन्होंने रोशनी की व्यवस्था की है और साथ ही देर रात फ़िल्मी गाने बजते रहते हैं| झरनों का पानी भी गंदा होता जा रहा है| लोगों ने न केवल साबुन और शैम्पू का प्रयोग शुरू कर दिया है बल्कि अब तेज डिटर्जेंट से कपडे भी धोने लगे हैं|

ऐसे ही एक झरने में ऊपर की ओर गिन्धोल के असंख्य वृक्ष हुआ करते थे| जब उनसे होकर झरने का पानी नीचे आता था तो दिव्य औषधीय गुणों से परिपूर्ण हो जाता था| झरने के नीचे वे रोगी इंतज़ार में बैठे होते जिनकी जीवनी शक्ति कम होती थी| औषधी देने के पहले उन्हें झरने में नहाने की सलाह दी जाती थी| अब यह बीते दिनों की बात हो रही है| अब पारंपरिक चिकित्सक अपने रोगियों को यहां नहीं भेजते हैं| क्योंकि अब जब रोगी डुबकी मारकर निकलते हैं तो उनके शरीर में गुटखों के खाली पाउच चिपके मिलते हैं जो ऊपर से बहकर आते हैं| (क्रमश :)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)