Wednesday, April 7, 2010

क्या कुत्ते बचा सकते थे उन अभागे जवानो को मौत के मुंह में जाने से?

क्या कुत्ते बचा सकते थे उन अभागे जवानो को मौत के मुंह में जाने से?
- पंकज अवधिया


"अरे, वह क्या है? ठहरो कोई कुत्ता लगता है| इतने घने जंगल में कुत्ता!! कही यह सोनकुत्ता तो नहीं है? अरे, यह तो देसी कुत्ता है|" मैंने बेसब्र होते हुए कहा| फिर उसे अनदेखा करके आगे बढ़ने लगा| तभी साथ चल रहे स्थानीय व्यक्ति ने टोका कि यह खतरनाक हो सकता है| बेहतर होगा कि आप अपने स्थान पर ऐसे ही खड़े रहें| मैंने उसकी बात मानी| कुछ ही पल में झाड़ियों में हलचल हुयी और अच्छी कद काठी वाले दो लोग तीर धनुष लिए प्रकट हुए| हमारी जान में जान आयी| ये कमार आदिवासी थे| हमने उनके कुत्ते से न उलझने का निर्णय लेकर ठीक ही किया| ये बड़े ही वफादार होते हैं और जंगल में निडरता से विचरते रहते है| उनके मालिक ने एक सीटी मारी नहीं कि वे हाजिर हो जाते है| वे शिकार में मदद करते है और अपने मालिक की रक्षा करते हैं| लम्बी दूरी से अनजानों को देखकर वे पीछे लगा जाते है और मालिक को सचेत कर देते हैं| ये निहायत ही देशी कुत्ते हैं पर काम में किसी से कम नहीं|


चिंतलनार के जंगल की खबर कल जब मै सुन रहा था तो मैं उस स्थिति में अपने को कल्पना के माध्यम से देखने का प्रयास कर रहा था| सोचिये बीच में सौ जवान और चारो ओर एक हजार दुश्मनों का घेरा| गर्मी के दिनों में सूखी पत्तियों की आवाज इतनी अधिक होती है कि किसी बड़े समूह के चलने की आवाज दूर से सुनी जा सकती है| दुश्मन दम साधे इंतज़ार कर रहे होंगे| हम आप भले न जान पाए कि आसा-पास इतनी बड़ी संख्या में कोई मौजूद है पर बहुत से जानवर जिनमे कुत्ते भी शामिल है यह सब पल में ही जान सकते है| क्यों नहीं जंगल की इस लड़ाई में सदियों से वफादार रहे इस जानवर की मदद ली जाती है|

कुछ वर्षों पहले गिल साहब ने कुत्तों की सेवाए लेने का प्रस्ताव दिया था- ऐसा मैंने अखबारों में पढ़ा था| पर वे कुत्तो को लाखों के खर्च में ट्रेनिंग के लिए विदेश भेजना चाहते थे| मेरा मानना है कि ऐसी जंग में जब तक आप स्थानीय ज्ञान और दक्षता के बारे में अनजान रहेंगे तब तक आप इसे नहीं जीत सकते| कमार आदिवासियों के पास जो कुत्ते है उनके बारे में गिल साहब भला क्या जाने| फिर यह हमारी भी गलती है कि इन दक्ष कुत्तों के बारे में कभी भी किसी ने नहीं लिखा| छत्तीसगढ़ में ही ज्यादातर ऐसे लोग जो इन आदिवासियों को नहीं जानते, उनके कुत्तो की दक्षता से अनजान हैं| पता नहीं क्यों मुझे लगता है कि यदि वे साथ होते तो जवानो को संभलने का कुछ समय तो मिल ही जाता| फाक्स टीवी में अमेरीकी युद्ध के बारे में बताते हुए एक कार्यक्रम में मैंने देखा था कि एम्बुश यानी घात लगाकर किये गए हमले में जीतने का एक ही रास्ता होता है और वह है मुकाबला करना| भागने या हडबडाने का मतलब मौत को खुला निमंत्रण देना|

मेरा एक विज्ञान उपन्यास "छत्तीसगढ़ की बेटी -मनटोरा" प्रकाशन के लिए तैयार है| साहसी मनटोरा जब जंगल में छुपे दुश्मन की ओर बढ़ती है तो वह चिड़ियों और बन्दर जैसे जानवरों के व्यवहार को भी देखती चलती है| ऊंची शाखाओं में बैठे हुए प्राणी अपने बदले व्यवहार से काफी कुछ बता देते हैं| बस इनके बदले व्यवहार को समझने की जरुरत है| मनटोरा अपने बबा के पारंपरिक ज्ञान के सहारे अकेले ही दुश्मनों को नाको चने चबवा देती है| वो छत्तीसगढ़ की बेटी है|

कुछ महीने पहले मैंने कांकेर में जंगल वार स्कूल चला रहे ब्रिगेडियर पवार साहब को एक ईमेल भेजकर अपने काम के बारे में बताया था और कहा था कि यदि आप मेरी सेवाए लेना चाहते है तो मै उपलब्ध हूँ| पर कोई जवाब नहीं आया| मेरे पास न तो सैन्य विशेषज्ञता की कोई डिग्री है और न हीं कोई एनजीओ जिसकी सहायता से मै बड़ी बातें कर सकूं पर मैंने जीवन का बड़ा हिस्सा जंगलों में बिताया है| यदि मेरा ज्ञान देश के कुछ काम आ सके तो मेरा जीवन सफल हो जाए|

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

© सर्वाधिकार सुरक्षित

4 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

आप का सुझाव और अपनी उपयोगिता का प्रस्ताव उचित है। पर उन विशेषज्ञों के कान पर शायद ही जूँ रेंगे।

Anil Pusadkar said...

यही तो रोना है पंकज,बिना लोकल सपोर्ट के इस मामले मे कुछ नही कर सकते और ये लोग लोकल सपोर्ट लेना नही चाहते.सुचना तंत्र भी इसिलिये फ़ेल हो रहा है.इसिलिये नक्सल वंहा ज्यादा ताकतवर है..

बी एस पाबला said...

स्थानीय समर्थन, कारकों के बिना फतह नामुमकिन है

अरुणेश मिश्र said...

सार्थक आलेख ।