Saturday, August 7, 2010

जीवनरक्षक जंगली मशरूम के अंतरराष्ट्रीय लुटेरे, सेन्हा फुटु और हानिकारक कीटों की बातें

सोमवार की जंगल यात्रा-३

जीवनरक्षक जंगली मशरूम के अंतरराष्ट्रीय लुटेरे, सेन्हा फुटु और हानिकारक कीटों की बातें
- पंकज अवधिया


घने जंगल में एक स्थान पर जब पारंपरिक चिकित्सक मुझे अकेला छोड़कर दूर पहाडी पर स्थिति मंदिर चले गए तो मैंने समय का सदुपयोग करने की ठानी| ड्रायवर भी पारंपरिक चिकित्सकों के साथ हो लिया था| गाडी के पास मैं था और आस-पास घना जंगल| कुछ देर तो खामोशी बड़ी पसंद आयी पर फिर यह खामोशी भी शोर मचाने लगी| जंगल में अकेले रहना बड़ा ही रोचक और कभी-कभी भयावह अनुभव होता है| आप बिना किसी सुरक्षा के खड़े होते हैं| किसी भी पल कुछ भी हो सकता है- बस यही भावना शरीर की सुरक्षा ग्रंथी को सक्रीय कर देती है और आप हाई अलर्ट मोड़ में आ जाते हैं|

मैंने गाडी में बैठे रहने की बजाय आस-पास घूमने का मन बनाया| कुछ अजीब से कीड़ों की तस्वीर खीची| मुझे पनबिच्छू की चिंता थी| पत्तियों के पीछे छुपाकर बैठा यह कीट मजे से दुश्मनो से बचा रहता है| जैसे ही गलती से इसके शरीर पर दुश्मन का कोई भाग लगता है असहनीय दर्द से दुश्मन चीख पड़ता है और दूर हो जाता है| जंगल में तो मैं भी पनबिच्छू के दुश्मनों में से एक था| वह अपने आप किसी को नहीं सताता| मुझे गुडसुकरी नामक वनस्पति पर एक पनबिच्छू दिख ही गया| मैंने दूर से उसकी तस्वीर ली| फ्लैश नहीं चमकाया| मैं वैसे भी फ्लैश के अनावश्यक प्रयोग से बचता हूँ विशेषकर जंगलों में| मुझे बताया गया है कि हिंसक जानवरों से सामना होने पर एक फ्लैश आपकी जान बचा सकता है| पर मुझे इसकी जरूरत कभी नहीं पडी|

घर से गंधविहीन होकर आया था| केवल पसीने की बदबू जंगल में फ़ैल रही थी| यह भी बहुत से कीटों को आकर्षित करती हैं| लोकटी माछी यानि लोकटी मख्खी इनमे से एक है| मैंने पिछले लेखों में लिखा है कि कैसे एक बार इस मख्खी ने मुझे जंगल में सताया था और तब पारंपरिक चिकित्सकों ने चेताया था कि मीठा खाने वालों को यह ज्यादा सताती है| इस बार मैंने महीनो से मीठा नहीं खाया था इसलिए मुझे विश्वास था कि लोकटी मुझमे रूचि नहीं लेंगी| पर अन्धयारी माछी यानि अन्धयारी मख्खी का क्या भरोसा? उसके डर से बाघ जैसे ताकतवर जानवर दिन के समय अँधेरे में रहते हैं फिर अपनी क्या बिसात? पिछले बार जब इस माछी ने काटा था तो सर फ़ुटबाल की तरह सूज गया था हालांकि नुक्सान कुछ नहीं हुआ|

मैं सेन्हा की पत्तियों को खा रहे कीट की तस्वीर ले रहा था कि अचानक ही मेरी नजर इसकी जमीन से बाहर निकली जड़ पर उग रहे मशरूम पर पडी| मशरूम को स्थानीय भाषा में फुटु कहते हैं| मेरी खुशी का ठिकाना नही रहा| शायद यह सेन्हा फुटु था| इसका रंग भी पीला था| मैंने तस्वीर लेनी आरम्भ की और काफी देर तक इसमे लगा रहा| बाद में पारंपरिक चिकित्सकों ने इसकी पुष्टि की| इस जंगली मशरूम की सहायता से लगभग सभी प्रकार के स्त्री रोगों की चिकित्सा की जाती है| पारंपरिक चिकित्सक हर साल इसके उगने की प्रतीक्षा करते हैं और फिर साल भर के लिए इसे एकत्र कर लेते हैं|

कुछ महीनो पहले एक व्यक्ति ने मुझसे मुलाक़ात करके एक हर्बल कंपनी बनाने का प्रस्ताव रखा था| यह कंपनी छत्तीसगढ़ के जंगली मशरूम पर ही केन्द्रित रहने वाली थी| बाद में पता चला कि न्यूजीलैंड में शोधरत एक भारतीय वैज्ञानिक के दिमाग की यह उपज थी| मुझे बताया गया कि सेन्हा फुटु की ही तरह के पांच प्रकार के मशरूमो को जंगलों से एकत्रकर परीक्षण के लिए न्यूजीलैंड भेजना है| कंपनी में मेरी भूमिका यही होती| और फिर मुझे इन मशरूमो पर तैयार किये गए शोध दस्तावेजों की एक प्रति उन्हें देनी होती| उसके बाद नए प्रोजेक्ट में भिड़ना था| वे मुंह माँगी कीमत देने की बात कर रहे थे| इससे मेरा शक बढ़ा| बाद में पता चला कि मशरूम को येन-केन-प्रकारेण न्यूजीलैंड ले जाने की योजना थी जहां इस पर शोध किये जाते और इसे प्रयोगशाला में उगाने की विधि विकसित की जाती| इस पर पेटेंट लिए जाते और फिर चीन में इसे सस्ते में उगाकर दुनिया भर जिसमे भारत भी शामिल है में विदेशी मशरूम बताकर बेचा जाता| इस पूरी प्रक्रिया में छत्तीसगढ़ और पारंपरिक चिकित्सकों का कोई जिक्र नहीं होने वाला था| न ही उन्हें अपनी सम्पदा और पारंपरिक ज्ञान से आर्थिक लाभ होने वाला था| मैं एक बड़ी साजिश का हिस्सा बनने वाला था|

सारा खेल जान लेने के बाद मैंने उनसे दो टूक कहा कि आप राष्ट्रीय जैव-विविधता बोर्ड के नियमो के अनुसार चलेंगे तो मै आपके साथ हूँ| यदि आप गलत राह पकड़ेंगे तो फिर मै आपके साथ नहीं जुड़ सकता| उन्होंने काफी मिन्नतें की| सब्ज-बाग़ दिखाए| प्रलोभन दिए| और कुछ दबाव भी डलवाया पर बात न बनते देखकर बोले कि मशरूम तो हम दूसरे रास्तों से बाहर भेज देंगे आप बस इससे सम्बंधित ज्ञान साझा कर लें| हमने जंगल छान मारा पर यह ज्ञान हमें नहीं मिला| पारंपरिक चिकित्सक बिकने को तैयार नहीं है| बिन ज्ञान के ये मशरूम हमारे लिए बेकार है|

मैंने पूछा, इसमे पारंपरिक चिकित्सको की कितनी हिस्सेदारी रहेगी और क्या आप क़ानून के अनुसार लिखित में सारी प्रक्रियाए अपनाएंगे? वे बगलें झांकने लगे| उन्होंने मुझसे दूरी बना ली|

लम्बे समय से चल रही फाका-मस्ती का अब अंत हो जाएगा, इस उम्मीद में माता-पिता थे| घर में महंगी गाड़ियों में लोग आ रहे थे और परामर्श शुल्क दे रहे थे| माता-पिता को उम्मीद थी कि अब बेटा काम पे लग जाएगा और कम्प्यूटर और जंगल से दूर हो जाएगा| हो सकता है कि शादी भी कर ले पर जब मैंने उन्हें अपना फैसला बताया तो वे मायूस लगे| पर जब फैसले की वजह बतायी तो माँ ने बिना देर किये कहा कि मैंने सही कदम उठाया|

अभी भी अक्सर वे महंगी गाड़ियां जंगलों में दिख जाती हैं| मैं अकेला कब तक संपदा की रक्षा करूँ| जब जिम्मेदार विभागों को ही इसकी परवाह नहीं है तो कोई क्या करे और कितना करे? (क्रमश:)

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

© सर्वाधिकार सुरक्षित

2 comments:

अन्तर सोहिल said...

"जब जिम्मेदार विभागों को ही इसकी परवाह नहीं है तो कोई क्या करे"

यही तो रोना है.

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cooltoad said...

Hats Off Sir. I am really impressed by your step. Main Hindi mein likhne ka vikalp khoj raha hun. Aap ki Bhasha Shaili mein Saahitykaar ki jhalak Drishtigat hui. Daampatya jeevan mein fanse mujh jese abhyarthi prakrati se prem karne ka haq ganva dete hain. Aur na chahte huey raashan ki quataron mein dikhayi dete hain. Aap ki lekhini mein hasya aur vyang ka napa tula mishran bhaanp ke mein fula nahi samaya. Dhanyawaad. Agami post ka mujhe besabri se intezaar rahega. Aap ke dwara likhi gayi posts se mujhe bachpan mein padi comics yaad aane lagi.