Thursday, April 16, 2009

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -110

अन्ध-विश्वास के साथ मेरी जंग : कुछ अनुभव -110
(क्या आप बीटी बैगन के लिये प्रयोगशाला जीव बनने तैयार है?) - पंकज अवधिया


जब चने की फसल मे इल्लियो का आक्रमण होता है तो बहुत से जानकार किसान खेतो मे घूम-घूम कर अपने आप मरी हुयी इल्लियो की खोज करते है। फिर इन इल्लियो को पानी मे मिलाकर घोल बनाते है और इस घोल को चने की प्रभावित फसल मे डाल देते है। कुछ ही समय मे चने की इल्लियाँ मरने लगती है और फसल इस कीट से मुक्त हो जाती है। यह चमत्कार नही है। इसका भी एक विज्ञान है। दरअसल किसान जिन मरी हुयी इल्लियो को एकत्र करते है उनकी स्वावभाविक मौत नही हुयी होती है। बैसीलस थरिजेनेसिस नामक जीवाणु (बैक्टीरिया) के कारण हुयी होती है। जब मरी हुयी इल्लियो का घोल बनाया जाता है तो इन जीवाणुओ को फैलने का मौका मिल जाता है। इल्लियो का घोल जब चने की फसल पर डाला जाता है तो ये जीवाणु फैल जाते है और स्वस्थ्य इल्लियो को अपनी चपेट मे ले लेते है। इस तरह बिना रसायन के किसान चने की इल्लियो से निपट लेते है।

जब वैज्ञानिको ने यह देखा तो उन्होने किसानो के दोस्त और इल्लियो के दुश्मन इस जीवाणु पर विस्तृत शोध आरम्भ किया। शोध के दौरान उन्होने जीवाणु के शरीर मे ऐसे जीन (टाक्सिन) का पता लगाया जो कि इल्लियो के लिये जानलेवा था। अब वैज्ञानिको का खुरापाती मन जागा और उन्होने इस जीन को उन फसलो मे डालना आरम्भ किया जिनमे इन इल्लियो का आक्रमण होता था। उन्होने पाया कि जीवाणु के जीन युक्त पौधो मे इल्लियो का आक्रमण कम या नही के बराबर होता है। इसे एक क्रांतिकारी खोज माना गया।

आपने इस जीवाणु का वैज्ञानिक नाम पहले पढा है। बैसीलस थरिजेनेसिस। संक्षेप मे इसे बीटी कह दिया जाता है। वही बीटी जिसका नाम विदर्भ मे आत्महत्या कर रहे किसानो के सन्दर्भ मे बार-बार आता था। सबसे पहले बीटी कपास या काटन भारत मे प्रस्तुत किया गया। कपास की फसल को इल्लियो से बहुत नुकसान पहुँचता है। बीटी काटन को प्रस्तुत करने वाली कम्पनियो ने बडे-बडे दावे किये कि इससे किसानो का भला होगा और कीटो से होने वाले नुकसान मे भारी कमी होगी। आप जानते ही होंगे कि बीटी काटन का व्यापक विरोध हुआ। इसे जैव-विविधता और देशज वनस्पतियो के लिये खतरा बताया गया। यह भी कहा गया कि इससे देशी किस्मे धीरे-धीरे खत्म हो जायेगी और किसानो की निर्भरता विदेशी कम्पनियो पर बढ जायेगी। भारत मे बतौर प्रयोग इन्हे बहुत से स्थानो मे लगाया गया। दक्षिण भारत मे तो किसानो ने फसल को जला दिया। ऐसा नही है कि सभी इसके विरोध मे थे। देशी-विदेशी वैज्ञानिको ने इसका समर्थन किया।

बीटी फसलो का विरोध करने वाले ये चेताते है कि जीवाणु के जीन से युक्त फसले जब आम लोगो के द्वारा उपयोग की जायेंगी तो उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पडेगा। अब प्रकृति मे तो ऐसा होता नही है। यह तो मानव जनित प्रयोग के परिणाम है। कौन जाने ऊँट किस करवट बैठेगा? समर्थन करने वाले वैज्ञानिक कहते रहे कि इससे स्वास्थ्य को कोई नुकसान नही होगा जबकि विरोधी कहते रहे कि दूरगामी विपरीत परिणाम होंगे। जब बीटी काटन को प्रस्तुत किया गया तो यह दावा किया गया कि चूँकि कपास को किसी तरह मनुष्य़ खाने के उपयोग मे नही लाता है इसलिये जीवाणु के जीन युक्त कपास से मनुष्य़ॉ के स्वास्थ्य पर विपरीत असर नही पडेगा। पर विरोधियो ने तर्क दिये कि कपास की खली जानवर खाते है और उन जानवरो का माँस और दूध मनुष्य इस्तमाल करते है इसलिये जीवाणु का विष मनुष्य़ के भीतर आ सकता है। सारे विरोधो के बावजूद बीटी काटन भारत आया। किसानो ने इसे हाथो-हाथ अपनाया। इसके महंगे बीजो के लिये ऋण लिया। दावे खोखले निकले। इल्लियो का जबरदस्त आक्रमण हुआ और फसल चौपट हो गयी। किसान कर्ज के भारी बोझ मे दब गये और उसके बाद क्या हुआ हम सब जानते है। इस सब के बाद समर्थक यह खबरे प्रकाशित करवाते रहे कि किसानो की आत्महत्या का कारण बीटी काटन नही बल्कि खराब मौसम है। और विरोधी कहते रहे कि सारा किया कराया बीटी काटन का ही है।

अब एक बार फिर देश मे बीटी फसल की चर्चा है। इस बार बीटी बैगन आ रहा है। आ रहा है या कहे, आ गया है। समर्थक और विरोधी मोर्चे पर डटे हुये है। चूँकि यह क्लिष्ट तकनीकी विषय है इसलिये आम जनता इससे अंजान है। किसी ने उन्हे सरल भाषा मे समझाया नही। पर यह भी नग्न सत्य है कि इस बीटी बैगन को खाना उन्हे ही है। वैसे हमारे देश मे आम जनता से पूछने की परम्परा नही है। जनता नेताओ को चुन लेती है और वैज्ञानिक नेताओ से चिपक जाते है। बस ये दोनो ही आम जनता से पूछे बिना पाँच वर्षो तक अपना राज चलाते है। जनता मे से कोई पूछता है तो तकनीकी बाते करके उन्हे चुप कर दिया जाता है। जब हाल ही मे विदेशो से घटिया क्वालिटी का गेहूँ खरीदा गया था तो कुछ वैज्ञानिको ने दबी जबान से कहा था कि यह जहरीला है। और इसके साथ दसो नये खरप्तवार आ जायेंगे। ये खरप्तवार पीढीयो तक गाजर घास की तरह देश का अरबो नुकसान करते रहेंगे। उन वैज्ञानिको को चुप करा दिया गया। मैने इस विषय मे हिन्दी मे लेख लिखे पर पंजाब की एक कृषि पत्रिका ने इसे छापने से इंकार कर दिया। फिर दूसरे अखबारो ने भी जैसे मौन साध लिया। आज जहरीला गेहूँ दुकानो मे मिल रहा है। जहर तो चुपचाप असर कर रहा है पर गुणवत्ता के बारे मे शिकायते आने लगी है। कुछ ही महिने पहले भुवनेश्वर के कृषि विश्वविद्यालय ने एक खबर छपवायी कि विदेश से आयातित गेहूँ के साथ आये खरप्तवारो ने उडीसा मे फैलना शुरु कर दिया है। चलिये अब वैज्ञानिको को नया काम मिला। अब खरपतवार फैलेंगे तो उनके नियंत्रण पर शोध होंगे। रसायनो का अनुमोदन होगा तो देशी-विदेशी कम्पनियो के दिन फिरेंगे। एक बार घटिया गेहूँ लाकर हमारे योजनाकर्ताओ ने दशको तक अपने लोगो की मलाई का प्रबन्ध कर दिया।

आम जनता को न तो घटिया गेहूँ के आयात का पता था न ही बीटी बैगन के आगमन का। मै यह दावे से कह सकता हूँ कि आपमे से अधिक्तर पाठक भी इस लेख के माध्यम से पहली बार इस विषय मे सरल भाषा मे जानकारी पा रहे होंगे। यही इस लेख का उदेश्य भी है। अब आप ही बताइये कि क्या आप जीवाणु के जीन युक्त बैगन को खाना पसन्द करेंगे? क्या आप से किसी ने इसके बारे मे पहले पूछा? क्या इस पर व्यापक राष्ट्रीय बहस की जरुरत नही है? मुझे आम जनता की स्थिति बहुत दुखदायी लगती है। आम जनता जाने या न जाने पर वह चाहकर भी कुछ नही कर सकती। वह समर्थको और विरोधियो के बीच पिसने के लिये अभिशप्त है। मै बातो का खुलासा कर ही देता हूँ।

बीटी फसलो की जब भारत मे बात शुरु हुयी ही थी तो विरोधियो के तर्को से प्रभावित होकर मैने इसके विरोध मे बिगुल फूँका था। रैलियो और प्रदर्शनो मे भाग लिया और लेख भी लिखे। एक बात मुझे हमेशा खलती रहती थी कि किसी ठोस वैज्ञानिक आधार पर हम विरोध नही कर रहे थे। बस विरोध करना है इसलिये कर रहे थे। प्रदर्शनो के दौरान मै साथियो से पूछता था कि आप क्यो विरोध कर रहे है? तो वे सीधा जवाब नही दे पाते थे। वे कहते थे कि इन फसलो से मनुष्यो मे कैसर हो जायेगा। कोई प्रमाण? तो वे बगले झाँकने लगते थे। कम्पनी के लोग दावा करते थे कि इससे कैंसर नही होगा। कोई प्रमाण? तो उनकी स्थिति भी वही होती थी। यह फसल वैज्ञानिको की कारतूत है। जब इससे पहले किसी ने इसे नही बनाया तो कैसे अनुमान लगाया जा सकता है कि आम मनुष्यो पर इसका कोई असर पडेगा कि नही। कम से कम दस साल तक प्रयोगशाला जीवो को खिलाकर यह सुनिश्चित किया जाना चाहिये कि इसका क्या असर होगा मनुष्यो पर। पर बाजार के चलते यह सब करने को कोई तैयार नही है। कम्पनी साधन सम्पन्न है इसलिये बडे से बडा वैज्ञानिक उनके पक्ष मे बोलने को तैयार है। वे लोग अखबारो मे भी अपने पक्ष मे खबर छपवाने मे सक्षम है। उन्हे पता है कि आम जनता के मन मे वैज्ञानिको के प्रति बहुत सम्मान है। आम जनता तक बात पहुँचेगी और वे बीटी फसलो को अपना लेंगे। इस सब के चलते विरोधियो की आवाज नक्कारखाने मे तूती की आवाज साबित हो रही है। मै बीटी फसलो के विरोध की अपनी मुहिम की बात कर रहा था। मेरा विरोध चलता रहा। कुछ समय मे भीड छँटने लगी। राष्ट्रीय स्तर पर शोर मचाने वाले अचानक से चुप हो गये। मुझे देखकर कन्नी काटने लगे। मुझे असमंजस मे देखकर किसी ने कहा कि ऊपर सेटिंग हो गयी होगी। अब दूसरे मुद्दे पर आँदोलन करते है। आपको कुछ चाहिये था तो पहले कहना था न। उसके बाद बीटी काटन भारत आया और बरबादी फैलाता रहा। मजाल है कि विरोध मे एक भी स्वर उठे हो।

आज जब बीटी बैगन के विरोध मे स्वर उठ रहे है तो मुझे पुरानी बाते याद आ रही है। कौन जाने विरोध करने वाले कम्पनी के ही लोग हो ताकि दूसरे विरोधी न खडे हो। आप देखियेगा बीटी बैगन के विरोध का शोर भी अचानक थम जायेगा और जल्दी ही यह आपके खाने की टेबल पर दिखेगा। पर फिर भी इस लेख के माध्यम से मै आम जनता को इस नयी तकनीक के बारे मे बता देना चाहता हूँ। इस उम्मीद मे कि शायद वह प्रयोगशाला जीव बनने के लिये तैयार न हो और इस पर राष्ट्र स्तरीय चर्चा की पहल करे। अमेरिका के लोग प्रयोगशाला जीव बनने को तैयार है। यूरोपीय देश इस तकनीक को संश्य से देख रहे है। हाल ही मे जर्मनी ने जनता का माँग पर ऐसी फसलो पर प्रतिबन्ध लगा दिया है। क्या भारत के आम लोग जागेंगे? (क्रमश:)


(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

© सर्वाधिकार सुरक्षित

1 comments:

Anil said...

जनता की सेहत का राजनीतिकरण : बहुत दुखद है।