मेरी जंगल डायरी से कुछ पन्ने-35
- पंकज अवधिया
वृक्षो की गोन्द चाटते बन्दरो का पीछा और रोचक रहस्योघाटन
पहाडी पर चढने से पहले ही स्थानीय लोगो ने चेता दिया था कि नारियल और दूसरी पूजन सामग्री लेकर नही जाये, बन्दर रास्ते मे ही लूट लेंगे। पर फिर भी हम बडी मात्रा मे पूजन सामग्री लेकर चढे। कुछ दूर चढने पर ही बन्दरो ने हमारे आस-पास घूमना शुरु कर दिया। मेरे हाथ मे कैमरा था इसलिये मुझमे वे ज्यादा रुचि नही ले रहे थे। पीछे चल रहे पारम्परिक चिकित्सक पर उन्होने धावा बोल दिया और सारी पूजन सामग्री जमीन पर बिखर गयी। बन्दरो को जो खाते बना, खा गये पर नारियल वैसे के वैसे पडे रहे। पीढीयो से इस पहाडी मे रहते हुये भी उन्होने नारियल को छीलना नही सीखा था। मैने आगे बढकर गिरे हुये नारियल को उठाना चाहा तो उन्होने उस ओर देखा तक नही। सामग्री लूट लेने के बाद उनकी रुचि हममे कम हो गयी। बस इसी पल का हमे इंतजार था। हम तस्वीरे लेने लगे और बन्दरो के व्यव्हार का अध्ययन करने लगे। इस बीच पारम्परिक चिकित्सक ने बन्दरो का विश्वास जीतने के लिये नारियल उठाया और पत्थर से उसे फोड दिया। फिर नारियल को बन्दरो मे बाँट दिया। बन्दरो का नजरिया हमारे प्रति दोस्ताना हो गया।
हमने पहाडी का मुख्य मार्ग छोडा और उस रास्ते पर चल पडे जिससे कम ही लोग आते जाते थे। बन्दर कुल्लु के वृक्ष पर बैठे हुये थे। आपने इस वृक्ष के विषय मे इस लेखमाला मे काफी कुछ पढा है। करीब एक घंटे तक लगातार बन्दरो को देखने के बाद बोरियत सी होने लगी। तभी एक बन्दर को नुकीला पत्थर उठाते देखा। उसने पत्थर की सहायता से कुल्लु की तने को मारना शुरु किया। तना नरम था इसलिये थोडी ही मेहनत से तने से गोन्द निकलनी आरम्भ हो गयी। बहती गोन्द को पहले व्यस्को ने चाटा और फिर बच्चो ने। चाटने का क्रम पारी-पारी से काफी देर तक चलता रहा। इसके बाद वे सब एक ऊँची चट्टान पर गये और एक छेद मे जमे बारिश के पानी का सेवन करने लगे।
कुल्लु की गोन्द का प्रयोग वनवासी पीढीयो से करते आ रहे है। वे गर्मी के दिनो मे शीतलता के लिये गोन्द को पानी मे भिगो देते है और फिर उस पानी को पी लेते है। बन्दर भी लगभग वैसा ही कर रहे थे। इसका मतलब क्या वे भी शीतलता की तलाश मे थे? पारम्परिक चिकित्सक ने शांत रहकर सब कुछ देखते रहने का निर्देश दिया। पानी पीने के बाद सारे के सारे बन्दर पहाडी के दूसरी ओर चले गये। हमने पीछा करने की ठानी।
कुछ दूर चलने पर हमे पहाड पर खोह दिखाई दिये। उनमे हलचल हो रही थी। हमे पता था कि इन खोह मे भालू हो सकते है। हमारे रोंगटे खडे हो गये। यदि भालू सामने आ जाते तो हमारे पास करने को ज्यादा कुछ नही था। मदद के लिये कोई आस-पास नही था और अगर होता भी तो भालूओ के शिकंजे से बचाने कोई सामने नही आता। खोह मे हलचल बढ रही थी।
सम्भावित हमले को देखते हुये मैने मोबाइल निकालना ही उचित समझा। बडी जोर से रेशमिया गीत बजाने लगा। फिर धीरे-धीरे हम उस खोह से आगे निकल गये। मुझे एन 73 की ध्वनि गुणवत्ता का असर एक बार फिर पता चला। पारम्परिक चिकित्सक ने जोर-जोर से हनुमान चालीसा पढना शुरु किया। किसी भी तरह शोर करना था ताकि भालू खोह से बाहर न निकले। तरकीब काम आयी और हम आगे बढ गये। हमे बन्दरो का झुंड फिर से दिखायी देने लगा। वह सलिहा वृक्ष के तने से गोन्द चाटने मे मगन था। गोन्द चाटने के बाद उन्होने पानी नही पीया। कुछ देर के बाद वे और आगे बढ गये। हमने अपने लिये रास्ता बनाने की कोशिश आरम्भ कर दी। इस बीच हमे गोह दिखायी दिये जो कि चट्टानो के पीछे छिपे हुये थे। ये आजकल दुर्लभ हो गये है। इन्हे देखना सचमुच हमारा सौभाग्य था। कुछ दूर चलने पर हमे तेज दुर्गन्ध आने लगी।
बन्दरो का समूह किसी हाल ही मे मरे जीव का भक्षण कर रहा था। बन्दर शाकाहारी माने जाते है पर विपरीत परिस्थितियो ने इन्हे सर्वहारी बना दिया है। पारम्परिक चिकित्सक ने बताया कि यह बन्दरो का शिकार नही है बल्कि ये किसी दूसरे जीव के शिकार का हिस्सा चुरा रहे है। हो सकता है कि दूसरा जीव आस-पास ही हो और पहले चक्र के भोजन के बाद आराम कर रहा हो। इस माँस को खाने से शरीर मे गर्मी पैदा होती और बन्दरो का स्वास्थ्य बिगडता इसलिये उन्होने शीतलता प्रदान करने वाली गोन्द का सेवन किया। यह सुनकर लगा कि इतना खतरा उठाना व्यर्थ नही गया। मै आस-पास की वनस्पतियो की तस्वीरे लेने लगा। तभी पारम्परिक चिकित्सक को एक वृक्ष के शीर्ष पर आराम करता तेन्दुआ दिखा। उसने शायद हमे देख लिया था पर फिर भी वह शायद ही आक्रमण करता। हम उसके शिकार के नजदीक जाते तब ही शायद वह हमला करता। बन्दर तेन्दुए की उपस्थिति से अंजान थे। तेन्दुआ बन्दरो को खाना पसन्द करता है। इसके लिये वह वृक्ष मे भी चढ जाता है। तेन्दुआ जरुर बन्दरो पर नजर गडाये हुये था। पीछे भालू की खोह, ऊपर तेन्दुआ और सामने बन्दर, बडी विकट स्थिति थी। तभी मोबाइल की घंटी बजी। उधर से आइसी-वाइसी बैक से कोई मधुर आवाज मे स्कीमे बता रहा था। मुझे लगा कि स्कीम बताने वाले को बिना देर यहाँ बुला लूँ और सारी बाते समझ लूँ। फोन काटा और फिर हम वापस लौटने लगे।
भालू की खोह के पास पहुँचे तो फिर हनुमान चालीसा और रेशमिया गीत का शोर शुरु कर दिया। जैसे-तैसे हम मुख्य मार्ग तक पहुँचे। देखा तो वहाँ कोई हमारी प्रतीक्षा कर रहा था। वे ऊपर वाले मन्दिर के पुजारी थे। उन्हे किसी ने हमारे रास्ते भटकने की बात बता दी थी। भालू की खोह की ओर गया जानकर वे मन्दिर छोडकर आ गये थे। उन्होने बताया कि पहले बहुत से हादसे हो चुके है इस कच्चे मार्ग पर। अनजान जगहो पर ऐसे जाना ठीक नही है। हमने अपनी गल्ती मानी।
पुजारी जी को हमने बन्दरो के व्यवहार के बारे मे बताया। उन्होने कहा कि पहले बन्दर पहाडो तक सीमित थे। उन्हे पहाड से पर्याप्त भोजन और पानी मिल जाया करता था। जब से इस पहाड मे मनुष्य़ की गतिविधियाँ बढी है तब से पहाड की वनस्पतियाँ खत्म होती जा रही है। पहाडी के आधार पर जंगली फलो के वृक्षो को काटकर जैट्रोफा लगा दिया गया है। बन्दर इसके जहरीले फलो को नही खाते है। बहुत से सजावटी पौधो का रोपण भी किया गया है। अब ये पौधे जंगलो मे खरप्तवार बनकर फैलने लगे है। मनुष्य़ भक्त के रुप मे आ रहे है और ढेरो कचरा छोडकर जा रहे है। अपने आवास को बर्बाद होता देखकर अब बन्दर नीचे बस्ती मे जा रहे है। बस्ती मे उन्हे आसानी से खाना मिल जाता है। इससे उनकी रुचि जंगली वनस्पतियो मे कम हो रही है। उन्होने अपनी युवावस्था को याद करते हुये बताया कि उन्हे भी बन्दरो और दूसरे जीवो के वनस्पति प्रेम का अध्ययन करने मे रुचि थी। उन्होने इस बात की पुष्टि की कि काँटेदार सेमल के वृक्ष मे बन्दर नही बैठते है पर उसके सभी भागो के औषधीय प्रयोगो के विषय मे वे जानकारी रखते है।
शाम होने लगी। भक्तो का आना बन्द हो गया। पुजारी जी ने कहा कि अब भालूओ के बाहर निकलने का समय है। ठंडक होने पर सर्प भी निकलने लगेंगे इसलिये नीचे उतरना ही ठीक होगा। हमने उनकी बात मानी और उनके पीछे चल पडे। (क्रमश:)
(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)
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Saturday, July 4, 2009
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3 comments:
बहुत रोचक जानकारी । विवरण पढते हुए डिस्कवरी के Man v/s wild की याद हो आई।
अच्छी पोस्ट।
रोचक वर्णन।
बीच जंगल में आइसी-वाइसी बैंक और रेशमिया संगीत से मुस्कुराहट आई।
रोचक जानकारी
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